
- विवेक मिश्र
लेखक हिंदी के प्रोफेसर हैं।
बरसेगा पानी…झूमेगा बादल और गायेगा गीत। जीवन आनंद की धड़कनों को बारिश की बूंदों के साथ ही महसूस करते हैं। चलते-चलते यदि झूम कर बादल बरसने लगते हैं तो आदमी बिना कहे ही मन से नाचने लगता है। दूर कहीं बारिश हो रही होती है और मन कह उठता है कि बारिश हो रही है, ठंडी हवा चल रही है। एकाएक बारिश की बूंदें राहत की बारिश करने लगती हैं और जीवन पथ पर एक अलग ही चमक बिखर जाती है। बारिश के साथ ही मन और चेहरे ऐसे खिल जाते हैं कि जैसे दुनिया की सारी खुशियां सारी दौलत मिल गई हो…हो भी क्यों नहीं जो मन अंगारों की बीच जल रहा होता है वहीं जानता है कि ठंडी हवाओं की लहरें क्या होती है। देह मन मस्तिष्क सब बारिश में भीग रहा होता है।
बारिश से भीगा मन नरम होता है, मृदुल होता है और उसके उपर से रस की फुहार ऐसे चलती है कि बस देखते जाइए। दुनिया को और दुनिया की दौलत को… बारिश में ही देखा जा सकता है। पृथ्वी भरी हुई है खुशियों के खजाने से, बस इस दौलत को समझने वाला कोई हो, फिर दुनिया सुंदर से सुंदर लगने लगती है। बारिशों के बादल जब नहीं आते तो मन तड़प-तड़प उठता है। बारिश की बूंदों को कोई और नहीं मन की पुकार बुलाती है। न जाने कब से पृथ्वी पर बारिश के गीत गाये जा रहे हैं। आदमी का सबसे सुंदर गीत बादल और बारिश की बूंदें हैं। यहां से वह जीवन सत्य को समझना शुरू करता है। बारिश की हर बूंद में अपने लिए प्राणी मात्र के लिए जीवन संदर्भ छिपा होता है। हर बादल से बस आदमी एक ही बात कहता है कि थोड़ा बरस जाओ, बरस कर मन को राहत दे जाओ।
बरसेगा पानी…थोड़ा ठहरो… बरसेगा पानी।
पहाड़ों से… झरनों से पत्तों से… गिरता रहेगा पानी।
ठहरो, आंखें उठाकर देखो उमड़-घुमड़ रहे हैं बादल,
गा रहे हैं मन का संगीत और कह रहे हैं कि बरसेगा बादल।
बेचैनियों को हवा देने के लिए…
बाहर जो आग जल रही है
उसे ठंडा करने के लिए आयेंगे बादल।
एक दिन इन उमड़ते-घुमड़ते बादलों से मन पूछ ही बैठा कि कब बरसोगे झूमकर, बस बादलों का घटाटोप दिखाकर चले जाते हो। भला ऐसे भी बादल जाते हैं? छटपटाते मन को यूं ही छोड़कर कहां भाग रहे हो? बादल तो बादल ही हैं, कहां सुनते हैं किसी की, बस अपने मन से बरसते हैं। बादल ने कहा, थोड़ा इंतजार करो बरसेगा बादल…. फिर झूमना गाना और मगन होकर नाचना।
इन दिनों हर कोई बादलों का ही इंतजार कर रहा है। इस उम्मीद से बादलों की ओर देख रहा है कि बरसेगा बादल और सजेगा जीवन। मन पर बादलों की धुन बजेगी… धम-धम-धम बादल आएंगे। कूदते उछलते बादल आयेंगे, धरा पर नाचेंगे और गायेंगे मन के गीत संगीत को…। जीवन को बादलों के संग घुमड़ते देखना ही सच में प्रकृति के साथ लय होना है। बादल एक जगह पर ठहरते नहीं समय और हवा के हिसाब से चलते रहते हैं बहुत बार आने की कह कर भी नहीं आते। फिर भी आदमी ने उम्मीद नहीं छोड़ी। वह बादलों की ओर आस लगाए देखता रहता है। बारिश हो जाए तो इस आग से कुछ राहत मिले। जो कुछ इस बीच में सुख रहा है, जो जल रहा है उसे कुछ जीवन मिल जाए। कुछ रस की बूंदें पृथ्वी पर बारिश के रूप में गिरती हैं तो मन उसे अमृत और धन मानकर ग्रहण करता है। हवाओं में बारिश का शोर है पर हवाएं आकर चली जाती हैं। और बारिश होती नहीं। जलती हुई धरती की आग कहां दो चार बूंदों से मिटती है बल्कि ऐसे में तो और ज्यादा आग भड़क जाती है। हवाओं के बीच दो-चार बूंदें जो गिर रही हैं, उससे काम चलने वाला नहीं है। अब तो हर मन बस यही कह रहा है कि बरस जा बदरा। हां, बरस जा बदरा। बरसते बादल को देखें बहुत दिन हो गए। आकाश में धमाचौकड़ी करते बादल … आषाढ़ के बादल तो बरसतें ही बरसतें हैं। इन दिनों तो बस तुम्हारा ही इंतज़ार रहता है। खेत से लेकर खलिहान तक और बालकनी से लेकर छतों तक।
बस, एक बारिश की बूंदें हों और जीवन का संगीत जम जाएं फिर क्या कहने? इन दिनों बरसोंगे तो कोई शिकायत भी नहीं होगी कि क्यों बरस रहे हो? क्यों गरज रहे हो? इन दिनों तो सब बस यही सुनना और देखना चाहते हैं कि बादल बरस जाएं और जीवन का संगीत सज जाएं। जगह-जगह महफ़िल जम जाएं।
अरे! बदरा ये मौसम है झूम कर, गरज कर, तड़प कर बरसने का इधर से उधर जाने का या बहक जाने का मौसम नहीं है यह। आखिर तुम्हें बरसना ही होगा। पूरी पृथ्वी पर इन दिनों जो गर्म हवाओं का पसारा हुआ है उससे मुक्ति बस तुम्हीं दिला सकते हो। हे बदरा बिना रुके तूं झूम कर बरस, हां गरज कर बरस। जीवन पथ पर सवार होकर बरस …सब तुम्हारा ही इंतज़ार कर रहे हैं। देह मन मस्तिष्क सब तो तुम्हारा ही इंतज़ार कर रहे हैं। बरसेगा बादल तो शांति मिलेगी। बेचैन मन को राहत मिलेगी। तुम्हारे बरस जाने से मन मस्तिष्क को राहत मिलती ही मिलती है सबसे ज्यादा राहत तो पशु पक्षी और दहकते पेड़ को मिलती है। जहां कहीं भी दाना पानी और उम्मीद होती है वहीं तो सब जाते हैं। जो राहत के छीटें देता है सब उसी से तो गुहार लगाते हैं।
बादल तो सबके मीत हैं। बादलों के गीत बस्तियां गाती रहती हैं। पेड़ पौधे सब लहलहाते हुए बादलों के ही गीत गाते हैं। तुम्हारे बरस जाने में ही पृथ्वी की सारी कहानियां पूरी होती हैं। तुम्हारे भीतर ही जन जन की आकांक्षा छिपी होती है। हर नया कोंपल तुम्हारा ही इंतज़ार करता है। उन्हीं आकांक्षाओं पर बरसता है पानी…। पानी को नदियों की लहरों पर, सागर की लहरों पर और पत्तों से झरते पानी में देखिए… कैसे बेचैन समय में भी यह दुनिया सुंदर लगने लगती है। बारिशों ने सबकुछ सजा दिया है यहां तक कि ठूंठ भी अपने ढ़ंग से संगीत को गूंजायमान किए हुए हैं।

