
- आशीष दशोत्तर
साहित्यकार एवं स्तंभकार
कहीं नज़दीक होना और सबसे दूर जाना
ये कैसी आग है जिस में कोई तपिश न धुआँ,
ये कैसा रब्त है जो फ़ासले बढ़ाता है।
लफ़्ज़ों को सलीके से बरतने और ग़ज़ल में बहुत पाकीज़गी के साथ उन्हें इस्तेमाल करने वाले शाइर मुमताज़ राशिद का ये शे’र बहुत सीधा होकर भी कई सारी उल्टी बात कर रहा है। शेर के दोनों मिसरों के सीधे-सीधे मआनी समझ में आते हैं। शाइर यहां बिना धुएं और तपिश वाली आग को समझा रहा है और फिर नज़दीक होकर भी दूर होने की बात कर रहा है। इस शेर को अगर गहराई से देखा जाए तो यह ज़िन्दगी के कई फलसफे हमारे सामने पेश करता है। इस शे’र को अलग तरीके से समझा जाए तो इसमें बहुत कुछ ऐसा भी है जो अनकहा है।
सामान्यतः यह माना जाता है कि आग वही होती है जिसकी तपन को महसूस किया जाए और जिसमें से धुआं निकले। यह कहा भी जाता है कि बिना आग के धुआं नहीं निकलता। अगर शाइर यह कह रहा है कि ऐसी आग जिसमें तपिश भी नहीं है, धुआं भी नहीं है फिर भी वह आग है तो इसका सीधा सा अर्थ है कि यह भीतर ही भीतर सुलगने वाली आग है। यह आज इश्क की भी हो सकती है और ईर्ष्या की भी। यह आज प्यार की भी हो सकती है, नफ़रत की भी। यह आग अपनों के दिए हुए ज़ख़्मों की भी हो सकती है और परायों द्वारा दिखाई गई सहानुभूति की भी। ऐसी आग में कभी धुआं निकलता दिखाई नहीं देता। यह इंसान को भीतर ही भीतर जलाती है। उसे परेशान करती रहती है। इंसान इस आग के रहते भीतर ही भीतर तपन महसूस करता। उसके विचार कुंठित हो जाते हैं। उसकी सोच सीमित हो जाती है। उसकी दृष्टि बहुत दूर तक नहीं देख पाती। यह आग उसे किसी दायरे में क़ैद कर देती है।
जब ऐसी आग लगती है तो इंसान ख़ुद को अकेला पाता है। उसे दुनिया में कुछ अच्छा नहीं लगता। वह सबसे अलग-थलग महसूस करता है। वह सबको अपना दुश्मन समझता है। उसकी नज़र में किसी की कोई अहमियत नहीं होती। सभी के प्रति उसका दृष्टिकोण अलग हो जाता है। शाइर इसी आग की बात कर रहा है जो इंसान के भीतर ही भीतर सुलगती रहती है।
सानी मिसरे में शाइर ने फिर एक विपरीत बात कही है। किसी से ऐसा संबंध होना जो फ़ासले बढ़ा दे। किसी के नज़दीक इतना जाना कि दूरियां बढ़ जाएं। यह ज़िन्दगी का अनुभव है। जीवन में कई बार ऐसे क्षण आते हैं जब किसी के बहुत नज़दीक होकर भी बहुत दूर महसूस किया जाता है। यह उस भीतरी आग ही नतीजा होता है। इंसान ऊपर से किसी के बहुत क़रीब होता है लेकिन भीतर से वह उतना ही दूर होता है। उसका प्रेम बाहर से बहुत प्रकट होता है लेकिन भीतर से उतनी ही नफ़रत उसे किसी से दूर कर देती। शाइर इंसान के उस चरित्र को उजागर कर रहा है जो उसे दोगला साबित करता है।
इस शे’र को तसव्वुफ़ के रंग में रंगा हुआ शेर भी कहा जा सकता है। आशिक और माशूक के बीच की दूरी किसी आग की तरह ही होती है। इस विरह की स्थिति को कोई बयां नहीं कर सकता। आशिक जब अपने महबूब को चाहता है तो उसे अपने बहुत नज़दीक रखता है। यह स्थिति ऐसी होती है जिसमें न मिलन होता है न ही जुदाई। इसमें भीतर ही भीतर आग सी लगती है। जिसे या तो आशिक महसूस करता है या माशूक।
शाइर यहां कहना चाहता है कि ऐसी आग किसी को दिखाई नहीं देती। इस आग का धुंआ भी किसी को नज़र नहीं आता। इसकी तपन भी वही महसूस करता सकता है जो इस आग में जल रहा है। ऐसी स्थिति में जब आशिक और माशूक के बीच एक रब्त बन जाता है, एक संबंध बन जाता है , तो इसमें आशिक और माशूक को तो अपार आनंद की अनुभूति होती है लेकिन ऐसे में दुनियावी नज़दीकियों से इंसान की दूरी बढ़ जाती है। एक ऐसा राब्ता क़ायम हो जाता है जो अन्य नज़दीकियों को ख़त्म कर देता है। इसे इस तरह भी समझा जा सकता है कि किसी के इतना नज़दीक होना कि बाक़ी सब से दूर हो जाना। तो यहां फ़ासला किसी और से बढ़ रहा है और राब्ता किसी और से क़ायम हो रहा है। यहां जिस्मानी और रूहानी रिश्तों के बीच की धारा को बखूबी परिभाषित किया गया है।
इस शेर को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी समझने की ज़रूरत है। विज्ञान यह कहता है कि संबंध समान ध्रुवों के बीच भी होता है और विपरीत ध्रुवों के बीच भी। समान ध्रुव एक दूसरे को प्रतिकर्षित करते हैं और विपरीत ध्रुव एक दूसरे को आकर्षित करते हैं। विपरीत ध्रुव जब एक दूसरे के क़रीब आते हैं तो वे एकाकार हो जाते हैं, लेकिन जब सामान ध्रुव एक दूसरे के क़रीब आते हैं तो वे इस तरह का संबन्ध बना लेते हैं जो एक दूसरे को दूर जाने पर मजबूर करता है। उन दोनों के समान होने को उनका यही गुण साबित करता है कि वे एक-दूसरे से दूर होकर भी जुड़े रहें। यह भी एक तरह की आग है जो इन दोनों सामान ध्रुवो के बीच में जलती रहती है , जिसमें कोई तपिश भी किसी को महसूस नहीं होती , कहीं धुआं किसी को दिखाई नहीं देता। लेकिन दोनों के मध्य एक संबंध बना होता है। जब यह राब्ता कायम होता है तो इसमें दोनों समान ध्रुव एक-दूसरे के क़रीब नहीं आते, दोनों एक दूसरे से दूर जाते हैं।
जीवन में भी यही होता है कि कई बार दो समान विचार वाले व्यक्ति एक-दूसरे से इस तरह जुड़े होते हैं कि वे एक दूसरे के क़रीब नहीं आते लेकिन फिर भी दोनों के मध्य एक संबंध स्थापित होता है। इसे वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझें तो जीवन का एक फलसफा यहां नज़र आता है। यह कहता है कि यह ज़रूरी नहीं कि कोई व्यक्ति आपसे मुख़्तलिफ़ हो तभी आप से संबंध बनाए। संबंध समान विचारधारा वाले लोगों के बीच भी होते हैं। इसमें एक-दूसरे से दूर जाने पर अधिक आनंद आता है। इस तरह वैज्ञानिक दृष्टिकोण से यह शेर जीवन के बहुत गहरे अर्थों को समझा रहा है और संबंधों की एक नई परिभाषा भी दे रहा है।
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