MP Rajya sabha Election

- पंकज शुक्ला
पत्रकार-स्तंभकार
रजनीश का संधि विच्छेद है– रजनी (रात) + ईश (स्वामी) = रात का स्वामी यानी चंद्रमा।
यह संधि विच्छेद करने का संदर्भ मध्यप्रदेश से राज्यसभा के लिए रजनीश अग्रवाल का चुना जाना है।
राज्यसभा सीट पर तमाम दावेदारों में से बीजेपी ने तीन का चयन कैसे किया, क्यों किया, किस गणित या समाज शास्त्र से किया इस पर तमाम विश्लेषण हुए हैं। आगे भी होंगे। इस पर फिर कभी बात करेंगे। आज बस रजनीश की बात।
मैं यह बता सकता हूँ कि रजनीश अग्रवाल का चयन क्यों उपयुक्त है। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के सदस्य रजनीश अग्रवाल अब राज्यसभा सदस्य हैं। यह यात्रा वास्तव में पगडंडी से हाई वे तक की यात्रा है। निरंतर चलते रहने वाले कछुए की पंचतंत्र की कथा का आधुनिक राजनीतिक कथानक।
रजनीश अग्रवाल किसी धूमकेतु की तरह नहीं उभरे। ऐसा नहीं कि आंधी की तरह आए और छा गए। किसी पैराशूट से नहीं उतरे औचक। वे तिल-तिल बढ़े हैं। एक पौधे की तरह अंकुरित, पल्लवित और पुष्पित हुए हैं। वे बीजेपी के चंद्रमा हैं जो अमावस्या से पूर्णिमा तक चार कलाओं में बढ़े हैं।
ऐसा नहीं है कि उनकी राह में कांटे नहीं थे। ऐसा नहीं कि उनके करियर में जेठ का सूरज तपा नहीं होगा। ऐसा भी नहीं कि फिसलन भरी राहों से वे गुजरे न होंगे। मगर उनका चित्त सम रूप रहा। आनन्द में अतिरेक नहीं और संकट में हताश नहीं।
जब यह लिखा जा रहा है तो यह ताजा ताजा सांसद बने राजनेता का स्तुतिगान नहीं है बल्कि यह उस कार्यकर्ता की प्रशस्ति है जिसने कभी विचारधारा का साथ नहीं छोड़ा, हित लालसा के वशीभूत हो कर गुरु बदले नहीं, राह पथरीली आई तो रुके नहीं, थके तो भी हारे नहीं। इरादे टूटे नहीं, मुस्कान छूटी नहीं। हाथ छोड़े नहीं, साथ तोड़े नहीं। वे आस बने रहे, विश्वास रचते रहे। तब भी जब बीजेपी बदल रही थी।
कह सकते हैं कि रजनीश अग्रवाल राजनीति की रजनी में खिला उजला चंद्र है। उनकी राजनीति उस बीजेपी के रंग-ढंग, तरीके और आचरण का पर्याय है जो कुशाभाऊ ठाकरे की बीजेपी कहलाती है। वे बोलने, जीने और संगठन के उन संस्कारों का व्यावहारिक रूप हैं जिन्हें कुशल संगठक अनिल माधव दवे के राजनीतिक संस्कार कहा जाता है। यानी वे ठाकरे जी और दवे जी के कुनबे वाली बीजेपी के उत्तराधिकारी हैं।
हमने उन्हें बीजेपी की सभाओं में बोलते सुना है। मित्रों -पत्रकारों संग बतियाते देखा है। आपसी बातचीत में सुना-सुनाया है। हर बार जब हाल पूछो तो एक उल्लासित उत्तर आता है, ज्यों के त्यों।अब वे अपने गुरु अनिल माधव दवे की तरह उच्च सदन में हैं। अब जब वे राज्यसभा में बोलेंगे तो उनका यही रूप-रंग अधिक दमक और चमक के साथ दिखाई देगा। उनके अतीत ने ही यह उम्मीद बंधाई है।
भरोसा तो अब भी है कि नई भूमिका में उतरे रजनीश अग्रवाल से जब भी पूछा जाएगा वे ज्यों के त्यों मिलेंगे। ऐसे ही स्याह रजनी में चमकदार धवल चन्द्र की मानिंद।


बहुत खूब, पंकज जी