न कड़वी निंबोली, न खजूर जैसी दूरी, फिर भी मिले नहीं सिन्नी जैसी खिन्नी

यह प्रकृति का आश्चर्य ही है कि विशाल वृक्ष में नीम की निबोली से दिखाई देने वाले छोटे पीले फल लगते हैं। दूर से देखने पर लगता है जैसे ‘बूंदी’ (एक मिठाई) बेची जा रही है। स्थानीय बोली में बूंदी को ‘सिन्नी’ भी कहते हैं। सो बेचने वाले ‘सिन्नी जैसी मीठी खिन्नी’ ले लो की आवाज लगाकर इसे बेचते हैं।

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बुद्ध: इशारा करने वाली ऊंगली को चांद न समझ लेना

बुद्ध ने खुद को आम इंसान से अलग किसी अनूठे और महान गुरु के रूप में स्थापित करने का प्रयास नहीं किया। दुःख का कारण ढूंढ कर उसे समाप्त करने वाले न ही वह पहले व्यक्ति हैं, और न ही अंतिम, इसे उन्होंने बार बार स्पष्ट किया।

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एक कप चाय? … हो जाए…

दाम के हिसाब से महंगी चाय दुनिया के किसी भी कोने में मिले, हमारे लिए तो सबसे खास, सबसे कीमती चाय वह है जिसे पीने के अरमान बने रहें और मौका मिलते ही हम कह उठें, चलो चाय पीते हैं।

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मैं क्यों लिखता हूं? शायद इसलिए कि…

जीवन में मुझे अपने भाई का स्थान देने वाली वह बहन, अस्पताल में पड़ा वह नौजवान, जिसके मन में मृत्युशय्या पर भी मेरी पुस्तक पढ़ने की याद जगती है; बस में मिलने वाला वह किसान, जिसे इस बात पर हँसी आ जाती है कि मैं इतनी अच्छी किताब, लिख कैसे लेता हूं, जिसे पढ़कर उसकी स्त्री और लड़की दोनों खुश हों तथा किराये की साइकिल की दुकान चलाने वाला वह गरीब लड़का, जो मुझसे इसलिए अपनी साइकिल का किराया नहीं लेना चाहता कि मैं उसका प्रिय लेखक हूं- क्या इन सबका यह असीम स्नेह; मेरी पुस्तक की पर्याप्त रायल्टी नहीं है?

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क्या महत्वाकांक्षा के बगैर जीना संभव है?

हमारे लिए महत्वाकांक्षा का मतलब है कि हम जिस भी स्थिति में है वह ठीक नहीं है और हमें उससे आगे की किसी स्थिति के लिए कोशिश करते रहना है। जीवन भले ही नरक हो जाए लेकिन हमें फैलते जाना है, आगे बढ़ते जाना है, नया से नया हासिल करते जाना है।

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मां… कुछ फिक्र अपनी भी कर लें

क्या मां की ममता, करुणा, त्याग का मोल मात्र एक दिवसीय शुभकामनाएं हो सकती हैं? क्या हमें साल में एक दिन के महिमा-मंडन से खुश-संतुष्ट हो सालभर उस यशगान की धुन गाते-गुनगुनाते अपनी सभी परेशानियां ताक पर रख देनी चाहिए?

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रिश्तों की सियासत में उलझा मां का दुलारा

मानव संबंध तो जटिल होते ही हैं पर जितनी जटिलता मां, बेटे और बहू के संबंध में अभिव्यक्त होती है, वह तो अद्भुत और असाधारण होती है! उसकी कोई तुलना ही नहीं!

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दाड़ी पगड़ी वाला कवि जो जादूगर समझा गया… सच में जादूगर था

पद्मश्री डॉ. सुरजीत पातर जिन्‍हें पंजाब के युग कवि पुकारा गया और जिन्‍हें शब्दों का समर्थ कवि की संज्ञा दी गई। उनकी कविताएं भले ही पंजाबी में लिखी गईं लेकिन उनमें सारे जहान की अनुभूति समाहित है और इसी कारण कविताएं अनुवाद के रूप में पंजाब, भारत का दायरा लांघ कर पूरे विश्व में पहुंची हैं।

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