चौड़ी सड़कों और लंबी सुरंगों से आती तबाही

हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और केरल में तबाही का भयावह तांडव चल रहा है। यह सब जलवायु परिवर्तन का नतीजा है। लेकिन जो चीज इसे और विकराल बना रही है, वह है नफा-नुकसान सोचे बिना हो रहा ‘विकास’।

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द्वापर के कृष्ण देव होते हुए निरंतर मनुष्य बनते रहे

त्रेता का राम ऐसा मनुष्य है जो निरंतर देव बनने की कोशिश करता रहा। इसीलिए उसमें आसमान के देवता का अंश कुछ अधिक है। द्वापर का कृष्ण ऐसा देव है जो निरंतर मनुष्य बनने की कोशिश करता रहा। उसमें उसे संपूर्ण सफलता मिली।

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मेरी बनाई झालर से झिलमिलाता था घर, कहां गए वे दिन?

अशफ़ाक की मधुर आवाज गूंजती, “आरती का समय हो गया है। सभी बहनों, भाइयों, माताओं, बच्चों से से निवेदन है कि वो गणपति/मां दुर्गा के पास आएं और आशीर्वाद पाएं।”

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लुंबिनी के आंगन में … एक स्‍वप्‍न का हकीकत हो जाना

लुंबिनी के प्राचीन पथों पर धीरे-धीरे कदम रखते हुए और मौन को अपनाते हुए, आप इस स्थल की आध्यात्मिक गहराई को अधिक सहजता से अनुभव कर सकेंगे।

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आपका मौलिक अधिकार है सम्मान के साथ मरना

हर किसी को गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार है। मरने की प्रक्रिया में गरिमा अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का हिस्सा है। इस प्रकार, स्वतंत्र और सक्षम मानसिक स्थिति वाला व्यक्ति यह तय करने का हकदार है कि उसे चिकित्सा उपचार स्वीकार करना है या नहीं।

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जानने के लिए दूरी जरूरी है …

जिसे माया कहा गया है उसे उसके द्वैत से दूरी हासिल कर ही अद्वैत के करीब जाकर फिर उसे जो द्वैत और अद्वैत से परे है, को जाना जा सकता है। अद्वैत से उतरकर फिर द्वैत की दुनिया में आया हुआ व्यक्ति ही सिद्ध है या साइंटिफिक भाषा में एलियन है।

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एक दुकान जहां सुई से लेकर जहाज तक सब मिलता था

यह अद्भुत कस्बा पूरी तरह नर्मदा माई का बच्चा था। सारे तीज-त्यौहार, उत्सव, मेले, माई के बिना अधूरे रहते। निवासियों की दिनचर्या भी पूरी तरह माई पर निर्भर थी।

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इतनी मुहब्बत! मुझे ऐसा प्रेम कहीं ना मिला

यही वह जगह थी जहां मैंने बंगाली संस्कृति, उनके महान लेखकों और फिल्मकारों को जानना शुरू किया। गुरुदेव की लिखी ‘The Home coming’ पढके मैं रोया।

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मणि मोहन: खींंचे दृश्‍य और लिखे शब्‍द झरते हैं मन पर

मणि मोहन जी प्रकृति और परिवेश को जिन साधारण शब्दों से विशिष्‍ट भाव रूप में उकेर देते हैं उतनी ही दक्षता से कैमरे के जरिए फोटो पर भी उतार देते हैं।

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बंसीलाल परमार: जिनकी नजरों से हम दुनिया पहचानते हैं…

फोटोग्राफर बंसीलाल परमार जी के पढ़ाने का तरीका जितना वैज्ञानिक था, फोटोग्राफी उतनी ही मानवीय दृष्टिकोण से पगी हुई।

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