
- पूजा सिंह
स्वतंत्र पत्रकार
लेखक विभूति झा की पुस्तक ‘अनाम पथ का पथिक’ एक ऐसी यात्रा का दस्तावेज है जिसमें बाहरी रास्तों की खोज धीरे-धीरे आंतरिक बदलाव और सामाजिक यथार्थ को समझने की कोशिश में बदल जाती है। विभिन्न चरणों में बंटी यह पुस्तक लेखक के अनाम पथ पर चलने के दौरान आए विभिन्न पड़ावों से हमें परिचित कराती है। पुस्तक का उपशीर्षक ‘नर्मदा तट के साधुओं से होते हुए भील आदिवासियों तक एक अलक्षित यात्रा’ इसकी विषयवस्तु की दिशा स्पष्ट करता है। नर्मदा तट, साधुओं का जीवन, झाबुआ और आलीराजपुर का आदिवासी अंचल तथा स्थानीय समाज में परिवर्तन की कोशिशें इस यात्रा के प्रमुख पड़ाव हैं। इनके बीच से गुजरते हुए ही लेखक जीवन के अर्थ, मनुष्य की गरिमा, सामाजिक जिम्मेदारी और सामुदायिक परिवर्तन की संभावनाओं को समझने का प्रयास करता है।
पुस्तक को तीन चरणों ‘विरक्ति’, ‘तलाश’ और ‘चुनौती’ में विभाजित किया गया है। यह विभाजन यात्रा की दिशा को समझने में मदद करता है। पहले चरण में परिचित जीवन से दूरी बनाने की इच्छा है, दूसरे में जीवन और समाज के नए अर्थों की खोज, और तीसरे में अनुभवों के आधार पर सामने आने वाले प्रश्नों का सामना। इसीलिए यह सामान्य यात्रा-वृत्तांत से आगे बढ़कर आत्ममंथन और सामाजिक अवलोकन की रचना बन जाता है।
परिचित संसार से बाहर निकलने की बेचैनी
लेखक और पुस्तक की यात्रा 29 जून 2007 को भोपाल से शुरू होती है। लेखक किसी निश्चित गंतव्य, व्यवस्थित योजना या सुविधाजनक यात्रा-प्रबंध के साथ नहीं निकलता। वह बस किसी ऐसी जगह जाना चाहता है जहां उसे कोई न जानता हो। इस अनिर्णय में वह पैदल ही भोपाल से निकल पड़ता है। उसके भीतर चल रही यात्रा उसे एक बाहरी यात्रा पर जाने के लिए प्रेरित करती है।
हमें यह याद रखना होगा कि यह यात्रा किसी किस्म का पर्यटन नहीं है। पर्यटन में अक्सर स्थानों को देखना, उनकी विशेषताओं को जानना और अनुभवों को स्मृतियों के रूप में संजोना प्रमुख होता है। इसके विपरीत, अपनी इस यात्रा में लेखक सफर की अनिश्चितता को स्वीकार करता है। उसे कुछ नहीं पता है कि दिन ढले वह कहां पहुंचेगा और किन लोगों के बीच रात गुजारेगा। इस प्रकार वह रास्ते में मिलने वाले लोगों, परिस्थितियों और अनुभवों के भरोसे आगे बढ़ता है। उसके लिए यात्रा पहले से तय कार्यक्रम पूरा करने के बजाय स्वयं को अपरिचित स्थितियों में रखकर देखने का माध्यम है।
विरक्ति से तलाश तक
पुस्तक का पहला चरण ‘विरक्ति’ है। विरक्ति को सामान्यतः सांसारिक जीवन से मोहभंग या उससे दूरी बनाने के अर्थ में देखा जाता है। लेकिन इस पुस्तक में यह धार्मिक या आध्यात्मिक विचार नहीं बल्कि परिचित जीवन की सीमाओं से बाहर निकलने और अपने अनुभवों को नए सिरे से परखने की कोशिश भी है। नर्मदा तट पर साधुओं से होने वाली मुलाकातें इस यात्रा का अहम हिस्सा हैं। साधुओं का संसार लेखक के लिए एक अलग जीवन-पद्धति से परिचित होने का अवसर बनता है। यहां धार्मिक आस्था, दिनचर्या, लोगों के बीच संबंध और जीवन के प्रति विभिन्न दृष्टिकोण सामने आते हैं। लेखक इन अनुभवों के माध्यम से केवल किसी आध्यात्मिक संसार का परिचय नहीं प्राप्त करता, बल्कि मनुष्य और उसके व्यवहार को भी करीब से देखने का अवसर पाता है।
आदिवासी समाज को निकट से देखने का अवसर
पुस्तक का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा झाबुआ, आलीराजपुर, कठ्ठीवाड़ा और जोबट जैसे क्षेत्रों की यात्रा से जुड़ा है। इन स्थानों पर पहुंचकर लेखक आदिवासी समाज, उसकी सांस्कृतिक परंपराओं, सामुदायिक जीवन और सामाजिक बदलाव की कोशिशों को समझने का प्रयास करता है। किसी समुदाय को समझने के लिए केवल उसके बारे में उपलब्ध जानकारियां ही पर्याप्त नहीं होतीं। उसके बीच रहना, लोगों से बातचीत करना और उनके दैनिक जीवन को देखना भी जरूरी है। आदिवासी समाज को अक्सर गरीबी, पिछड़ेपन या सरकारी योजनाओं की जरूरत जैसे सीमित संदर्भों में देखा जाता है। लेकिन कोई भी समाज केवल अपनी समस्याओं से परिभाषित नहीं होता। उसकी अपनी सांस्कृतिक स्मृतियां, सामाजिक व्यवस्थाएं, जीवन-दृष्टि और सामुदायिक संबंध भी होते हैं। इस पुस्तक के अनुभव ऐसी एकांगी धारणाओं से आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं। आदिवासी अंचल के संदर्भ में भगोरिया का प्रसंग विशेष उल्लेखनीय है। किसी सांस्कृतिक आयोजन को केवल एक उत्सव या आकर्षक दृश्य के रूप में देखना उसके सामाजिक अर्थ को सीमित कर सकता है।
पुस्तक का दूसरा चरण ‘तलाश’ है। इस हिस्से में लेखक व्यक्ति से समाज की ओर बढ़ता है। अब सवाल केवल अपने जीवन और पहचान को समझने का नहीं, बल्कि यह जानने का भी है कि समाज कैसे बदलता है और लोग अपने सामूहिक जीवन को बेहतर बनाने के लिए क्या प्रयास करते हैं। शिवगंगा से जुड़े प्रसंग इस दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। इनके माध्यम से स्थानीय समाज में चल रही पहल, सामुदायिक सहभागिता और ग्रामसभा के जरिये जनजागरण जैसे विषय सामने आते हैं। यह विवरण यात्रा को सामाजिक सरोकारों से जोड़ता है। ग्रामसभा जैसी संस्थाएं तभी प्रभावी हो सकती हैं जब लोग अपने सामुदायिक जीवन से जुड़े प्रश्नों पर संवाद करें और निर्णयों में भाग लें। इसके लिए केवल औपचारिक व्यवस्था नहीं, बल्कि जागरूकता, आपसी विश्वास और सामूहिक जिम्मेदारी भी आवश्यक है।
पुस्तक इन अनुभवों के माध्यम से पाठक को यह सोचने का अवसर देती है कि परिवर्तन किसी एक व्यक्ति या संस्था का अकेला प्रयास नहीं होता। उसकी स्थायित्व-क्षमता स्थानीय लोगों की भागीदारी और उनके अपने जीवन से उसके जुड़ाव पर निर्भर करती है। हालांकि किसी सामाजिक पहल की पूरी सफलता या सीमाओं का मूल्यांकन करने के लिए उसके कामकाज और परिणामों की अलग से पड़ताल जरूरी होगी। पुस्तक की भूमिका यहां एक यात्री के अनुभवों के माध्यम से इन प्रश्नों को सामने लाने की है।
‘चुनौती’: लौटने का अर्थ
पुस्तक का तीसरा चरण ‘चुनौती’ है। यह शीर्षक यात्रा के एक महत्वपूर्ण पक्ष की ओर संकेत करता है। यात्रा के दौरान नए अनुभव प्राप्त करना एक बात है, लेकिन उन अनुभवों के साथ अपने जीवन में लौटना दूसरी। किसी व्यक्ति की दृष्टि बदलने के बाद उसके लिए पहले की तरह जीवन जीना आसान नहीं रह जाता। परिचित परिस्थितियां और पुरानी मान्यताएं अब नए सवालों के सामने आ सकती हैं।
संपादक चिन्मय मिश्र पुस्तक को ‘लौटने’ की कथा के रूप में देखने की दृष्टि देते हैं। यह व्याख्या इसे किसी महान उपलब्धि या गौरवगाथा के रूप में प्रस्तुत करने से बचाती है। यहां महत्व इस बात का नहीं कि लेखक ने कितना असामान्य काम किया, बल्कि इस बात का है कि यात्रा ने उसे अपने जीवन और समाज को किस तरह देखने का अवसर दिया।
लेखक ने अपनी यात्रा को डायरी के रूप में दर्ज किया है। डायरी की विशेषता यह है कि इसमें घटनाओं के साथ तत्काल उपजी प्रतिक्रियाएं, छोटी-छोटी मुलाकातें और बदलते विचार भी जगह पा सकते हैं। पुस्तक की खूबी यह है कि इसके जरिये पाठक को केवल बाद में तैयार किया गया निष्कर्ष नहीं, बल्कि अनुभव के बनने की प्रक्रिया देखने का अवसर मिलता है
अनाम पथ का पथिक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह यात्रा को केवल स्थान बदलने की प्रक्रिया नहीं मानती। भोपाल से शुरू होकर नर्मदा तट और मध्य प्रदेश के आदिवासी अंचलों तक पहुंचने वाली यह यात्रा धीरे-धीरे व्यक्ति, समाज और जीवन के अर्थ से जुड़े प्रश्नों की यात्रा बन जाती है। यह पुस्तक न तो किसी समाज का संपूर्ण अध्ययन है और न ही जीवन के हर प्रश्न का अंतिम उत्तर देती है। इसका महत्व इस बात में है कि यह पाठक को अनुभव के माध्यम से सोचने के लिए प्रेरित करती है। यह याद दिलाती है कि किसी समुदाय को समझने के लिए उसके बीच जाना, उसके जीवन को ध्यान से देखना और अपनी धारणाओं की जांच करना जरूरी है।
हम कह सकते हैं कि अनाम पथ का पथिक केवल एक यात्रा वृतांत नहीं है बल्कि यह पुस्तक यात्रा के अर्थ पर विचार करने का निमंत्रण देती है। किसी भी रास्ते की दूरी या मार्ग में आने वाली कठिनाई से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि उस रास्ते ने किसी यात्री के भीतर क्या बदला। पुस्तक हमें बताती है कि किसी यात्रा की वास्तविक उपलब्धि केवल नई जगहों तक पहुंचना नहीं, बल्कि अनुभवों के बाद अपने जीवन और समाज को एक नई दृष्टि से देख पाना भी।
इस पुस्तक के प्रकाशन के पूर्व टॉक थ्रू ने श्री विभूति झा के यात्रा वृतांत्त को धारावाहिक रूप से प्रकाशित किया है। इन कड़ियों को यहां पढ़ा जा सकता है-
यह अनिवार्य रूप से घटित हुआ भी एक साधारण दस्तावेज है। यह न तो कहानी है, न यात्रा वृतान्त। यह एक व्यक्ति की “लौटने” की गाथा है। विभूति दा की यह डायरी अबूझ सी सच्ची कहानी है। यह सत्य की अभिव्यक्ति है। –चिन्मय मिश्र
मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल जिले मंडला से निकलकर सागर विश्वविद्यालय से एमए और एलएलबी। फिर जेएनयू (नई दिल्ली) से समाज विज्ञान में शोधकार्य किया। भोपाल से वकालत शुरू की और भोपाल गैस त्रासदी मामले में गैस पीड़ितों के वकील बने। एक युवा वकील ने बड़े बड़े वकीलों की दलीलों को खारिज कर भोपाल गैस पीड़ितों को मुआवजा दिलवाने की लड़ाई जीती। जिला अदालत से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक पैरवी और फिर एक दिन अचानक पूरी प्रसिद्धि, अपने समृद्ध भविष्य की संभावना को पुराने वस्त्र की तरह उतार कर चल पड़े एक नए जीवन की खोज में। मन में विचारों का उफान और तन पर एक जोड़ी कपड़ों के साथ सबकुछ छोड़ दिया। परिवार भी। किसी फिल्म की पटकथा सा लगता यह इस डायरी के लेखक विभूति झा के जीवन की वास्तविकता है। एक ऐसा मंथन जो जीवन उद्देश्य खोजने की दिशा में बढ़ा और इस राह में उतने ही विविध अनुभव हुए। यह एक विस्तृत जीवन से साक्षात्कार है। किश्त-दर-किश्त रोचक होती जीवन दास्तां।

