
- आशीष दशोत्तर
साहित्यकार एवं स्तंभकार
कवि रतन चौहान की नई पुस्तक ‘मैं अभी मृत्यु के बारे में नहीं सोच रहा हूं’ पर टिप्पणी
समकालीन कविता के सामने इस समय बहुत से संकट हैं । अभिव्यक्ति से लेकर ईमानदारी, प्रतिबद्धता से लेकर दृढ़ता और मुखरता से लेकर गहनता । सभी के बीच आज के कवि को एक पुल बनाना पड़ रहा है । उस पुल को मज़बूत करना पड़ रहा है । उस पर चलने का हौसला दिखाना पड़ रहा है और स्वयं को विषमताओं के अंधड़ में खड़ा रखना पड़ रहा है । समकालीन कविता के महत्वपूर्ण कवि और अनुवादक रतन चौहान ऐसे झंझावातों के बीच अपनी कविता को मुस्तैदी से लेकर खड़े हैं । अपनी कविता के ज़रिए तूफानों को चुनौती दे रहे हैं । अपनी शालीनता के साथ प्रतिबद्धता को लेकर चल रहे कवि रतनजी अपने हाल ही में प्रकाशित कविता संग्रह ‘ मैं अभी मृत्यु के बारे में नहीं सोच रहा हूं ‘ में हमारे इस विश्वास को मज़बूत करते हैं।
वरिष्ठ कवि, आलोचक श्री विजय कुमार कहते हैं ‘ भारतीय समाज में उन्माद और उपभोग की नई वास्तविकताओं में छिपी बर्बरता के सूक्ष्म रूपों की पड़ताल और एक बुनियादी नैतिक ताने- बाने को बचाए रखने की चिंता हमारी समकालीन कविता की मुख्य चिंता है । जिस दौर में इतिहास के नकार के स्मृतिहीन उत्सव हो रहे हैं और कला के स्वायत्तता की चतुर चर्चाएं चल रही हैं ,उसी दौर में यह कविता मनुष्य होने की मूलभूत गरिमा से भी वंचित लाखों ,करोड़ों मनुष्यों की दीनता और दुःख – दर्द को समझना चाहती है। यह कविता नैतिक मूल्यों पर आधारित जीवन दृष्टि तथा मनुष्य के बुनियादी राग व ऐंद्रिकता को बचाए रखने की बेचैनी में अपनी सांस्कृतिक जड़ों ,परंपराओं और लोक जीवन के तत्वों की ओर भी लौटना चाहती है।’
कमोबेश यही चिंताएं रतन चौहानजी की कविताओं में भी नज़र आती हैं । दरअसल आज कविता के सामने कई सारे अवरोध हैं। हर बोलने और लिखने वाले के सामने कई संकट हैं। उस पर कई दृष्टियां जमी हुई हैं । उसके शब्दों को तोला जा रहा है। उन पर बहुत कुछ बोला जा रहा है । इन सबके बावजूद खरी कविता आज भी अपने पलड़े पर मज़बूती से खड़ी हुई है । तमाम मुश्किलों, तमाम प्रतिकूलताओं के बावजूद आज भी रतन चौहान जैसे रचनाकार प्रतिबद्धता के प्रतिमानों को कायम रखे हुए हैं । इस संग्रह की रचनाओं से गुज़रने पर महसूस होता है कि असली कविता हमारे बीच ही मौजूद है । ज़रूरत उसे पहचानने , देखने, परखने और समझने की है।
लोग वैर भाव बोते हैं, कवि किसान होता है
कविता की क्यारियों में बीज बोता है
फूलों की पौध तैयार करता है ,
हरी – भरी हो धरती , मीठे जल वाली
डरावनी नहीं हो नींद
फूलों से खिलते रहें सुकुमार बच्चे
कुम्हलाए नहीं चेहरे
कभी यही सपना देखा है रंगों में रेखाओं में
गीत की लय और संगीत की धुन में ,
और जब यह नहीं होता झगड़ पड़ता है
फिर दुनिया का कोई भी नादिरशाह हो सामने। (फूलों की भाषा)
रतन चौहान चाहते हैं इस दुनिया को ख़ूबसूरत बनाना , मानीखेज बनाना , मोहब्बत का घर बनाना। वे इस बात को ज़ोर दे कर कहते हैं कि ‘मैं इस पुरशबाब आंगन को दुनिया का आंगन बना देना चाहता हूं।’ यहां वे पूरी दुनिया को इंसान के वहशीपन से बचाने की प्रार्थना भी करते हैं।
जंगलीपन की भी अपनी सुंदरता होती है,
मैं आदमी के जंगलीपन की
बात नहीं कर रहा ,
वहां तो एक बीहड़ फैला हुआ है। (बोगनवीलिया)
सामान्यतः यह समझा जाता है कि कविता कहना बहुत आसान है। कई बार यह भी कहा जाता है कि कविता बहुत सीधे-सीधे की जाने वाली अभिव्यक्ति है। रतन चौहान के यहां ऐसा नहीं है। उनकी कविता अपने घर -परिवार, किसी मित्र या गांव से शुरू होकर पूरी दुनिया के फ़लक तक पहुंच जाती है। बहुत छोटे से विषय को दुनिया से जोड़ने का बेजोड़ हुनर रतनजी के पास है। वे जितनी शिद्दत से चिंता अपने कवि मित्र की बेटी के लिए करते हैं, उतनी ही चिंता कहीं दूर किसी युद्ध में आहत स्त्री के लिए भी करते हैं। कवि का यही संबंध उसकी कविता को वैश्विक बनाता है।
मेरे जेहन की दीवारों से टकरा रही हैं बच्चों की रूहें
जिन्हें बेवजह कत्ल कर दिया गया
मेरे तसव्वुर के आसमान भर गए हैं
सताई गई औरतों की चीखों से ,
जलती बस्तियों का धुआं घिर आया है
मेरी आत्मा के तहखानों में ,
यह कौन सा जलजला उठा है कि
धरती की छाती में दरारें पढ़ने लगी हैं
आंखों में सुलगती लपटों को लेकर
घृणा का यह कौन सा डायनासोर जागा है
यह कौन से अहम् का विस्फोट हुआ है कि
दरक गई है प्रेम और करुणा की मूर्तियां
आतंक पहरे पर बैठ गया है हर दरवाज़े
चुप हो गई हैं जिव्हाएं
विवेक पर स्याही पोत दी गई है
झूठ चढ़ बैठा है सच की छाती पर। (आंधी)
इन सब परिस्थितियों के बाद भी यह नहीं कहा जा सकता है कि दुनिया बड़ी ख़राब है । बहुत सी ख़राबियों के बाद भी अच्छाइयां मौजूद हैं । भले लोग मौजूद हैं । हर क़दम पर किसी मजलूम को सहारा देने वाले हाथ आज भी हैं । कहीं घिरते अंधेरे में रोशनी का एक नन्हा दिया जलाने वाला कोई मौजूद है । आज भी कहीं कोई है जो नाउम्मीदी के इस वातावरण में उम्मीद की बातें करता है । आज भी कोई है जो नफ़रतों के दौर में प्रेम के लिए पहल करता है । रतनजी की कविता उस भले इंसान को ढूंढ लाती है। यह एक कवि का दायित्व है कि वह ख़राब परिस्थितियों में भी उन भलाई के नायाब मोतियों को ढूंढ कर सारी दुनिया के सामने ज़ाहिर करे और बताए कि आज भी अच्छे लोग मौजूद हैं । आज भी वातावरण ख़राब नहीं हुआ है । ऐसा करना एक कवि के विश्वास की जीत है।
कड़ुवाहट भरी दुनिया में भी
लोग संगीत की मीठी धुन सिरज लेते हैं
ज़िन्दगी में कविता की ख़ूबसूरती पैदा कर देते हैं ।
ग़रीबी का रोड रोलर सुबह-शाम उन पर चढ़ता है
क़र्ज़ का कनखजूरा उनकी देह और आत्मा से हमेशा के लिए चिपक जाता है
वे तसल्ली भर खाना भी नहीं खाते
उनकी दीवालों पर कितने दिन की मार खाए कपड़े टंगे रहते हैं ,
दुश्चिंताएं रात भर उनके सिरहाने बैठी रहती हैं
लगातार अंधेरों की आवाजाही रहती है
पर सुबह जब उठते हैं तो मोहब्बत के दरिया में मुंह धोते हैं
इंसानियत के जल से वुजू करते हैं। (लोडिंग वाहन)
सही मायने में देखा जाए तो दुनिया ऐसे भले लोगों से ही टिकी हुई है। ख़राबा करने वालों ने तो इस दुनिया को बुरी बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी । इसकी चमक को धूमिल करने में कोई कमी नहीं रखी । इसके बाद भी अगर यह दुनिया टिकी हुई है तो सिर्फ़ उन लोगों के दम पर , जिनका ज़िक्र कहीं नहीं होता । जिनकी चर्चा कहीं नहीं होती । जिनके नन्हें हाथों से लिखी गई कविताओं को कहीं नहीं पढ़ा जाता । जिनके सपनों को साकार करने के लिए कोई नहीं सोचता । जिनके नन्हें क़दमों से तय दूरी को कोई मंज़िल नसीब नहीं होती । ऐसे में भी ये नन्हें-नन्हें प्रयास अगर हो रहे हैं तो इन्हें दुनिया के सामने लाना बहुत ज़रूरी है । रतनजी की कविता ऐसे नन्हें प्रयासों को ही सामने लाती है।
यह सच है कि
सीधे सरल बेदाग़दार लोग ही
मारे जाते हैं इतिहास के हर दौर में ,
बावजूद इसके कि उन्होंने नहीं की मुल्कों की तक्सीम
युद्ध को जन्मा नहीं ,
मारा नहीं बेकसूर बच्चों को
तबाह नहीं की स्त्रियों और सभ्यताओं की ख़ूबसूरती ,
अपनी छोटी-छोटी दुनियाओं में बसे यह लोग
जो लाखों करोड़ों हैं ,
जिंदगी जो भी कपड़ा उन्हें हासिल हुआ
उस पर अपने ढंग की कशीदाकारी कर रहे हैं
जितना भी मुमकिन हो हसीन बन रहे हैं। (लोडिंग वाहन)
कवि रतन चौहान के यहां स्त्री के दुःख – दर्द उसकी चिंताएं , उसका संसार बार-बार शिद्दत के साथ उभरता है । मां के जाने के बाद , औरतें हमारे घर में हंसना भूल जाती हैं, इस ईद पर , वह कहीं नहीं गई ,जब मैंने उसे आख़िरी बार देखा , बाग़ में घुस आई लड़कियां, ज्यों ज्यों रात गहरा रही है, सच यह है कि, अभी मृत्यु के बारे में नहीं सोच रहा हूं जैसी कविताएं स्त्री के जीवन के दर्द को उभारती हैं । यहां कवि स्त्री के जीवन से एकाकार हो जाता है । वह अपनी पत्नी के जाने के ग़म में जितना दुःखी होता है, उतना ही किसी की मां की मृत्यु पर भी। वह इजराइल के हमले से लहूलुहान फिलिस्तीनी महिला अबू ममार और सैली के दर्द से भी उसी शिद्दत से वाबस्ता होता है । यहां कवि स्त्री को व्यक्तिगत संबंधों से नहीं बल्कि उसकी वैश्विकता में उसे महसूस करता है । यहीं आकर रतन चौहान की कविता बहुत बड़े कैनवास पर पहुंच जाती है।
बड़े घरों में औरत पांव में सोने की पाज़ेब पहनती है
मोतियों और हीरों से जड़े हार डालती है गले में
पर वहां भी कहां है आकाश ?
अगर गाने की इजाज़त मिलती है तो भी है तो स्वर्ण पिंजर ही
कितनी महिलाएं घुट कर मर गई
उनकी हंसी में न तो अब बिजलियां दमकती हैं
न पहाड़ी नदी की खिलखिलाहट सुनाई देती है
दर्ज़ी हमारा नाप भी लेता है और कपड़े का भी
और हम औरतों की हंसी का नाप लेते हैं। (औरतें हमारे घर में हंसना भूल जाती हैं)
अपनी जीवन संगिनी दिवंगत कृष्णा चौहान को समर्पित इस संग्रह में कई कविताओं पर कृष्णाजी का अक़्स नज़र आता है। यह सही है कि एक रचनाकार को जो संबल उसके जीवनसाथी से मिलता है, वह उसकी रचनाधर्मिता को बहुत मज़बूत बनाता है। ज़िन्दगी को देखने का नज़रिया कवि के पास हो सकता है लेकिन ज़िन्दगी की मुश्किलों का सामना करने का हौसला उसे अपने जीवनसाथी से ही मिलता है। इस बात को रतनजी स्वीकारते भी है और अपने जीवनसाथी को इसके लिए धन्यवाद भी देते हैं।
एक तुम थी कि मैं तूफानों में भी पगडंडिया बना लेता था
मेरे लिए अंधेरों में तुम थामे रही मशाल
तुमने नई साड़ी की जगह मेरे लिए पुस्तक ख़रीदीं
तुमको मालूम था मेरे हृदय के वातायन किताबों से खुलते थे ,
किताबों के बग़ैर में अंधेरों में घिर जाऊंगा,
तुमने रोटियां और शोरबा बनाया उनके लिए
जो जुल्मों के ख़िलाफ़ लड़ाई में मुब्तिला थे,
मेजपोश बिछाया उनके लिए
जो ज़िन्दगी को कविता की तरह ख़ूबसूरत बनाना चाहते थे।
जो भी तुम्हारे ज़ाती ख़्यालात रहें हों
भगवान और देवता रहें हो ,
तुम तरफदार रही इंसानियत के मज़हब की। (सच यह है कि)
कवि सिर्फ़ कल्पनाओं के लोक में ही विचरण नहीं करता बल्कि वह हक़ीक़त के धरातल पर भी उतरता है और वहां की वास्तविकता को भी सामने लाता है। रतन चौहान के यहां भी उस धरातल पर चहलकदमी देखी जाती है। वे आम आदमी के हक़ में ख़ुद उतरकर इन बातों को सामने लाते हैं। कविताओं में उपलब्ध जगह और उपलब्ध जगह में मौजूद कविताओं के बीच रतन चौहान बहुत महत्वपूर्ण अंतर करते हैं।
कविताओं में तो आसमान है
हवाएं मुक्त बहती हैं
नृत्य और अभिनय , चित्रों और छायाचित्रों का
धनुष थामे वसंत खड़ा रहता है ,
यहां पर तो इतनी बंदिशें लगा दी हैं ,
होट सिल दिए हैं
लोगों को कठपुतलियों में बदल दिया है। (यू आर बर्ड इन द केज)
कठपुतलियों में बदलते लोग और ऐसे लोगों से बना समाज कभी स्वच्छंद नहीं हो सकता। कवि की चिंता इस समाज में हो रहे परिवर्तन, आम आदमी के प्रति बढ़ती जा रही उपेक्षा से है। रतन चौहान अपनी कविताओं में कठपुतलियों में बदलते समाज के प्रति चिंतित हैं। वे निरंतर बढ़ रहे अंधेरे के प्रति भी हर इंसान को सतर्क करते हैं। वे चाहते हैं इस बुरे दौर को जैसे भी हो गुज़रने दिया जाए, क्योंकि वक़्त हमेशा एक सा नहीं होता। आज ख़राबियां अधिक हैं तो इनका अंत भी एक दिन होना है।
पूरा शहर अंधेरे में डूबा हुआ है
और पूरे देश को अंधेरे में डुबाया जा रहा है
रोशनी की बात करने वालों को जेलों में डाला जा रहा है
सामंती दौर के लठैतों की तरह
सत्ता के हरकारे, चाकर , खुट्टाबरदार
मोहल्ला- दर- मोहल्ला गश्त कर रहे हैं
आंखों पर पट्टी बांध दी गई है
कानों में सीसा उड़ेल दिया गया है ।
अब अख़बार लोकतंत्र की भाषा नहीं बोलते
दूरदर्शन केवल एक ही ज़बान जानता है कि
तानाशाह का मुहावरा क्या है
उसकी धज क्या है
उसके मंसूबे कहां-कहां तक चहलक़दमी कर रहे हैं ,
यह कैसा दौर है कि
आपका घर ही आपकी मुख़ालिफत करने लगा है। (पूरा शहर अंधेरे में डूबा हुआ है)
वक़्त बेशक बहुत ख़राब है । हर सुबह को रातों ने घेर रखा है । हर बेहतरीन पर बदतरी की नज़र लगी हुई है , लेकिन इन सब के बावजूद एक रचनाकार की आंखों में उम्मीद की चमक अब भी बाकी है । रतन चौहान उसी उम्मीद के ज़रिए हर रात के बाद एक नई सुबह लाने के लिए तैयार नज़र आते हैं।
ख़त्म नहीं होती लड़ाइयां
और वह हमेशा जीती भी नहीं जातीं
हारना भी पड़ता है
और हार कर फिर नए मोर्चे बांधना पड़ते हैं
पर रात के बाद कभी रात नहीं होती।
युद्ध यूं ही नहीं जीते जाते हैं
मीलों चलना पड़ता है भूखे – प्यासे
तुम्हारा हौसला नहीं टूटे
तुम थककर नहीं बैठ जाओ मंज़िल से पहले
इसलिए गढ़ रहा है छंद
ढाल रहा है नया सौंदर्य बोध
कवि कविता पढ़ रहा है। (कवि कविता पढ़ रहा है)
एक कवि का यह विश्वास ही उसे सकारात्मक साबित करता है । उसके विश्वास को मज़बूती देता है और यह यक़ीन दिलाता है कि रतन चौहान साहब जैसे रचनाकार जिस सुबह के इंतज़ार कर रहे हैं, वह सुबह हर बार आती रही है, हर बार आएगी , चाहे रात के सौदागर कितने ही ताक़तवर क्यों न हों।
पुस्तक- मैं अभी मृत्यु के बारे में नहीं सोच रहा हूं
कवि – रतन चौहान
प्रकाशक – न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन, नई दिल्ली
मूल्य – 299/-
संपर्क: 9827084966


अभी मैं मृत्यु के बारे में में नहीं सोच रहा हूं
कवि स्तंभकार आशीष दशोत्तर ने बहुत ही सशक्त समीक्षा करते हुए पुस्तक की रचनाओं अपनी बात कही है/
बधाई /
कवि आशीष दशोत्तर ने कवि रतन चौहन की कविता पुस्तक पर सशक्त समीक्षा की है?