हम लखपति होते-होते बाल-बाल बचे…
पन्ना की जो खासियत मुझे सबसे ज्यादा आकर्षित करती थी,वो था प्राणनाथ मंदिर का गजर। गजर हर घंटे अपनी टंकार से पन्नावासियों को समय बताता, और हर प्रहर के बदलने की जानकारी भी देता।
हम लखपति होते-होते बाल-बाल बचे… जारी >
पन्ना की जो खासियत मुझे सबसे ज्यादा आकर्षित करती थी,वो था प्राणनाथ मंदिर का गजर। गजर हर घंटे अपनी टंकार से पन्नावासियों को समय बताता, और हर प्रहर के बदलने की जानकारी भी देता।
हम लखपति होते-होते बाल-बाल बचे… जारी >
पापा के ऑफिस की जो चीज मुझे सबसे ज्यादा आकर्षित करती वो था हाथ से खींचे जाने वाला पंखा। मेरा दूसरा प्यार था पापा को मिली जीप। मैं हमेशा इस गुंताड़े में रहता कि कैसे इसे चलाएं!
लगता था ड्राइवर से अच्छी जिंदगी किसी की नहीं… जारी >
सो बचपन में उस वक्त तक मैंने अपने दो गुणो और दक्षताओं (skills and competencies) को साबित कर दिया था। वालेंटियर होना और डेयरिंग होना जो एक डेवलपमेंट वर्कर की एसेंशियल क्वालिफिकेशंस है।
आखिर मैं साबित कर पाया कि ‘मर्द को दर्द नहीं होता’ जारी >
जेन में कहते हैं कि जब विद्यार्थी तैयार होता है, तब गुरु प्रकट हो जाता है; और जब विद्यार्थी पूरी तरह तैयार हो जाता है, तब गुरु गायब हो जाता है।
असल गुरु प्रेम है, जो कान उमेठता है, शाबाशी भी देता है जारी >
बुद्ध एक सच्चे कल्याण मित्र थे जिन्होंने स्वयं को गुरु कहने से इनकार किया था और सभी को अपनी रोशनी खुद बनने की सलाह देते थे।
गुरू पूर्णिमा के शुभ अवसर पर महर्षि वेद व्यास की परंपरा को आगे बढ़ाने वाले समस्त गुरूओं के सम्मान में समर्पित यह लेख।
जिन्होंने सिखाया चलते रहना ही जिंदगी है, रूकना यानी जड़ता जारी >
हमारे देश में महिलाओं के खिलाफ हिंसा का एक क्रूर रूप है महिलाओं का लापता हो जाना। अफसोस की बात है ये महिलाओं और किशोरियों की आर्थिक स्थिति, शैक्षिक स्थिति, सामाजिक और यहां तक कि राजनीतिक स्थिति से भी जुड़ी है।
कहां गई होगी, क्यों गई होगी, उसका क्या हुआ होगा? जारी >
इस उम्र में बिना टिकट पकड़े जाने का भय सर पर सवार था। गाड़ी अपनी गति पकड़ चुकी थी, सह-यात्री अपने बिस्तर बिछा कर लेट गए थे। मां–बेटी, अपने गुप्त श्वान के साथ, परदे खींच कर मौन थे। मैं एक मृत्यु–दंड मिले, मुजरिम की तरह, जल्लाद का इंतजार कर रहा था।
रेलयात्रा की व्यथा कथा-अंतिम भाग: टिकट कैंसल का संदेश और बेटिकट हो जाने की धुकधुकी जारी >
आश्चर्य की बात थी कि सेकंड एसी कोच में जीआरपी का कोई जवान नहीं था और पास के अन्य कोच में भी नहीं। जिन पर यात्रियों की जानमाल की हिफाज़त की जिम्मेदारी रहती है।
रेलयात्रा आपबीती: कसम खाई, ऐसी ट्रेन में सफर नहीं करेंगे जारी >
सुविधाओं के मामले में हम वर्ल्ड क्लास स्टेशनों के उपयोगकर्ता कहलाने लगे हैं लेकिन सुविधाएं दोयम दर्जे की ही हैं। कितना कष्टदायक है कि एक यात्री अपनी गाड़ी के इंतजार में घंटों प्लेटफार्म पर बैठा रहता है और उसे सटीक जानकारी भी नहीं मिल पाती है कि उसकी गाड़ी आखिर कब पहुंचेगी।
रेलयात्रा की व्यथा कथा-3: नाम वर्ल्ड क्लास लेकिन रखरखाव का क्लॉज ही नहीं जारी >