लगानी पड़ती है डुबकी उभरने से पहले…
शेर जीवन की उस हक़ीक़त को भी बयां कर रहा है जिसमें कई सारे अक़्स हमें नज़र आते हैं। आगे की ओर जाने की इच्छा से कुछ क़दम पीछे लौटना बुरा नहीं होता।
लगानी पड़ती है डुबकी उभरने से पहले… जारी >
शेर जीवन की उस हक़ीक़त को भी बयां कर रहा है जिसमें कई सारे अक़्स हमें नज़र आते हैं। आगे की ओर जाने की इच्छा से कुछ क़दम पीछे लौटना बुरा नहीं होता।
लगानी पड़ती है डुबकी उभरने से पहले… जारी >
सूरत को देखकर किसी की सीरत का अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता। मगर सवाल यह है कि इस असली सीरत को बताए कौन?
आईनों रूह का चेहरा भी दिखा दो उनको… जारी >
जीवन हमेशा अपने भीतर के हौसलों और इच्छाशक्ति के बल पर ही जिया जाता है। जो लोग किसी के सहारे जिंदगी गुज़ारते हैं वे कभी अपने पैरों पर खड़े नहीं हो पाते।
मैं भंवर में तैरने का हौसला रखने लगा… जारी >
यहां एक पहेली भी नज़र आती है जो बारिश के हर्फ़ को उल्टाने की बात कह रही है। बारिश लफ्ज़ जिन तीन हर्फ़ों से मिलकर बना है। उन्हें अगर उल्टा दिया जाए तो वह शराब लफ्ज़ के हर्फ़ों में तब्दील हो जाता है।
बारिश के सब हुरूफ़ को उल्टा के पी गया… जारी >
अगर अपनी मंज़िल तक पहुंचना है तो इस संजीदगी के साथ सफ़र तय किया जाए कि किसी को पता न चले और आपकी मंज़िल आपके कदमों में हो।
जो डूबना है तो इतने सुकून से डूबो… जारी >
यह जीवन दर्शन से जुड़ा शेर है। जो हमारे भीतर होता है उसे हम देख नहीं पाते और जो सामने दिखता है उसे सही समझ कर ज़िन्दगी भर तड़पते रहते हैं।
हम तरसते ही, तरसते ही, तरसते ही रहे… जारी >
इंसान को अपनी दिनचर्या जागने की तरफ तो ले आती है लेकिन जागने के बाद एक इंसान ऐसा कुछ नहीं कर पाता कि वह ज़िंदा भी महसूस हो।
मैं हर दिन जाग तो जाता हूँ, ज़िंदा क्यूँ नहीं होता… जारी >
हर ऊंचाई पर पहुंचकर महसूस होता है कि यह वह ऊंचाई नहीं है जिसकी तमन्ना रही है। तो फिर वहां कैसे पहुंचा जा सकता है?
एक ही घूंट में दीवाने जहां तक पहुंचे… जारी >
सारी दुनिया को अपनी मुट्ठी में क़ैद समझ कर चलने वाला तो अभी ख़ुद को भी नहीं जानता है। वह कौन है, उसकी ताक़त क्या है?
ठहरो-ठहरो मुझे अपनी तो ख़बर होने दो… जारी >
मंज़िल का मिलना उतना ख़ास नहीं है जितना ख़ास रास्तों की तकलीफ़ों का सामना करना और समझना।
सुना है कि मंज़िल क़रीब आ गई है… जारी >