
- राघवेंद्र तेलंग
सुपरिचित कवि,लेखक,विज्ञानवेत्ता
रिग्मा का तीसरा चांद: डॉ. वीणा सिन्हा की नई औपन्यासिक कृति
हम जानते ही हैं कि भौतिक शास्त्र के जो नियम इस पृथ्वी पर काम करते हैं वे सभी नियम सारे ब्रह्माण्ड में भी एक ही तरह से काम करते हैं,इस तरह परमाण्विक एकात्म का गुण संपूर्ण विश्व में समाया हुआ है। गीता के अनुसार इस एकात्म को जानने वाला ही क्षेत्रज्ञ है और इस तरह यह समस्त विश्व एक क्षेत्र है, फील्ड है। आधुनिक भौतिकी में इसे एक्साइटेड पार्टिकल के फील्ड की उपमा दी गई है जिसमें सृजन और विलय की तरंगें समुद्र में लगातार उठती लहरों की तरह आती जाती रहती हैं। इस सब को समझ लेना ही जन्म-मरण के रूप को जान लेना है।
ये बातें डॉ. वीणा सिन्हा के नव रचित साइंस फिक्शन या कहें विज्ञान सम्मत औपन्यासिक कृति ‘रिग्मा का तीसरा चांद’ में गुंफित बेहतरीन वाक्यांशों और संवादों की ग्रेविटी को महसूस कर की जा रही हैं। इस उपन्यास में पृथ्वी सहित अन्य प्रकार के ग्रहों और सोच के विभिन्न आयामों से आए पात्रों के समन्वित संवादों में एक अपील का मिला-जुला धीमा स्वर पाठक के अंतर्मन बराबर में गूंजता रहता है, वह यह कि आज के समय की यह जरूरत है कि समस्त मानव जाति विराट विश्व से एकत्व की भावना से जुड़कर काम करे अर्थात एकोहं बहुस्याम के सूत्र को आत्मसात करे। लेखिका भारतीय दर्शन और अध्यात्म परंपरा और इवॉल्यूशन की विज्ञान यात्रा से उत्तरोत्तर जागृत चैतन्य या कहें कांशसनेस के बोध से भली प्रकार से संपृक्त हैं। शायद यही वजह है कि विज्ञान साहित्य के केनवास में यह उपन्यास एक ताजा हवा का झोंका मालूम पड़ता है। अभी तक विज्ञान फंतासी साहित्य प्रो-एडवेंचर प्रवृत्ति के हुआ करते थे मगर भारतीय परिवेश की सौंधी सुगंध में पगी यह कृति अहिंसा के मौलिक और निरपेक्ष स्वाद की महत्ता को अप्रत्याशित रूप से प्रमाणित कर जाती है और इस उपन्यास में ऐसा होते देखना बहुत दिलचस्प है।
द्वैत या डुएलिटी के बीच इस गत्यात्मक कॉस्मास में नव का सतत पैदा होते रहना एक स्वाभाविक और प्राकृतिक क्रिया है और इसी गतिशीलता में उस उत्पन्न अंकुर का स्वत: विलय भी समाया होता है। यही जन्म- मृत्यु का शाश्वत चक्र है जिसमें चलायमान अस्तित्व समय अंतराल में लगातार स्वरूप बदलता चलता है, उसका स्वयं में विलय होना एक साहजिक अस्तित्वगत क्रिया ही है, नष्ट शब्द अधूरा पड़ जाता है यह बयान करने के लिए।
भारतीय दर्शन परंपरा में जिस प्रकार अनंत ब्रह्मांडों और अनेक ब्रह्मांडों की अवधारणाओं की कल्पनाएं हैं, बहुत कुछ इसी तरह ही समकालीन विज्ञान की कॉस्मोलॉजिकल और क्वांटम व्याख्याओं में अलग-अलग तरीके से ऐसी ही मेल खाती परिकल्पनाएं हमारे देखने में आती हैं। यह साम्य लेखिका की अंतर्दृष्टि में होने से उपन्यास में भी आ झलकता है। विज्ञान के अन्य विषयों की जिज्ञासाओं को संवादों और घटनाओं के माध्यम से स्पष्ट करते हुए लेखिका ने अपनी कहन को यथासंभव कॉम्पैक्ट रखा है फलत: उपन्यास में प्रवाह बना रहता है,कथ्य पर ऐसी प्रभावी पकड़ वीणा सिन्हा के लेखन की विशेषता है। भारतीय मनीषा में नाद,शब्द और ओम की महत्ता हर बार रेखांकित की जाती रही है। ओम का तो विशेषतः गहरा, आत्मिक और आध्यात्मिक महत्व है। ऐतरेय उपनिषद हो या पुरूष सूक्त या मांडूक्य उपनिषद ओम को चेतना की विभिन्न अवस्थाओं यथा अकार,उकार,मकार और एब्साल्यूट रियलिटी से संबद्ध करके दर्शाया गया है।
‘रिग्मा का तीसरा चांद’ में लेखिका लगातार एक मनभावन दार्शनिक प्रश्न बेहिचक उठाती चलती है कि क्या मनुष्य मेधा और उसके समस्त ज्ञान की सीमाओं से परे भी कोई ऐसी वास्तविक दुनिया हो सकती है जो अब तक हमारी सोच की परिधि के बाहर हो? आप भी लेखक की तरह सोचकर देखिए कि क्या ऐसी कोई एक विचार प्रणाली भी हो सकती है जब एक घटना के ठीक एक ही परिणाम के बजाय उस घटना के पीछे के सभी संभावित परिणामों को एक साथ एक ही परसेप्शन से समझा जा सके? भारतीय वांग्मय में इस संसार के प्रोबेबिलिटी और पॉसिबिलिटी के गणितीय मॉडल को माया शब्द के अर्थ के विस्तार में समझाने की कोशिश की गई है। विज्ञान और पारंपरिक ज्ञान के दृष्टिकोण को समाहित करते हुए लेखिका एक प्रतीकात्मक विचार पाठकों के मन में पनपाने में सफल होती हैं कि क्या अनेक ब्रह्मांडों का समुच्चय यह विराट अस्तित्व अपने में कोई मूलभूत सिद्धांत या संरचना भी समाए हुए है जिसे मनुष्य को समझना अभी बाकी है! जी हां! बात उसी आधुनिक मूल प्रश्न ‘थ्योरी आफ एवरीथिंग’की, जो आज के विज्ञान का ज्वलंत विषय है,इस उपन्यास के कथ्य की दिशा इसी मूलभूत औत्सुक्य भाव के प्रति है।
इस कृति में विज्ञान और आध्यात्मिक दर्शन की सीमाएं बखूबी चित्रित की गई हैं। जहां विज्ञान सिद्धांतों और गणितीय समीकरणों के अनुसार अपने मत व्यक्त करता है वहीं आध्यात्मिक दर्शन अपनी ध्यान केंद्रित आत्मचिंतन प्रणाली के जरिए स्वानुभूत और तत्त्वदर्शी गुणों के मनन के द्वारा परम के साक्षात्कार के मुकाम तक ले आता है। ये दोनों प्रणालियां आब्जर्वर-सेंस यानी साक्षी भाव को विकसित कर ही अपने किसी नतीजे पर पहुंचती हैं बस शब्दावली और पार्श्व संगीत की भिन्नता है, अन्यथा परिणाम का आस्वाद तो अंततः एक ही है।
हमारी पुराण कथाएं श्रुति परंपरा से अब तक चली आ रहीं हैं। इतनी लंबी यात्रा के पीछे इन कथाओं में रूपक, बिंब, फैंटेसी, मिथक आदि का सुव्यवस्थित ढंग से मिश्रित होना रहा है। संचारण की दृष्टि से मिथक कैरियर वेव्ह का काम करते हैं जबकि मूल संदेश यानी ट्रांसमिटेड सिग्नल कुछ और ही होता है। मिश्रित तरंग से मूल संदेश को छानने का काम गुणीजन का होता था और मिथकों में उलझे रहने वाले और उनसे जूझते रहने वाले लोग अलग हुआ करते। आदि मानव जब शिकार किया करता था तब से ही उसके अवचेतन मन में सुरक्षा को लेकर स्वप्न और दु:स्वप्न बेतरतीब ढंग से उपजते आए हैं। सुरक्षा हर जीव में अंतर्निहित सर्वोच्च प्राथमिकता का जेनेटिक गुण है जिसकी संबद्धता जीवन प्रणाली के गहरे रहस्य से है। यही रहस्य है जो मानव को इवाल्यूशन के चक्र में लगातार बेचैन बनाए रखकर उसे डायनामिक बनाए रखता है। ऊपर कही गई मिथक रचना प्रणाली अवचेतन मन को वैसे ही आलोड़ित करती है जैसे शिकार के युग में स्वप्न और दु: स्वप्न मिलकर किया करते थे। मानव मन के कुछ स्याह कोने अभी भी अबूझ बने हुए हैं तो इस तथ्य को स्वीकारना होगा।
विज्ञान और अध्यात्म मनुष्य के लिए बाहर और भीतर की यात्राओं के द्वार हैं। यहां यह लिखते हुए श्री अरविन्द की याद भी कर रहा हूं। जीवन को समग्रता में समझने के लिए आपको अपने अंदर की जड़ों सहित सतह के ऊपर की शाखाओं और फलों को भी साथ देखना होगा। ओम्नी सेंस का शाब्दिक अर्थ भी यही कहता है, विषय के दोनों पहलू जब पता हों तो निर्णय भी सटीक के निकट होते हैं। सबसे बड़ी समस्या जो लंबे समय से महसूस की जाती रही है वह है अध्यात्म और विज्ञान का आपस में दोस्ती की भावना का अभाव। दोनों के संशयवादी एप्रोच के कारण ही मानव का सांस्कृतिक इवाल्यूशन बाधित होता रहा है,साथ ही एक समन्वयवादी वातावरण की दिशा में सामाजिक कार्य भी अटकते हैं।

वीणा सिन्हा ने अपने नए विज्ञान उपन्यास ‘रिग्मा का तीसरा चांद’ में इस अभाव की प्रतिपूर्ति करने की कोशिश की है। वीणा जी अपनी पारंपरिक धरोहर के प्रति भी उतनी ही सजग हैं जितनी नए आयामों की वैज्ञानिक जानकारियों से वे लैस हैं। उनके उपन्यास में मुहावरे और कहावतें इतने सहज प्रवाह के साथ पढ़ने में आते हैं कि लगता है यह कथा के विषय और पात्रों के चरित्र से आती हुई सुगंध की सुखानुभूति है। अक्सर यह अनुभव में आता है कि विज्ञान फंतासी के लेखक कथानक में समस्याएं उत्पन्न करते हुए उनके हल के लिए पात्रों के वैयक्तिक संघर्ष की ओर मुड़ जाते हैं। वीणा जी ऐसे पूर्वाग्रहों से मुक्त रहते हुए इस उपन्यास के कथ्य में किसी प्रवाहित नदी की धारा पर अपने पाठकों को सवार कराती हैं। रोचकता बनाए रखते हुए पाठक को भी अपनी कल्पनाशीलता में डूबने के लिए उपन्यास में बराबर विराम मिलता चलता है। अंग्रेजी भाषा के साइंस फिक्शन के पाठक भी इसी खूबी के चलते इस प्रकाशनाधीन उपन्यास को पसंद करेंगे ऐसा माना जा सकता है। यह कथा कृति महज एक साइंस फिक्शन भर नहीं है,यह सुनिश्चित भी करती है कि पाठक के मन में पहले से बसी वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दावलियों को अंतरिक्ष के वातावरण में ले जाकर उन्हें इवाल्यूशनरी संकल्पनाओं के द्वारा अर्थवत्ता दी जाए और ऐसा कर सकने में वीणा जी सफल हैं। इस अभिनव विज्ञान कृति के लिए लेखिका का अभिनन्दन व शुभकामनाएं।
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