life

वाह, पचास रुपए? बड़े दिनों बाद इतने रुपए एक साथ देखे थे…

शाम के पांच बजे होंगे। एकाएक दो मोटरसाइकलें आकर रूकीं और उसमें से चार लोग उतरे। मैं रामायण पढ़ता रहा पर मन में आया कि ये लोग अचानक यहां कैसे आ धमके?

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मैंने सोचा, खतरनाक होने के लिए खतरनाक होना जरूरी नहीं होता

इस जगह आकर जेल जैसा लग रहा है, खुली जेल। याद आया आंदोलनों के दौरान जेल में बिताया गया वक्त। वहां भी ऐसा ही वातावरण और खाना मिलता था। वैसे तीन बार जेल गया हूं।

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उसने मेरे पैर छू कर कहा, बाबा, कहीं मत जाओ, तुम जैसे महात्मा की जरूरत है

जीवन में शायद पहली बार किसी से कुछ मांगा था। स्वयं को इस तरह सुनकर बहुत अच्छा लगा। दरअसल, इसका अर्थ हुआ कि मैंने अपने ‘दंभ’ पर पहली विजय प्राप्त की है।

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भोजन करने और भोजन पाने के बीच का अंतर भी समझ आने लगा

मैं जिस उद्देश्य के साथ निकला था, कि नर्मदा जी पहुंचना है, उसके अप्रतिम जल को ओर बढ़ा। धीरे-धीरे पानी तक पहुंचा। जल का स्पर्श किया। नर्मदा जी में थोड़ा अंदर गया, वहां आचमन किया। कुछ देर वहीं खड़ा रहा।

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अनजान द्वारा खुद को समझे जाने से जीवन मनोहारी हो गया

इस पूरी गाथा में कुछ भी उपदेशात्मक नहीं है। यह नैतिकता का पाठ भी नहीं पढ़ाती। यह एक ऐसी रचना है, जो सिखाती है, कि बिना किसी को दुखी किए कैसे अपना जीवन जिया जा सकता है।

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शब्दों के ऑर्केस्ट्रा में साइंस एक म्यूजिकल स्ट्रिंग

इस पुस्तक को पढ़कर महसूस होता है कि इंसानी भावनाओं और बातचीत का डायनामिक्स हमारी ज़िंदगी में बहुत कुछ मायने रखता है।

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मां की याद हरी है,पेड़ सूख गया है…

पहली बार जब उसको गले लगाया था तो उसकी और से मुझे उत्‍तर मिला था। लेकिन अब नहीं। पेड़ का शरीर तो खड़ा था लेकिन उसके प्राण निकल गए थे।

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जिन्‍हें सुन अभंग याद आता है, जोहार माय बाप,जोहार माय बाप

यह कहा जा सकता है कि सांगीतिक डोमेन में राग की छवि का रूपांतरण का कीमिया एक गणितीय प्रक्रिया है जो एक जटिल सिग्नल को उसके मूल आवृत्ति घटकों में विभाजित करता है।

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भेद मिटाता श्‍मशान! दोगले समाज की तस्‍वीर

काश कि मरघट में हिलौर मारने वाले श्‍मशान वैराग्‍य की तरह यह चिंतन भी तात्‍कालिक न हो, जरा अधिक देर हमारे भीतर उथल-पुथल मचाए। काश!

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पं‍. छन्‍नूलाल मिश्र: गुरु ने कहा था, भीतर-बाहर एक जैसा दिखना…

पंडित छन्नूलाल मिश्र ने जीवन के अंतिम पड़ाव तक न गुरु को विस्‍मृत किया न उनकी शिक्षाओं को। करीब 10 साल पहले कला समीक्षक-पत्रकार विनय उपाध्‍याय ने पंडित छन्‍नूलाल मिश्र से लंबी बात की थी। पुनर्पाठ में उसी साक्षात्‍कार के प्रमुख अंश:

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