एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-31

- विभूति झा, सामाजिक कार्यकर्ता
संपादन: चिन्मय मिश्र
यह अनिवार्य रूप से घटित हुआ भी एक साधारण दस्तावेज है। यह न तो कहानी है, न यात्रा वृतान्त। यह एक व्यक्ति की “लौटने” की गाथा है। विभूति दा की यह डायरी अबूझ सी सच्ची कहानी है। यह सत्य की अभिव्यक्ति है। –चिन्मय मिश्र
मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल जिले मंडला से निकलकर सागर विश्वविद्यालय से एमए और एलएलबी। फिर जेएनयू (नई दिल्ली) से समाज विज्ञान में शोधकार्य किया। भोपाल से वकालत शुरू की और भोपाल गैस त्रासदी मामले में गैस पीड़ितों के वकील बने। एक युवा वकील ने बड़े बड़े वकीलों की दलीलों को खारिज कर भोपाल गैस पीड़ितों को मुआवजा दिलवाने की लड़ाई जीती। जिला अदालत से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक पैरवी और फिर एक दिन अचानक पूरी प्रसिद्धि, अपने समृद्ध भविष्य की संभावना को पुराने वस्त्र की तरह उतार कर चल पड़े एक नए जीवन की खोज में। मन में विचारों का उफान और तन पर एक जोड़ी कपड़ों के साथ सबकुछ छोड़ दिया। परिवार भी। किसी फिल्म की पटकथा सा लगता यह इस डायरी के लेखक विभूति झा के जीवन की वास्तविकता है। एक ऐसा मंथन जो जीवन उद्देश्य खोजने की दिशा में बढ़ा और इस राह में उतने ही विविध अनुभव हुए। यह एक विस्तृत जीवन से साक्षात्कार है। किश्त-दर-किश्त रोचक होती जीवन दास्तां।
झाबुआ: नए अनुभव 20 जनवरी, 2008
चाय की दुकान खुली तो थोड़ी-सी गरम चाय पीकर अच्छा लगा। छह बजे के करीब थोड़ा-थोड़ा उजाला हो गया। पीठ पर बैग डालकर चल दिया। 15 मिनिट में शिवगंगा केंद्र पहुँच गया। महेश जी मिल गए। सब शिविर की तैयारी में लगे हुए हैं। कल से शिविर शुरू हो रहा है, जिसमें लगभग डेढ़ हज़ार लोगों के शामिल होने की आशा है। जिले भर से शिवगंगा से जुड़े हुए लोगों के प्रतिनिधि। चूंकि पहली बार ही जिला स्तर पर इस तरह का आयोजन हो रहा है इसलिए सभी थोड़े तनाव में भी हैं। मैंने भी ऐसे समय में एक दिन पहले यहाँ पहुँचना उचित समझा। इन लोगो ने इसी सब काम के लिए एक जीप किराए पर ले रखी है। लोगों का आना-जाना लगा हुआ है। मैंने धूप में बैठकर चाय पी। इस बीच सुशील आ गया और इन्दौर से उसके साथ जो व्यक्ति आए हैं, वे महेश जी के छोटे भाई सुदामा हैं, जो दतिया से आए हैं। शिविर देखने और महेश जी के स्वास्थ्य की जानकारी लेने आए हैं। भोपाल और धार में बात की।
दोपहर में खाना खाकर शिविर स्थल गया। वहीं करीब आधा किलोमीटर दूर रेलवे ट्रैक के पार औद्योगिक क्षेत्र में एक बहुत बड़े भूखण्ड को समतल किया गया है, और वहाँ टेण्ट लगाए जा रहे हैं। यहीं सब लोग आकर रुकेंगे। बहुत योजनाबद्ध तरीके से सब काम चल रहा है। बड़े-बड़े टेण्ट हैं, जो इन्दौर से आए हैं। पानी के लिए बोर किए गए हैं और बिजली की लाइन डल रही है। यह औद्योगिक क्षेत्र होने से बिजली नहीं जाती है। यह भूखण्ड स्थानीय बाफना परिवार का है, जो शिवगंगा से जुड़े हुए हैं। स्थानीय लोगों के अलावा काफी बड़ी धनराशि इकट्ठी की गयी होगी इंदौर आदि से। शासकीय सहयोग तो बिल्कुल भी नहीं है। आर.एस.एस. का खुलकर विरोध है इसलिए प्रशासन से भी कोई मदद नहीं है। ऐसे में जिज्ञासा का विषय यही है कि इन लोगों के पास इतना धन आ कहां से रहा है।
शाम को हर्ष चौहान और मुकेश जैन भी इंदौर से आ गए। हर्ष ही शिवगंगा के प्रमुख योजनाकार हैं। आईआईटी दिल्ली से इंजीनियरिंग की है और उसके बाद से इन्हीं सब कामों में लगे हैं। लगभग 47-48 साल के हैं। यहीं धार जिले के पुराने जागीरदार परिवार के हैं, जो मूलतः भिलाला राजपूत हैं-जैसे राजगौड़। इनके पिता भी लंबे समय तक सांसद रहे हैं। बहुत समझदार और संतुलित व्यक्ति हैं। पैतालीस वर्षीय मुकेश जैन इंदौर के बड़े व्यवसायी हैं, जो सब छोड़छाड़ कर इसी काम में पिछले कुछ वर्षों से लगे हुए हैं- अच्छे व्यक्ति हैं। हर्ष की पत्नी मराठी ब्राह्मण परिवार से है और वह भी संस्कार भारती में काम करती है। ये सारे लोग वनवासी कल्याण परिषद्, सेवा भारती तथा विद्या भारती से जुड़े हुए थे और वहीं से सबका साथ है। एक तरह की सोच वाले ये सारे लोग एक साथ बाहर आकर अब शिवंगंगा चला रहे हैं।
शाम को महेश जी भी लौट आए। बातचीत चलती रही और हम सभी लोग एक कमरे में सो गए। कल से तो शिविर के टेंट में सबके रहने की व्यवस्था है। इतनी ठंड हैं कि सुबह उठने की हिम्मत ही नहीं होती। अंदर व्यायाम किया फिर चाय पी। ‘अल्पाहार’ भी मिल गया। सब लोग फिर शिविर की तरफ गए। वहां तम्बू गाड़ने का काम चल रहा है। फौजी छावनी की तरह लग रही है। दोपहर में सब आने शुरू होंगे। शाम 5 बजे से कार्यक्रम शुरू होना है। थोड़ी देर रुक कर काम होता देखते रहा। मैं तो सोचता हूँ यहाँ टेंट में न रहकर वहीं कमरे में रहूँगा ठंड से बचने के लिए। दिन भर जबर्दस्त ठंड रही। महेश जी तो टेंट में ही रहेंगे।
लोगों का आना शुरू हो गया। छोटे-छोटे दलों में अपना सामान ले लेकर लोग आ रहे हैं। कुछ लोग बस करके भी आए। सब लोग अपने पैसे खर्च करके आ रहे हैं और यहाँ शिविर में घुसने से पहले प्रत्येक व्यक्ति डेढ़ सौ रुपए जमा कराता है-तीन दिन के खाने-पीने का खर्च। दूर-दूर से अपना काम-धंधा छोड़कर सब आ रहे हैं। धीरे-धीरे बड़ा जबर्दस्त माहौल बनने लगा। यहां बीच में बड़ा मैदान जिसके चारों तरफ टेंट लगे हैं। अलग-अलग विकास केंद्र के लिए स्थान नियत- झाबुआ, मेघनगर, जोबट, आलीराजपुर, राणापुर, पारा, रामा, थांदला, पेटलावाद, कल्याणपुरा, भाबरा सब अलग-अलग, एक दूसरे से लगे हुए। शाम 5 बजे सब मैदान में इकट्ठे हो गए और फिर खेल शुरू हुए। इनके अपने स्थानीय खेलों को लेकर जबर्दस्त उत्साह है। उसके बाद एक बड़े पांडाल में आरती हुई जहाँ अलग-अलग स्थान से आए लोगों ने अपनी भाषा में भजन गाए। उमराली का एक छोटा लड़का 11-12 साल का-रामू अच्छा गाता है तथा उसका भाई गनपत एवं उमेश भी बहुत अच्छा गाते हैं। उन्होंने भजन गाया “मन तो शिवा रट ले, छोड़ दे कपट भोलेनाथ भज ले…” साथ में पूरा पांडाल गूँज उठा।
महेश जी का प्रारंभिक संबोधन-एकदम खोमोशी से सुना गया। कहीं से कोई आवाज़ नहीं। उसके बाद भोजन हुआ। सारे लोग पांडाल में जमीन पर बैठे एक साथ खा रहे हैं। कोई सोच नहीं सकता कि एक हजार से ऊपर लोग इस तरह एक साथ, इतनी शांति से खा रहे हैं। कहीं से कोई एक आवाज सुनाई नहीं देती। सब अपने-अपने बर्तन साथ लेकर आए हैं। सबने खाना खाया, बर्तन धोए और अपने-अपने पांडाल में चले गए। कहीं जूठे का नामोनिशान नहीं। बिना देखे तो कोई मान ही नहीं सकता कि इतने सारे लोगों ने एक साथ अभी यहाँ बैठकर खाना खाया हैं। रोटियाँ गाँवों से इकट्ठी होती हैं।
इतनी जबर्दस्त ठंड है कि बताया नहीं जा सकता। एकदम खुला मैदान। रात करीब साढ़े नौ बजे है। सब अपने-अपने पांडालों से बाहर निकले और अलग-अलग दलों में गाना-बजाना, नाचना शुरू हो गया। ढोलक, मंजीरे, मांदल सब साथ लेकर आए हैं। देर रात तक गाना-बजाना चलता रहा और थकान का एहसास तक नहीं। कहते हैं आदिवासी शराब के बिना नाचना गाना नहीं कर पाते। यहाँ तो शराब का कोई नाम भी नहीं लेता। कोई नशा नहीं; बस अपने जीवन, अपनी संस्कृति और अपने आत्मसम्मान का नशा है! रात करीब 12 बजे तक चला होगा नाच-गाना। मैं तो थक-थकाकर 11 बजे के करीब आकर कमरे में घुसकर ठंड से बच रहा था लेकिन आवाजें देर तक आती रहीं।
सुबह नींद खुली और जल्दी-जल्दी निकला तो फिर आवाजें आ रही हैं। सब उठकर नहा-धोकर शारीरिक व्यायाम और खेल-कूद में लगे हुए हैं। अभी करीब 6 बजा है और सर्दी से एकदम कपकपाहट हो रही है। पता नहीं किस मिट्टी के बने लोग हैं। इसके बाद ‘अल्पाहार’ करके फिर सब अलग-अलग समूहों में बैठ गए। अब चर्चाओं का सत्र है। यह ‘ग्राम सशक्तीकरण शिविर’ है। इसके बाद एक सामूहिक सत्र होना है। रात में अंतिम संख्या 1430 हो गयी थी। बदल-बदल कर इन्हीं में से एक दल को खाना बनाने में मदद करने, एक को खाना परोसने और एक को सुरक्षा व्यवस्था की ज़िम्मेदारी दे दी जाती है। सब कुछ इतना सुव्यवस्थित तरीके से चल रहा है कि कहीं कोई आवाज़ नहीं आती। ऐसा लगता है कि सब बड़े अनुभवी हैं जबकि वास्तविकता ये है कि पहली बार इतना बड़ा शिविर हो रहा है और बहुत सारे ऐसे लोग हैं, जो पहली बार अपने गाँव से बाहर निकले हैं। कमाल के लोग हैं। मुझे तो अब इनमें से बहुत लोग पहचानने लगे हैं। लगभग पूरे जिले में तो सैकड़ों गाँवों में जा चुका हूँ। मुझे भी महसूस हो रहा है कि शिवगंगा को समझने और अपने कार्य निर्धारण का यह सर्वश्रेष्ठ संयोग बना है। मेरी शिवगंगा के साथ सहमति बनेगी या नहीं, यह सम्मेलन संभवत: यह तय करने में महत्वपूर्ण सिद्ध होगा।
11 बजे के करीब दीपक आ गया। उसे भी बहुत अच्छा लगा। दोपहर में सबके साथ ज़मीन पर बैठकर खाना खाया। उसके बाद थोड़ी देर और रुका फिर वापस चला गया। आज मेघनगर के भी काफी लोग आए हुए हैं और बाँसवाड़ा वगैरह के भी। स्वामी अवधेशानन्द गिरि आज शिविर में आने वाले हैं। उनके दर्शन के लिए ये शहरी लोग इकट्ठे हुए हैं। शाम को जब खेल चल रहे थे, उसी समय अवधेशानन्द जी का काफिला पहुँचा। शहरी और मीडिया के लोगों ने घेर लिया जिससे उनका चलना मुश्किल हो गया लेकिन इन वनवासियों में से कोई भी अपनी जगह से नहीं हिला और सब कुछ यथावत चलता रहा।
थोड़ी देर बाद पांडाल में अवधेशानंद जी का संक्षिप्त सम्बोधन हुआ। रामकथा और भागवत पुराण सुनाने वाले जाने-माने व्यक्ति हैं। भोपाल में भी हर साल इनका आयोजन होता है, राहुल सिंह करते हैं। एक बार राहुल ने बड़ा आग्रह करके बुलाया भी था। मैं कभी गया नहीं। अच्छा बोलते हैं, बड़ा प्रभावशील व्यक्तित्व है। धर्म की काफी व्यापक परिभाषा बताई और उसे सीधा सेवा कर्म से जोड़ते हुए यही कहा कि पूजा-अर्चना वास्तव में धर्म नहीं है, वरन् मनुष्य की सेवा ही वास्तविक धर्म है और भी बहुत सी बातें कही। काफी अच्छा बोले। अब कल यहाँ शिविर में आकर एक सत्र में बोलेंगे और दोपहर साथ में भोजन करेंगे।
अवधेशानंद जी चले गए और उनके साथ तमाम शहरी लोग भी मक्खी-मच्छरों की तरह उड़ गए। यहाँ सब यथावत चलता रहा। जैसे और भी बहुत कुछ हो रहा है, वैसे ही स्वामी जी का आना, रहना और जाना भी हो गया। जबकि उनके प्रति बड़ी श्रद्धा है। ठंड बढ़ती जा रही है, लेकिन जोश भी वैसे-वैसे बढ़ रहा है सबका।
अखबारों का कहना है कि झाबुआ में ऐसी ठंड कभी नहीं हुई। खुले मैदान में और तम्बुओं में बिना खूब सारे ऊनी कपड़ों के तथा बिना आग के रह रहे इन वनवासियों की परीक्षा ही है। विषम परिस्थिति में भी उत्साह में कोई कमी नहीं, इसी दौरान स्वामी अवधेशानंद जी आ गए। सुबह के सत्र में शहरी लोगों को प्रवेश दिया गया है। स्वामी जी करीब एक घण्टा बोले और साथ में सबने भोजन किया। उनके लिए एक अलग तम्बू बनाया गया है, वे वहाँ विश्राम करने चले गए।
महेश जी ने मुझे बुलाया और अलग से मिलाया।
मैंने कहा “आपने धर्म की जो परिभाषा दी थी कल, उससे मैं प्रभावित हुआ। वैसे मेरी पृष्ठभूमि कुछ अलग है।”
कहने लगे “कल तो शहरी लोग भी थे न इसलिए उस हिसाब से बोल रहा था। वनवासी बेचारे क्या समझें, उन्हें तो ये सब नहीं बता सकते?”
उनकी बात सुनकर मैं थोडा सा असहज हुआ। मैंने कहा “यही तो हम लोगों की भूल है। जिन्हें हम समझदार मानते हैं; वे एकदम नासमझ हैं और जिन्हें नासमझ जानते हैं वे ही सचमुच समझदार हैं। मैंने तो तीस साल तक वकालत की है, लेकिन एकदम नासमझ था, अभी छह महीने से ही थोड़ा-थोड़ा समझना शुरू किया है।”
एकदम चौंककर सचेत होकर बैठ गए।
“आप धार्मिक काम से कब जुड़े हैं?”
मैंने कहा “मैं तो नास्तिक हूँ लेकिन यहाँ आकर लग रहा है कि धर्म का काम करने वालों के साथ मिलकर भी सार्थक काम किया जा सकता है, विशेषकर तब जब धर्म की वही समझ हो जो आपने सबको कल दी है।”
वे बोले “आपसे बहुत बातें करनी हैं। आप समय निकालकर कुछ समय हमारे आश्रम में आकर रहें। आपने ऐसी बात कही है, जिस पर विचार करना होगा।”
महेश जी बोले “इनके साथ छह महीने में इतना सीखने को मिला है और बहुत-सी ऐसी बातें हैं, जिनसे देखने की दृष्टि ही बदल गई।”
मैंने कहा “हम सब मिलकर झाबुआ में ऐसा कुछ कर सकते हैं, जो देश में अभी तक कहीं नहीं हुआ और जिसकी बहुत अधिक आवश्यकता है, बस ईमानदारी, लगन और स्पष्ट समझ की आवश्यकता है।”
स्वामी अवधेशानंद जी बोले “विभूति जी आप अवश्य आइए, मुझे प्रतीक्षा रहेगी। मैं तो अगली बार यहाँ आकर एक हफ़्ता साथ रहूँगा।”
मैं बाहर निकल आया। सोचता रहा कि स्वामी जी ने मुझसे जो कहा है उसका क्या वही आशय है? यह तो समय और शिवगंगा के साथ भविष्य की संभावनाएं ही बताएंगी।
बाद में शहरी लोगों को अलग से सम्बोधित किया और मेरा उदाहरण देते हुए उसका अनुसरण करने का आह्वान करते रहे। महेश जी ने बाद में बताया कि बार-बार बोलकर गए हैं कि उनके आश्रम ‘कनखल’ में अवश्य लेकर आयें। महेश जी ने बताया कि यहाँ शिवगंगा के कार्यक्रम में आते हैं तो कुछ नहीं लेते, बल्कि कुछ देकर ही जाते हैं। जबकि और कहीं भी जाते हैं तो एक लाख प्रतिदिन इनकी ‘फीस’ होती है। है न मजेदार बात। डॉक्टरों, वकीलों जैसी ही धार्मिक प्रवचनकर्ताओं की भी फीस! स्वामी अवधेशानंद एक किस्म की वैचारिक स्पष्टता खासकर धर्म के हिसाब से देते जा रहे हैं।
शाम को ऐसे-ऐसे खेल खेले गए कि देखकर दंग रह गए। खेलते-खेलते ही कोई नया खेल निकाल लेते हैं; बड़े ही ऊर्जावान लोग हैं। कितना कुछ है इनसे सीखने को? आज शिविर की अंतिम रात है। कल दोपहर तक सब सिमट जाए गा। आज शाम केंद्रीय मंत्री कांतिलाल भूरिया भी स्वामी जी से मिलने शिविर में आए। कोई भी वनवासी अपने स्थान से टस से मस नहीं हुआ। रात में ढोलक की थाप पर मैं भी अपने को रोक नहीं पाया और बहुत देर नाचता रहा।
सुबह इतनी अधिक ठंड है कि बिस्तर से उठना ही असम्भव लग रहा है। शिविर में तो तापमान शून्य के करीब पहुँच गया होगा। आज तो सब कुछ देर से चल रहा है। ठंड के कारण एक घंटा विलम्ब हो रहा है; बड़े-बूढ़े सब बता रहे हैं कि उनकी याद में यहाँ आज तक ऐसी ठंड कभी-भी नहीं हुई। निश्चित तौर पर यहाँ तापमान शून्य के करीब हो गया होगा। ऐसी ठंड तो मैंने भँवरताल में ही महसूस की है। जलवायु परिवर्तन की आहट? सुबह थोड़ी दौड़-भाग और महेश जी का अन्तिम सम्बोधन। इसके बाद सबकी अलग-अलग समूह में बैठक व अल्पाहार। सब अपने-अपने तम्बू समेट के रख रहे हैं। देखते ही देखते पूरा शिविर साफ हो गया और सारा सामान एक जगह इकट्ठा करके रख दिया गया। कोई बाहरी आदमी नहीं आया इस काम के लिए। सारे बर्तन साफ होकर रख दिए गए। कोई टूट-फूट नहीं, बिजली की लाइन निकाल कर रख दी गई। कोई कह नहीं सकता कि अभी कुछ देर पहले यहाँ इतने सारे लोगों का इतना बड़ा शिविर लगा हुआ था। बहुत पहले छत्तीसगढ में शंकर गुहा नियोगी के संगठन की सभाओं के बारे में ऐसा सुना था। बहुत से लोग अपने तीर-कमान भी कंधे पर टाँगे हुए हैं। एक-दूसरे से मिलते हुए, फिर मिलने का तय करते हुए और एक-दूसरे के गाँव आने-जाने का वादा करते हुए, मिल-जुलकर काम करने का प्रण लेते हुए सब धीरे-धीरे निकलने लगे। 12.00 बजे तक पूरा शिविर खाली हो गया। सिर्फ सामान बटोरने वाले ही रह गए। क्या कमाल के लोग हैं? बहुत ज़बर्दस्त अनुभव रहा इन तीन-चार दिन में!
शिविर खत्म होने के बाद एकदम सूना सूना, खाली-खाली-सा लगने लगा। महेश जी और अन्य प्रमुख कार्यकर्ता समीक्षा में लगे रहे। हर्ष जी भी आज चले गए। इस बार हर्ष से भी काफी बातें हुईं। हर्ष परदे के पीछे ही रहते हैं, सामने महेश जी। दोनों में बड़ा जबर्दस्त सामंजस्य है। शिविर का आयोजन बहुत सफल रहा और सबमें अब नया उत्साह है। अब 5 से 15 फरवरी तक इंदौर में कार्यकर्ता प्रशिक्षण शिविर है, जिसमें लगभग सौ-सवा सौ प्रमुख कार्यकर्ता शामिल होंगे। अब महेश जी उसकी तैयारी में लग जाएंगे। उनका कहना है कि उसके बाद ही, यानी 15 फरवरी के बाद ही मेरे साथ जोबट क्षेत्र में समय दे पाएंगे। इस तरह तो बहुत देर हो जाएगी। मैं इतने दिन क्या करूँगा? मैंने कहा बीच में 2-3 दिन समय निकालकर जोबट चलते हैं और केंद्र स्थापित करने के लिए स्थान तो तय करते हैं। रहना फिर 15 फरवरी के बाद शुरू करेंगे। महेश जी ने कहा ठीक है। यहाँ का काम समेटकर एक-दो दिन में चलते हैं।
क्रमशः…
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