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किसी व्यक्ति को डराना आईपीसी की धारा 387 के तहत अपराध

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति को भयभीत करने से आरोपी भारतीय दंड संहिता की धारा 387 के तहत अपराध का दोषी हो जाएगा; इसके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 383 के तहत जबरन वसूली के सभी तत्वों को पूरा करना आवश्यक नहीं है।

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हास्य चूड़ामणि: हमारी उम्मीदों से भी कई कदम आगे विहान

कहने को यह हास्य नाटक था पर अपनी प्रस्तुति में ऐसी शिक्षाएँ और संकेत लिए था जिससे जनसमाज सचेत हो सके।

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ओवरथिंकिंग से आजादी: मन के पर्यावरण की फिक्र कितनी?

आज विश्व पर्यावरण दिवस है। संयुक्त राष्ट्र ने तीन पर्यावरणीय मुद्दों को समूचे विश्व के लिए चिंता का विषय बताया है। “ट्रिपल प्लेनेटरी क्राइसिस” यानी जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और जैव विविधता की हानि हम सबके फिक्र का केंद्र होना चाहिए। जहां बाहरी पर्यावरणीय अंसतुलन हमारे भीतर असर डाल रहा है वैसे ही हमारे मन का पर्यावरणीय असंतुलन हमारे पूरे जीवन को प्रभावित कर रहा है। विश्व पर्यावरण दिवस पर मन के पर्यावरण की सुध लेने को सचेत करता हुआ यह आलेख।

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साइकिल की अपनी एक तहजीब होती है

साइकिल पर चलता इंसान जीवन और अपनी खुद की गति के बीच एक अद्भुत ताल-मेल बैठा लेता है, और उनके बीच के संबंधों का संतुलन शायद ही कभी बिगड़ता होI साइकिल सवार पैदल लोगों की तुलना में तीन या चार गुना ज्यादा तेज चल लेता है।

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क्या अदृश्य शक्ति के प्रभाव में कोई अपने बच्चों की हत्या कर सकता है!

एक मां ने अपनी बेटियों की हत्या की और अदृश्य प्रभाव का दावा किया। सुप्रीम कोर्ट ने मामले में सजा कम की, मानसिक अस्थिरता को ध्यान में रखते हुए, लेकिन यह विवादास्पद और जटिल है।

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हम एआई से डरते हैं क्योंकि वह मुनष्‍य न हो कर भी निर्णय ले सकता है…

जेन एआई अर्थात् जनरेटिव एआई को एक सभ्यतागत परिवर्तन के हेतु के रूप में देखना सचमुच सिर्फ एक कॉरपोरेट आकलन नहीं है।

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नागनाथ की पेंटिंग्स में सुनिए साइलेंस का म्यूज़िक

नागनाथ जी के चित्र संग्रह देखकर ऑर्गेनिक फीलिंग्स पैदा होती हैं। ये चित्र एक सुघड़ सोच, विश्वास और कॉन्सेप्ट के तहत निर्मित हैं इसीलिए ये वैसा ही असर देखने में पैदा करते है और दर्शक-पाठक को रोककर थाम लेते हैं।

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अनुभव में नहीं आती तब तक सवाल ही बनी रहती है जिंदगी

ऊर्जा का मौलिक गुण होता है कि वह स्वतंत्र रहना चाहती है, बंधकर रहना उसे भाता नहीं। मनुष्य के अंदर की बेचैनी दरअसल ऊर्जा के स्वतंत्र होने की इच्छा की तड़प का ही नाम है।

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जिस को तुम भूल गए याद करे कौन उस को…

इसे ज़िन्दगी की ज़रूरियात और इंसानी हक़ों के नज़रिए से समझना नए अर्थ खोलता है। सरपरस्त जब अपनी रिआया को नज़रंदाज़ कर देता है तो उसे कहीं सहारा नहीं मिलता है।

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समाचार एजेंसी ने किया एक शब्‍द का गलत अनुवाद और हुआ सर्वनाश

राष्‍ट्र युद्ध की कगार बैठा था। शांति कायम करने के प्रयत्‍न परवान चढ़ रहे थे। मगर दुर्भाग्‍य से समाचार एजेंसी के अनुवादकों ने प्रधानमंत्री के वक्‍तव्‍य में एक शब्‍द का गलत अंग्रेजी अनुवाद कर दिया। इस गलती ने विश्‍व को ऐतिहासिक त्रासदी दे दी। अचरज तो इस पर भी है कि सब कुछ खोने की कगार पर बैठे राष्‍ट्र के नियंताओं ने उस शब्‍द की गलती सुधारने पर ध्‍यान क्‍यों नहीं दिया?

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