एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-33

- विभूति झा, सामाजिक कार्यकर्ता
संपादन: चिन्मय मिश्र
यह अनिवार्य रूप से घटित हुआ भी एक साधारण दस्तावेज है। यह न तो कहानी है, न यात्रा वृतान्त। यह एक व्यक्ति की “लौटने” की गाथा है। विभूति दा की यह डायरी अबूझ सी सच्ची कहानी है। यह सत्य की अभिव्यक्ति है। –चिन्मय मिश्र
मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल जिले मंडला से निकलकर सागर विश्वविद्यालय से एमए और एलएलबी। फिर जेएनयू (नई दिल्ली) से समाज विज्ञान में शोधकार्य किया। भोपाल से वकालत शुरू की और भोपाल गैस त्रासदी मामले में गैस पीड़ितों के वकील बने। एक युवा वकील ने बड़े बड़े वकीलों की दलीलों को खारिज कर भोपाल गैस पीड़ितों को मुआवजा दिलवाने की लड़ाई जीती। जिला अदालत से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक पैरवी और फिर एक दिन अचानक पूरी प्रसिद्धि, अपने समृद्ध भविष्य की संभावना को पुराने वस्त्र की तरह उतार कर चल पड़े एक नए जीवन की खोज में। मन में विचारों का उफान और तन पर एक जोड़ी कपड़ों के साथ सबकुछ छोड़ दिया। परिवार भी। किसी फिल्म की पटकथा सा लगता यह इस डायरी के लेखक विभूति झा के जीवन की वास्तविकता है। एक ऐसा मंथन जो जीवन उद्देश्य खोजने की दिशा में बढ़ा और इस राह में उतने ही विविध अनुभव हुए। यह एक विस्तृत जीवन से साक्षात्कार है। किश्त-दर-किश्त रोचक होती जीवन दास्तां।
सुंदर खट्टाली में दुस्साहसः 21 फरवरी, 2008
आखिरकार निकल ही पड़े अपने काम पर। झाबुआ जिले के विभिन्न अंचलों में लगभग छह महीने का समय बिताने और निरंतर भ्रमण करने के बाद, अब अंततः अपने काम को मूर्त रूप देने के लिए एक केंद्र स्थापित करने के लिए मानसिक तैयारी पूरी करके जा रहे हैं। मेरा यह नया उपक्रम होगा कानूनी ज्ञान का लोकव्यापीकरण! पिछली बार सब जगह घूम-घामकर बड़ी खट्टाली में केंद्र बनाने का मन बना लिया है। इस इलाके में एक सुंदर कहावत प्रचलित है – “आदमी जाने बसां-सोना जाने कमां”, अर्थात आदमी के बसने और सोने के तपने पर ही परख होती है। बसने तो मैं जा रहा हूँ और मेरा कार्य ही मेरा सोना है। देखें उसे कितना तपा पाता हूँ।
अंतत: खट्टाली के डुडवे फलिया पहुँच ही गए। सीधे उसी बूढ़े के घर पहुँचे जहाँ से पिछली बार विदा हुए थे, आज से 23 दिन पहले। बूढ़े ने कहा था कि जब भी आओ मेरे घर ही ठहरना। तो हम आ गए। बूढ़े का नाम केक्टा है। काफी विचित्र सा नाम है ! दोपहर में सब खेत में काम कर रहे हैं-गेहूँ की कटाई और बोझा बँधाई चल रही है। घर से लगा हुआ ही खेत है। केक्टा को बताया कि हम रहने आ गए हैं। उसने कहा ठीक है। उसे साथ लेकर गाँव में घूमते रहे। लौटकर केक्टा के घर आए। अब तक बच्चों की छुट्टी हो गई थी और उन्होंने आकर गाड़ी को घेर लिया। यहां एक प्राइमरी स्कूल है। सब बच्चे मुझे पहचानने लगे हैं। महेश जी का कैमरा थोड़ी देर चलता रहा। हमने केक्टा से कहा कि उसी के घर रुकेंगे और अपना सामान गाड़ी से निकालकर उसके घर रख लिया। घूमते हुए जो लोग साथ थे उनमें से वेस्ता जी से महेश जी ने कह दिया कि रात भोजन उसके यहाँ करेंगे। महेश जी और मैं केक्टा के घर में परछी में बिछी दो खाटों में थोड़ी देर आँख बंद करके लेट गए। केक्टा अपने खेत में चला गया। बच्चे भी चले गए।
थोड़ी देर में सोकर उठे। लगभग साढ़े चार बजा होगा। हँसते-मुस्कुराते चाय की फरमाइश की। काली चाय बन गई। केक्टा गम्भीर मुद्रा में आकर बैठ गए। थोड़ी-बहुत बातें होती रहीं। केक्टा ने पूछा कि अभी कहाँ जाओगे तो उसे बताया कि अब तो यहीं रहने का सोचकर आए हैं, अब कहीं नहीं जाना है। पूछने लगा कब तक रहोगे तो महेश जी ने बताया कि ये तो अब यहीं रहेंगे और उनका आना-जाना लगा रहेगा। यहाँ लोगों की समस्याएँ समझेंगे और कानूनी अधिकारों की जानकारी देंगे। केक्टा की भावभंगिमा और भी गंभीर होती गई। उसका एक नया रूप सामने आ रहा था। आज उसने ताड़ी नहीं पी रखी है। कहने लगा ये इलाका बहुत खराब है। यहाँ चोर बहुत आते हैं, लूट-मार करते हैं। रात में घर में घुस जाते हैं और सब उठाकर ले जाते हैं। हमने कहा कोई बात नहीं, हमारे पास तो ऐसा कुछ है भी नहीं। बोला पिटाई भी करते हैं। महेश जी बोले थोड़ी-बहुत पिटाई भी हो गई तो ख़ास बात नहीं है। अब बोला-तीर-कमान लेकर आते हैं, कोई भी बाहरी आदमी मिलता है तो उसकी गर्दन काट देते हैं। मैंने जवाब दिया एक-न-एक दिन तो मरना ही हैं! हम तो सब कुछ के लिए तैयार होकर आए हैं।
इसके बाद केक्टा ने हथियार डाल दिए। उसने स्पष्ट बोल दिया कि रात तो उसके घर नहीं रुक सकते। रुकना है तो बाज़ार (नगर) में जाओ नहीं तो सरपंच के पास जाकर रुकने की जगह ढूँढ़ो। मैंने सोचा इसके बाद तो अब धक्का देकर निकालना ही बाकी रह गया है। हम लोग भी बड़ी नादानी कर बैठे। बूढ़े की पिछली बार की बात को इतनी गम्भीरता से ले लिया और उस पर विश्वास कर लिया। समस्या यह है कि अँधेरा होने वाला है, अब जाएँ तो कहाँ जाएँ? केक्टा से कहा कि सामान यहीं रखकर सरपंच से मिलकर आते हैं। मेरा बैग भी तो बहुत बड़ा है। सारा सामान है, ठंड के लिए कपड़े और कुछ किताबें भी। ठंड अभी काफी है। “समझेगा कौन यहाँ, दर्द भरे दिल की जुबाँ?” जितनी आसानी से नया सफ़र शुरू हो जाने की कल्पना की थी, उससे ठीक उलट से शुरुआत हो रही है ।
दोनों मुँह लटकाए, चिंतामग्न निकल पड़े गाँव की गलियों में। कुछ समझ में नहीं आ रहा है। मैंने कहा वह बूढ़ा पिछली बार ताड़ी के नशे में बिना सोचे-समझे बोले जा रहा था और उसने सोचा ही नहीं होगा कि हम सच में आ जाएंगे। अब उसे वास्तविकता समझ में आ रही है और आसपास सलाह-मशविरा भी किया होगा। हमारे आँखें बंद करके लेटने और फिर सो कर उठने के बीच ही सब-कुछ बदल गया। उसका व्यवहार एकदम उलट गया। ऐसा क्या हुआ होगा? समझ में नहीं आ रहा है? महेश जी ने कहा उस पर विश्वास न करने की कोई वजह ही नहीं थी और फिर वह मसनी वाले शिवगंगा से जुड़े प्रताप का ससुर भी तो है।
इस गाँव में न तो शिवगंगा का किसी ने नाम सुना है और न ही महेश जी को ही कोई जानता। बाकी बातों के अलावा इसी तथ्य ने दरअसल मुझे यहाँ आकर्षित भी किया था। लेकिन इस समय यह अखर रहा है।। लग रहा है कि या तो मसनी वाले प्रताप ने संपर्क नहीं किया और या फिर संपर्क का उल्टा असर हुआ। स्कॉर्पियो से आने का भी शायद उल्टा असर हुआ है। हाँ, केक्टा ने यह भी कहा था कि यहाँ तो चोर-डाकू लोग गाड़ी में भरकर भी आते हैं। तो क्या हमें चोर-डाकू समझ रहा है? मैंने सोच रखा था कि सरपंच, पटवारी, पुलिस जैसे लोगों से थोड़ी दूरी बनाकर रखेंगे, क्योंकि जागरूक होने पर अंततोगत्वा उन्हीं सब के विरुद्ध तो जाना है। लेकिन अब मजबूरी में सरपंच को ही ढूँढ़ना पड़ेगा। पता नहीं वह कैसा होगा?
सरपंच का घर पूछते-पूछते चल दिए। फलिया छोटा सा ही है, 25-30 घर होंगे। पता लगा सरपंच घर पर नहीं है। उसके घर के पीछे तरफ दूसरे घर की बाड़ी में एक बूढ़ा सा व्यक्ति मिर्ची-भटे में पानी देते मिल गया। राम-राम की तो उसने अपनी भाषा में कहा-आओ। महेश जी ने कहा आप घर से बाहर हो तो हम भीतर कैसे आ सकते हैं? अपना काम छोड़कर वह हमें लेकर घर की परछी में चला। उसका नाम प्रताप है-प्रताप डुडवे। बैठ गए। वह टूटी-फूटी बोली में बात करता रहा। हमने बताया कि मण्डला और दतिया के रहने वाले हैं अभी मेघनगर से आए हैं, वनवासियों के बीच रहकर काम करना चाहते हैं। अभी रात में कहाँ रहें, कोई ठिकाना नहीं है। सरपंच अभी घर पर नहीं है। प्रताप ने कहा कोई बात नहीं, मेरे घर पर ही रह जाओ, काफी जगह है। सरपंच भी कुटुम्ब का है, सुबह उससे मिल लेना। प्रताप की बात सुनकर जान में जान आई। प्रताप के दो बेटे हैं-भारत सिंह और डूंगर सिंह। एक बेटी है-मीरा जो बी.एस.सी. कर रही है। डूंगर बी.ए. फाइनल में है। भारत बड़ा है, पंचायत में काम करता है और शादी-शुदा है तथा उसके चार बच्चे हैं। इस क्षेत्र में इतने पढ़े-लिखे परिवार कम ही हैं। बड़ा अच्छा परिवार लगा। बड़ा-सा पक्का घर बना रहे हैं। अभी अधबना-सा ही है। घर में दरवाजों की चौखटें लगी हुई है लेकिन पल्ले नहीं है-यानी पूरी तरह से खुला हुआ घर, और प्रताप सिंह डुडबे का मन भी ऐसा ही लगा। वह लगभग मेरी ही उम्र का होगा। एक मुहल्ले में दो विपरीत मनोस्थिति के लोगों से मिलना भी मजेदार लग रहा है। पर लगा, “भीतर होय तो कोई चढ़ी ने नांच”। सत्य में आत्मविश्वास अधिक होता है। हमें भी अंतत: आसरा मिल ही गया ।
पास-पड़ोस के एक-दो लड़के और आ गए। बातें करते रहे। वही लड़के जाकर केक्टा के यहाँ से हमारा सामान उठाकर ले आए। बड़ी राहत मिली यहाँ आकर। मीरा ने काली चाय पिलाई। अँधेरा घिर गया। शौच के लिए जाना है। भारत सिंह नदी के पास तक छोड़कर चला गया। केक्टा के घर से निकाले जाने के बाद महेश जी ने जोबट में जंगल सिंह को फोन करके आने के लिए कह दिया था। कहीं भी अगर ठिकाना न मिला तो कहीं तो जाना ही पड़ेगा। जंगल सिंह का गाँव गुड़ा करीब 6-7 कि.मी. है और उसकी बुआ का घर खट्टाली में ही दूसरे फलिए में है। जंगल सिंह का फोन आया कि वह मोटरसाइकल पर आ गया है और सरपंच के घर पर है। महेश जी और निश्चिन्त हो गए। लौटते हुए अच्छा-खासा अँधेरा हो गया। शाम के धुंधलके में यह जगह बेहद खूबसूरत लगी। ऊँचे-ऊँचे टीले जिन पर खड़े होकर दूर तक पानी ही पानी दिखाई देता है और पानी के अन्दर समाधि लिए हुए ताड़ के ऊँचे-ऊँचे पेड़। पानी के किनारे भी ताड़ के सैकड़ों पेड़। केरल तो मैं अभी तक नहीं जा पाया हूँ लेकिन फिल्म, टी.वी. में जो केरल का दृश्य देखा है, लगभग वैसा ही। पानी का स्तर घटने से जो जगह निकली हुई है, वह एकदम बीच (समुद्र तट) की तरह लग रही है। इसमें कोई शक नहीं कि हमने बहुत सुन्दर जगह चुनी है।
यह आदमी सचमुच महात्मा है
लौटने लगे तो मेढ़ पर बैठा हुआ प्रताप मिल गया। हमारा रास्ता देख रहा था। कहने लगा अंधेरा हो गया इसलिए आकर बैठ गया कि साथ ले जाऊँगा। यह आदमी सचमुच महात्मा है, ऐसे अनजान लोगों के लिए इतना सरोकार! प्रताप के साथ उसके घर पहुँचे। जंगल को भी वहीं बुला लिया। सबके लिए खाना तैयार। सबने भरपेट स्वादिष्ट भोजन किया-मक्के की रोटी और उड़द की दाल। महेश जी बहुत उत्साहित हो गए और डूंगर सिंह को हिन्दी साहित्य समझाने लगे। डूंगर और जंगल ऊपर छत पर जाकर बातें करते रहे फिर एक खाट पर दोनों सो गए। महेश जी भी एक खाट पर सोए और मैंने ज़मीन पर अपना बिस्तर लगाया। ठंड ज़बर्दस्त है। हम परछी में सो रहे हैं जहाँ छत है, मगर आस पास दीवार नहीं। परिवार के सभी सदस्य भी अपनी-अपनी नियत जगह पर सोने चले गए। घर के बीच में एक बड़ा कमरा है जिसमें अनाज रखा हुआ है और कुछ जगह खाली है जहाँ बैठकर खाना खाते हैं। एक खाट भी पड़ी हुई है। उसके पीछे की परछी में खाना बनता है। सामने परछी (बरामदे) के बाद आँगन है, जिसमें बकरियाँ बंधी रहती हैं, एक तरफ मवेशियों की सार है, जिसके अंदर ऊपर जगह बनाकर मुर्गियाँ रहती हैं। आँगन तीन तरफ़ दीवारों से घिरा हुआ है। यह यहाँ के घरों की खासियत दिखी कि सभी घरों में दीवार से घिरा हुआ बरामदा है। प्रताप से पूछा-यहाँ चोर-डाकू आते हैं? उसने कहा अरे नहीं, कभी कोई चोर-वोर नहीं आता। पूरा गाँव एक ही कुटुम्ब का है और एकदम सुरक्षित है। केक्टा तो कुछ और ही बता रहा था। बस कभी कभार थोड़ी ले लेते हैं। प्रताप सिंह के परिवार में कोई भी शराब नहीं पीता।
मैं तों अच्छे से सो गया। महेश जी उलटते-पलटते रहे। उन्हें खटमल काटते रहे। खट्टाली की पहली रात।
सुबह बहुत जल्दी नींद खुल गयी। एकदम घुप्प अंधेरा है, इसलिए पड़ा रहा। छह बजे के बाद नदी की तरफ गए। इतना सुंदर दृश्य है कि तबियत खुश हो गई। यहाँ जंगल तो है नहीं, इसलिए न तो जंगली जानवर हैं और न ही ज़्यादा पक्षी। बस पानी की सुंदरता है और उसी में पक्षी भी हैं। थोड़ी देर में सूर्योदय हुआ, पानी में से निकलता हुआ सूरज, बस देखते ही बनता है। पानी के कारण भी शायद ज़्यादा ठंड है यहाँ। महेश जी ने कहा कि वह जंगल सिंह के साथ जोबट तक जाएंगे और शाम तक लौट आएंगे। वहाँ विनय पाण्डे लंगड़ा होकर पड़ा हुआ है और जोबट बाज़ार के दिन बुधवार को वहाँ शिव बारात निकालनी है। मैंने कहा अभी तो सरपंच से भी भेंट नहीं हुई है। कहने लगे, कोई बात नहीं, लौटकर शाम को मिल लेंगे।
नदी से लौटकर प्रताप सिंह के घर पहुँचे। सरपंच का घर खुला देखकर महेश जी वहाँ घुस गए और फिर मुझे भी बुला लिया। सरपंच तो घर में नहीं है लेकिन उसकी पत्नी, बच्चे और माँ मिल गई। बड़ा लड़का शंकर पास के गाँव भीती में शिक्षक है। दो छोटे लड़के पढ़ते हैं। तीन बेटियाँ-सुनीता, संगीता और सरिता हैं 10,11,12 वीं में पढ़ती हैं, यानी परिवार में सभी बच्चे पढ़े-लिखे हैं। बहू भी बी.ए. की प्राइवेट परीक्षा दे रही है। बस सरपंच भाओ सिंह ही अनपढ़ है। लड़का काफी चतुर लगा। यहाँ अच्छी दूध वाली चाय पी। सरपंच शाम तक मिलेंगे, जोबट गए हैं। महेश जी उसके लड़के से बातें करते रहे। लड़कियाँ अच्छी व्यवहारकुशल और सुसंस्कृत लगीं। प्रताप के घर गए। मैं कपड़े लेकर सरपंच के घर गया और गरम पानी से नहा लिया। महेश जी गरम पानी से प्रताप के घर नहा लिए। दोनों घर पास-पास, आगे-पीछे ही हैं।
महेश जी निकल गए जंगल सिंह के साथ जोबट के लिए। मैंने आसन किया और पढ़ता-लिखता रहा। महेश जी ने जाते हुए डूंगर से बहुत आग्रह किया कि वह भी साथ चले लेकिन वह नहीं गया। कहने लगा बाद में जाएगा। डूंगर सिंह जोबट में आई.टी.आई. में कम्प्यूटर कोर्स के लिए रोज जाता है। गम्भीर लड़का लगा। कम बोलता है और थोड़ा रुक-रुक कर बोलता है। मुझसे पूछने लगा कि आप लोगों के मोबाइल में कितना बैलेंस रहता है? मैंने पूछा क्यों फोन करना है क्या? बोला नहीं, वैसे ही पूछ रहा था क्योंकि आप लोग इतनी-इतनी देर बातें करते रहते हो। मुझे एकदम शर्म सी आई। महेश जी का मोबाइल तो मशहूर है ही और वे काफी समय उसके साथ बिताते ही हैं। मैंने अपनी शर्म छुपाते हुए डूंगर सिंह को बताया कि बी.एस.एन.एल. की एक स्कीम है जिससे दूसरे बी.एस.एन.एल. पर मुफ्त फोन कर सकते हैं-महेश जी के पास ऐसा ही फोन है जिससे मुफ्त में बातें करते रहते हैं और मेरे पास जिन लोगों के फोन आते हैं उनके पास भी ऐसे ही मुफ्त वाले फोन हैं। मेरे पास मुफ्त वाला नहीं है, इसलिए मैं कहीं फोन नहीं करता। कहने लगा, हाँ आप तो नहीं करते, वो दूसरे ही करते रहते हैं। मेरे ख्याल से यह बात उसके गले उतरी नहीं, पूरी तरह से।
खाने का तरीका भी पश्चिमी देशों जैसा
डूंगर सिंह जोबट चला गया। मैं बैठकर लिखता रहा। साढ़े बारह-एक बजे के करीब मीरा ने खाना लगाकर मुझे खिला दिया। इन लोगों का खाने का तरीका भी पश्चिमी देशों से मिलता-जुलता है। एक छोटी टोकरी में रोटियाँ बनाकर रख देते हैं-बड़ी-बड़ी मक्के की या फिर मक्का, गेहूँ, ज्वार, बाजरा सभी की एक-एक, दो-दो (‘ब्रेड बास्केट!’) और थाली में दाल या रसे वाली सब्जी रख देते हैं। अपने हाथ से रोटियाँ लेकर खाते जाओ। अलग से दाल या सब्जी एक बर्तन में रख दी जाती है, जितनी चाहें ले लें। आदिमतम और आधुनिकता की अद्भुत समानता। खाते हुए सामने खड़े होकर या आग्रह कर-करके कोई नहीं खिलाता। खाना खाकर वहीं थाली में हाथ धोकर थाली का पानी पोंछकर पानी थाली में छोड़ दो। मेहमानों को थाली नहीं उठाने देते। खुद तो थाली में जो कुछ भी बच जाता है उसे पानी डालकर पी लेते हैं और थाली एकदम साफ हो जाती है। मेहमानों की थाली बाहर ले जाकर धोते-माँजते हैं। खाने से कुछ घंटे पहले तो गाढ़े सूप की तरह मक्की या गेहूँ या चावल का पेय पीते ही हैं। लाल मिर्च नमक के साथ कूटकर खाने के साथ चटनी की तरह खाते हैं। यहां लोग मिर्ची काफ़ी खाते हैं।
दोपहर में थोड़ा आराम किया। डूंगर सिंह आ गया और उससे बातचीत होती रही। अपने खेत में खजूर के पेड़ों में रस के लिए मटकी बाँधने जाने लगा तो मैं भी साथ हो लिया। इस समय खजूर का रस निकलता है और ताड़ का अभी-अभी शुरू हुआ है। खजूर के रस को नीरा या सिंदी कहते हैं और उसी को दिन भर रखने के बाद ताड़ी कहते हैं। ताड़ की तो ताड़ी होती ही है। ताड़ के पेड़ों पर चढ़ना बढ़ा जोखिम भरा काम है और कई लोग तो गिरकर मर भी जाते हैं। डूंगर ने तीन पेड़ों में मटकी टाँगी। इस बीच मैं घूमता रहा और उसकी खलिहान में खाट पर बैठा भी रहा। वहीं दरयाव सिंह मिल गया-मिलिट्री साहब। वह सी.आर.पी.एफ. में इम्फाल में पोस्टेड है। 20 साल की नौकरी हो चुकी है। अब कुछ महीने में रिटायरमेंट लेकर यहीं आ जाएगा। पुलिस वाले के अक्खड़पन के साथ मुझसे जानकारी लेता रहा कि कहाँ से आए हो, क्या करने वाले हो, यहीं क्यों आए हो, वगैरह? मैं उसे बताता रहा लेकिन उसके चेहरे पर झलक रहा था कि वह संतुष्ट नहीं है। शायद शहर में रहने से सहज विश्वास वाला मानस बदल सा गया है। मुझे भी अपने यहाँ बसने का उद्देश्य तो स्पष्ट करना ही चाहिए। डूंगर घर चला गया, मैं नदी तरफ चला गया। थोड़ी देर में लौटते हुए इडला ड्राइवर के घर के पास नरसिंह मिल गया। इडला का घर एक टेकरी पर है और खाली है। हमारे रहने के लिए बहुत उपयुक्त है। ताला लगा हुआ है।
महेश जी का फोन आया कि वह आ गए हैं। वहीं नदी किनारे मिल गए। जंगल सिंह और देहदला का भूरू साथ है। कहने लगे जंगल सिंह की बुआ के घर जमरा फलिया चलते हैं। डुडवे और जमरा फलिया के बीच से सड़क जाती है जो अब डूब में आ गयी है-खट्टाली-डाबड़ी रोड़, उम्दा और जामनी होकर। उसी सड़क पर आ गए। थोड़ी दूर चले तो पीछे से किसी ने ज़ोर से आवाज़ लगाकर रोका। एक पेंट-शर्ट पहने आदमी नशे में लड़खड़ाता हुआ पास आ गया। अधेड़ उम्र का था। पास आकर बोलने लगा कि दो दिन से यहाँ घूम रहे हो, दिन भर इधर से उधर घूमते रहते हो। तुम लोग कौन हो? क्यों आए हो, क्या काम है? सब साफ-साफ बताओ? मैं हिन्दी-अंग्रेज़ी सब जानता हूँ, मैं टीचर हूँ, सब समझता हूँ; ऐसे कोई भी हमारे गाँव में आकर नहीं रह सकता। अपना सामान समेटो और जाओ।
महेश जी ने कहा चलो आपके घर बैठकर बताते हैं।
कहने लगा-नहीं, घर में नहीं आ सकते, अभी इसी मिनट यहीं खड़े-खड़े बताओ, नहीं तो ठीक कर दूँगा।
मैंने पलटकर जवाब दिया कि तुम शिक्षक होकर नशे में घूम रहे हो और ऐसी बातें करते हो। तुम्हें ज़रा भी तमीज़ नहीं है। अब सारे गाँव को बताएँगे लेकिन तुम्हें नहीं बताएँगे कि हम यहां क्यों आए हैं। हम तो यहीं रहेंगे, जो बनता हो कर लो।
उसे वहीं बड़बड़ाता छोड़कर हम आगे बढ़ गए। इसका नाम छगनलाल चौहान मास्टर है।
आगे चलकर जमरा फलिया की ओर मुड़ गए। कई लोग ताड़ के पेड़ों पर चढ़े हुए दिखे। शाम का धुंधलका हो रहा है। जंगल की बुआ के लड़के मोहकाम के घर पहुँचे। उसका छोटा-सा घर है, गरीबी की हालत में रह रहे हैं। पत्नी, तीन छोटे बच्चे, माँ और एक अविवाहित बहन। घबराया हुआ सा लगा मुहकाम। थोड़ी देर बैठे रहे और तय हुआ कि खाना यहीं खाएंगे।
मैंने कहा जब तक खाना बनता है, प्रताप के घर चलकर बता देते हैं कि खाकर आएंगे।
प्रताप के घर पहुँचे। बताया कि खाना जमरा फलिया में मोहकाम के घर खाएंगे। कहा-वारलो, ठीक है। हमने कहा बताने आए हैं, डूंगर को भी साथ ले जाएंगे।
डूंगर ने कहा, बताने की क्या ज़रूरत थी और न ही मुझे लेने आने की, मैं तो जाऊँगा नहीं और आप नहीं आते तो हम समझ ही जाते कि वहीं रुक गए।
हमने कहा-सामान भी तो यहाँ है, तो बोला सामान वहीं ले जाओ, वहीं रुक जाना।
एकदम बदलाव दिखा।
मैंने कहा, नहीं लौटकर यहीं आएंगे, सोएंगे तो यहीं। अब प्रताप ने भी कहा सकुचाते हुए कि इतनी रात में कहाँ लौटकर आओगे, वहीं सो जाना, सामान ले जाओ।
मैंने कहा-नहीं, जल्दी आ जाएंगे और यहीं सोएंगे; आकर सरपंच से भी मिलेंगे। यह कहकर हम चल पड़े। बेचारा प्रताप का परिवार! मान न मान, मैं तेरा मेहमान। हमारी भी तो मजबूरी है। स्थाई व्यवस्था हो जाने तक शायद यह सब करना ही पड़ेगा।
महेश जी ने कहा कि सामान उठा ही लें क्या तो मैंने कहा नहीं सामान उठाना ठीक नहीं रहेगा, सोएंगे तो यहीं। इस तरह से जाना ठीक नहीं है।
रास्ते भर जंगल सिंह कहता रहा कि सामान ले आते हैं, वहाँ मत रुको, बहुत खतरा है। यहाँ शराब पीकर बहुत उत्पात मचाते हैं, रात में जमरा फलिया से लौटने में भी बहुत खतरा है, रास्ता रोककर खड़े हो जाते हैं, लूट लेते हैं। मैंने जंगल सिह को झिड़क दिया।
प्रताप के घर में अगर घुसने नहीं दिया तो क्या होगा?
गंभीर चिंता का विषय हो गया। प्रताप के घर में अगर घुसने नहीं दिया तो क्या होगा? 24 घंटे में ही उसके घर की स्थिति एकदम बदल गई। किसी ने उसे डरा दिया। सरपंच से अभी भेंट नहीं हुई लेकिन उसे पता तो लग ही गया होगा। प्रताप का लड़का भारत उसी के साथ सचिव की तरह काम करता है। मोहकाम सिंह के यहाँ पहुँचे। महेश जी काफी विचलित हैं कि यहाँ उनका अंदाज असर नहीं कर रहा है। वे शायद स्थिति का आकलन पूरी तरह से कर नहीं पाए और आत्मविश्वास का अतिरेक उनके साथ रहा।
धर्म का नाम लेकर लोगों के घर में घुसना और इस तरह से धर्म का नाम लिए बिना कानूनी अधिकारों की बात करके अपनी जगह बनाने में बहुत फर्क है। मैं तो इसके लिए पूरी तरह से मानसिक रूप से तैयार था लेकिन शायद महेश जी नहीं थे! उन्हें शायद यह भी आभास नहीं था कि शिवगंगा यहाँ पूरी तरह से एक अनजाना शब्द है। स्थिति का आकलन सही होता तो महेश जी आज जोबट जाते ही नहीं। प्रताप के घर में एक रात सोकर उन्हें लगा कि बस अब खट्टाली में जगह बना ली। ऐसा ही उनके साथ केक्टा को लेकर हुआ था, जबकि मैंने कहा भी था कि वह ताड़ी के प्रभाव में बोल रहा है, जिसे बहुत गंभीरता से नहीं लिया जाना चाहिए।
मेरी समझ में आ रहा था कि धर्म प्रचार के बहाने किसी के यहाँ जाकर खाना-पीना और एक रात रुक जाना एक अलग बात है और इस तरह कानूनी ज्ञान के प्रसार के लिए किसी जगह स्थाई रूप से रहने की बात करके जाना और वहाँ रुकना एकदम ही अलग बात है। महेश जी शायद इस महत्वपूर्ण अंतर को पूरी तरह से समझ नहीं पाए और अति-उत्साह में रहे। उन्होंने अपनी काबलियत और मेरे व्यक्तित्व का भी शायद थोड़ा बढ़ाकर ही आकलन कर लिया। जाहिर है दोनों में ही कमी है-मैं शायद अभी भी काफी संकोची हूं और आवश्यकता से भी कम बोलता हूं। दूसरी तरफ़ महेश जी एकदम अनौपचारिक हो जाते हैं और कई बार लगता है कि आवश्यकता से बहुत अधिक बोल जाते हैं। बहुत जल्दी, बहुत सारा पाने के विचार के चलते तय नहीं कर पाते कि कहाँ आवश्यकता पूरी हो गयी और रुक जाना चाहिए। यह तो गवाह से जिरह करने जैसी ही बात है। क्रास-एक्जामिनेशन एक कला है जहाँ आपके मतलब की बात गवाह से कहलाने में सफल हो जाते हैं, वहाँ रुक जाना चाहिए। अगर अपने उत्साह में उसके भी आगे चलते रहे तो उसका उल्टा असर होने और गवाह को अपनी कही हुई बात को फिर से सोचकर आपके खिलाफ कहने की संभवना रहती है। लगभग यही बात यहाँ भी लागू होती है। महेश जी को अभी इसमें महारत हासिल करनी होगी। हम दोनों मिलकर एक अच्छा संतुलन बनाए रख सकते हैं। जो भी हो, अब तो कमर कसकर निकल ही पड़े हैं।
क्रमशः…
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एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-23: अपने गांव भंवरताल में हूं; एक वो दिवाली थी, एक ये दिवाली है, एकदम अलग
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-24: खबर फैल गई कि मैं ‘बैरागी’ हूं, इनाम नहीं मिलेगा
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 25ः भंवरताल में आखिरी रात है, पता नहीं कब आना होगा…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 26ः वकालत छोड़ी, फिर अपनाई, मैं उलझता चला जा रहा था…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 27: उस दिन मैं अचानक छोटा-मोटा ‘महामानव’ बन गया… मगर
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 28ः चोम सिंह ने समझा दिया, 21 वीं सदी में अपनी शर्तों पर जिया जा सकता है
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 29ः आज ऑफिस में लगेगा ताला, नाम पट्टिका हट जाएगी
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 30ः उन जगहों पर लाैटना जहां कभी मन बैरागी बन कर गया था…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 31ः स्वामी अवधेशानंद बाेले, विभूति जी आप अवश्य आइए, मुझे प्रतीक्षा रहेगी
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 32ः नाते-रिश्तेदार ‘माता-पूजन’ कर मनाते हैं ईंद, हैं न अनाेखी बात

