
- पूजा सिंह
स्वतंत्र पत्रकार
प्रिय कथाकार उदय प्रकाश की नई कहानी ‘कपटकाल में कवि’ हमारे समय के पसंदीदा कथाकारों में से एक और अच्छी खासी कॉर्पोरेट नौकरी छोड़कर इधर पूरी तरह साहित्य में रम जाने का कठिन निर्णय लेने वाले कथाकार-संपादक मित्र चंदन पांडेय की ई-पत्रिका ‘सम्मुख’में प्रकाशित हुई है। उदय जी ने स्वयं कहा है कि यह उनकी कहानी का पहला ड्राफ्ट है जिसे उन्होंने डेडलाइन और संपादक के दबाव में शीघ्रता में साझा किया है और वह इसे जल्दी ही नए सिरे से अंतिम रूप देंगे।
उदय जी को जानने वाले जानते हैं कि इस विरल और मनमौजी कथाकार से अपने आग्रह पर कोई काम करा ले जाना किसी चमत्कार से कम नहीं है। खुशी के साथ बताना चाहती हूं कि यह चमत्कार मैंने भी किया है जब ‘तहलका के ‘पठन-पाठन’ अंक में मैंने उनसे ‘जज साहब’कहानी लिखवा लेने में सफलता हासिल की थी। सफलता इसलिए क्योंकि मेरे संपादक सहित टीम के किसी साथी को यकीन नहीं था कि उदय जी मेरे कहने पर कोई नई कहानी लिख देंगे।
बहरहाल, हम बात कर रहे थे सम्मुख में उदय जी की नई कहानी की। उनकी एक छोटी किंतु सघन कहानी ‘नेलकटर’ का आखिरी वाक्य है-
“चीज़ें कभी खोती नहीं हैं, वे तो रहती ही हैं। अपने पूरे अस्तित्व और वज़न के साथ। सिर्फ हम उनकी वह जगह भूल जाते हैं।”
हम सभी ने यह कहानी पढ़ी है और बहुत लंबे समय तक उनकी इस जादुई पंक्ति के असर में भी रहे हैं। उनकी नई कहानी पढ़ते हुए मुझे लगा कि यह कहानी ‘नेलकटर’ के उसी केंद्रीय वाक्य का ही खंडन करती हुई अनेक नए अर्थ हमारे सामने रखती है। शुरुआत में बोझिल लगने वाली यह कहानी कई पाठों के बाद आपके सामने खुलती है। कहानी कुछ यूं हैं कि एक समय अचानक वस्तुएं कहानी के मुख्य पात्र कवि कुमार विकल के नियंत्रण में रहने से इनकार कर देती हैं। जिन चीजों को उन्होंने वर्षों से साधा था और अपने घर और अपने जीवन में उनके लिए एक स्थान तय किया था। और जिसके चलते उनका मानना था कि उनका जीवन-संसार एक खास लय में चल पा रहा है, वह संसार तब एक झटके में बिखर जाता है जब चीजें अपनी तय जगह के बजाय अपने लिए एक नई जगह का चुनाव करने लगती हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो चीजें मनमानी करने लगती हैं।
यह कहानी चीजों और हालात को नियंत्रित करने की प्रबल इंसानी इच्छा का एक विलोम रचती है। कहानी उस आधुनिक मनुष्य की त्रासदी की कथा कहती है जो मानता है कि चीजों, शब्दों, स्मृतियों और तथ्यों पर नियंत्रण तथा उनका सटीक दस्तावेजीकरण करके इस संसार को स्थिर किया जा सकता है। कहानी कहती है कि संसार की सबसे बड़ी हकीकत उसकी अस्थिरता है।
इस कहानी को पढ़ते हुए अमेरिका में डॉनल्ड ट्रंप के दोबारा राष्ट्रपति बनने और पश्चिम एशिया में ईरान के साथ अमेरिका और इजरायल के युद्ध की याद बरबस आती है। ठीक उस समय जब लग रहा था कि वैश्विक स्तर पर देशों के बीच आपसी कारोबारी संबंधों को लेकर एक बुनियादी शिष्टाचार कायम हो गया है और विपरीत से विपरीत हालात में भी उस शिष्टाचार का पालन किया जाएगा, तभी ट्रंप ने अपने जवाबी शुल्क और बेलगाम जुबान से हालात को बदतर कर दिया। उन्होंने ईरान पर युद्ध थोपते हुए उसकी समूची शीर्ष लीडरशिप को खत्म करने का ऐसा अपराध कर दिया जो यदि घटित नहीं होता तो शायद ही कोई यकीन करता कि इस सदी में ऐसा कुछ किया जाना संभव है।
खैर, कहानी पर वापस लौटते हैं। कहानी की शुरुआत में ही कवि कुमार विकल शेविंग क्रीम की जगह चेहरे पर टूथपेस्ट लगा लेते हैं क्योंकि क्रीम अपनी जगह पर नहीं है। भूलने और चीजों के खोने की एक मामूली घरेलू और हास्य उत्पन्न करने वाली समस्या बहुत जल्दी एक अस्तित्ववादी रूप में बदल जाती है।
जैसा कि मैंने आरंभ में ही कहा, कहानी का केंद्रीय वाक्य “चीज़ें कहीं नहीं जातीं, वह तो रहती ही हैं… बस, हम उनकी वह जगह भूल जाते हैं” आखिर तक आते-आते एक उलटा अर्थ ग्रहण कर लेता है। ‘नेलकटर’ कहानी से लिया गया यह वाक्य एक खास किस्म का आत्मविश्वास प्रदर्शित करता है लेकिन नई कहानी के अंत तक आते-आते यही वाक्य मनुष्य की असहायता और विस्मृति का बयान बन जाता है। वस्तुएं शायद सचमुच कहीं नहीं गईं, बदलाव हमारी स्मृति और चेतना में आया है।
कहानी के आरंभ में आया टूथपेस्ट और आखिर में खड़ा शव वाहन, कहानीकार इन दोनों के बीच एक विशाल वृत्त की रचना करता है जिसके दरमियान कई अनुभव आकार लेते हैं। एक तरफ रोजमर्रा की छोटी-छोटी चीजों को भूल जाने की उलझन है तो दूसरी ओर जीवन से आखिरी बार विदा। कहानी के बीच में वस्तुएं अपनी जगहें बदलती रहती हैं और इस सिलसिले का अंत तब होता है जब मनुष्य खुद अपनी जगह से विस्थापित हो जाता है।
इस कहानी को एक बुजुर्ग होते व्यक्ति के स्मृतिभ्रंश की कहानी के रूप में पढ़ना ठीक नहीं है। कहानी बताती है कि उम्र भर अपने इर्दगिर्द चीजों और हालात को नियंत्रित करने की कोशिश करते रहने वाले मनुष्य की सबसे गहरी आकांक्षा उस अस्थिर संसार में किसी पुरानी जगह, किसी पुराने व्यक्ति और किसी पुराने अर्थ तक लौट जाने की है।
इस समय यह कहानी सोशल मीडिया पर छाई हुई है। इसे लेकर मिलीजुली प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। लेकिन जैसा कि खुद उदय जी ने लिखा है यह कहानी का पहला ही ड्राफ्ट है। पहले ड्राफ्ट के इतने अधिक पाठ हो गए हैं कि शायद खुद उदय जी भी चकित होंगे। बहरहाल हम पाठकों को कहानी के अंतिम ड्राफ्ट की प्रतीक्षा है।
यहाँ पढ़ी जा सकती है कहानी:
कपटकाल में कवि / उदय प्रकाश

