
- डॉ. दीपक हरी रानडे
लेखक कॉलेज ऑफ हॉर्टिकल्चर, मंदसौर के अधिष्ठाता हैं।
एक डिब्बा मावे की जलेबी जो खुद रिश्ते में मैदे की जलेबी की बड़ी बहन लगती है लेकिन तासीर वही छोटी बहन वाली- ऊपर से कुरकुरी और अंदर से नर्म।
मनुष्यों को पशुओं से अलग करने वाली कुछ बातों में एक है हमारा स्वाद। हम इंसानों में 2000 से 8000 टेस्ट बड्स होती हैं। जो हमें अलग-अलग स्वादों से परिचित कराती हैं। लेकिन जीवन में कुछ स्वाद ऐसे होते हैं जो केवल जीभ पर नहीं ठहरते बल्कि हमारे मन में भी बस जाते हैं। बरसों बाद भी जब उनका नाम सुनाई देता है तो उनसे जुड़ी जगहें, लोग और अवसर सब एक-एक करके आंखों के सामने उतर आते हैं।
मेरे लिए जबलपुर के बड़ेरिया मिष्ठान्न भंडार की मावे की जलेबी ऐसा ही एक स्वाद है। संयोग कुछ ऐसा बना कि पिछले दिनों हमारे एक साथी जबलपुर से मावे की जलेबी लेकर मंदसौर आए। वजह भी बड़ी सुखद थी। उनकी बिटिया का भोपाल के एक प्रतिष्ठित अभियांत्रिकी संस्थान में प्रवेश हुआ था। खुशी बांटने का इससे अच्छा तरीका और क्या हो सकता था कि मुंह मीठा कराया जाए।
खैर, उनके मिठाई का डिब्बा खोलने की देर थी कि हमारा पूरा घर मावे और चाशनी की खुशबू से भर गया। पहला निवाला लेते ही अद्भुत आनंद से मेरी आंखें मूंद गईं। ऐसा लगा कि जैसे जबलपुर ही उठकर हमारे घर में आ गया। वह स्वाद, वह जानी-पहचानी गंध और बाहर से हल्की कुरकुरी, भीतर से मुलायम, मावे की भरपूर मिठास से भरी हुई वह जलेबी। सच कहूं तो उस समय मिठाई कम और अपनापन ज़्यादा खाया।और जैसा कि आजकल चलन है, अपनी हर खुशी-हर गम को तुरंत सोशल मीडिया पर बांटने का तो खुशी में मैंने अपने मित्रों के व्हाट्सऐप समूह पर तुरंत कुछ पंक्तियां लिख भेजीं-
जबलपुर में बनी कल,
पहुंची आज जलेबी,
मंदसौर आकर मुझे मिली अभी।
मावे की जलेबी,
बड़कुल या बड़ेरिया,
मजे ले-लेकर,
अपुन इसे खारिया।
इस तरह आती रहें,
मिलती रहें जलेबियाँ
देते रहेंगे हम,
बधाइयां ही बधाइयां।
होते रहो हमेशा,
अच्छे नंबरों से पास,
मिलती रहें हमें,
जलेबियाँ ऐसी झकास।
मित्रों ने भी इस आशु कविता का खूब आनंद लिया। किसी ने कहा कि अब तो जबलपुर जाने की इच्छा हो रही है तो किसी ने लिखा कि ऐसी मिठाइयाँ मिलती रहें तो बधाइयां देने का मन भी बार-बार करेगा। मुझे लगा कि एक साधारण-सी जलेबी की मिठास कुछ ही मिनटों में मेरे घर से आभासी दुनिया में दूर-दूर तक फैल गई।

जलेबी आखिर किसकी?
बड़ेरिया की मावे की जलेबी तो जबलपुर की खासियत हो गई लेकिन जलेबी का इतिहास बहुत दिलचस्प है। जलेबी भारत की लोकप्रिय मिठाइयों में है लेकिन इसकी उत्पत्ति फारस (मौजूदा ईरान) या अरब क्षेत्र में मानी जाती है जहां यह मैदे से बनती थी और इसे ज़लाबिया कहा जाता था। यह व्यापारियों के जरिये से 12वीं–13वीं शताब्दी में भारत पहुंची। यहां आकर इसमें स्थानीय स्वाद जुड़े और केसर, इलायची तथा गुलाबजल का प्रयोग होने लगा। 15वीं शताब्दी के संस्कृत ग्रंथ प्रियंकररूपरेखा में इसका उल्लेख कुण्डलिका नाम से मिलता है। मुगल काल में यह शाही रसोई से निकलकर जन-जन की मिठाई बन गई। समय के साथ मावे और छेने की जलेबियाँ भी बनने लगीं।
बहरहाल, जबलपुर की मावे की जलेबी की बात ही कुछ और है। यह केवल मिठाई नहीं, शहर की पहचान है। जब भी कोई परिचित जबलपुर से लौटता है, मन अनायास पूछ बैठता है, ‘जलेबी तो लाए होंगे?’ और यदि सचमुच डिब्बा निकल आए तो समझिए यात्रा सफल हो गई। मुझे हमेशा लगता है कि हर शहर की अपनी एक खुशबू होती है। इंदौर के नाम के साथ पोए-जलेंबी (पोहे-जलेबी) की खुशबू जुड़ी है तो मथुरा कहते ही पेड़ा याद आता है। रतलामी बोलते ही हमारे मुंह से सेंव अपने आप निकल आता है। आगरे को पेठे से अलग करना तो ऐसा है जैसे जिस्म को जान से अलग कर दिया जाए। इसी तरह जबलपुर की पहचान अगर किसी मिठाई से जोड़नी हो तो मैं बिना झिझक मावे की जलेबी का नाम लूंगा। यह केवल स्वाद नहीं देती, इस शहर से जुड़े रिश्तों की गर्माहट भी साथ लेकर आती है।
आजकल हम छोटी-छोटी खुशियां मनाने के मौके कम निकालते हैं। लेकिन उस दिन महसूस हुआ कि एक डिब्बा जलेबी भी लोगों को जोड़ सकती है। शायद इन्हीं छोटी-छोटी खुशियों का नाम जीवन है।जब मावे की जलेबी सामने आती है तो मुझे सबसे पहले उसका स्वाद नहीं वह दिन याद आता है जब एक पिता अपनी बेटी की सफलता की खुशी बांटने हमारे बीच आया था। उस दिन समझ में आया कि मिठाइयाँ केवल चीनी और मावे से नहीं बनतीं उनमें रिश्तों की मिठास, शुभकामनाओं की ऊष्मा और साझा खुशी का स्वाद भी घुला होता है। शायद, इसलिए कुछ जलेबियाँ खा लेने के बाद भी बरसों तक याद रहती हैं। कुछ स्वाद जुबान से कभी नहीं उतरते।
लेखक डॉ. दीपक हरी रानडे कॉलेज ऑफ हॉर्टिकल्चर, मंदसौर के अधिष्ठाता हैं। जल संरक्षण एवं कृषि अभियांत्रिकी के क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें भारत सरकार के प्रतिष्ठित ‘बसंतराव नाइक अवार्ड’ सहित अनेक राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हैं।


Mouth watering composition. Charged with emotion, packed with taste with touch of historicity and sweetness of relationship with a native town through taste bud.