एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-32

- विभूति झा, सामाजिक कार्यकर्ता
संपादन: चिन्मय मिश्र
यह अनिवार्य रूप से घटित हुआ भी एक साधारण दस्तावेज है। यह न तो कहानी है, न यात्रा वृतान्त। यह एक व्यक्ति की “लौटने” की गाथा है। विभूति दा की यह डायरी अबूझ सी सच्ची कहानी है। यह सत्य की अभिव्यक्ति है। –चिन्मय मिश्र
मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल जिले मंडला से निकलकर सागर विश्वविद्यालय से एमए और एलएलबी। फिर जेएनयू (नई दिल्ली) से समाज विज्ञान में शोधकार्य किया। भोपाल से वकालत शुरू की और भोपाल गैस त्रासदी मामले में गैस पीड़ितों के वकील बने। एक युवा वकील ने बड़े बड़े वकीलों की दलीलों को खारिज कर भोपाल गैस पीड़ितों को मुआवजा दिलवाने की लड़ाई जीती। जिला अदालत से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक पैरवी और फिर एक दिन अचानक पूरी प्रसिद्धि, अपने समृद्ध भविष्य की संभावना को पुराने वस्त्र की तरह उतार कर चल पड़े एक नए जीवन की खोज में। मन में विचारों का उफान और तन पर एक जोड़ी कपड़ों के साथ सबकुछ छोड़ दिया। परिवार भी। किसी फिल्म की पटकथा सा लगता यह इस डायरी के लेखक विभूति झा के जीवन की वास्तविकता है। एक ऐसा मंथन जो जीवन उद्देश्य खोजने की दिशा में बढ़ा और इस राह में उतने ही विविध अनुभव हुए। यह एक विस्तृत जीवन से साक्षात्कार है। किश्त-दर-किश्त रोचक होती जीवन दास्तां।
जोबट-भ्रमण: 26 जनवरी, 2008
बैठकर पढ़ता रहा; इस बीच ठंड में कोई कमी नहीं है। वैसे सबसे ज़्यादा ठंड 23 की रात और 24 की सुबह ही थी जब तापमान 2 डिग्री पर पहुँच गया। जोबट यात्रा के लिए भी महेश जी ने जीप का इंतजाम कर लिया है, शिविर की निरन्तरता में। सुबह आठ बजे के करीब महेश जी और मैं मेघनगर से निकल गए, 9 बजे के करीब राणापुर पहुँचकर वहाँ राजू भाई के यहाँ नाश्ता किया। राकेश आर्य, प्रजापति वगैरह तथा अन्य लोग भी मिले। छगन प्रजापति यहाँ के बड़े व्यवसायी हैं तथा आसाराम बापू के परम् भक्त हैं। आसाराम बापू का यहाँ बहुत प्रभाव है-गुजरात के पड़ोस में होने के कारण उनका अच्छा व्यवसाय चलता है। अब बेटा भी व्यवसाय का उत्तराधिकारी बनकर साथ हो गया है।
11 बजे के करीब जोबट पहुँच गए। विनय पाण्डे को साथ में लिया और सीधे बेटवासा निकल गए। पाण्डे कहता रहा कि बेटवासा मत चलो, देहदला चलो क्योंकि बेटवासा में कुछ “दूसरे किस्म का” कार्यक्रम हो रहा है, उस तरफ ही चलना है तो कौसदूना चलो जहाँ गायत्री परिवार का कार्यक्रम चल रहा है। हमने कहा नहीं, पहले बेटवासा ही जाएंगे। झाबुआ जिले में गाँव-गाँव में कुछ-न-कुछ धार्मिक, सांस्कृतिक कार्यक्रम चलते ही रहते हैं लगभग पूरे साल।
11.30 के करीब बेटवासा पहुँच गए, वहीं मदन की चक्की के सामने गाड़ी रोकी। सामने खेतों में कुछ दूर पर बड़ी भीड़भाड़ दिखी, पाण्डे रोकता रहा वहाँ मत जाओ, गंदा है, जाने लायक नहीं है। महेश जी और मैं उसी तरफ चल दिए। मैं तो दूर से ही समझ गया क्या चल रहा है। पाण्डे वहीं जीप के पास रुका रहा। बड़ा ज़बर्दस्त माहौल है, सैकड़ों लोग खेतों में फैले हुए हैं, समूहों में बैठे हुए हैं। एक जगह पूजा स्थल की तरह बना रखा है, जिसमें झण्डे लगा रखे हैं। कुछ लोग वहाँ बैठे हुए गा रहे हैं, बाकी बहुत सारे लोग दूर-दूर तक छोटे-छोटे समूहों में बैठे बकरे काट रहे हैं और ताड़ी पी रहे हैं, गाना बजाना कर रहे हैं। एक जगह बहुत बड़े-बड़े बर्तनों में मनों से चावल पक रहा है। जबर्दस्त उत्सवी माहौल है। हम लोगों को देखकर पहले लोग थोड़ा सकुचाते रहे, फिर धीरे- धीरे सब सामान्य हो गए। संयोग से महेश जी के पास आज कैमरा रखा है। फोटो खींचनी शुरू कर दी तो सब आकर्षित हो गए। ऐसी जगह में आने की और इस सब में शामिल हो पाने की महेश जी ने कभी स्वप्न में भी कल्पना नहीं की थी। शिवगंगा की जिस तरह की छवि बनी हुई थी उसके अनुसार कोई सोच ही नहीं सकता कि उसका प्रमुख ऐसे किसी आयोजन में खुशी-खुशी शामिल होगा।
हम लोग पूजास्थल में काफी देर बैठे। एक दम्पती जिनके यहाँ सन्तान उत्पन्न नहीं हो रही थी उन्होंने मन्नत माँगी थी। इस दम्पत्ति को 6 साल पहले बच्चा पैदा हो गया। आज वह मन्नत पूरी कर रहे हैं और तमाम नाते-रिश्तेदारों का भोज कर रहे हैं। मदन का पिता बड़वा है, वह पूजा करा रहा है। बच्चे को सिर पर बैठा कर नाच रहा है। इस पूजा-पाठ में बच्चे की बुआ की मुख्य भूमिका है। इन लोगों में घर की बेटी का बहुत अधिक महत्व है और शादी के बाद भी वह अपने माता-पिता के घर की एक प्रमुख सदस्य बनी रहती है। थोड़ी देर बाद पाण्डे भी नाक-भौं सिकोड़ते आ गए। सबसे ज़्यादा मज़ा ड्रायवर को आ रहा है पाण्डे को देख-देखकर। ड्राइवर मेघनगर के पास के गाँव का पटैलिया है। इस मौसम में लगभग महीने भर तक गाँव-गाँव में इसी तरह के आयोजन होते हैं, जिसे ‘ईंद’ कहते हैं जिसमें पूरा कुटुम्ब व नाते-रिश्तेदार एकत्रित होकर ‘माता-पूजन’ (पुरखों की पूजा-अर्चना) करते हैं। ‘ईंद’ सच में अनूठा नामकरण है।
धीरे-धीरे पिछली बार के परिचित तमाम लोग मिले-मदन, वैल सिंह, नारायण सिंह, नर सिंह वगैरह। महेश जी को बड़ा आश्चर्य हुआ कि मुझे इतने लोग पहचानते हैं और इतनी आत्मीयता से मिल रहे हैं। पूछने लगे आप कितने दिन रुके थे? मैंने कहा बस एक दिन। नारायण सिंह के घर पर बैठकर चाय पी। वैल सिंह की आज-कल प्री-बोर्ड परीक्षा चल रही है। अभी स्कूल से लौटा है, कल भी पेपर है। कहने लगा कुछ दिन रुको यहाँ, कल से वह पूरे समय साथ रहेगा। हमने तय किया कि दिन भर और गाँवों में घूमकर शाम को यहीं आ जायेंगे और रात में यहीं खाना खायेंगे, सोयेंगे। थोड़ी देर मदन की चक्की में खाट डालकर बैठे रहे। इस बीच कोसदूना से गायत्री परिवार का कलश जुलूस इसी रास्ते से जोबट के लिए निकला जिसमें बहुत सारी महिलाएँ हैं, जिसे देखकर पाण्डे जी एकदम उत्साहित हो गए लेकिन महेश जी ने कोई विशेष रुचि नहीं ली। कहने लगे इस तरह के जुलूस निकालने का क्या लाभ है? पाण्डे जी खामोश हो गए। उन्हें मुझमें खलनायक नज़र आ रहा है!
जोबट की ओर चल दिए। सब को भूख लग रही है, एक ढाबे में खाना खाया। झाबुआ जिले में शायद पहली बार किसी ढाबे होटल में खाया। पाण्डे जी चाहते हैं कि देहलता चलें लेकिन हमने कहा कि वह तो देखा हुआ है बाद में चलेंगे। खाना खाकर आलीराजपुर रोड पर निकल गए और रमपुरा, गुड़ा वगैरह होते हुए आम्बुआ तक गए। गुड़ा जंगल सिंह का गाँव है जो साथ में है। हथनी नदी के उस पार आम्बुआ है जो आलीराजपुर तहसील में हैं, जिसकी बस्ती बड़ी है। यहाँ बोहरा मुल्ला समुदाय के लोग बहुसंख्यक हैं तथा कलारों की काफी दुकानें और वर्चस्व है। एक किराने की दुकान में बैठकर चाय पी। यहाँ खुलेआम देशी शराब (भट्टी वाली) की बोतलें बिक्री के लिए रखी हुई हैं। दुकानदार ने बताया कि आलीराजपुर तहसील में तो सभी किराने की दुकानों पर यह सरकारी ठेके वाली देशी शराब खुलेआम बिकती है। यह एक अनूठी बात तो है ही। आम्बुआ से लौटते हुए बोरझड के पास से उबलट की ओर मुड़ गए, जहाँ एक प्रधानमंत्री सड़क बनी है तथा एक हाईस्कूल भी है। एक-दो घरों में गए, चाय पी, यहाँ से एक कच्चा रास्ता आगे हथनी नदी की ओर जाता है। मसनी गाँव में शिवगंगा से जुड़े कुछ लोग हैं। उसी कच्चे रास्ते पर चल दिए, जहाँ तक जीप जा सकी चलते गए। उसके बाद नदी की ओर पैदल चल दिए।
हथनी नदी पर पहुँचकर तबियत खुश हो गयी। बहुत ही सुन्दर जगह है। किनारे पर कोई आबादी नहीं, दूर-दूर तक दोनों तरफ, बस हरियाली ही हरियाली दिखाई देती है और चट्टानों के बीच बहती हुई नदी। शाम को धुंधलका हो गया। नदी के अन्दर उतरकर रेत पर चलने लगे। मुझे एकदम ऐसा लगा कि भँवरताल में बंजर नदी में चल रहे हैं और उसी समय महेश जी ने भी कहा कि उन्हें दतिया में उनके घर के पास की नदी की याद आ रही है। बहुत-सी समानताएँ हैं हम दोनों में, तभी ऐसा साथ हो गया है। अच्छा-खासा अँधेरा हो गया और सर्दी भी। चलते-चलते मसनी गाँव में प्रताप के घर पहुँचे। यह जगह बड़ी अच्छी लगी जो सड़क से थोड़ी दूर है और बिजली-टेलीफोन सुविधा नहीं है, वरना नदी के किनारे आश्रम बनाने के लिए बहुत ही उपयुक्त जगह है। नदी के किनारे पहाड़ी पर ऊपर खड़े होकर दूर-दूर तक दिखाई देता है। थोड़ी दूर पर नदी पर बना नया पुल दिखाई दिया, जो खट्टाली में है। पुल के दूसरी तरफ आलीराजपुर तहसील है। जोबट से एक सीधा रास्ता खट्टाली होकर नानपुर और आलीराजपुर जाता है-कल खट्टाली जायेंगे। प्रताप के घर चाय पी। कहने लगे अब खाना खाओ और यहीं रुको। मैंने कहा बिटवासा में बोल आए हैं, नहीं तो रुक भी जाते।
आठ बजे के बाद बेटवासा पहुँचे। सब सोने की तैयारी में हैं। वैल सिंह के चचेरे भाई विक्रम सिंह के यहाँ खाने-सोने की व्यवस्था है। सबने खाना खाया और खटियों में सो गए। इस इलाके में एक कहावत प्रचलित है – “भगवान भूका उठाय पण भूका सुवाय नी।” शायद सच ही उतर रही है, खासकर मुझ पर। सुबह देहलता- जामनी जाएंगे।
छोटी-सी खाट पर पैर सिकोड़ कर सोया। सुबह-सुबह बहुत तेज़ ठंड हुई। रात इतनी ठंड नहीं थी। सिर थोड़ा भारी लग रहा है और गर्दन में भी थोड़ा दर्द है। सुबह चार बजे के करीब नींद खुल गयी थी, पेट गड़बड़ लगा-झाबुआ जिले में पहली बार। मुँह धोकर चाय पीकर निकलने के लिए तैयार हो गए। वैल सिंह स्कूल जाते हुए मिला। देहलता रोड पर चल दिए जो आगे कुक्षी तक जाती है। बेटवासा तो इन्दौर रोड पर है जो बाघ होकर जाती है। वैसे इससे भी कुक्षी का रास्ता भी जाता है। देहदला फिर नहीं रुके, आगे बढ़ गए। जामनी तिराहा पर रुके। सीधा रास्ता कुक्षी को, एक तरफ़ जामनी गाँव और दूसरी तरफ ‘उम्दा पुनर्वास स्थल’ का बोर्ड लगा हुआ है। यहाँ हथनी नदी पर ‘फाटा बाँध’ कुछ दूरी पर बंधा है जो इसी साल भरा है। वहाँ के विस्थापितों के लिए उम्दा (यह एक गाँव का नाम है ) में व्यवस्था की गयी है। भीती और उम्दा गाँवों की ज़मीन इस तरफ है, जो डूब में गयी है। दूसरी तरफ से चमारबेड़ा, भीती, खट्टाली की ज़मीन डूब में है। बाँध बनने से ही मसनी तक हथनी में पानी भरा हुआ है। यह हथनी नदी आगे नर्मदा जी में मिल जाती है। नर्मदा परिक्रमा में हथनी नदी का बड़ा महत्व है और बार-बार उल्लेख आता है।
जामनी तिराहे पर एक छोटी दुकान से बिस्किट लेकर चाय बनवाकर पी। यहाँ भी ठेके की देशी शराब का खुलेआम अड्डा है। उम्दा वाली सड़क पर निकल गए। भीती और उम्दा गाँवों की बहुत सारी ज़मीन डूब में गर्इ है। काफी बड़ा बाँध है जिसका पानी लबालब भरा हुआ है। हमें देखकर कुछ किसान आ गए और अपनी तकलीफें बताने लगे। खेती की सारी जमीन डूब में चली गर्इ। कुछ मुआवजा तो मिला है लेकिन उसका क्या करें? यहाँ कोई खेती की ज़मीन तो बेचता नहीं और कुछ करने लायक है नहीं। विस्थापित होकर बेकार बैठे हैं। आसपास के सभी गाँवों का यही हाल है। लोग बहुत दुःखी है। क्या करें कुछ समझ में नहीं आता। भारत भर में विकास योजनाओं से अब तक करीब 5 करोड़ से ज्यादा लोग विस्थापित हो गए है। ‘फाटा बाँध’ से इनकी किस्मत ही फूट गई है। इस क्षेत्र में खेती की जमीनों की कमी है और मुआवजा भी इतना नहीं मिलता कि कहीं दूर जमीन खरीद सकें। जमीन के बदले जमीन एक स्थापित सिध्दांत बनाया गया था, सरदार सरोवर बाँध में। परंतु सर्वोच्च न्यायालय ने ही उस सिध्दांत को खोखला कर दिया। थोड़ी देर पानी के किनारे बैठे रहे और फिर लौटकर जामनी गाँव गए। प्रताप, विक्रम, कैरम, वैल, वेस्ता, दरयाव-ए सारे नाम बहुत हैं यहाँ। कैरम सिंह यहाँ का प्रमुख कार्यकर्ता है। आज नहाना तो सबका गोल। जबकि बाँध किनारे खड़े हैं।
दोपहर में फिर चल दिए जोबट की ओर। यहाँ से कांदा रोड पकड़ी। कांदा जोबट, कांदा, चमारबेंड़ा और खट्टाली। यही रोड आगे नानपुर और फिर आलीराजपुर चली जाती है। सिंगल रोड है। रात में नहीं चलती ख़तरनाक मानी जाती है। खट्टाली का पुल पार करके दूसरी ओर गए। यह आलीराजपुर तहसील में आता है। फॉटा बाँध बनने से यहाँ हथनी नदी में पानी लबालब भरा हुआ है। दोनों तरफ घाट बने हुए है। पुल की दूसरी ओर प्राचीन मन्दिर और आश्रम है। यह भी एक अच्छा स्थान है। इस समय यहाँ कोई साधू नहीं है। थोड़ी देर वहीं आश्रम में बैंच पर बैठे
वापस लौटकर खट्टाली के बाज़ार फलिया या भील फलिया में आए। यहाँ माहेश्वरी लोग काफी जमे हुए हैं। अनिल माहेश्वरी की चाय-नाश्ते की दूकान में चाय पी। अंदर एक 12 बोर की दुनाली बंदूक भी टंगी हुई है। उससे बातचीत होती रही। कहने लगा घाट पर मन्दिर में आजकल कोई साधु नहीं है, वहीं अपना स्थान बना लीजिए। महेश जी ने कहा बेटवासा ही ठीक लगता है। मैंने कहा नदी के किनारे-किनारे चलकर देखते हैं, कहीं कोई उपयुक्त गाँव मिल जाए। दरअसल मैं ऐसी जगह चाहता हूँ, जहाँ पाण्डे की जान-पहचान कम-से-कम हो और शिवगंगा के पुराने कार्यकर्त्ता न हों। इससे नए सिरे से नई तरह से काम शुरू करना आसान होगा। देहदला, बेटवासा यहाँ सब पुराना काम है। वैसे बेटवासा बहुत सही जगह है। अनिल माहेश्वरी से नदी तक जाने का रास्ता पूछा तो उसने पुराना रोड बताया, जो यहाँ से जामनी जाता था और अब डूब गया है। इसी रोड के उस छोर पर उम्दा में हम कल थे।
उस पुरानी रोड पर चल दिए। रास्ते में जो दिखता चिल्लाकर बताता कि आगे रास्ता नहीं है। बाज़ार से क़रीब डेढ़-दो किलोमीटर दूर तक चलकर पानी आ गया। गाड़ी वहीं खड़ी कर दी। सब तरफ़ पानी-ही-पानी। किनारे फसल खड़ी हुई है। हम लोग एक टीले के ऊपर चढ़ गए। वहाँ से खड़े होकर जो दृश्य देखा तो पाण्डे से मैंने कहा कि मुझे लगता है यही वह जगह है जिसे तलाश कर रहे थे। काफी देर तक वहीं खड़े रहे। लगता है तलाश पूरी हुई। बिजली की लाइन भी एकदम करीब से जाती है। पानी के उस पार दूसरा गाँव है, शायद भीती; जो टापू जैसा दिख रहा है, तीन तरफ से पानी से घिरा हुआ। यह जगह हथनी नदी के एकदम ऊपर है और दूसरी तरफ से बाँध का पानी आकर नदी में मिल रहा है, यहाँ तो पूरे साल पानी रहेगा ही। महेश जी को भी बहुत अच्छी लगी जगह। मसनी गाँव की कगार भी यहाँ से दूर दिखाई पड़ रही है। नदी के किनारे-किनारे तो बस दो-तीन कि.मी. ही होगा मसनी। थोड़ी दूर ऊँचाई पर एक खलिहान में काम करती स्त्रियाँ दिखीं उसी ओर चल दिए। वहाँ सास-बहू मूँगफली साफ़ कर रही हैं और साथ में एक बच्चा भी है। महेश जी ने बातचीत शुरू कर दी। बच्चे का नाम मनीष है जिसका पिता भारत सिंह है। जिस टीले पर हम खड़े थे, वह भारत सिंह की ही ज़मीन है। यहाँ आसपास इनके खानदान की ज़मीन है।
यह डुड्डवे फलिया है। महेश जी के कैमरे ने बहुत साथ दिया। थोड़ी दूर पर नदी के किनारे एक घर दिखा और हम उसके पास गए। बाहर एक बच्ची बकरी के साथ बैठी हुई कंघी कर रही है। बड़ी प्यारी बच्ची है-सोना नाम है, पाँचवीं कक्षा में पढ़ती है। यह उसी का घर है। घर में अभी कोई नहीं है, सब लोग खेतों में हैं। उसका भाई भी आ गया। मनीष इसका चचेरा भाई है। बच्चों के साथ गाँव के अन्दर गए। धीरे-धीरे बच्चे इकट्ठे होते गए। राजेन्द्र सिंह के घर पहुँचे। गाँव के सारे बच्चे इकट्ठे हो गए और धीरे-धीरे महिलाएँ भी। सब लड़कियाँ स्कूल में पढ़ती हैं। दरयाव सिंह के यहाँ लड़का फौज़ में काम करता है और अभी इंफाल में पदस्थ है। एक-दो दिन में आने वाला है छुट्टी पर। उसका परिवार यहीं रहता है। दूसरे घर में एक लड़का राजू ड्राइवर है, इन्दौर में ट्रक चलाता है। अधिकांशतः वही पूछताछ करता रहा। क्यों आए हैं, कहाँ से आए हैं, क्या करना चाहते हैं? कई लोग सोच रहे हैं कि बाँध बना है इसलिए उसमें नाव चलवायेंगे। कुछ लोग कह रहे हैं कि अनाज के व्यापारी हैं बाँध बनने से अच्छी फसल होगी इसलिए अभी से आए हैं। इंदर सिंह के यहाँ गए, वहाँ उसका बूढ़ा पिता ताड़ी पीकर मस्त है। खूब बातें कीं और गले मिलता रहा। मसनी का प्रताप सिंह उसका रिश्तेदार निकल आया। अब तो पीछे पड़ा कि यहीं रुको, खाना खाकर जाओ। उसे अपने काम के बारे में थोड़ी जानकारी दी तो बहुत खुश हुआ। कहने लगा हमारे घर में बहुत जगह है यहाँ आकर रहो, जब तक मन चाहे। कोई समस्या नहीं है। यहाँ तो ऐसे काम की बहुत ज़रूरत है क्योंकि यहाँ के लोगों की सारी ज़मीन डूब में चली गयी। कोई सुनने वाला नहीं है।
धीरे-धीरे जैसे पूरा फलिया ही इकट्ठा हो गया। जवान, उत्साही लड़के-लड़कियाँ बहुत हैं। उनमें से कुछ पढ़ते भी हैं। महेश जी और मैंने एक-दूसरे को देखा और कहा कि इससे उपयुक्त और जगह मिलना मुश्किल है। बूढ़े ने ज़बर्दस्ती चाय पिलाई। मेरी थकान, सुस्ती, दर्द सब गायब हो गया। अँधेरा होने लगा अतः यहाँ से चलने की तैयारी हो गयी। इस समय तक 50-60 लोग इकट्ठे हो चुके हैं। काफी दूर जीप तक बहुत से लोग छोड़ने आए। पूछने लगे फिर कब आयेंगे। हमने कहा जल्दी आयेंगे और यहीं रुकेंगे। मेरा तो एक मन किया कि रुक ही जाऊँ फिर महेश जी से बात करके तय हुआ कि दोनों एक साथ आकर कुछ दिन रुकेंगे। रास्ते में बात करते हुए तय किया कि खट्टाली ही अपना केन्द्र बनाने के लिए उपयुक्त स्थान है। तलाश आज पूरी हुई।
भवानी प्रसाद मिश्र की एक कविता हैः
मौसम नए छूते रहते हैं
मगर इसलिए कि वे नए होते हैं
लौट-लौट कर फिंकना चाहिए
अर्थ पुराने शब्दों में से नए सन्दर्भों में
मेरा आज का मन एक नया संदर्भ है
मगर ऐसा नया भी नहीं कि
लगाव न हो उसका किसी पुराने के साथ।
क्रमशः…
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