एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-34

- विभूति झा, सामाजिक कार्यकर्ता
संपादन: चिन्मय मिश्र
यह अनिवार्य रूप से घटित हुआ भी एक साधारण दस्तावेज है। यह न तो कहानी है, न यात्रा वृतान्त। यह एक व्यक्ति की “लौटने” की गाथा है। विभूति दा की यह डायरी अबूझ सी सच्ची कहानी है। यह सत्य की अभिव्यक्ति है। –चिन्मय मिश्र
मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल जिले मंडला से निकलकर सागर विश्वविद्यालय से एमए और एलएलबी। फिर जेएनयू (नई दिल्ली) से समाज विज्ञान में शोधकार्य किया। भोपाल से वकालत शुरू की और भोपाल गैस त्रासदी मामले में गैस पीड़ितों के वकील बने। एक युवा वकील ने बड़े बड़े वकीलों की दलीलों को खारिज कर भोपाल गैस पीड़ितों को मुआवजा दिलवाने की लड़ाई जीती। जिला अदालत से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक पैरवी और फिर एक दिन अचानक पूरी प्रसिद्धि, अपने समृद्ध भविष्य की संभावना को पुराने वस्त्र की तरह उतार कर चल पड़े एक नए जीवन की खोज में। मन में विचारों का उफान और तन पर एक जोड़ी कपड़ों के साथ सबकुछ छोड़ दिया। परिवार भी। किसी फिल्म की पटकथा सा लगता यह इस डायरी के लेखक विभूति झा के जीवन की वास्तविकता है। एक ऐसा मंथन जो जीवन उद्देश्य खोजने की दिशा में बढ़ा और इस राह में उतने ही विविध अनुभव हुए। यह एक विस्तृत जीवन से साक्षात्कार है। किश्त-दर-किश्त रोचक होती जीवन दास्तां।
महेश जी ने सरपंच को अपने प्रभाव में ले लिया
मोहकाम सिंह के यहाँ खाना खाया और चाँद की रोशनी में वापस निकल पड़े। करीब साढ़े आठ बजा होगा। क़रीब आधा किलोमीटर है प्रताप का घर। एकदम सन्नाटा है रास्ते में। डरपोक जंगल सिंह और भूरू से बातें करते हुए पहुँच गए। दोनों को उनकी मोटरसाइकल पर जोबट रवाना किया। सरपंच के घर लाइट जलती देखकर महेश जी अंदर चले गए, मैं प्रताप के घर चला। दरवाजा अंदर से बंद नहीं है, दो बिस्तर ज़मीन पर बिछे हुए देखकर खुशी हुई। सब सो चुके हैं, डूंगर सिंह जाग रहा है। थोड़ी देर में सरपंच भाओ सिंह का छोटा बेटा मुझे भी बुलाने आ गया। अब तक महेश जी ने सरपंच को अपने प्रभाव में ले लिया था। मैं समझ गया कि मेरी अनुपस्थिति में पूरे समय धर्म की बातें की होंगी। सरपंच ने बड़ा स्वागत किया। 45-50 की उम्र का भला सा घरेलू व्यक्ति दिखा, नेतागीरी के लक्षण नहीं दिखे। महेश जी ने मेरा परिचय दिया और अब जो काम करना है, वह समझाते रहे। भाओ सिंह भाजपा का आदमी है और उस पर संघ का प्रभाव भी है। महेश जी से कहने लगा आप तो अपने आदमी हैं, जैसा चाहेंगे करेंगे, फिकर की कोई बात नहीं हैं। गाँव के लोगों को अभी जानकारी नहीं है इसलिए तरह-तरह की बातें करते होंगे; केक्टा तो शराबी है, बुरा आदमी है इसलिए उससे तो दूर ही रहना। दरयाव सिंह मिलिट्री में है, उसको समझा लेंगे; पूरा गाँव अपना ही परिवार है, जैसा मैं कहूँगा वैसे ही चलेंगे। आप लोग तो आराम से रहो, प्रताप का घर भी अपना ही है। कल से फिर व्यवस्था कर लेंगे।
सरपंच से मिलकर, उसकी बातें सुनकर बहुत हल्का लगा। यह भी लगा कि सीधा-सादा आदमी है, चालाक या धूर्त नहीं है। फिर समझनें में कोई गलती तो नहीं है? उसका उप सरपंच बाजार फलिया का कोई सेठ है। मैंने सोचा वही पंचायत चलाता होगा; भाओ सिंह तो अनपढ़ है। हाँ, इसका लड़का ज़रूर होशियार लगा। महेश जी ने सरपंच के बेटे शंकर को भी प्रभाव में ले लिया। बात-बात में पता चला कि उसका साढू महेश जी का चेला रहा है जब वह संघ में सक्रिय थे और तब महेश जी ने ही शायद उसकी नौकरी लगवाई थी। शंकर से फोन नंबर लेकर उसी समय उससे भी बात कर ली और शंकर की बात करवा दी। बड़े आश्वस्त होकर सरपंच के घर से निकले। मैंने कहा कि महेश जी, ऐसा लगता है कि आपकी बातों से ये लोग थोड़े धोखे में हैं। जल्दी से जल्दी स्पष्ट कर देना कि आप संघ में नहीं हैं।
रात अच्छी नींद आई। सुबह नदी की तरफ गए। नदी से लौटते हुए पास के घर के सारे लोग निकलकर देखने खड़े हो गए, जैसे कोई अजूबे जा रहे हों। एक घर के बाहर भीड़ लगी थी। हम वहीं चले गए। जमरा लोगों का घर है-मगन सिंह और देह सिंह, दोनों शराबी। कुछ समय पहले मगन शराब पीकर नदी पार करते हुए डूबकर मर गया। तब से कोई नदी में नहाने नहीं जाता। बाँध का पानी भी इसी साल भरा है। देह सिंह पल्लेदारी करता है और सुबह से पीना शुरू कर देता है। मगन का लड़का रमेश ड्राइवरी सीख रहा है। काली चाय पी, सबसे परिचय हुआ और चल दिए। ये घर थोड़ा अलग पड़ जाता है। अंदर के डुड़वे लोगों के घरों के बच्चे तो सब जानने लगे हैं। इस फलिये के भी तीन भाग हो सकते हैं-सरपंच भाओ सिंह और उसके आसपास के घर जो सब सरपंच के परिवार के हैं और उसके प्रभाव में हैं; दूसरा दरयाव सिंह के आसपास के घर जो उसके प्रभाव क्षेत्र में हैं, जिसमें केक्टा का घर भी शामिल है जिसका पिता डुडवों के यहाँ घरजमाई बनकर आया था; और तीसरा जमरा लोगों के चार घर जिसमें छगन मास्टर का घर शामिल है। इस समय दरयाव सिंह और छगन मास्टर के भाग के बच्चों पर भी शायद हमसे मिलने-जुलने पर पाबंदी लगा दी गई है। पहले दिन तो सारे बच्चे साथ थे।
सरपंच के बगल की गली से लौटते हुए महेश जी अजय के घर के सामने रुक गए। अजय कारीगर है और एक-दो बार मिल चुका है। दरवाज़े से आवाज लगाई तो अंदर से आवाज आई अजय नहीं है। हम रुके रहे। एक दुबला-पतला आदमी नहाकर निकला। अजय का पिता वेर सिंह 40 के करीब होगा, बहुत सीधा-साधा। सरपंच का चचेरा भाई। खाट बिछाकर हमें बैठाया, चाय बनाकर पिलाई। बातचीत करते रहे-अपने बारे में बताया और उसके बारे में भी पूछते रहे। अजय उसका बड़ा बेटा है, उससे छोटी बेटी हिमली है जो 11 वीं में पढ़ती है और छोटा बेटा सुर सिंह भोपाल में दसवीं पढ़ता है। पहले भाबरा पढ़ता था। आश्चर्य हुआ कि बेटा स्कूल में पढ़ने भोपाल गया-बताया कि वह अंधा है और अंध विद्यालय में पढ़ता है। पहले भाबरा पढ़ता था, लेकिन वहाँ जो शिक्षक था वह इसकी सारी छात्रवृत्ति की राशि रख लेता था और बकरा – मुर्गा भी बार-बार मँगवाता था। वह छात्रावास अधीक्षक भी था। उसकी शिकायत की तो बच्चे को छात्रावास से निकाल दिया, फिर किसी तरह कलेक्टर से मिलकर भोपाल में अंध विद्यालय में दाखिला कराया रेडक्रास के पास 1250 हॉस्पिटल के करीब। वेरसिंग ने बताया कि सुरसिंग के पास मोबाइल है। महेश जी ने नम्बर लेकर फोन लगाया और उससे बात की। बड़ा होशियार लड़का लगा और यह भी लगा कि उसमें बहुत आत्मविश्वास है। सुरसिंग बहुत खुश हो गया।
इसीलिए यहाँ प्रताप नाम बहुत प्रचलन में है
अब तक हमारे नहाने के लिए पानी भी गरम कर लिया था और खाना बनाना भी शुरू हो चुका था। कपड़े लेकर आए और यहीं नहाए। सुरसिंग जन्म से अंधा नहीं है, बीमारी में अंधा हो गया।
वेरसिंग का पिता भी साथ रहता है-जुगड़िया। क़रीब 75 साल का बेहद स्मार्ट बूढ़ा, बस उसे सुनाई नहीं देता। एक कान से बड़ी मुश्किल से थोड़ा-बहुत सुन पाता है। वेरसिंग ने उसे बताया कि हम लोगों ने सुरसिंग से बात की तो बूढ़ा बहुत खुश हो गया और हमारे लिए बड़ी आत्मीयता आ गई उसमें। बूढ़ा नहाकर पूजा-पाठकर कर रहा था तो महेश जी ने अपने कैमरे में उसकी फिल्म बना ली। महेश जी का कैमरा लगातार अपने करतब दिखा रहा है, बस कभी-कभी लगता है कि कहीं अति न हो जाए, खासकर तब जब घर की लाड़ी (बहू) का घूंघट खुलवाकर उसका फोटो लेने पर ज़ोर डालते हैं। केक्टा के यहाँ से रवानगी का शायद यह भी एक कारण हो सकता है? जो भी हो, जुगड़ा दादा बहुत खुश हो गया। फिर तो पुराने किस्से सुनाने लगा। आलीराजपुर के राजा प्रताप सिंह की महानता के किस्से जो ठिगना सा था लेकिन था बड़ा बहादुर और दयालु। शायद इसीलिए यहाँ प्रताप नाम बहुत प्रचलन में है। सबने साथ खाना खाया और वहीं खाटें डालकर आराम किया।
सोकर उठे और बाहर खुले में खाट डालकर बैठे गप्पें मारते रहे। कई लोग आते-जाते रहे। वेरसिंह और बच्चों से पूछ-पूछकर डुडवा परिवार की वंशावली बनाता रहा। पाँच पीढ़ी पहले ही एक व्यक्ति यहाँ आया था, अब ये लोग डेढ़ सौ हैं। वेर सिंह का बड़ा भाई भरेला बगल में रहता है। इनके पिता जुगड़ा और सरपंच भायो सिंह का पिता उग्रा सगे भाई थे, उसकी मृत्यु हो गई है लेकिन पत्नी जीवित है जो लगभग 80 वर्ष की पूर्णतः स्वस्थ महिला है। वह पूरे समय काम में लगी रहती हैं। बीच में इडला ड्राइवर की पत्नी आई थी लेकिन हम लोग सो रहे थे और हमें पता ही नहीं चला। मकान की बात करनी थी। शाम को वेर सिंह के साथ उसके खेतों में और नदी तक घूमने गए। खूब बेर खाई। वेर सिंह बड़ा भला व्यक्ति है। पीना छोड़ चुका है, बीमार होने के बाद मरते-मरते बचा, उसके बाद से। इस छोटे से गाँव में इतनी विविधता है कि हैरत होने लगती है।
शाम को सरपंच के यहाँ बैठक होनी है। सरपंच ने कहा कि सबको बुलाया है। आज रात खाने और सोने का कार्यक्रम भी सरपंच के घर पर ही है। बैठक में ज़्यादा लोग नहीं आए। बस सरपंच के प्रभाव क्षेत्र के लोग ही आए। सबको विस्तार से अपना काम समझाया। सरपंच ने सबसे सलाह मशविरा करके यह विचार रखा कि इडला ड्राइवर के घर रहने की व्यवस्था करेंगे और वह नहीं हुआ तो प्रताप के खेत में सड़क के किनारे टूटे हुए कमरे को सुधारेंगे। प्रताप ने तो दूसरे दिन सुबह ही मुझसे कहा था कि वह कमरा अपने रहने के लिए बना लो। प्रताप सच में साधू प्रकृति का व्यक्ति है। बैठक अच्छी रहीं।
सरपंच ने कहा है कि आज वह इडला से मकान के विषय में बात कर लेगा और चाबी ले लेगा। आज इतवार है इसलिए इडला घर पर होगा। वह ड्राइवर है, बड़ा ट्रॉलर चलाता है यहाँ के नगर सेठ धनराज का। इडला का परिवार बाज़ार फलिया में ही मकान लेकर रहता है, यहाँ का मकान खाली पड़ा है। कुल मिलाकर यह कि उसका परिवार अब नगरीय हो चुका है।
हम लोग कल रात की बैठक और निर्णय से उत्साहित होकर गाँव में घूमने और लोगों से मिलने-जुलने निकले। सबसे पहले वेर सिंह के भाई भरेला के घर गए। उसका बेटा सावन सिंह बी.ए. में पढ़ता है, फर्स्ट ईयर में हैं, यहाँ स्कूल तक सभी बच्चे एग्रीकल्चर भी पढ़ते हैं, लेकिन कॉलेज में यह विषय नहीं है। इसलिए ज़्यादातर समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र और हिन्दी साहित्य बी.ए. में पढ़ते हैं। सावन होशियार लड़का है। उसका छोटा भाई प्रदीप स्कूल में है और बहन की शादी हो चुकी है। भरेला के यहाँ दिन में भोजन करना निश्चित करके आगे निकल गए। केम्टा के घर गए जहाँ उसका छोटा बेटा मेहताब मिला। मेहताब धार में एमए फाइनल में पढ़ता है, हिन्दी साहित्य। बीच-बीच में यहाँ आता रहता है, इस फलिए का शायद सबसे ज़्यादा शिक्षित युवक, और भी लड़के उसके साथ बैठे हुए मिले। बड़ी अच्छी बातें करता रहा और हर तरह से सहयोग करने की बात कही। इस तरफ के गाँवो में शिक्षा को लेकर काफी जागरूकता दिखाई पड़ती है।
यह परिवार सरपंच विरोधी है और शायद इनका कांग्रेस की तरफ़ रुझान भी है। आपस में न बनने का मूल कारण वैसे आर्थिक ही है। मेहताब की दादी डुडवे परिवार की लड़की थी जिसका कोई भाई नहीं था। उसकी शादी देहलता में मंडलोई परिवार में की गई और उसका पति घर जमाई होकर रहा। पिता की मृत्यु के बाद उसकी सम्पत्ति के लिए घर जमाई ने दावा किया जो उसे मिल गई। इन लोगों में जबकि प्रचलन यह है कि बेटा न होने पर सम्पत्ति भाई के बेटे को मिलती है, जिसके अनुसार सरपंच भाओ सिंह और उसके चचेरे भाइयों का हक बनता था। आपसी वैमनस्य का मूल कारण यही है। ऊपर-ऊपर तो सब सामान्य दिखता है लेकिन अन्दर ही अन्दर दोनों तरफ से एक-दूसरे के लिए ईर्ष्या है।
गजब की अंधेरगर्दी
दरयाव सिंह के घर तरफ गए। उसके दोनों भाई राम सिंह और जाम सिंह अगल-बगल रहते हैं। दोनों अनपढ़ किसान हैं। दरयाव सिंह घर पर नहीं मिला, बताया कि खेत में है। हम उसके खेत चले गए, वह वहां पानी देते मिला। इस इलाके में बाँध बनने से पानी ही पानी हो गया है और सबकी फसल बहुत अच्छी है। वैसे काफी ज़मीन डूब में भी चली गई है। सबका कहना है कि मुआवजा बहुत कम मिला, लेकिन शायद किसी ने कोई कार्रवाई नहीं की और अगर की भी होगी तो किसी को पता नहीं। कल वेर सिंह को कहा था कि कागज दिखाना, लेकिन उसने अब तक नहीं दिखाए। आज सरपंच को भी कहा है। पता यह लगा है कि मुआवजे की जो भी राशि मिली वह किसानों ने बाज़ार में बड़े सेठ के पास जमा कर दी और जब जैसी ज़रूरत पड़ती है सेठ से पैसे लेते रहते हैं। बैंक में कोई पैसा जमा नहीं करता, सेठ की मेहरबानी है कि इनकी अमानत अपने पास सुरक्षित रखता है। सेठ कोई ब्याज दे इसका तो कोई प्रश्न ही नहीं उठता, उल्टे अपने पास पैसे सुरक्षित रखने के लिए कुछ निश्चित रकम इनसे ज़रूर लेता है। जैसे बैंक लॉकर का किराया हो। यह सब जानकारी अभी चलते-चलाते मिली है, कोई प्रामाणिक जानकारी नहीं है। यह निश्चित है कि पैसा बड़े सेठ के पास जमा किया है। यह भी केवल संयोग नहीं है कि पिछले कुछ सालों में ही बड़े सेठ के ट्रालर चलने लगे हैं और उनका कद और बढ़ गया है। इससे यह विसंगती भी समझ में आ रही है कि सेठ ऋण देने पर तो ब्याज लेता ही है। पैसा जमा रखने का शुल्क लेता है। गजब की अंधेरगर्दी और सरकारी बैंकिंग व्यवस्था की जबरदस्त नाकामी।
जीवन में पहली बार इतने विलक्षण शोषण से साबका पड़ रहा है। जितना इन लोगों के नजदीक जाना होता जा रहा है, उतने ही नए तथ्य सामने आते जा रहे हैं।
चंद्रकांत देवताले की पंक्तिया हैं:
यह वक्त-वक्त नहीं
एक मुकदमा है या तो गवाही दो
या हो जाओं गूंगें
हमेशा के लिए
मैं भी अपनी तरह से वाचाल होने की शुरूआती प्रक्रिया में ही तो हूँ। सबसे बोल भी रहा हूँ और उससे भी ज्यादा उनकी सुन रहा हूँ। खैर!
दरयाव सिंह से औपचारिक राम-राम हुई और वहीं खेत में खड़े-खड़े बातचीत होने लगी। महेश जी तो उससे पहली बार मिल रहे हैं। अभी भी थोड़ा उखड़ा-उखड़ा ही लग रहा है। पूछने लगा आप लोग चाहते क्या हैं? हमने उसे बताया कि यहीं रहकर वनवासियों में कानूनी अधिकारों के ज्ञान का प्रचार-प्रसार करना चाहते हैं। धीरे-धीरे सबको जोड़ना है। वह कहने लगा बहुत अच्छी बात है लेकिन इसके लिए न तो यहाँ रहने की ज़रूरत है न ही घर-घर जाने की। काम करना है तो बाज़ार फलिया में जाकर रहो, मंदिर में रहो, पंचायत भवन में रहो, यहाँ किसी के घर में कैसे रह सकते हो? वह काफी चिढ़कर बोला कि ये किसी और के घर में रहना, घर-घर घूम-घूमकर खाना और कभी किसी के घर में और फिर दूसरे घर में सोना ठीक नहीं है। हमारे घरों में हम ऐसे अनजान लोगों को घुसने नहीं देते। आपके रहने की व्यवस्था बाजार में कर सकते हैं, वहीं खाना पहुँचा देंगे, और जो भी पैसे—धेले की ज़रूरत होगी व्यवस्था कर देंगे लेकिन इस तरह अपने घरों में घुसकर खाने और रहने नहीं देंगे। ऐसा तो नहीं चलेगा, आपकी बातों का विश्वास नहीं कर सकते। पता नहीं कौन हो, क्यों आए हो? मेरे घर में फौज़ी का भेष बनाकर दो बार लोग आकर ठगकर ले गए। हम किसी का विश्वास नहीं करते। वगैरह-वगैरह…। वह काफी विचलित भी लग रहा था।
तभी महेश जी ने कहा कि हम दोनों का नाम, पता सब आपको बता रहे हैं। आप तो केंद्रीय पुलिस में रहे हैं, सब जाँच कर लो। वह और भी उग्रता से बोला। कहने लगा हमें कोई जाँच करने की ज़रूरत नहीं है। बस आप इस फलिया में नहीं रह सकते, ये तय है। यहाँ सब खाते-पीते हैं, नशे-पत्ते में किसी ने आपके साथ कुछ कर दिया, पीट दिया या जान से मार डाला तो किस की जवाबदारी होगी? आप तो कहीं और देखो, यहाँ आपकी कोई ज़रूरत नहीं है।
हमने कहा- रहेंगे तो यहीं, लोगों के बीच ही रहना है और गाँव के लोग ही मिलकर गाँव के अंदर जो जगह बतायेंगे, वहीं रहना है। हमें किसी से कोई डर नहीं हैं।
वह कहने लगा तो क्या जबर्दस्ती रहोगे?
महेश जी ने कहा, जबर्दस्ती क्या है इसमें, बस रहेंगे यहीं।
दरयाव बोला अभी भी सोच लो।
मैंने कहा सोच लिया है, तभी तो यहां आए हैं।
उसने कहा-ठीक है, अभी बाज़ार जाता हूँ, आप भी चलो।
हमने कहा आप हो आओ, हम तो यहीं हैं।
वह बोला-अच्छी बात है, अभी आपका… समाधान कर देता हूँ।
हमने कहा शाम को मिलेंगे और वहाँ से चल दिए। दरयाव सिंह का रुख बहुत आक्रामक था। उसने तो सीधे-सीधे धमकी ही दे डाली थी।
सैद्धान्तिक ज्ञान को व्यवहार में ढालने का अवसर
एप्लाइड एन्थ्रोपोलॉजी और एक्शन एन्थ्रोपोलॉजी में पढ़ा तो बहुत था ये सब। सिद्धांत तो सब पता ही थे, लेकिन ऐसी परिस्थिति का कभी इतने स्पष्ट रूप में सामना नहीं हुआ था। समझ में आ रहा था कि भारतीय ग्रामीण समाज अभी भी एक किले की तरह है जहाँ कुछ भी नया, अपरिचित, अनजान विचार, सुधार या व्यक्ति का प्रवेश अत्यंत दुष्कर होता है और उसके प्रति आशंका, भय और क्रोध से उत्पन्न विरोध इसकी एक स्वतःस्फूर्त और स्वाभाविक प्रतिक्रिया है। विरोध की प्रकृति और स्वरूप अलग-अलग हो सकते हैं-शाब्दिक से लेकर शारीरिक तक जिसके लिए हमें शारीरिक और मानसिक रूप से तैयार रहना चाहिए। इसी के समानांतर विरोध की प्रतिक्रिया में कोई ऐसा कदम नहीं उठना चाहिए जो विरोध को स्थाई बना दे। सम्भव है उस समय विरोध को दबाने में आप सक्षम हों, लेकिन यदि उसे बलपूर्वक दबाया गया तो वह अपनी जड़ जमा लेगा और आगे चलकर उचित समय पाकर अधिक शक्ति के साथ भड़केगा। मुझे समझ में आ गया कि सैद्धान्तिक ज्ञान को व्यवहार में ढालने का अवसर आ गया है। साथ ही मुझे विचलित हुए बिना, संयम बनाए रखते हुए, स्वाभाविक आचरण करना चाहिए और सिद्धांतों की बात न करते हुए समाज के एक-एक व्यक्ति को लेकर एक मनुष्य के रूप में अपने को स्वीकार्य बनाना चाहिए। यदि आप स्थानीय समुदाय को एक भले, सज्जन, हानिरहित व्यक्ति के रूप में स्वीकार्य लगे तो लोग धीरे-धीरे आपका बचाव भी करेंगे।
दरयाव सिंह से झड़प के बाद दोनों विचारमग्न खामोश चलते रहे। गांधी जी के अनुभवों के तो हम साक्षी नहीं रहे, लेकिन ‘एक्सपेरीमेंट विथ ट्रुथ (सत्य के प्रयोग)’ शायद यही है और यही है ‘सत्याग्रह!’ अपने नए जीवन के प्रवेश पूर्व यह पहला टकराव समझा रहा था कि मुझे अपने अंदर असीम धैर्य रखने की क्षमता विकसित करनी होगी। गांधी को अब सिद्धांतों में ही नहीं व्यवहार में भी लाना होगा।
प्रताप के घर से कपड़े उठाकर नदी की ओर चल दिए। नदी ही वह स्थान है, जहाँ अकेले में हम दोनों विचार-विमर्श कर पाते हैं और अपनी कार्य-योजना तैयार करते हैं। महेश जी बहुत अधिक उद्वेलित और चिंतित हैं। दरयाव सिंह ने उन्हें काफी विचलित कर दिया है। कहने लगे इसका कुछ इलाज करना पड़ेगा नहीं तो यह आदमी सब कुछ तहस-नहस कर देगा। महेश जी कहने लगे कि दीपक जी से कहकर एसपी से बात की जाए और दरयाव सिंह को पुलिस स्टेशन बुलाकर उसे समझाया जाए कि वह चुपचाप रहे। अगर दरयाव को अभी नहीं दबाया गया तो यहाँ टिकना मुश्किल है।
मैंने कहा, है तो स्थिति गंभीर लेकिन इस तरह की कार्रवाई का विपरीत परिणाम भी हो सकता है। वैसे भी मैं अपने इस काम में कोई बाहरी मदद लेना उचित नहीं समझता। प्रशासन की मदद से ही करना होता तो इस तरह से आने की आवश्यकता ही नहीं थी और न ही यहाँ आने का कोई औचित्य था। देखना तो यही है कि अपने आत्मबल, ज्ञान और कौशल से हम क्या कर सकते हैं। मैंने उन्हें समझाया कि वैसे इतना विचलित होने की ज़रूरत नहीं है। अकेला दरयाव क्या बिगाड़ लेगा, और लोग तो हमारा साथ देंगे। कुछ करने से पहले वह भी दस बार सोचेगा। वैसे आज हमारा यहाँ चौथा दिन है।
केंद्रीय ‘रिजर्व’ पुलिस का तात्पर्य
परिवर्तन का विरोध मानव का स्वभाव है। वैसे दरयाव सिंह ने जो कुछ कहा वह मेरे लिए तो न तो अनपेक्षित था और न ही अस्वाभाविक। जो कुछ वह सोच और बोल रहा है वह इस गाँव का निवासी दरयाव सिंह नहीं बल्कि बीस साल से केंद्रीय रिजर्व पुलिस का वीर जवान दरयाव सिंह है जो भारत के सुदूर पूर्वांत मणिपुर, मेघालय, नागालैंड में पदस्थ रहा है। उसकी शिक्षा-दीक्षा ही यह है कि हर व्यक्ति को संदेह की दृष्टि से देखो, समाज से दूर रहो, समाज मैं यथास्थिति बनाए रखो और उसमें जो भी बदलाव लाने का प्रयत्न करते दिखता है उसे समाज विरोधी समझो और कुचलने का प्रयत्न करो। केंद्रीय ‘रिजर्व’ पुलिस का तात्पर्य ही है सामाजिक बदलाव के हर प्रयत्न को कुचलने और दबाने के लिए ‘रिजर्व’। पैरा मिलिट्री फोर्सेस की आवश्यकता ही सत्ताधारियों को इसलिए पड़ी क्योंकि राज्यों की स्थानीय पुलिस, स्थानीय व्यक्तियों से ही बनती है जो किसी न किसी रूप में समाज से जुड़ी रहती है और एक हद तक समाज को समझती है। अपनी तमाम बुराइयों और कमजोरियों के बावजूद भी राज्य की स्थानीय पुलिस से कुछ सोच-समझ और सन्तुलित व्यवहार की अपेक्षा की जा सकती है जो कई बार देखने को भी मिलती है। यदि ऐसा नहीं होता तो सत्तर के दशक के आंदोलन में जयप्रकाश नारायण ने अपने उच्च अधिकारियों के समाज विरोधी अनुचित आदेशों का पालन न करने का पुलिस से आह्वान करने की बात भी नहीं सोची होती, जिसके बाद इमरजेंसी लगानी पड़ी थी।
महेश जी के विचार से पूर्णतः असहमति जताकर मैंने उन्हें चुप रहने पर बाध्य कर दिया, लेकिन दोनों ही विचारों में खोए रहे। बाँध बन जाने से नदी में बहुत गहरा पानी है। आजकल गेहूँ में सिंचाई के लिए नहरें और मोटरें निरंतर चलती हैं, जिससे पानी का स्तर रोज़ घटता है और काई लगे पत्थर निकलते जाते हैं। महेश जी शौच के लिए चले गए और मैं एक पत्थर पर कपड़े धोने लगा तो पत्थर ऐसा फिसला कि मैं धड़ाम से पानी में गिरा और पत्थरों की चोट से बचने के लिए कूदा। अगर तैरना न जानता तो डूब गया होता। बहुत गहरा और बेहद ठंडा पानी है। बचते-बचते भी हाथ की एक उँगली में, और पैर में घुटने के नीचे चोट लग ही गई और गड्डा होकर खून निकले लगा। मेरा तो स्नान हो गया। महेश जी आए और बेचारे मेरे भी कपड़े उन्होंने धो दिए
कलेक्टर को आभास है कि मैं ही आया हूँ
महेश जी के कपड़े धोते और नहाते समय मैं सोचता रहा, ‘एक्सपेरीमेंट’ और ‘एडवेंचर’ में अंतर है और दोनों के बीच संतुलन बनाए रखकर ही आगे बढ़ना अक्लमंदी है। ‘एडवेंचर’ के चलते मूल उद्देश्य की भी कभी-कभी हानि हो जाती है। आक्रामक तो नहीं लेकिन कुछ सुरक्षात्मक कदम तो उठा ही लेना चाहिए। दरयाव सिंह भी क्या करेगा, आखिरकार पुलिस के पास ही जाएगा। मैंने दीपक को फोन लगाया और कहा कि कलेक्टर को फोन करके बोलो कि वह जोबट के एसडीएम को बताए कि दो पढ़े-लिखे लोग सामाजिक कार्य के लिए खट्टाली गए हुए हैं जिसकी सूचना एसडीएम जोबट थाना और खट्टाली की पुलिस चौकी में दे दें। बस इससे आगे कुछ नहीं। दीपक तो आगे भी बहुत कुछ करने को आतुर हैं। उसकी तो शुरू से असहमति रही है इस तरह से आने को लेकर। मैंने कहा यहाँ सब कुछ सामान्य है। वैसे भी यदि कोई व्यक्ति स्थाई निवास की दृष्टि से किसी गाँव में जाता है तो इसकी जानकारी देना कानूनी आवश्यकता है। सिर्फ यह चाहता हूँ कि हम स्वयं जाकर जानकारी दें, इसकी बजाय जानकारी पहुँच जाए। पुराने समय से यह परंपरा रही है कि गाँव का कोटवार सम्बन्धित थाने या चौकी में गाँव आने वाले बाहरी व्यक्तियों की सूचना दर्ज कराता था, लेकिन अब यह व्यवस्था चरमरा गई है, जबकि कागजों में आज भी मौजूद है। थोड़ी देर में दीपक का फोन आया कि कलेक्टर से बात हो गई और उसे आभास है कि मैं ही आया हूँ। आजकल राजकुमार पाठक झाबुआ कलेक्टर है; जो भोपाल के ही हैं और माध्यमिक शिक्षा मंडल के सचिव थे जब मैं उनका वकील था। हो सकता है उन्हें मेरे बारे में पता भी हो। इधर महेश जी भी कुछ आश्वस्त हुए।
हम वापस भरेला के घर पहुँचे। उसके बेटे पढ़ने गए हुए हैं और पत्नी खेत में काम कर रही है। भरेला भी सीधा-सादा भला व्यक्ति है। उसने हमें खाना खिलाया और वहीं खाट बिछाकर थोड़ी देर आराम किया। भरेला के पिता जुगरिया आ गए और उनकी बातें सुनते रहे। वे ओंकार मान्धाता के बड़े भक्त हैं और बचपन से वहाँ जाते रहे हैं। झाबुआ जिले में ओंकारेश्वर और नर्मदा के प्रति बड़ी श्रद्धा है। लोग मन्नत माँगने ओंकारेश्वर जाते हैं और वहाँ से जल लेकर काँवड़ यात्रा पर जाते हैं। ओंकारेश्वर में नर्मदा और छोटीकावेरी दोनों ही हैं। जुगड़िया बाबा ने ओंकारेश्वर की जो कहानी सुनाई उसके अनुसार वहाँ पर गंगा और यमुना नदियाँ हैं जो सगी बहने है। और ओंकार बाबा उनका भाई है। दोनों बहनों में लड़ाई होने लगी कि इस रास्ते पर मैं ही चलूँगी, तब उनके भाई ओंकार बाबा ने बीच में पड़कर समझौता कराया कि लड़ो मत मैं बीच में खड़ा हो जाता हूँ, तुम दोनों मेरे आसपास से बहकर अलग-अलग दिशा में जाओ। तब से ओंकार बाबा पहाड़ बनकर वहीं खड़ा है और दोनों बहनें प्रेमपूर्वक बह रही हैं। मेरे मन में भाव उठा कि प्रकृति से एकाकार होना शायद यही है। प्रकृति में विद्यमान प्रत्येक वस्तु से मनुष्य की तरह व्यवहार करना। तभी तो यहां नर्मदा नदी नहीं “मोटली माई” है। सब कुछ उसी से तो प्राप्त होता है। नर्मदा यानी मोटली माई इनके घर की सदस्य ही है। इन पर जो गाथले (गायन) रचे गए हैं, वह बेहद आकर्षक हैं।
आराम करके उठे। भरेला की बेटी रामपुरा से अपनी बच्ची के साथ आ गई। उसका पति वहाँ पंचायत सचिव है, जिसे यहाँ मंत्री कहते हैं। बहुत बड़ा आदमी। हमारा डेरा अभी-भी प्रताप की परछी में स्थाई रूप से बना हुआ है। जमरा फलिया की तरफ निकल गए । शराबी जालम सिंह के घर के पास पहुँचे तो वह दिख गया- नशे में धुत्त। हमने कहा तुम्हारे घर चलेंगे तो संकोच करने लगा, फिर भी चले गए। काली चाय बनवाई और पी। उसकी पत्नी ने उसे नहीं दी कहा कि ये तो ठंडी चाय पीता है। ठंडी चाय यानी शराब। पत्नी का सहज हास्य बोध मजेदार है। जालम सिंह ने माँगकर चाय पी। वह 25-30 साल की उम्र का लड़का है। चौबीसों घंटे नशे में धुत्त रहता है। बाप नहीं है। माँ है, पत्नी है और छोटे बच्चे हैं और एक बहन भी है। पूरा परिवार दुःखी है। जालम सिंह की आँखें भर आईं। मुझे देखकर कहने लगा बाबा, मैं ठीक होना चाहता हूँ। मुझे ठीक कर दो। मुझे तुम पर भरोसा है। ऐसा ही महात्मा मैंने ओंकारेश्वर में देखा था लेकिन उनसे मिल नहीं पाया। हमारे घर कोई नहीं आता। सब मेरा मज़ाक उड़ाते हैं। उसे समझाकर हम बाहर निकले। बाबागिरी का साथ लगातार मेरा पीछा कर रहा है।
क्रमशः…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा की सभी कड़ियां यहाँ देखेंः
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-1: अनजान द्वारा खुद को समझे जाने से जीवन मनोहारी हो गया
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-2: भोजन करने और भोजन पाने के बीच का अंतर भी समझ आने लगा
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-3: उसने मेरे पैर छू कर कहा, बाबा, कहीं मत जाओ…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-4: मैंने सोचा, खतरनाक होने के लिए खतरनाक होना जरूरी नहीं होता
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-5: वाह, पचास रुपए? बड़े दिनों बाद इतने रुपए एक साथ देखे थे…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-6: जीवन में पहली बार रोजदारी की थी, वह भी भक्ति की!
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-7: भोपाल करीब आने लगा तो मैं ट्रेन में ऊपर चढ़कर बैठ गया…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-8: दोनों घूम-घूम कर पार्टी का प्रचार कर रहे हैं, सावधान रहना
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-9: नक्सलवाद के एक काल्पनिक बिजूके को प्रतीक बनाया गया
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-10: मैंने अपना पूरा नाम बताया तो वे एकदम उछल पड़े…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-11: कथा वाचक की नई भूमिका, मुझे अंदर से हँसी आ रही थी…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-12: वृंदावन की कुंज गली में बदल गया मेरा नजरिया
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-13: ब्रज जा कर जाना, श्रद्धा से किस तरह आनंदित रहा जा सकता है
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-14: मैं बाबा नहीं बन पाया…मैं हार गया!
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-15: अहसास हुआ कि लोग सफर को मंजिल से बेहतर क्यों बताते हैं…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-16: मैं संघ का भेदिया हूं, वकील तो ऐसे होते नहीं हैं…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-17: घर बनते जाते हैं, जमीन बंटती चली जाती है लेकिन रहते सब साथ-साथ हैं
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-18: सौ दिन पूरे… लगता है घर से बहुत दूर न जाकर गलती कर दी
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-19: मैं सन् उन्नीस सौ बावन में सातवीं फेल हुआ हूं…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-20: संभवतः किसी को उम्मीद नहीं होगी कि मैं इस तरह फट पडूंगा…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-21: दहेज का दबाव न हो तो हर मर्द चार-पांच ब्याह कर लेगा
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-22: पूरे पच्चीस साल बाद पैदल अपने गांव भंवरताल जा रहा हूं…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-23: अपने गांव भंवरताल में हूं; एक वो दिवाली थी, एक ये दिवाली है, एकदम अलग
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-24: खबर फैल गई कि मैं ‘बैरागी’ हूं, इनाम नहीं मिलेगा
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 25ः भंवरताल में आखिरी रात है, पता नहीं कब आना होगा…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 26ः वकालत छोड़ी, फिर अपनाई, मैं उलझता चला जा रहा था…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 27: उस दिन मैं अचानक छोटा-मोटा ‘महामानव’ बन गया… मगर
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 28ः चोम सिंह ने समझा दिया, 21 वीं सदी में अपनी शर्तों पर जिया जा सकता है
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 29ः आज ऑफिस में लगेगा ताला, नाम पट्टिका हट जाएगी
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 30ः उन जगहों पर लाैटना जहां कभी मन बैरागी बन कर गया था…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 31ः स्वामी अवधेशानंद बाेले, विभूति जी आप अवश्य आइए, मुझे प्रतीक्षा रहेगी
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 32ः नाते-रिश्तेदार ‘माता-पूजन’ कर मनाते हैं ईंद, हैं न अनाेखी बात
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 33: बुढ़े ने रहने बुला लिया, हम सामान लिए चले आए, रात में बोला, घर से निकलो

