
- आशीष दशोत्तर
साहित्यकार एवं स्तंभकार
तेरी गली से गुज़रता हूं इस तरह ज़ालिम,
के जैसे रेत में से पानी की धार गुज़रे है।
ख़ुदा-ए-सुख़न मीर के समकालीन उस्ताद शाइर मिर्ज़ा रफ़ी ‘सौदा’ का यह शेर कई अर्थ खोलता है। लफ़्ज़ी मआनी पर ग़ौर किया जाए तो शाइर इस बात को रेखांकित कर रहा है कि बहुत ख़ामोशी के साथ मैं ज़ालिम की गली से गुज़र जाता हूं। उसे पता भी नहीं चलता और मैं कहां से कहां पहुंच जाता हूं। यहां होने और दिखने के फ़र्क को महसूस किया जा सकता है। होना वह है जो निरंतर घटित हो रहा है और देखना वह है जो नज़र के सामने से गुज़र रहा है। यहां हो कुछ रहा है और दिख कुछ रहा है। सामने कुछ भी नहीं दिख रहा लेकिन सब कुछ हो रहा है।लेकिन लफ़्ज़ी मआनी से इतर अगर ग़ौर किया जाए तो यह शेर ज़िंदगी के कई फलसफे देता है। तमाम मुश्किलों और परेशानियों में घिरे इंसान को अपनी राह ख़ुद बनाना होती है। उसे कभी बना बनाया रास्ता नहीं मिलता। मगर मुश्किल यह होती है कि आप ज़िंदगी में जब भी राह बनाने की कोशिश करेंगे कोई न कोई ज़ालिम आपके सामने आकर खड़ा हो जाएगा। वह आपको रास्ता नहीं बनाने देगा। आपकी राह रोक लेगा। आपकी राहों को ग़लत दिशा में मोड़ देगा। कुल मिलाकर आप अपनी मंज़िल तक नहीं पहुंच पाएंगे। शाइर कहता है कि इन मुश्किलों में ही कुछ ऐसी राह बनाने की कोशिश की जानी चाहिए जो कि दुनिया को न दिखे मगर वह मंज़िल तक ले जाए।
इस शेर को अगर तसव्वुफ़ के नज़रिये से देखा जाए तो यह गहरा अर्थ छोड़ता है। आशिक अपने माशूक तक पहुंचने के लिए दुनियावी ज़मीनों के भीतर अपना सफर तय करता है। जिस तरह ख़ुदा तक पहुंचने के लिए बंदा अपनी कोई न कोई राह बनाता है। ज़ालिम ज़माना उसे दीवाना कहता है, पागल कहता है लेकिन उसकी अपनी राह उसे कहीं ले जा रही होती है। शाइर कहता है कि यह राह रेत के भीतर ही भीतर से गुज़रते पानी की तरह होती है जो अपने आसपास की रेत के कणों को तृप्त करती है। उन्हें ख़ुदा तक पहुंचने के लिए प्रेरित करती है और ज़िंदगी का मर्म समझते हुए आगे बढ़ती जाती है। इंसान केवल उन रास्तों को ही देख पाता है जो उसकी नज़र के सामने होते हैं लेकिन बंदे को ख़ुदा तक पहुंचने के लिए ऐसी अदृश्य राहों से गुज़रना होता है जिसमें उसकी मंज़िल उसे साफ़ दिखाई दे।
इबादत करना इतना आसान नहीं होता और अपने माशूक को पाना तो और भी मुश्किल होता है। इंसान जहां खड़ा होता है माशूक तो वहां भी होता है। शाइर कहता है कि दरिया के किनारे खड़े होकर पानी की चाहत नहीं की जा सकती। किनारे पर बिखरी रेत को थोड़ा खोदा जाए तो वहीं मीठे पानी के सोते दिखाई देंगे। ज़िंदगी भी कुछ इसी तरह की होती है, जहां सतही तौर पर कुछ नहीं दिखाई देता लेकिन थोड़ा भीतर प्रवेश करने पर एक ऐसी धार दिखाई देती है जो आपको कहां से कहां ले जाती है, इसकी कल्पना आप भी नहीं कर सकते।
इस शेर को अगर सिर्फ़ प्रेम के पहलू से देखा जाए तो एक प्रेमी अपनी प्रेमिका को देखने की चाह में उसकी गली से इस तरह गुज़रने की बात करता है कि उसे ख़बर नहीं होती लेकिन वह उसे छू कर गुज़र जाता है। ठीक वैसे ही जैसे कोई हवा का झोंका उसे छू कर गुज़र रहा हो। यहां शाइर ने प्रेमी को रेत के भीतर गुज़रने की सलाह दी है तो इसलिए कि प्रेम उथलेपन में नहीं, गहराइयों में होता है। आपको अपने प्रेम को देखना है तो आपको गहराइयों में उतरना होगा यानी वास्तविक प्रेम करना होगा। यहां ज़ालिम लफ्ज़ का इस्तेमाल बड़ी ख़ूबसूरती से किया है। वह जिसे आप अपना सब कुछ समझ रहे हैं वह आपसे मुख़ातिब नहीं होना चाहता। एक ज़ालिम की तरह पेश आता है लेकिन आप अपने लक्ष्य के प्रति दृढ़ हैं तो उसे किसी न किसी तरह देख लिया करते हैं।
शाइर यहां यह भी कहना चाहता है कि यह दुनिया बहुत ज़ालिम है। इस ज़ालिम की गली से गुज़रना बहुत ही मुश्किल है। यहां कई सारी ख़्वाहिशें आपको भटका सकती हैं। कई सारे आकर्षण आपको उलझा सकते हैं। कई प्रलोभन आपको अपनी राह से विमुख कर सकते हैं। इसलिए इस गली से गुज़रना बहुत कठिन है। ज़िंदगी को समझना है और यहां अपने सफर को पूरा करना है तो पानी की उस धार की तरह गुज़रो जो रेत के भीतर ही भीतर गुज़रती है। यानी, बहुत ख़ामोशी के साथ अपना काम करते रहो। बाहरी आकर्षण से दूर रहो। ख़्वाहिशों को अपने ऊपर हावी मत होने दो। आपसे जो मिले उसे आप खुशहाल करते हुए चलो, जैसे कि रेत के भीतर से गुज़रती हुई पानी की धार रेत की नमी को बनाए रखते हुए उनकी ज़िंदगी को शादाब करती है , इस तरह से अगर गुज़र सकोगे तो ही जीवन की सार्थकता है।
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जालिम सरकार है ,गुजरता हूं उपभोक्ता ,पानी की धार जीएसटी टैक्स हर उपभोक्ता इस जालिम सरकार को जीएसटी टैक्स ऐसे देता है जैसे रेत में गुजरती हुई पानी की धार क्योंकि हर वस्तु हर सेवा खरीदते समय कीमत के भीतर ही छुपी रहती है टैक्स की राशि बील चुकाते वक्त हमें उसका एहसास ही नहीं होता और जालिम सरकार हमसे ले लेती है
आप अपने उर्दू अल्फ़ाज़ में इसे सवार सकते हैं इस शेर का यह आर्थिक पहलू भी है
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