
- विवेक मिश्र
लेखक हिंदी के प्रोफेसर हैं।
टिश्यू पेपर को देखते ही आंखें खिल जाती हैं, झक सफेद और साफ्ट टिश्यू पेपर मन पर राज करने लगता है। टिश्यू पेपर को ऐसे ही नहीं छोड़ सकते, भला कोई भी आदमी क्यों न हो एक न एक समय टिश्यू पेपर को महसूस करता ही करता है और टिश्यू पेपर है कि सबके काम आने में ही अपना सारा सौंदर्य लगा देता है। बहुत लंबा जीवन काल नहीं होता है उसका। जबतक पैकेट में बंद है तभी तक बचा है, तभी तक सुरक्षित है और खुलते ही कब, कहां, कौन, किस हालात में टिश्यू पेपर का उपयोग कर रहा है या नहीं भी कर रहा है तो टिश्यू पेपर को देखते ही रगड़ कर, मसल कर फेंक देने की कहानी आ ही जाती है। हर टिश्यू पेपर इस सच का शिकार होता ही होता है। टिश्यू पेपर इसी तरह से इस संसार में आता है और अचानक से दिखता है, चमकता है और फिर गुमनामी का शिकार हो जाता है। जाने अनजाने हर कोई टिश्यू के साथ बेरहमी ही करता है। कठोर या नाजुक हाथ ही क्यों न हों कहीं भी टिश्यू को राहत नहीं है। टिश्यू पेपर बस टिश्यू पेपर के रूप में ही दुनिया में अपने अंदाज से देखा और जाना जाता है, कोई और कथा नहीं है टिश्यू की पर हर कथा में, हर यात्रा में टिश्यू शामिल हो जाता है। यह तो आप पर है कि आप टिश्यू पेपर का कितना ख्याल रखते हैं नहीं तो उसे तो अपनी नियति मालूम है।
बेरहम समय में ही नहीं खुशनुमां माहौल में भी टिश्यू पेपर के साथ हर कोई बेरहमी से ही पेश आता है। कोई रियायत नहीं, गिर जाए तो कोई परवाह नहीं, दूसरा, तीसरा और चौथा भी आ सकता है, इतना ही नहीं पूरा पैकेट ही आ जाएगा मसले जाने के लिए, लुगदी बनाकर फेंक देने के लिए। सोचता हूं तो बहुत तकलीफ होती है कि क्या नसीब मिला है टिश्यू को…चमकते-चमकते ही गर्दिश में चला जाता है। खुशी-खुशी जाता है। इसलिए तो किसी को भी दर्द नहीं होता कि वह टिश्यू पेपर को मसल रहा है। टिश्यू पेपर अक्सर डस्टबिन में पड़े-पड़े रोता रहता है पर वहां किसी की नजर नहीं जाती। जो भी हो पर टिश्यू पेपर के साथ यह दुनिया बहुत ही बेरहम तरीके से पेश आती है। ऐसा ही है और इसी दुनिया में टिश्यू घूमता रहता है इधर से उधर, इस प्लेट से उस प्लेट तक और इन हाथों से उन हाथों तक।
नियति और भाग्य ही जब सबकुछ तय करते हों तो कोई भी कुछ नहीं कर सकता। इसीलिए कहते हैं कि हर टिश्यू पेपर की पीछे एक कहानी सी छिपी होती है। इतना कुछ टिश्यू पेपर के साथ होता है कि आप टिश्यू पेपर को यूं ही एक किनारे पर छोड़ नहीं सकते, न ही यह कह सकते हैं कि मेरा वास्ता टिश्यू पेपर से नहीं पड़ा। एक जमाने में टिश्यू पेपर से परिचित नहीं होते थे लोग, जो शहरों में रहते थे, कभी-कभार होटल आदि जाते थे उन्हें ही पता होता था कि क्या है टिश्यू पेपर? कोई-कोई घर में भी इस्तेमाल करता था पर इसका प्रयोग और इसे देखने का अवसर बड़े होटल के खाने की मेज पर ही होता था और वह भी बड़े लोग ही करते थे। गांव गिरांव में टिश्यू पेपर का क्या काम? उनके लिए तो वह एक चमकता कागज ही था। पहली बार जब प्रसाद ने टिश्यू पेपर देखा तो यहीं सोचा कि यह एक तरह का कागज है और प्रसाद ने टिश्यू पेपर पर लिखना शुरू कर दिया। अक्सर देखा जाता है कि जो लिखने के आदी और आदतन लेखक हैं, वे टिश्यू पेपर पर ही लिखने लगते हैं, कभी भी कहीं भी लिखने बैठ जाते हैं। कुकुड़ी ने तो यहां तक कह दिया कि मुझे इस कागज पर लिखना अच्छा लगता है। इस पर विचार तुरंत उतरते हैं और जब मन हो तब इस पर विचार लिख लो नहीं जमे तो मुंह पोछ कर फेंक दो या जम जाए तो अपने समय व हिसाब से फेयर कर लें।
टिश्यू पेपर आगे होकर किसी के पास नहीं जाता पर यह सच है कि कोई किसी भी स्थिति में टिश्यू पेपर की मदद लेना चाहें तो टिश्यू मना नहीं करता बल्कि उसका हेल्प ही करता है। टिश्यू पेपर की नियति है कि वह लोगों के काम आएं। वह बना ही इसीलिए है कि लोगों के लिए मददगार साबित हो पर यह तो समय व परिस्थिति पर निर्भर करता है कि आप टिश्यू का उपयोग करें, नहीं तो टिश्यू तो बना ही है पोछे जाने और लुगदी बनाकर फेंक देने के लिए। जो लोग टिश्यू पेपर का सही उपयोग करते हैं उनसे टिश्यू पेपर भी खुश रहता है पर हर आदमी से एक जैसा ही व्यवहार की उम्मीद नहीं रहती है। सबका अपना-अपना हिसाब होता है। किसी किसी को कुछ नहीं मिलता तो वह सारा गुस्सा टिश्यू पेपर पर ही उतारता है। जब देखो तब जतिन टिश्यू पेपर से मुंह साफ करता रहता है। टिश्यू पेपर न होकर जैसे रुमाल हों। मुंह साफ करें यहां तक तो ठीक है पर कोई कोई तो टिश्यू पेपर को टिश्यू पेपर भी रहने नहीं देते….उसे ही देखो रुमाल की तरह से मुंह ही नहीं पोंछता बल्कि चारों तरफ का गंदा संदा पानी पोछने में काम लेता है। कुछ एक ऐसे भी होते हैं जो टिश्यू पेपर को रगड़ कर गोल गोली बना लेते हैं और कहीं भी फेंक देते हैं। टिश्यू पेपर तो बस यहीं चाहता है कि आप उसका प्रयोग करें और सम्मान के साथ करें।
कुछ ऐसे भी हैं जो टिश्यू पेपर के साथ क्रूर और बेरहम हो जाते हैं। प्रसाद है कि टिश्यू पेपर के पीछे ही पड़ा रहता है। खायेगा नहीं, पीयेगा नहीं पर हाथ में टिश्यू पेपर को लेकर ऐसे घूमता है कि टिश्यू का कोई वजूद ही न हो और वह उसे कुचलकर जैसे मार ही डालेगा। सुंदरता नोचने, खींचने और फींचने के लिए नहीं होती कि कुछ भी अच्छा दिखा नहीं कि उसके पीछे पड़ जाओ, इस संसार में जो जितना सुंदर है वह उतना ही ज्यादा क्रूरता का शिकार है। टिश्यू पेपर सुंदर है…यह सफेदी तो अद्भुत है। ऐसी सफेदी तो स्वर्ग में भी नहीं होती जो टिश्यू पेपर की सफेदी में दिखाई देती है। अब तो रंगीन टिश्यू पेपर भी आने लगे… कहते हैं कि टिश्यू पेपर का भी भाग्य होता है। कब किसके हाथ लग जाएं कह नहीं सकते। टिश्यू पेपर पर बहुत बार सुंदरियों के भी निशान लग जाते हैं। एक दिन टिश्यू पेपर यहीं सोच रहे थे कि मौका मिले तो किसी सुंदरी के सामने बैठे, किसी हीरोइन की टेबल पर बैठने का मौका मिले। उन्हें क्या पता कि सुंदरियां जितना सुंदर होती हैं उतनी ही बेरहम भी होती हैं। कब बिना बात ही होंठों से लगा कर पोंछ कर यूं ही डस्मेंटबिन में फेंक दें, रद्दी बना दें? वैसे भी टिश्यू पेपर का हाल बुरा ही बना रहता है। टिश्यू पेपर कुछ कर भी नहीं सकता बस एक तरफ पड़ा रह सकता है। एक समय के बाद वह कचरे का ढ़ेर बन जाता है। कचरे के बीच कचरा सा पड़ा रहता है। जीवन जगत का संदर्भ भी इसी तरह से होता है। कब आप को संभाल कर रखा जाए और कब टिश्यू पेपर की तरह डस्टबिन में डाल दिया जाए, कह नहीं सकते। आप हैरान होकर दुनिया को देखते रहिए। क्या कर सकते हैं?
टिश्यू पेपर की नियति ही ऐसी है कि वह डस्टबिन में ही रहने के लिए बना हों। हर कोई क़ातिल हंसी के साथ कितना सुंदर है, कहते हुए एक टिश्यू पेपर उठा लेता है। झक सफेद टिश्यू पेपर… ऐसा साफ कि बस देखते रहिए, पर यह भी सच है कि टिश्यू पेपर जब तक पैकट में रहता है तभी तक साफ रहता है। टिश्यू पेपर की नियति ही कुछ इस तरह की होती है कि संपर्क में आते ही गंदला हो जाता है। टिश्यू पेपर को कहीं भी रख दें अंत में तो पोंछने के ही काम आता है। कोई भी क्या कर सकता जिसकी नियति ही बस इतनी सी हो कि अगले ही क्षण डस्टबिन में जाना हो फिर उसकी सुंदरता उसका होना न होना सब कुछ एक सा हो जाता है। फिर भी टिश्यू पेपर को यादों के तहखाने में छिपा कर रखा जा सकता है। कब कुछ निशान टिश्यू पेपर पर उतर आए और कब वह जरूरी दस्तावेज बन जाएं। यह सब कुछ समय पर निर्भर करता है। समय की महिमा होती है कि वह कब किसे महान बना दें और किसे गड्ढे में धकेल दें।


बहुत सुंदर प्रस्तुति है