एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा- समापन कड़ी

- विभूति झा, सामाजिक कार्यकर्ता
संपादन: चिन्मय मिश्र
यह अनिवार्य रूप से घटित हुआ भी एक साधारण दस्तावेज है। यह न तो कहानी है, न यात्रा वृतान्त। यह एक व्यक्ति की “लौटने” की गाथा है। विभूति दा की यह डायरी अबूझ सी सच्ची कहानी है। यह सत्य की अभिव्यक्ति है। –चिन्मय मिश्र
मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल जिले मंडला से निकलकर सागर विश्वविद्यालय से एमए और एलएलबी। फिर जेएनयू (नई दिल्ली) से समाज विज्ञान में शोधकार्य किया। भोपाल से वकालत शुरू की और भोपाल गैस त्रासदी मामले में गैस पीड़ितों के वकील बने। एक युवा वकील ने बड़े बड़े वकीलों की दलीलों को खारिज कर भोपाल गैस पीड़ितों को मुआवजा दिलवाने की लड़ाई जीती। जिला अदालत से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक पैरवी और फिर एक दिन अचानक पूरी प्रसिद्धि, अपने समृद्ध भविष्य की संभावना को पुराने वस्त्र की तरह उतार कर चल पड़े एक नए जीवन की खोज में। मन में विचारों का उफान और तन पर एक जोड़ी कपड़ों के साथ सबकुछ छोड़ दिया। परिवार भी। किसी फिल्म की पटकथा सा लगता यह इस डायरी के लेखक विभूति झा के जीवन की वास्तविकता है। एक ऐसा मंथन जो जीवन उद्देश्य खोजने की दिशा में बढ़ा और इस राह में उतने ही विविध अनुभव हुए। यह एक विस्तृत जीवन से साक्षात्कार है। किश्त-दर-किश्त रोचक होती जीवन दास्तां।
अपने काम का मूलमंत्र मिल गया
30 जनवरी 2009 को कट्ठीवाड़ा से करीब 15 किलो मीटर दूर करेली महुड़ी ग्राम पंचायत के कलमाजा गाँव गये, सड़क से काफ़ी अंदर-साधना और दो अन्य कार्यकर्ताओं के साथ। थोड़ी बातचीत हुईं और 3 फरवरी को ग्रामसभा की औपचारिक बैठक रखना तय हुआ। 3 फरवरी को हम फिर से गये। धीरे-धीरे करके 40-50 लोग इकट्ठे हुए। बातचीत सुनता रहा। इनका ज़्यादा ज़ोर तो अपने प्रोजेक्ट के संबंध में हिसाब-किताब पर ही रहा, लेकिन इस दौरान लोगों ने बहुत सी बातें सामने रखीं। मैंने ध्यान से सब सुना और बीच-बीच में कुछ सवाल भी करता रहा। सरपंच और सचिव दोनों ही ग्रामसभा नहीं आये। कहलवा दिया बाद में दस्तखत कर देंगे। कलमाजा गाँव में इन दो दिनों में ही बहुत कुछ समझने और सीखने को मिल गया। समझ में आया कि ऐसे दूर-दराज के गाँवों में कितनी समस्याएँ हैं, लेकिन ज़्यादातर ऐसी छोटी-छोटी समस्याएँ हैं जिन पर कोई ईमानदारी से ध्यान दे तो सुलझ सकती हैं। एक बुजुर्ग आदिवासी के मुँह से निकली बात एकदम घर कर गई- “पंचायत सुधर जाए तो सब सुधर जाए!”
कलमाजा के अनुभव के बाद ‘ग्राम पंचायत’ और ‘ग्रामसभा’ के विषय में और पढ़ना शुरू किया और समझ में आया कि अब जाकर मुझे अपने काम का मूलमंत्र मिल गया है कि ग्रामसभा को प्रभावी बनाया जाए। आदिवासियों के बीच काम करने का और कुछ बदलाव लाने का यही सही तरीका हो सकता है। अब तो बस एक साथी चाहिए, उसे ही तलाशना होगा। बाकी सब तो धीरे-धीरे हो ही जायेगा। ऐसा लगा कि ग्रामसभा में मेरी मौजूदगी के बाद साधना के लोग भी मुझसे थोड़ा कतराने से लगे, और इसके बाद कहीं और नहीं ले गये। अब 14 अप्रैल के आसपास ग्रामसभाएँ होनी हैं। उसके बारे में गंभीरता से मनन और मंथन करना होगा।
इस बीच गाँवों में घूमते हुए करीब 10-12 किलो मीटर दूर के खरकाली-चिमाटा गाँवों में जानकारी मिली कि यहाँ के मुस्लिम परिवार करीब 5-6 महीने से भाग कर कहीं चले गये हैं। इसकी वजह है कि एक मुस्लिम के साथ एक आदिवासी लड़की भाग गई है। वे डर के मारे वापस आ नहीं रहे हैं और आदिवासियों से कोई बात करने की हिम्मत नहीं करता। मैंने आदिवासियों से बात की, उन्हें समझाया। इसी बीच सारे मुस्लिम लोग मुझसे मिलने आये। मुझे तो ऐसा लगा कि समझौता हो जायेगा, लेकिन कुछ मुस्लिम परिवारों में ही आपस में मतभेद होने लगे। आखिरी फैसला तो नहीं हो पाया, लेकिन इतना ज़रूर हुआ कि गाँव में डर और तनाव कम हो गया और कुछ मुस्लिम परिवारों के लोगों ने गाँव में आना-जाना शुरू कर दिया। यहाँ के मुस्लिमों के बीच मेरा सम्मान बढ़ा और अपना हितैषी मानने लगे। इस घटना के बाद से संघ से जुड़े लोग मुझसे और भी चिढ़ने लगे। कस्बे के ‘हिन्दुओं’ को भी यह अच्छा नहीं लगा। शायद इस मसले में हाथ डालना साधना के कार्यकर्ताओं को भी- और हो सकता है उन्हें भी- रास नहीं आया और सम्पर्क बहुत कम हो गया। यह साफ-साफ समझ में आ रहा था कि आपसी सौहार्द के लिए वातावरण तैयार करना भी ‘काउंटर प्रोडक्टिव’ हो सकता है, समाज का विभाजित रहना ही इन सबके हित में रहता है। इसमें शायद कुछ न कुछ करने की छूट भी मिल जाती है।
कट्ठीवाड़ा में रहते हुए एक साल हो गया था। रास्ता अभी भी पूरी तरह स्पष्ट नहीं था। छटपटाहट बढ़ती जा रही थी। कुछ दिनों के लिए मंडला जिले में अपने गाँव भँवरताल चला गया। भँवरताल रहना काफी सार्थक रहा। इस बार मैंने यहाँ भी प्रयास किया कि आसपास के लोग स्थानीय मुद्दों को लेकर एकसाथ आयें। पहले प्रयास में ही काफी सफ़लता मिली और यह लगा कि यहाँ भी एक विकल्प तैयार हो सकता है। मैंने सोचा और कहा कि अब यहां भी आता रहूँगा महीने-दो महीने में। वहाँ से मेरे आने के बाद लोग इकट्ठे होकर काम करने लगे और उन्हें कुछ सफलता भी मिली।
घर छोड़े भी दो साल हो रहे थे। कट्ठीवाड़ा में भी पूरा साल बीत गया था। मुझे लग रहा था कि अब तो कुछ ठोस शुरुआत हो ही जानी चाहिए। एक बात यह भी दिमाग में आ रही थी कि यदि यहाँ नहीं जमता है तो भंवरताल जाना बेहतर और सार्थक सिद्ध हो सकता है। बढती उम्र का अहसास भी हो रहा था। मैं अब 57 साल का हो गया था। जून के अंत में इंदौर में महेश जी और हर्ष जी के साथ विस्तृत चर्चा कर तय किया कि कट्ठीवाड़ा क्षेत्र में “ग्रामसभा” को केंद्र में रखकर काम करेंगे। प्रत्यक्ष रूप से शिवगंगा कहीं भी दिखाई नहीं देगी।
एक बार फिर कट्ठीवाड़ा छोड़ने का मन बना लेकिन…
भंवरताल की सफलता और इन्दौर में बनाई योजना से उत्साहित होकर करीब पांच सप्ताह बाद कट्ठीवाड़ा लौटा। सबने शुरुआत में फिर बहुत उत्साह दिखाया लेकिन पुन: वही असहयोग। उधर घर की समस्याएं भी मुँह बायें खड़ी थी। इस बीच फुफेरे भाई आलोक के कान में जहरीला कीड़ा घुसने से बम्बई के हिंदुजा अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। मैं भी 15 जुलाई से सितंबर तक वहीँ रहा। डेढ़ महीने। पर आलोक ठीक नहीं हो पाया। बढ़ते नैराश्य के चलते करीब-करीब तय ही कर लिया था कि अब कट्ठीवाड़ा नहीं बल्कि भंवरताल में ही काम करुंगा। मगर तभी घटनाचक्र एकबार पुनः बदला।
9 सितम्बर को इंदौर में साधना-हेरविग के कल्याणी संस्थान की दसवीं वर्षगाँठ का कार्यक्रम था। उन्होंने बहुत पहले से मुझे बुला रखा था, और मेरी भी इच्छा थी शामिल होने की। मैंने सोचा कट्ठीवाड़ा छोड़ने से पहले इस कार्यक्रम में शामिल हो जाऊँ। मैं आ गया। महेश जी भी आये। उस कार्यक्रम में बैठे-बैठे, सुनते-सुनते, देखते और बातें करते पता नहीं क्या कि अंदर से लगा कि मुझे कट्ठीवाड़ा नहीं छोड़ना चाहिये। यह उचित नहीं है, अभी हार नहीं माननी चाहिए। एक प्रयास और करना चाहिए। महेश जी से चर्चा की और अपनी मन:स्थिति बताई। उन्होंने कहा कट्ठीवाड़ा में ही काम करना चाहिए, पूरा-पूरा सहयोग करेंगे। सफलता मिलेगी।
कट्ठीवाड़ा में नये संकल्प, जोश और उत्साह के साथ फिर से शुरूआत करनी थी। पूरे दो महीने के अन्तराल के बाद कट्ठीवाड़ा आ पाया। यहाँ कई लोगों ने तो समझ लिया था अब नहीं आयेंगे। यह तय था की अब जुटकर काम में भिड़ना है। साधना-हेरविग के यहाँ मिलने गया। अभी-अभी उनके कार्यक्रम में इंदौर में शामिल हुआ, इसलिए ज़्यादा गर्मजोशी और उत्साह के साथ मिले। उन्हें ‘ग्राम सभा’ से संबंधित अपनी योजना बताई और बताया कि शुरू में तीन पंचायतों में काम करना है। साधना ने बताया रठौड़ी और करेली महुड़ी में आजीविका परियोजना का उनका काम चल रहा है, इसलिए वहाँ सहयोग मिल सकता है। 2 अक्टूबर से निरंतर जगह-जगह उनकी ग्राम सभाएँ होंगी जिनमें मैं भी जा सकता हूँ। यह विचार अच्छा लगा। शुरूआत इस तरह की जा सकती है। एक बार गाँवों में कुछ परिचय हो जाये, फिर तो अपने आप काम किया जा सकता है। निरंतर सम्पर्क रखना पड़ेगा। एक शाम पारसिंग के घर भी चला गया वह खुश हो गया। अब तो गाँवों में ही काम करना है, यहाँ की राजनीति से दूर। शुरू में तो पारसिंग ने साथ दिया ही था। इस बार सरपंच का चुनाव लड़ेगा। मैंने तय किया कि ग्राम सभाओं का काम दूर के गाँवों से शुरू करना चाहिए और फिर धीरे-धीरे कट्ठीवाड़ा आना चाहिए। अगर यहाँ से शुरूआत करेंगे तो शुरू से ही बहुत ज़्यादा विरोध का सामना करना पड़ेगा। इस बीच यहाँ के उन कलेक्टर और एसपी का ट्रांसफर हो गया जो दोनों ही काफी सकारात्मक थे। अब तो शायद ‘पार्टी समर्पित’ लोग आ गये।
ग्रामसभा बैठक के लिए मिल गया मुद्दा
पारागांव का भँवर साथ रहने लगा। कमल भी नियमित रूप से आने लगा। रठौड़ी से ही शुरूआत करनी चाहिए और इसके लिए जुआन को पूरी तरह से जोड़ना होगा। इस बीच एक बार रठौड़ी होकर भी आये। अभी यह सब योजना बन ही रही थी कि अचानक एक दिन 19 सितंबर 2009 को कट्ठीवाड़ा के गणपत फलिया का महेन्द्र अपनी समस्या लेकर आ गया। उसे पारसिंग और उसके भाई वरसिंग ने मुझसे मिलने की सलाह दी। महेन्द्र भिलाला आदिवासी है। उसने बताया कि वह जिस जमीन पर पीढ़ियों से खेती करता है उस पर ठेकेदार जबरन छात्रावास बनाने की कोशिश कर रहा है। महेन्द्र ने बताया कि एक ही खेत है जिसकी आधी भूमि उसकी निजी है और बाकी रिकॉर्ड में सरकारी दर्ज है, लेकिन वे लोग बरसों से यहीं खेती करते हैं। मैंने कहा मौके पर आकर देखेंगे, कागज़ भी दिखाना। गाँव वालों को भी इकट्ठा करने को कहा।
दूसरी शाम भँवर, कमल और अविनाश के साथ मौके पर गया। गाँव के कुछ लोग इकट्ठे हुए और बताया कि महेन्द्र का कहना सही है। तहसीलदार के कहने से ठेकेदार वहां छात्रावास बना रहा है जबकि जगह दूसरी आवंटित हुई है। कागज़ देखे, मौका देखा-महेन्द्र की बात सही पाई। कलेक्टर ने जो भूमि छात्रावास के लिये कार्यादेश में दर्शाई है वह नाले के दूसरी तरफ़ है। ठेकेदार इन लोगों को रोज़ धमकाता है। उसे दूसरे दिन मेघनगर से पटवारी के साथ आने के लिये खबर भेजी। अगली दोपहर मेघनगर से ठेकेदार आ गया। पटवारी भी साथ में था। मुझे बुला लिया, पारसिंग और दूसरे लोग भी आ गये। वहीं खेत में ही सब बैठ गये और बातचीत हुई। थोड़ी देर में ठेकेदार और पटवारी को मानना पड़ा कि छात्रावास के लिये दूसरी ज़मीन आवंटित है और वह नाले के दूसरी तरफ़ है। सब लोगों ने दूसरी ज़मीन भी देखी, उस पर गाँव का एक दूसरा आदिवासी खेती करता है, उसे भी बुलवाया। उसका कहना था कि उसके पास खेती की कोई और ज़मीन नहीं है । पारसिंग ने कहने की कोशिश की कि दूसरा किसान नशैला और झगड़ालू है, उसकी ज़मीन जब छात्रावास के लिये आवंटित हो गयी है तो उसे तो छोड़ देना चाहिए। इस पर विवाद होने लगा। मैंने लोगों से पूछा क्षेत्र में क्या और खाली शासकीय जमीनें नहीं हैं जहाँ कोई खेती न करता हो। तो सबने कहा ऐसी जमीनें हैं तो सही लेकिन बड़े लोगों के कब्ज़े में हैं। मैंने कहा अगर भूमिहीन और छोटे किसान सरकारी ज़मीन पर खेती करते आए हैं तो उन्हें पट्टा मिलना चाहिए। सरकार उनसे खाली नहीं करा सकती। हाँ, बड़े लोगों से खाली कराई जा सकती है।
अनायास ही यह एक ऐसा मुद्दा उठ गया कि मैं अपना लोभ सँवरण न कर सका और मैंने कहा कि इस विषय में ग्रामसभा में विचार करके फैसला करना चाहिये। गांधी जयंती 2 अक्टूबर को ग्राम सभा बुलाई जाये और इस बीच तहसीलदार को भी ज्ञापन देंगे। सब लोग ग्राम सभा के लिये तैयार हो गयें। पारसिंग ने कहा हम ग्रामसभा में दूसरे मुद्दे भी उठायेंगे कि पप्पू सरपंच ने पैसे लेकर बाहरी लोगों को मकान के लिये पट्टे दिये हैं। मैंने कहा अभी और कोई मुद्दा नहीं उठायेंगे। यह सब बाद में देखेंगे। पारसिंग चुप रहा लेकिन उसे अच्छा नहीं लगा। मुझे लगा दरअसल पारसिंग ग्राम पंचायत चुनाव को ध्यान में रखकर ही सब करना चाहता है। जिस दूसरे किसान की जमीन छात्रावास के लिये आवंटित है वह पारसिंग का विरोधी है और महेन्द्र उसका समर्थक है। मैंने कहा मेरे लिये सब बराबर हैं। इस तरह अचानक कट्टीवाड़ा में ग्रामसभा आयोजित करने का अवसर आ गया था।
दूसरे दिन से ही तैयारी में लग गये। तहसीलदार को देने के लिये महेंद्र की तरफ से एक ज्ञापन बनाया। सरपंच सचिव को ग्रामसभा बुलाने के लिये एक पत्र बनाया, 50 लोगों के हस्ताक्षर कराये। महेन्द्र, भँवर, कमल हस्ताक्षर कराने में लग गये और सचिव को देकर पावती ले ली। यहां अभी तक कोई भी ग्रामसभा का महत्व नहीं समझ पाया था। सरपंच, सचिव सभी इससे अनभिज्ञ थे। वे बोलने लगे कोई आता नहीं है, बुलाते तो हैं। सरपंच से मैं भी मिला। उसने कहा आप चाहते हैं तो ग्रामसभा की बैठक रख लेते हैं, लेकिन कोई आयेगा नहीं। मैंने कहा कोशिश करते हैं और बैठक खुले चौपाल में रखो, कमरे में नहीं। सरपंच और सचिव तैयार हो गये। मुझे ऐसा लगा कि ‘ग्राम सभा’ का मेरा सपना अचानक ही सच होने की ओर अग्रसर हो रहा है।
2 अक्टूबर, 2009
अंतत: परीक्षा की घड़ी आ ही गई। मुझे ऐसा लग रहा था कि इस पर आगे का काम बहुत कुछ निर्भर करेगा। इस बीच महेश जी से बातचीत होती रही और उत्सुकतावश 1 अक्टूबर की रात को वह भी आ गये। मैंने कहा आप अलग बैठकर देखना, साथ में नहीं बैठना। गांधी जयंती पर जनपद में कोई शासकीय कार्यक्रम भी होना था जिसमें क्षेत्रीय विधायक, जिले के अधिकारी लोग आने वाले थे। अब काँग्रेस की विधायक बन गई यहाँ से सुलोचना रावत जो पहले राज्यमंत्री भी रह चुकी है। आने वाली हैं। हम लोग तो पेड़ों की छाँव में दरियाँ बिछाकर 11 बजे बैठ गये। सरपंच-सचिव भी आ गये, लेकिन लोगों का आना शुरू ही नहीं हुआ। शुक्रवार होने से कट्ठीवाड़ा हाट भी था। शायद इसलिये भी लोग नहीं आ रहे थे।
मुझे गांधी की यह बात ध्यान में आई – “मैं यह सिद्ध कर दिखाने की आशा रखता हूँ कि सच्चा स्वराज्य थोड़े लोगों के द्वारा सत्ता प्राप्त कर लेने से नहीं, बल्कि सब लोगों द्वारा सत्ता के दुरूपयोग के प्रतिकार करने की क्षमता से हासिल किया जा सकता है। दूसरे शब्दों में स्वराज्य जनता में इस बात का ज्ञान पैदा करके प्राप्त किया जा सकता है कि सत्ता पर नियंत्रण और नियमन की क्षमता उसमें है।”
इसी बीच पारसिंग अपनी दुकान से उठकर आया। महेश जी आकर चबूतरे पर बैठ गये। धीरे-धीरे लोग आये, उप-सरपंच आया, बाज़ार के कम लोग आये। गणपत फलिया से ही अधिक लोग आये। धीरे-धीरे 25-30 लोग आ ही गये और बातचीत शुरू हुई। एक बुजुर्ग आदिवासी को अध्यक्ष बनाया। जब मैंने यह बताया ऐसा ही नियम है तो सरपंच- सचिव को बड़ा अजीब लगा। लोगों की हिचक धीरे-धीरे खत्म हुई और वे बोलने लगे। पारसिंग ने फिर बाहरी लोगों को मकान के पट्टे देने की बात उठानी चाही। इस पर सरपंच भड़क गया और मैंने पारसिंह को मना कर दिया। घण्टे-डेढ़ घंटे की चर्चा के बाद जैसा मैंने कहा सर्वसम्मति से सारे प्रस्ताव पास कर लिये गये। इस बीच सड़क पर विधायक की गाड़ी आकर रुकी, रुककर चली गयी, कोई नहीं उठा। यह भी सकारात्मक परिवर्तन ही तो है।
ग्रामसभा की सारी कार्यवाही रजिस्टर में सचिव ने मुझसे पूछ-पूछकर लिखी। सरपंच देखता रहा। यह प्रस्ताव पारित हो गया कि, “महेन्द्र जिस जमीन पर खेती करता है उस पर छात्रावास नहीं बनेगा। छात्रावास के लिये उपयुक्त स्थान की अनुशंसा ग्रामसभा करेगी, जिसके लिये राजस्व अभिलेख आवश्यक हैं। पटवारी हड़ताल के कारण अभिलेख उपलब्ध नहीं हैं। तहसीलदार को लिखा जाये कि अगली बैठक में पटवारी राजस्व अभिलेख लेकर आये।” सत्ता के नियमन और नियंत्रण की शुरुआत हो गयी थी। अगली बैठक 2 नवम्बर को नियत की गई। इस तरह यह ग्रामसभा संख्या की दृष्टि से असफल लेकिन निर्णय की दृष्टि से बेहद सफल मानी जाएगी, खासकर कट्ठीवाड़ा में! इसका असर क्या होगा यह देखने वाली बात होगी। 2 अक्टूबर 2009 एक महत्वपूर्ण दिन हो गया मेरे इस अभियान में।
कल्याणी संस्थान के आजीविका परियोजना के अन्तर्गत 2 तारीख से ग्रामसभाओं का आयोजन हो ही रहा था। 2 को तो मैं कट्ठीवाड़ा में था इसलिये और कहीं नहीं जा सकता था। तीन को रठौड़ी ग्रांम पंचायत के झोलिया गाँव में ग्रामसभा नियत थी जहाँ भँवर और कमल के साथ मैं भी पहुँच गया। कल्याणी के कार्यकर्ता बाद में आए। गाँव में किसी की मृत्यु हो जाने से सभा स्थगित करके 8 अक्टूबर को नियत कर ली गयी। यह गाँव सड़क से 6-7 किलो मीटर दूर है, एकदम गुजरात बॉर्डर पर जहाँ बिजली भी नहीं है। इस समय पंचायतों की मतदाता सूचियों में संशोधन हो रहा है। जाहिर है वह काम भी ग्राम सभाओं में हो सकता है। पंचायत चुनाव भी दिसम्बर-जनवरी में होने हैं। यहाँ अनौपचारिक बातचीत में यह बात उठी कि बिजली, पानी, सड़क की बड़ी समस्या है। मैंने कहा इसके लिए विशेष ग्रामसभा बुलायें। इसमें सरपंच और सचिव को अवश्य बुलायें। इसके बाद विशेष ग्रामसभा के लिए 3 नवंबर की तारीख नियत की गई। 8 अक्टूबर की ग्रामसभा में भी मतदाता सूची संशोधन का काम तो हुआ लेकिन सरपंच उसमे नहीं आया। मैं कमल को साथ लेकर पैदल “राठौडी” हो आया। साथ में जुआन उसका भाई राकेश और रमेश नाम का एक व्यक्ति भी आया।
तहसीलदार से बहस
9 अक्टूबर को बाज़ार के दिन तहसीलदार कट्ठीवाड़ा आया और लोग उसे ज्ञापन सौंपने गये, मुझे भी बुला लिया। मैं बिना किसी और परिचय के कट्ठीवाड़ा के निवासी की तरह ही गया। अपनी सरकारी ठसक और आदत के चलते तहसीलदार ने पहले महेन्द्र को बहुत धमकाया। फिर धीरे-धीरे उसे मुद्दे की गंभीरता और वास्तविकता समझ में आई। मेरे बाद फिर और लोगों ने भी बोलना शुरू किया। सरपंच भी वहीं बैठा हुआ मिला। स्कूल का प्राचार्य और खंड शिक्षा अधिकारी भी वहीँ थे। यानी ये सब एकजुट हैं। पटवारी को बुलाया गया। उसने कहा महेन्द्र की ज़मीन सरकारी है लेकिन छात्रावास के लिये आवंटित नहीं है। मेरी तहसीलदार से काफ़ी गरमा-गरमी वाली बहस हो गई और फिर वह ठंडा पड़ा। अंत में उसने मुझसे कहा कि आप जो जगह तय कर देंगे, वहीं छात्रावास बनेगा। पटवारी अभिलेख लेकर आपके पास आ जायेगा। मैंने कहा 3 नवम्बर को इसी मुद्दे पर ग्रामसभा रखी है, उसमें तय कर लेंगे। तहसीलदार ने कहा ग्रामसभा में तो अभी समय है, आप पहले तय कर दें। मैंने कहा देखेंगे। पटवारी को बोलें कि वह राजस्व अभिलेख लेकर आये। सब बेहद उत्साहित हुए। बाद में दो लड़के 2 अक्टूबर की ग्राम पंचायत के प्रस्ताव की कॉपी देने गये तो तहसीलदार बहुत बिगड़ा। बोला ये ग्रामसभा क्या होती है? क्या मेरे फैसले को बदल देगी? सबको देख लूँगा।
सरपंच उस समय तहसीलदार के पास एक नोटिस लेकर बैठा था जो महेन्द्र ने मुझसे मिलने से पहले वकील द्वारा पंचायत को भिजवाया था। मुझे दिखाया था तो मैंने कहा था उसने यह बेवकूफी और गलती की है। सरपंच हम लोगों के सामने उस नोटिस के मुद्दे को उठाना चाह रहा था। मैंने यह कहकर रोक दिया कि उस नोटिस का इससे कोई संबंध नहीं। वह चुप रह गया था। तहसीलदार ने मुझसे कहा था कि 13 तारीख मंगलवार को पटवारी अभिलेख साथ लेकर आ जायेंगा, मैं उसी दिन तय कर दूँगा। दूसरे ही दिन पटवारी ने बताया 13 को नहीं आ पायेंगे, अभिलेख नहीं मिल पा रहा है।
9 अक्टूबर को मैं कट्ठीवाड़ा ग्राम पंचायत के कार्यालय में बैठा था मतदाता सूची में संशोधन और पटवारी का इंतज़ार करते । तभी ध्याना ग्रामपंचायत के काफ़ी सारे लोग मिलने आ गये। उन्होंने बताया उनके गाँव और पास के गाँव में बिजली की बड़ी समस्या है। मैंने कहा शाम को वहीं आऊँगा। शाम को भँवर और कमल के साथ ध्याना गया, वहाँ चौपाल पर बैठे क़रीब 50 लोग आ गये। पंचायत के सचिव को भी ले आये। सरपंच नहीं आया (पत्नी सरपंच है)। काफ़ी देर बातचीत की और तय किया कि 13 तारीख़ को ध्याना और भोलवाट गाँवों की संयुक्त ग्रामसभा रखेंगे और उसमें औपचारिक रूप से प्रस्ताव पारित कर आगे कार्यवाही करेंगे। भोलवाट निवासी कट्ठीवाड़ा रहने वाले राजेन्द्र सिंह इस काम में आगे रहे और उनके साथ ध्याना का एक प्रभावशाली व्यक्ति नरसिंह भी साथ ही थे। यह तय हुआ कि प्रस्ताव पारित कर मुझे देंगे और फिर प्रतिनिधि मंडल बनाकर जनप्रतिनिधियों और संबंधित अधिकारियों से मिलेंगे। इस तरह सामूहिक रूप से काम करके समस्या का निराकरण करेंगे। सबको साथ रहना होगा।
भँवर और कमल कट्ठीवाड़ा ग्राम पंचायत की मतदाता सूची में संशोधन के काम में लग गये। मैंने सोचा इसी तरह लोगों से सम्पर्क होगा। पारसिंग का भाई वरसिंग भी इनके साथ हो लिया और फिर उसी के साथ घर-घर घूमते रहे। इस सबके चलते सचिव ने सहयोग करना बंद कर दिया, जबकि पहले उसका रुख बड़ा सहयोगात्मक था।
11 की शाम महेश जी और हर्ष जी आ गये, भावी कार्य की योजना बनाने और परचे आदि पर चर्चा करने – ड्राफ्ट करने। अच्छी बातचीत होती रही। चर्चा तो अच्छी और लाभप्रद हुई और यह तय हुआ कि पर्चे, पत्र आदि तो इंदौर में साथ बैठकर कम्प्यूटर पर बनायेंगे। भँवर और कमल भी काफ़ी समय साथ रहे। भँवर सितम्बर में ही अपनी पत्नी-बच्ची को घर छोड़ आया था और उसके बाद से पूरे समय मन लगाकर काम कर रहा था और समझने की कोशिश कर रहा था। उसे भी अब यह काम बहुत महत्वपूर्ण लगने लगा था। बैठकों का दौर लगातार जारी रहा। इस बीच दीवाली के पहले मैं मंडला जाने के लिए 13 अक्टूबर को भोपाल पहुँच गया। सोचा था इस दीपावली पर भोपाल और भाईदूज पर मंडला में रहूंगा, परंतु भोपाल में अनिष्ट सा घट गया। मैं भोपाल से मंडला जाने के बजाए मेघनगर आ गया, बेहद विचलित और व्याकुल। इसके बाद कुछ दिन नर्मदा किनारे सुंदर बीहड़ में बिताए तो अच्छा लगा। इसके बाद मेघनगर से सीधा भंवरताल आ गया। सोच रहा था कि 4-5 दिन भंवरतताल में रहकर 28-29 तक हर हाल में कट्ठीवाड़ा पहुँच ही जाउँगा। जाहिर है 2 नवंबर की ग्रामसभा की तैयारी जो करना है।
भंवरताल पहुंचकर अच्छा लगा। 18 जून को जो शुरूआत की थी उसके बाद मैं चार महीने तक आ ही नहीं पाया था। लेकिन लगा कि यहाँ युवकों की इच्छा बनी हुई है और उत्साह भी है। उन्हें कुछ सफलता भी मिली है। आख़िरी दिन 26 अक्टूबर को पास के गाँव मऊटोला में एक बैठक रखी जिसमें आसपास के क़रीब सौ लोग इकट्टे हुए। मुझे अपार प्रसन्नता हुई और लगा कि यहाँ भी अब काम करने की दिशा में गंभीरतापूर्वक सोचा जा सकता है। कट्ठीवाड़ा को बेस बनाकर बीच-बीच में कुछ अधिक समय के लिये भंवरताल आकर रहना सार्थक होगा, यह अब दृढ़ विश्वास हो गया।
सरपंच ने की बाजी पलटने की कोशिश 2 नवम्बर, 2009
ग्रामसभा का समय 11 बजे रखा था। मैं किसी तरह 10 बजे सुबह ही कट्ट्ठीवाड़ा पहुँच पाया। भँवर सपरिवार मिला। उससे कोई विशेष जानकारी नहीं मिल पाई। जल्दी से तैयार होकर मैं ठीक 11 बजे पहुँच गया, इस बार ग्राम पंचायत भवन में ही ग्रामसभा रखी गई। सचिव मिला और पूरी व्यवस्था दिखाई दी। सरपंच भी इस बार एकदम समय से आ गया। भँवर और कमल आ गये। काफी लोग आने लगे, उनमें से कई नशे में। महेन्द्र और उसके साथ के कोई भी लोग नहीं आये। कमल ने कहा महेन्द्र आया था, और लोगों को बुलाने गया है। ऐसा लगा कि अधिकतर वे लोग हैं जिन्हें सरपंच पप्पू बारया ने खुद बुलाया है। यहां गुटबाजी बढती जा रही है। उपसरपंच अंतिम गुप्ता और बाजार के कुछ लोग आये, अधिकतर लोग कोठार महुड़ा के थे-महेन्द्र की ज़मीन के दूसरी तरफ़ रहने वाले। पंचायत समन्वयक आ गया और पटवारी भी। समझ में आ गया कि इस बार सरपंच ने खूब तैयारी की है। मुझे कुछ बेचैनी होने लगी, माहौल एकदम विपरीत लगने लगा। पिछली 2 अक्टूबर की ग्रामसभा वाले कोई भी चेहरे नहीं दिखे। सरपंच बड़ा प्रसन्न और आश्वस्त लग रहा था, जबकि पिछली बैठक में बहुत तनाव में था। काफी देर बाद महेन्द्र आया और उसके साथ एक-दो लोग ही थे। अब तक कुल 50 के क़रीब लोग हो गये थे।
इस कार्य को करते हुए कई बार मेरे मन में प्रश्न उठता है कि प्रेमचंद “पंच परमेश्वर” जैसी कहानी की कल्पना कैसे कर पाए होंगे? उस समय पंचायतों का स्वरूप कैसा होगा?
सरपंच ने बोलना शुरू किया कि महेन्द्र ने एक नोटिस भेजा है और उसमें कोठार महुड़ा का रास्ता बंद करने को लिखा है। नोटिस पढ़कर सुनाने लगा। मैंने कहा कि नोटिस का इससे वास्ता नहीं है, लेकिन कोई मेरी बात सुनने को तैयार नहीं हुआ। सरपंच नोटिस पढ़ता जाता और लोग उस पर गुस्से में टिप्पणी करते । नशे वाले गालियाँ देते। मैंने बीच में बोलने की कोशिश की तो कोई सुनने को तैयार नहीं हुआ। उस क्षेत्र का जनपद सदस्य मुझसे गुस्से में बोला कि आपने ही तो नोटिस भिजवाया है। मैंने कहा कि मेरा इससे कोई वास्ता नहीं है। ये तो पहले ही वकील ने भेजा है। महेन्द्र ने भी यही कहना चाहा, लेकिन किसी ने सुना ही नहीं। लोग चिल्लाने लगे, धमकी देने लगे कि रास्ता बंद करके तो देखो, काटकर फेंक देंगे, एक-एक को देख लेंगे। भयानक अराजक वातावरण बनता जा रहा था। सरपंच बहुत खुश था, मुझसे बोला, “आज हुई ग्रामसभा, पिछली बार तो दबाव डालकर कुछ भी प्रस्ताव पारित कर लिया जबकि कोरम भी नहीं था, आज देखो क्या होता है? आपकी ग्रामसभा की तमन्ना पूरी हो जायेगी।”
एक आदमी भी नहीं था महेन्द्र की तरफ़ बोलने वाला। मैं चुपचाप सब सुनता रहा। जब सब खूब चिल्ला लिये और गालियाँ दे चुके तब मैंने धीरे से बोलना शुरू किया। एक तरह से यह मेरी आखिरी कोशिश थी। मैंने बात शुरू करते हुए कहा “मेरी बात सुन तो लो, मानो या न मानो यह आपकी मर्जी है। सब यही चाहते हो न कि रास्ता बंद न हो?”
सबने कहा “हाँ”।
“और कोई बात तो नहीं है, और कोई शिकायत तो नहीं?”
सबने कहा “नहीं, और कुछ नहीं, पिछली बार तो हमको बताया था कि जो जमीन जोतता है उसके बारे में है, हमने कहा ठीक है, जमीन उसके पास रहना चाहिए। वो तो अब सरपंच साहब ने बताया कि ये महेन्द्र तो हमारा रास्ता बंद करा रहा है। इसने हमको धोखा दिया।”
अब मैंने कहा “अगर महेन्द्र बोल दे कि रास्ता बंद नहीं करायेगा, तब तो ठीक है?”
सब बोले “ठीक तो है, मगर नोटिस तो लिख के भेजा है। अब मुँह से बोलने से क्या होगा।”
अब मैंने महेन्द्र से पूछा “क्यों रास्ता बंद करना चाहते हो?”
उसने कहा “नहीं”।
मैंने कहा “नोटिस में क्यों लिखा?”
उसने कहा “गलत लिखा है।”
मैंने कहा “लिखकर दोगे कि नोटिस वापस लेते हो?”
उसने कहा “हाँ, जैसा भी आप कहो लिख दूँगा।”
एकदम खामोशी छा गई, सारे लोग चुप हो गये। मैंने कहा “बोलो भाई, महेन्द्र लिख कर दे रहा है, मंजूर है! और कोई शिकायत!”
सबने कहा “नहीं, और कोई बात नहीं, यही तो बात थी।”
रामू जनपद सदस्य ने बीच में बोलना चाहा तो सबने उसे चुपकर दिया। सरपंच बोलने लगा तो उसे भी रोक दिया। मैंने कहा अब महेन्द्र पूरी बात बतायेगा कि असल मुद्दा क्या है और ग्रामसभा क्यों बुलाई गई। महेन्द्र ने फिर पूरी बात बताई और कहा कि बाबा चाहते हैं कि जो भी गरीब किसान-मजदूर सरकारी ज़मीन पर खेती करता है उसको उस जमीन का पट्टा मिलना चाहिए। किसी की भी ज़मीन पर हॉस्टल नहीं बनना चाहिए। बहुत सी सरकारी ज़मीन खाली पड़ी है या बड़े लोगों के कब्ज़े में है, वहाँ हॉस्टल बनना चाहिये। क्या ग़लत है? सबने कहा बिल्कुल सही बात है, सरपंच ने हमको ये सब बात नहीं बताई थी। उसने और रामू ने तो ये बताया कि रास्ता बंद करने के लिये ग्रामसभा हो रही है। जो सबसे ज़्यादा नाराज़ था और जिससे सरपंच अध्यक्षता करा रहा था-तेरसिंग-उसने कहा कि बाबा जैसा बोलें वैसा प्रस्ताव पारित करा दो, सही बात अब समझ में आई।
सारा कुछ पलट गया, सरपंच को जैसे साँप सूँघ गया। मैंने कहा, अभी तो आधा काम हुआ है, अभी तो अपने को यह भी तय करना है कि छात्रावास कहाँ बनाया जाये, कौन सी जमीन खाली है या नाजायज कब्ज़े में है। पटवारी जी सारा रिकॉर्ड दिखाओ। अब तक सब सन्नाटे में आ गये थे। पटवारी ने जल्दी से सारा रिकॉर्ड निकाला। हवेली खेड़ा गाँव में खाली सरकारी ज़मीन दिखाई दी- पटवारी ने मेरे कान में बताया कुछ राजा साहब और कुछ पिछले एम.एल.ए. साहब के कब्ज़े में है। सरपंच ने धीरे से कहा ये तो और झंझट हो जायेगी।
मैंने कहा-होने दो, किसी गरीब की ज़मीन तो नहीं जायेगी। इन लोगों के पास ज़मीन की कमी थोड़े ही है, अपन सब निवेदन करेंगे तो वैसे ही छोड़ देंगे, अच्छे काम के लिए। वे भी तो अच्छे लोग हैं। इसके बाद कोई कुछ नहीं बोला।
सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित हो गये “महेन्द्र रास्ता बंद नहीं करेगा। इस शर्त पर नोटिस वापस लेता है कि सरकार ने सड़क में उसकी जो ज़मीन ली है उसका मुआवजा या दूसरी जमीन दे। छात्रावास के लिये उचित जगह हवेली खेड़ा की सरकारी ज़मीन है जो खाली है। अगर किसी का नाजायज़ कब्ज़ा है तो हटाया जाये। तहसीलदार को लिखा जाये।”
ज़बर्दस्त अनुभव रहा कट्ठीवाड़ा की ग्रामसभा का। एकदम हलचल हो जायेगी। दरअसल जैसे ही लोगों को हम निर्णय प्रक्रिया से जोड़ते हैं, उनके निर्णय लेने की क्षमता स्वयं विकसित होने लगती है।
3 तारीख को झोलिया में विशेष ग्रामसभा नियत थी। अब पता लगा कि वह तो 1 को ही हो गई। परियोजना वालों ने तारीख बदल दी, बोले कलेक्टर साहब ने तारीख तय कर दी है, मध्यप्रदेश का स्थापना दिवस की वजह से। भंवर और कमल से मैंने पूछा तुमने उन्हें बताया था कि मैं 1 तारीख को नहीं रहूँगा और न ही मुझे बताया। कहने लगे-नहीं हमने ये तो नहीं बताया। दोनों पर काफी गुस्सा आया। पता नहीं क्यों ऐसा किया होगा। कहीं जानबूझकर मुझे दूर रखने के लिये तो नहीं किया ऐसा?
बाबा को किसने भेजा और उसे पैसे कहाँ से मिलते हैं?
अब धीरे-धीरे पता चला कि 2 अक्टूबर की ग्रामसभा और 9 अक्टूबर को तहसीलदार से भेंट के बाद मेरी अनुपस्थिति में यहां बड़ी हलचल रही। स्थानीय काँग्रेस विधायक के यहाँ सरपंच और ठेकेदार, अधिकारी वगैरह और काँग्रेस से जुड़े कार्यकर्ताओं की बैठक हुई जिसमें 3 नवम्बर की ग्रामसभा की रणनीति बनाई गई। पारसिंग वगैरह को इससे दूर रहने को कहा गया, साथ ही मेरा साथ न देने की समझाइश दी गई। भँवर ने बताया पारसिंग एक दिन उससे पूछ रहा था वह कहाँ से आया, किसने भेजा और उसे पैसे कहाँ से मिलते हैं? और भी कोई पूछ रहा था कि बाबा तो कमाते-धमाते नहीं उनका खर्चा कहाँ से चलता है? राजेन्द्र सिंह पूछ रहे थे कि 2 अक्टूबर की ग्रामसभा में चबूतरे पर धोती पहने कौन आदमी बैठा था, वह ग्रामसभा में क्यों आया था, बाबा से उसके क्या संबंध हैं? ध्याना में बिजली के संबंध में जो प्रस्ताव पारित किया था वह भी विभाग को नहीं दिया और बोले कि हम सीधे एम.एल.ए. को दे आये, वह सब ठीक करा देंगी। यानी मामला अब उच्च स्तर पर पहुंच रहा है। जनहित में काम करना कमोवेश असंभव बनाया जा रहा है।
इस सबके चलते एक दिन साधना के यहाँ गया। उसने बताया कि झोलिया में 8 अक्टूबर की ग्रामसभा के बाद वहाँ के सरपंच, सचिव, जनपद पंचायत के सी.ई.ओ. आदि ने कहा कि बाबा को इन ग्रामसभाओं से अलग रखो, नहीं तो परियोजना के काम में सहयोग नहीं करेंगे और सारे काम रुक जायेंगे। बाबा तो जबरन अधिकारों की बात ग्रामसभा में करते हैं, आप लोगों को काम से काम रखना चाहिए। मैंने कहा मैं समझता हूँ, यह तो होना ही था, चलो जल्दी स्पष्ट हो गया। आपका और मेरा काम तो अलग-अलग प्रकृति का है ही, जहाँ तक साथ चल सकते हैं चलें, यह भी स्पष्ट हो गया था। अब समझ में आ गया कि इतना भी संभव नहीं है। मैं तो अपनी तरह से जारी रखूँगा ही, लेकिन अब चुनाव के बाद। साधना ने बताया कि रठौड़ी का सरपंच रतनसिंह कह रहा था कि बाबा के साथ तो उसके विरोधी रहते हैं – रमेश वगैरह जो सरपंच के चुनाव की तैयारी कर रहा है। मैं देख पा रहा था कि 500-1000 की जनसंख्या वाले गांवों तक में कितनी अनैतिक राजनीति विद्यमान है। यह अनैतिकता तब भी अस्तित्व में है जबकि यहां रहने वाले अधिकांश लोग पीढ़ियों से एकसाथ रहते आ रहे हैं। क्या भविष्य है, इस त्रिस्तरीय पंचायती व्यवस्था का? परंतु मुझे तो इसकी सीमा में ही काम करना है। मेरी यह भी समझ में आ गया कि ग्रामसभाओं में लोग अपने चुनावी कार्यक्रम को आगे बढ़ाने ही आ रहे थे- चाहे वह कट्ठीवाड़ा में पारसिंग हो या फिर रठौड़ी में रमेश। हमारे सीधे-सादे कार्यकर्ता बेचारे भँवर और कमल समझ नहीं पाते।
3 नवम्बर, 2009 को झोलिया की ग्रामसभा तो नहीं हो पाई लेकिन उसी दिन कट्ठीवाड़ा में यह हुआ कि ‘मकान मालिक’ धनराज ने आकर बगल के कमरे खाली कराके मुझे दे दिये, अब पूरी जगह हमारे पास किराये पर हो गई। लगा कि अब अच्छे से सब व्यवस्थित हो जायेगा। भँवर, कमल और महेन्द्र ने मिलकर साफ-सफाई, पुताई वगैरह सब कर ली और अब एक हिस्से में मैंने अपना जमा लिया, दूसरे हिस्से में भँवर का परिवार और वहीं बनाना-खाना। यहां रहना अब थोड़ा सुविधाजनक हो गया। कमल ने कहा वह पूरे समय इसी काम में लगना चाहता है। मैंने उससे कहा अभी और सोच लो, जल्दबाजी में कोई फैसला मत करो जिससे बाद में पछताना पड़े। महेन्द्र से भी सम्पर्क रहने लगा और जुआन भी कभी- कभार राठौड़ी से आने लगा। लगने लगा कि अब काम जमने की ओर अग्रसर हो रहा है। उधर बिलासपुर में आलोक की तबियत बिगड़ रही थी। बिलासपुर गया। वहां से लौटते हुए इन्दौर में दो दिन रुककर हर्ष जी और महेश जी से “जन अधिकार मंच” के बारे में विस्तृत नोट आदि पर चर्चा की।
कट्ठीवाड़ा लौटने पर समझ में आया कि यहां पर ईमानदार कार्यकर्त्ता ढूंढ पाना बेहद कठिन है। जब भी यहाँ से जाने की बात करता हूँ तो एकदम भावुक हो तमाम वायदे करने लगते हैं और जैसे कुछ दिन बाहर रहकर लौटो उनके सुर बदल जाते हैं। दूसरी तरफ यहां बने रहने के लिए कोई नया साथी मिल जाता है और यहां से रवानगी टल जाती है। इसी बीच बिलासपुर में आलोक का निधन हो गया। मैं बिलासपुर गया और वहां से अमरकंटक होता हुआ भंवरताल पहुँच गया। भंवरताल का प्रवास बहुत उत्साहवर्धक रहा। पंचायत चुनाव का प्रचार शुरू हो गया था। उम्मीदवार भी मिलने आ आए। काफी संख्या में पढ़े-लिखे उत्साही आदिवासी नवयुवक इकटठा हुये। मैंने अब दृढ़ निश्चय कर लिया कि भंवरताल को ही अब अपने कार्य का मुख्य केंद्र बनाना है।
एक सप्ताह बाद कट्ठीवाड़ा लौटा तो पाया स्थिति और भी खराब हो चुकी है। साथ ही शिवगंगा के साथ कार्य करना भी असंभव ही लग रहा है। परंतु तभी एक बार फिर से रोशनी कौंधी। 31 दिसम्बर को मैं राठौड़ी चला गया और रात वहीं जुआन के घर रुका। उस बिजली विहीन गाँव में नये साल का स्वागत किया। बहुत अच्छा लगा। वहाँ रहते हुए यह भी लगा कि कट्ठीवाड़ा के बजाय एक झोपड़ा रठौड़ी में ही क्यों न बना लिया जाये, कभी-कभार आकर रुकने के लिये और कुछ हद तक इस क्षेत्र में काम चालू रखने के लिये। इस जगह को पूरी तरह से त्यागने का तो मेरा मन नहीं करता। बहुत कुछ सीखा और पाया है यहाँ। यह भी संयोग है कि यहाँ रहते हुए खोया भी बहुत कुछ। लेकिन इसमें इस जगह का क्या दोष? कुछ ऐसा हुआ कि जुआन ने भी अपनी तरफ़ से यह बात कही कि रठौड़ी में क्यों नहीं रहते? मुझे गंभीरतापूर्वक सोचना होगा। विचार बुरा नहीं है।
जनवरी 2010
3 जनवरी की सुबह दीपक और हर्ष आ गये। बातचीत हुई और मैंने उन्हें अपना इरादा बताया। दूसरे दिन सुबह उनके साथ ही यहाँ से निकल गया। छह महीने बाद बड़वानी गया। भव्या को देखकर, उससे मिलकर बहुत तसल्ली हुई। बड़वानी से निकलकर आलीराजपुर आया और वहाँ से बोराना गाँव से शिवगंगा की पदयात्रा में शामिल होना था। आलीराजपुर तक तो मैं पैदल नहीं चला, सोचा एक दिन देख लूँ, अगले दिन से पैदल साथ चलूँगा। आलीराजपुर में यात्रा का ‘प्रायोजित’ स्वागत हुआ। ‘धर्मसभा’ में थोड़े से लोग जुटे। महेश जी बहुत अच्छा, सार्थक और संतुलित बोले। ‘स्वामी’ प्रणवानंद उतना ही आपत्तिजनक, फूहड़ और साम्प्रदायिक बोले। उसके बाद उसी समय मैंने तय कर लिया कि इस यात्रा से कोई संबंध नहीं रखूँगा। महेश जी भी विचलित दिखे। रात में एक धर्मशाला में खाकर सो गया और सुबह महेश जी से मिलकर, बोलकर कट्ठीवाड़ा निकल गया। इस अनुभव के बाद यह स्पष्ट हो गया कि आगे ‘शिवगंगा’ से किसी भी तरह का संबंध रखना उचित नहीं है। महेश जी मित्र हैं लेकिन हैं तो शिवगंगा का ही अभिन्न अंग और वे विवश हैं। उनकी विवशता और छटपटाहट साफ दिखाई देती है। हर्ष संतुलित और बुद्धिमान हैं, लेकिन भगवा नहीं छोड़ सकते। मुझे अब उन्हें छोड़ने के अलावा और कोई रास्ता नहीं दिखता। लौटना इस मायने में काफी लाभदायक रहा। मेरी शिवगंगा, महेश जी और हर्ष जी को लेकर दुविधा आज ख़तम हो गई थी।
7 जनवरी को कट्ठीवाड़ा लौट आया। अब तो निश्चय कर लिया कि भँवरताल जाना है। स्थाई रूप से वहाँ रहने और काम करने के लिए। अभी जुआन सिंह के साथ निर्णय लेना बाक़ी है कि रठौड़ी में जगह बनाई जाये या नहीं। कट्ठीवाड़ा से तो अब समेटना ही होगा। बहुत भारी मन से यह स्वीकारना होगा, यह एक बड़ी हार है। सम्मान और प्रेम तो यहाँ भी है लेकिन सिर्फ इसके साथ काम कर पाना संभव नहीं है, जब तक कि साथी न जुड़ें, जो अब संभव नहीं दिख रहा है। बहुत ही दुःख होगा कट्ठीवाड़ा छोड़ते हुए। यह भी सिद्ध हो गया कि मैं एक अच्छा संगठक नहीं हूँ।
14 जनवरी, मकर संक्रांतिः मेरा भी संक्रमण काल चल रहा है। कट्ठीवाड़ा बनाम भंवरताल या भंवरताल बनाम कट्ठीवाड़ा !
15 जनवरी, सूर्यग्रहण
क्या कट्ठीवाड़ा ग्रहण में ढंक जायेगा? यह बात लगातार दिमाग में घर करती जा रही है। यहां काफी समय लगाया और बहुत कुछ नया सीखा भी है। उसे अकारण व्यर्थ तो नहीं कर देना चाहिए। जो सीखा है उसे प्रयोग में भी लाना चाहिए।
क्या सीखा?
− अकेले काम करने के लिये छोटी से छोटी इकाई से शुरू करके अपेक्षाकृत बड़ी की ओर जाना चाहिए। इससे उल्टा नहीं जब तक कि उद्देश्य प्रचारित होना या प्रशासन, पार्टी से समर्थन लेकर काम करना न हो। मित्र और यहाँ तक कि विपरीत विचार धारा वाले सद्भावी व्यक्ति/व्यक्तियों के साथ जुड़ा जा सकता है, लेकिन ऐसे किसी संगठन के साथ जुड़े व्यक्ति/व्यक्तियों के साथ जुड़कर काम करना भूल है।
− गाँधी ने कहा था जिस व्यक्ति में सुधार या परिवर्तन लाना हो, उसके साथ घनिष्ट, व्यक्तिगत संबंध बनाना उचित नहीं है।
− जब तक कुछ स्थानीय व्यक्ति साथ में न जुड़े, तब तक प्रभावी रूप से काम करना कठिन है। भाषा/ बोली भी एक बड़ा अवरोध होता है;
− पूरे समय सतर्कता रखनी होगी कि कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा वाला व्यक्ति मंच का दुरुपयोग तो नहीं कर रहा है;
− अपने रोज़मर्रा के जीवनयापन के साधन के संबंध में स्थिति स्पष्ट होना चाहिए।
− शायद सर्वाधिक महत्वपूर्ण है कि धर्म को सामने रखकर विकास/ परिवर्तन की दिशा में काम नहीं किया जा सकता। यह भटकाव है।
− परिवर्तन के लिये काम करते हुए, जुड़ने वाले लोगों की आजीविका के साधन पर भी ध्यान देना आवश्यक है। केवल आदर्श से काम नहीं चलेगा।
− सहनशीलता और सहिष्णुता अनिवार्य है। किसी के प्रति दृष्टिकोण दूसरों से सुनकर प्रभावित नहीं हो।
− सभी मोर्चे एकसाथ नहीं खोलने चाहिए। क्रमशः एक-एक करके ही मोर्चा खोलना उचित है।
− सम्पर्क और काम की निरन्तरता अनिवार्य है।
इस क्षेत्र के आदिवासियों को विषय बनाकर अद्भुत चित्रांकन (पेंटिग) करने वाले महान चित्रकार विष्णु चिंचालकर, जिन्हें सामान्यतया “गुरूजी” कहकर संबोधित किया जाता था, का कहना था कि आदिवासी सीधी स्पष्ट-सपाट सड़क पर नहीं चलते, बल्कि पगडंडी पर चलते हैं। गौरतलब है जब हम पगडंडी पर चलते हैं तभी अपने पैरों की छाप वहां छोड़ते जाते हैं। हमारे बाद कोई दूसरा व्यक्ति आता है, वह अपने पदचिह्न छोड़ जाता है और मार्ग की गहराई बढ़ती जाती है और उसकी गहरी पहचान भी सुस्पष्ट हो जाती है। मैं भी मुख्य सड़क को छोड़कर पगडंडी की राह पकड़ चुका हूँ। दूसरा मेरे चिह्न को, मेरी सोच को और गहरा ही करता चलता है।
इसी विषय पर गांधी भी बड़ी मार्के की बात कहते हैं,“ एक आदर्श रास्ते की खोज में हम दिनों दिन इंतजार करते रहते हैं। मगर हम भूल जाते हैं कि रास्ते चलने के लिए बनाए जाते हैं, न कि इंतज़ार करने के लिए।” मैं भी पिछले करीब दो वर्षों से लगातार चल रहा हूँ। गांधी और मुक्तिबोध दो विपरीत विचारधाराएँ लगातार रेल की पटरियों की तरह मुझे अपने पर सवार किये अपनी जगह स्थिर हैं, लेकिन मुझे गतिमान बनाए हुए है। दायीं पटरी गांधी है, जो समझाती है:
“अगर किसी मकसद के लिए खड़े हो तो एक पेड़ की तरह रहो और गिरो तो एक बीज की तरह गिरो, ताकि दुबारा उगकर उसी मकसद के लिए संघर्ष कर सको।”
और मुक्तिबोध गांधी की सीधी-साधी शब्दावली के ठीक विपरीत अमूर्त में वही समझते हैं जो गाँधी मूर्त में समझते हैं,
सब चुप, साहित्यिक चुप और कविजन निर्वाक
चिन्तक, शिल्पकार, नर्तक चुप हैं
उनके खयाल से यह सब गप है
मात्र किवदन्ती !
रक्तपायी वर्ग से नाभिनाल-बद्ध लोग
नपुंसक भोग-शिरा – जालों में उलझे
प्रश्न की उथली सी पहचान
राह से अनजान वाक रुदन्ती।
चढ़ गया उर पर कहीं कोई निर्दयी।
कहीं आग लग गई, कहीं गोली चल गई।
भव्याकार भवनों के विवरों में छिप गये
समाचार पत्र के पतियों के मुख स्थल।। – मुक्तिबोध (‘अँधेरे में’)
मैंने इस इलाके में आकर इतना तो सीख लिया, “भूखला तो भूखल सुकला खरी” यानी भूखा ही सही पर सुखी तो हूँ।
समाप्त
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा की सभी कड़ियां यहाँ देखेंः
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-1: अनजान द्वारा खुद को समझे जाने से जीवन मनोहारी हो गया
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-2: भोजन करने और भोजन पाने के बीच का अंतर भी समझ आने लगा
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-3: उसने मेरे पैर छू कर कहा, बाबा, कहीं मत जाओ…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-4: मैंने सोचा, खतरनाक होने के लिए खतरनाक होना जरूरी नहीं होता
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-5: वाह, पचास रुपए? बड़े दिनों बाद इतने रुपए एक साथ देखे थे…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-6: जीवन में पहली बार रोजदारी की थी, वह भी भक्ति की!
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-7: भोपाल करीब आने लगा तो मैं ट्रेन में ऊपर चढ़कर बैठ गया…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-8: दोनों घूम-घूम कर पार्टी का प्रचार कर रहे हैं, सावधान रहना
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-9: नक्सलवाद के एक काल्पनिक बिजूके को प्रतीक बनाया गया
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-10: मैंने अपना पूरा नाम बताया तो वे एकदम उछल पड़े…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-11: कथा वाचक की नई भूमिका, मुझे अंदर से हँसी आ रही थी…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-12: वृंदावन की कुंज गली में बदल गया मेरा नजरिया
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-13: ब्रज जा कर जाना, श्रद्धा से किस तरह आनंदित रहा जा सकता है
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-14: मैं बाबा नहीं बन पाया…मैं हार गया!
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-15: अहसास हुआ कि लोग सफर को मंजिल से बेहतर क्यों बताते हैं…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-16: मैं संघ का भेदिया हूं, वकील तो ऐसे होते नहीं हैं…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-17: घर बनते जाते हैं, जमीन बंटती चली जाती है लेकिन रहते सब साथ-साथ हैं
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-18: सौ दिन पूरे… लगता है घर से बहुत दूर न जाकर गलती कर दी
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-19: मैं सन् उन्नीस सौ बावन में सातवीं फेल हुआ हूं…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-20: संभवतः किसी को उम्मीद नहीं होगी कि मैं इस तरह फट पडूंगा…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-21: दहेज का दबाव न हो तो हर मर्द चार-पांच ब्याह कर लेगा
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-22: पूरे पच्चीस साल बाद पैदल अपने गांव भंवरताल जा रहा हूं…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-23: अपने गांव भंवरताल में हूं; एक वो दिवाली थी, एक ये दिवाली है, एकदम अलग
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-24: खबर फैल गई कि मैं ‘बैरागी’ हूं, इनाम नहीं मिलेगा
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 25ः भंवरताल में आखिरी रात है, पता नहीं कब आना होगा…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 26ः वकालत छोड़ी, फिर अपनाई, मैं उलझता चला जा रहा था…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 27: उस दिन मैं अचानक छोटा-मोटा ‘महामानव’ बन गया… मगर
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 28ः चोम सिंह ने समझा दिया, 21 वीं सदी में अपनी शर्तों पर जिया जा सकता है
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 29ः आज ऑफिस में लगेगा ताला, नाम पट्टिका हट जाएगी
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 30ः उन जगहों पर लाैटना जहां कभी मन बैरागी बन कर गया था…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 31ः स्वामी अवधेशानंद बाेले, विभूति जी आप अवश्य आइए, मुझे प्रतीक्षा रहेगी
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 32ः नाते-रिश्तेदार ‘माता-पूजन’ कर मनाते हैं ईंद, हैं न अनाेखी बात
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 33: बुढ़े ने रहने बुला लिया, हम सामान लिए चले आए, रात में बोला, घर से निकलो
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 34ः बाबा, मैं ठीक होना चाहता हूँ… बाबागिरी मेरा पीछा नहीं छोड़ रही
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 35ः ऐसा लगा जैसे दुनिया जीत ली, सिर्फ तीन दिन बाद जबर्दस्त मुँह की खाई
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 36: काेई खेत नहीं गया, कोई बाजार, कोई स्कूल, राे कर बोले, बाबा मत जाओ
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 37: मैं विचलित हूं, मुझे बताए बिना महेश जी ने ऐसा क्यों किया?
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 38: जिसे ‘खूनी सोंडवा’ कहते हैं, मुझे वहीं मिला सबसे ज्यादा आनंद
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 39 : जो मैं कहना चाह रहा था, वह खुद न कहकर उनसे कहलवा लिया
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 40 : मरेंगे और मारेंगे, नहीं तो जिंदगी किस काम की! कानून की पढ़ाई दांव पर
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 41 : स्वामी अवधेशानन्द ने कहा− मैं चाहता हूं कि आप…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 42 : आप इतने अच्छे आदमी हैं, कैसे लोगों के बीच फँस गए?
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 43 : एक साल की यात्रा−सार…स्वाभाविकता ही वास्तविक जीवन
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 44 : एक लक्ष्यहीन यात्राःकट्ठीवाड़ा के ‘बाबा’ बम्हनी में ‘दादा’, प्रेम व विश्वास ही आधार
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 44 : टर्निंग पाइंट आ ही गया, नारे लगे− बाबा, हम तुम्हारे साथ हैं…

