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प्रकृति से मन तक हर तरफ फाग, इनमें आप कहां हैं?

हर जगह बस और बस खुशियों का रेला है। हंसते-गाते-नाचते लोगों का मेला है। रंग-अबीर-गुलालों का उड़ता बादल है तो सिर चढ़कर बोलते अबीर से बहका-बहका लोगों का मन है।

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उज्‍जैन में पग-पग पर बाबा महाकाल की महिमा का दर्शन

श्री महाकालेश्वर के दर्शन हेतु शारीरिक एवं मानसिक मजबूती दोनों जरूरी है क्योंकि ये वही देव हैं जो अपने ही शादी में रानी मैनावती की परिक्षा लेने में भी पीछे नहीं रहे।

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लगानी पड़ती है डुबकी उभरने से पहले…

शेर जीवन की उस हक़ीक़त को भी बयां कर रहा है जिसमें कई सारे अक़्स हमें नज़र आते हैं। आगे की ओर जाने की इच्छा से कुछ क़दम पीछे लौटना बुरा नहीं होता।

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14 मिनट सितार दिल को छलनी करता है और तबला विचारों को बेचैन

इस फिल्‍म को देखते हुए सिर्फ महसूस किया जा सकता है। महसूस किया जा सकता है कि शाब्‍दिक, मानसिक और शारीरिक हिंसा किस तरह हमारे जीवन को प्रभावित कर रही है।

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सुधा जैसा असमंजस सीधा-साधा, अपनी किताब छापें या नहीं?

कई लोग इस दोराहे पर खड़े हैं कि अपनी किताब छापें या नहीं? असमंजस भी बड़ा है, कौन पढ़ेगा, कौन छापेगा, कैसे छपेगी किताब।

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कानपुर में एक लड़का है, उसे जरूर बुला लें…

सत्तर के दशक में नीरज को लगातार तीन बार फिल्‍म फेयर पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया। वे पहले गीतकार थे जिनके भजन को फिल्‍म फेयर अवार्ड मिला था।

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एक थे विषपायी जी…ऐसे कुछ लोग ही मिले

विषपायी जी ने कबीर की तरह जीवन जिया। उनके पत्र और साहित्‍य लेखन का इतना प्रभाव रहा है कि उनके निधन पर प्रख्‍यात कहानीकार-संपादक राजेद्र यादव ने ‘हंस’ के संपादकीय के एक कालम में उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की थी।

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