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मैं विचलित हूं, मुझे बताए बिना महेश जी ने ऐसा क्यों किया?

मुझे उनकी बात कुछ जम नहीं रही है। मैं काफी विचलित हो गया। ऐसा क्यों किया गया है? क्या महेश जी की खुद की यह सोच और निर्णय था या उन पर दबाव डालकर थोपा गया?

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खबर फैल गई कि मैं ‘बैरागी’ हूं, इनाम नहीं मिलेगा

लोग सोचते हैं कि मेरा कितना कुछ छूट रहा है, परंतु मुझे लगता है कि मैं कितना कुछ पा रहा हूं, अर्जित कर रहा हूं। जिस तरह से सबका स्नेह मिल रहा है उससे जो खोया है, वह तो मायने ही नहीं रखता।

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सौ दिन पूरे… लगता है घर से बहुत दूर न जाकर गलती कर दी

इन आदिवासियों की नैसर्गिक प्रतिभा और सौंदर्य दृष्टि को लेकर मैं जरूर सम्मोहित हो रहा था। स्पष्ट कहूं तो सम्मोहित हो गया था।

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घर बनते जाते हैं, जमीन बंटती चली जाती है लेकिन रहते सब साथ-साथ हैं

मैं नैतिक और अनैतिक की दुविधा से गुजर रहा था। मगर यहां का आदिवासी समुदाय इसे जिस सहजता से स्वीकार और अंगीकार कर रहा है, वह वास्तव में शोध का विषय हो सकता है।

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मैं संघ का भेदिया हूं, वकील तो ऐसे होते नहीं हैं…

वैसे देखा जाए तो पिछले लगभग दो महीने में, जब से मैं सम्पर्क में हूं, शिवगंगा ने कांवड़ यात्रा और गणेश उत्सव आयोजन में ही सारी शक्ति झोंक रखी है।

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अहसास हुआ कि लोग सफर को मंजिल से बेहतर क्यों बताते हैं…

सोचता हूं पिता का न रहना, हमें एकाएक वयस्क से प्रौढ़ बना देता है। उनके रहते हम हमेशा निर्णय लेने की प्रक्रिया में बहुत सक्रिय नहीं रहते।

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वृंदावन की कुंज गली में बदल गया मेरा नजरिया

बस, वृंदावन की गलियां में चलते चले गए। वृंदावन की गलियों का जिक्र तो कई गानों, भजनों में है, लेकिन प्रत्यक्ष देखने का मौका अभी मिला। वह अनदेखा जैसे अब साकार हो रहा है।

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कथा वाचक की नई भूमिका, मुझे अंदर से हँसी आ रही थी…

लो तो अब हम पिताजी भी हो गए इस बतीस साल के लड़के की मां और छह साल की पोती की दादी के पिताजी! अब यहां से दण्ड-कमण्डल समेटने का समय आ गया है।

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सुनो लड़कियो,बाज़ के गुण सीखो

सुंदर, असुंदर में/ भी मत उलझो। दुनिया भर में/ सम्मान पाने वाली/ महिलायें निरी सामान्य रही हैं चेहरे से/ गढ़ो व्यक्तित्व। सशक्तिकरण माँगती क्यूँ हो?

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वाह, पचास रुपए? बड़े दिनों बाद इतने रुपए एक साथ देखे थे…

शाम के पांच बजे होंगे। एकाएक दो मोटरसाइकलें आकर रूकीं और उसमें से चार लोग उतरे। मैं रामायण पढ़ता रहा पर मन में आया कि ये लोग अचानक यहां कैसे आ धमके?

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