एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-35

- विभूति झा, सामाजिक कार्यकर्ता
संपादन: चिन्मय मिश्र
यह अनिवार्य रूप से घटित हुआ भी एक साधारण दस्तावेज है। यह न तो कहानी है, न यात्रा वृतान्त। यह एक व्यक्ति की “लौटने” की गाथा है। विभूति दा की यह डायरी अबूझ सी सच्ची कहानी है। यह सत्य की अभिव्यक्ति है। –चिन्मय मिश्र
मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल जिले मंडला से निकलकर सागर विश्वविद्यालय से एमए और एलएलबी। फिर जेएनयू (नई दिल्ली) से समाज विज्ञान में शोधकार्य किया। भोपाल से वकालत शुरू की और भोपाल गैस त्रासदी मामले में गैस पीड़ितों के वकील बने। एक युवा वकील ने बड़े बड़े वकीलों की दलीलों को खारिज कर भोपाल गैस पीड़ितों को मुआवजा दिलवाने की लड़ाई जीती। जिला अदालत से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक पैरवी और फिर एक दिन अचानक पूरी प्रसिद्धि, अपने समृद्ध भविष्य की संभावना को पुराने वस्त्र की तरह उतार कर चल पड़े एक नए जीवन की खोज में। मन में विचारों का उफान और तन पर एक जोड़ी कपड़ों के साथ सबकुछ छोड़ दिया। परिवार भी। किसी फिल्म की पटकथा सा लगता यह इस डायरी के लेखक विभूति झा के जीवन की वास्तविकता है। एक ऐसा मंथन जो जीवन उद्देश्य खोजने की दिशा में बढ़ा और इस राह में उतने ही विविध अनुभव हुए। यह एक विस्तृत जीवन से साक्षात्कार है। किश्त-दर-किश्त रोचक होती जीवन दास्तां।
मैं धीरे-धीरे पूरे गाँव से अपना सम्बन्ध बना लेना चाहता हूँ
अगले दिन सुबह बहुत जल्दी नींद खुल गई। एकदम अंधेरा है। हाँ, चाँद की रोशनी है थोड़ी। महेश जी गहरी नींद में सो रहे हैं। मैं अकेले ही नदी की ओर चल पड़ा। नदी करीब आधा किलोमीटर दूरी पर है। ठंड अच्छी-खासी है। इसी बीच महेश जी आ गए। लौटे तो देखा कि सरपंच खेत में हल चला रहा था। कहने लगा चलो दूसरे फलिए भी देखकर आते हैं। मुझे ध्यान में आया कि इडला तो आया नहीं और न ही कोई जवाब दिया, इसका मतलब है कि अपना घर नहीं देना चाहता। सरपंच के साथ घूमते हुए जमरा फलिया गए। वहाँ एक-दो घर देखे। थोड़ी देर बैठे। मोहकाम भी मिला, बोला कब आओगे। उससे बोला कि रात में तुम्हारे यहाँ खाएंगे और सोएंगे भी। फिर डावरिया फलिया गए वहाँ एक स्कूल भवन है वह भी देखा। गुल सिंह डाबर के घर गए। वह एक सम्पन्न किसान है। काफी बुजुर्ग भी है। सरपंच के बड़े आत्मीय लगे। इनका बड़ा बेटा राजमल डाबर ने इंदौर से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है। अब पोलिटेक्निक कॉलेज़, झाबुआ में पढ़ाता है और परिवार सहित वहीं रहता है। कहीं कोई जगह जमी नहीं। लौटते हुए सरपंच ने कहा कि अब प्रताप के खेत वाला कमरा ही ठीक-ठाक करके 2-3 दिन में रहने लायक बना देंगे। आज भारत से बात करके शाम को या कल सुबह से काम लगा देंगे। हम बड़े खुश हुए।
ग्राम पंचायत और दूसरे काम निबटाकर सरपंच लौटकर आया। सरपंच ने बताया कि भारत सिंह से भी बात हो गई है और प्रताप के खेत में कमरा ठीक हो जाएगा। पंचायत का काम कुएँ बाँधने का चल रहा है, वहीं से कारीगर और मज़दूर आ जाएंगे। उप सरपंच प्रहलाद लड्डा से बात हुई है, उसने कहा है कि फोन पर बात करा देना कौन लोग हैं; फिर कल सुबह से काम शुरू हो जाएगा। अब महसूस हो रहा था कि बात कुछ आगे और सकारात्मक हो रही है।
सरपंच भाओ सिंह ताड़ी के ऊँचे पेड़ पर सरपट चढ़ गया। ऊपर पहुँचकर मटके में से वहीं लटके-लटके थोड़ी-सी ताड़ी पी और उतनी ही फुर्ती से नीचे आ गया। महेश जी ने पूरी फिल्म बना ली और भाओ सिंह को दिखाई। उसे मज़ा आ गया। लगभग 50 साल का आदमी जिस तेज़ी से चढ़ा और उतरा वह देखने लायक था। सरपंच में नेतागीरी के लक्षण बिलकुल नहीं हैं, वह अभी आम आदमी ही बना हुआ है। सरपंच भाओ सिंह पूरी तरह से हमारे प्रति समर्पित लग रहा है। महेश जी ने उसे बताया कि संघ से पिछले तीन साल से उनका कोई सम्बन्ध नहीं है। अलग ही काम करते हैं। यह भी बताया कि मुझे जो काम करना है वह शिव गंगा से अलग है।
मैं धीरे-धीरे पूरे गाँव से अपना सम्बन्ध बना लेना चाहता हूँ। इसी के चलते मोहकाम सिंह के यहाँ जमरा फलिया गए। खाना खाया और सोए। रात भर पड़ोस में लोग शराब पीकर लड़ते रहे। ऐसा लगे कि मार ही डालेंगे। रात भर के शोर-शराबे में ठीक से नींद नहीं आई। मवेशियों और बकरियों के एकदम बगल में थी मेरी खाट। एक बकरी बार-बार खाट के नीचे घुसकर उचका देती और कोई गाय या बैल पेशाब करता तो ऐसा लगता कि ऊपर कहीं से पानी गिर रहा है। वैसे भी खाट पर सोने से बचता हूँ, लेकिन इस घर की भूमि समतल नहीं है और गड्ढे बहुत हैं, इसलिए खाट पर ही सोना पड़ा। हर रात एक नया अनुभव लेकर आती है। मोहकाम सिंह बहुत सीधा-सादा व्यक्ति है। मोहकाम की बहन काफी तेज है। इनका घर शायद शराबियों का भी अड्डा है। रात में जालम सिंह भी आया था और मगन सिंह, जो पूर्व सरपंच दयाबाई का बेटा है। सुबह उसके घर जाना तय किया है।
अगली सुबह मोहकाम सिंह के बड़े लड़के मुन्ना को साथ लेकर दयाबाई के घर की ओर चले। मुन्ना स्कूल में नहीं पढ़ता लेकिन है बड़ा होशियार 12-13 साल का लड़का है। रास्ते भर सब कुछ बताता रहा। उसे गाँव की, खेती की, लोगों की बहुत जानकारी है। दयाबाई के घर के रास्ते में मस्जिद की ज़मीन है और एक मुस्लिम परिवार मज़ीद भाई की भी ज़मीन है, जिसने टेकरी पर दो कमरे बना रखे हैं। यह भी बड़ी अच्छी जगह है रहने के लिए। और ऊपर जाकर एक आलीशान भवन बना हुआ दिखा-गाँव के हिसाब से पक्का आलीशान भवन। तो असल सरपंची रुतबे इनके हैं। दयाबाई भवन लिखा है इस पर। यह कांग्रेस की पुरानी कार्यकर्त्ता है जो भाओ सिंह से पहले सरपंच थीं। बरामदे में बैठाया। अंदर से शुद्ध दूध से बनी चाय आई।
वाह, अंदाज़ देख कर लगा कि सही शासक यही है
थोड़ी देर में बुलाने पर दयाबाई आई। हम लोग उन्हें अपने आने का मकसद बताते रहे। इस पर वह कहने लगी यहाँ तो कोई समस्या नहीं है, लोगों को सब जानकारी है। बस, शराब पीने की ही कमजोरी है। आप लोग रहना चाहो तो मंदिर में रख सकते हैं और नहीं तो बाजार में सेठ लोगों से बात करके चंदा करके टेकरी में भी घर बना सकते हैं। यहां सब मेरी बात मानते हैं, सेठ लोग से बात करके ही व्यवस्था करनी होगी। भाऊ सिंह तो अभी नया है, उसे कोई नहीं जानता। वैसे है तो हमारे परिवार का ही परंतु मुझे ही सब जानते हैं। यही सब बात करते-करते दयाबाई अचानक उठ खड़ी हुई – “ठीक है, आपकी बात पर विचार करेंगे।” और उठकर अंदर चली गई। हम लोग बैठे-बैठे देखते रह गए। वाह, क्या अंदाज़ है, सही शासक यही है। अभी सत्ता में नहीं है, फिर भी अंदाज़ सत्ताधारी का। शासक वाला अहंकार कांग्रेसियों में ही है। एकदम नया अनुभव भी हुआ। मजा भी आया। इसके बाद हम लोग उठकर चल दिए। मुन्ना के साथ टेकरी पर बने हनुमान मंदिर चल दिए। वहाँ पोस्टमेन मिला मंदिर में झाडू लगाते। कहने लगा यहाँ के वनवासियों की तो किस्मत जग गई बाँध बनने से, पहले भूखे मरते थे। कितना विषाद था उसकी आवाज़ में! कितना दुःखी! लौटते हुए देखा तो दया बाई भैंस चराते हुए मिली। कहने लगी चने ले जाओ, होले भुनवा लेना। हमने कहा-फिर आकर खाएंगे। इन वनवासियों की यही खास बात है कि आर्थिक स्थिति कैसी भी हो, अपना सारा काम शान के साथ खुद करते हैं।
अभी तक कमरे का काम शुरू नहीं हुआ। सरपंच के घर पहुँचे तो पता चला कि वह बाज़ार के लिए निकल चुका था। लगा कि आज भी अब काम शुरू नहीं हुआ, तो कुछ गड़बड़ ही है। शायद सेठ लोग मना कर रहे होंगे, इसीलिए बात करने को कहा था। सरपंच बेचारा अपने-आप तो उनकी मर्जी के खिलाफ कुछ कर नहीं सकता।
मैं भी इधर रोज नए घर में खाना खा रहा हूँ। इस गाँव में बसने के लिए शायद यही सबसे बेहतर रास्ता है। नरसिंह और उसकी पत्नी दोनों ही बड़े समझदार हैं। भला आदमी है, काम से काम रखता है। गरीब ही है। बच्चे सब स्कूल से आ गए। सब पढ़ते हैं और होशियार हैं। थोड़ी देर हम वहीं खटिया पर लेटे। महेश जी आजकल समय मिलने पर ‘गॉड फादर’ उपन्यास पढ़ते हैं, हिन्दी में। आजकल इस तरह की सामान्य किताबें पढ़ते रहते हैं, जो संघ के ज़माने में सोच भी नहीं सकते थे। इसी बीच और भी बच्चे इकट्ठे हो गए। उनके साथ मैं उनके स्कूल की किताबें पढ़ता रहा, बातें करता रहा और हम सब हँसते रहे। बहुत अच्छा समय बीता।
प्रताप और सरदार सिंह सगे भाई हैं। और नरसिंह उनका सौतेला भाई और साथ ही चचेरा भाई भी। उनकी माँ एक है लेकिन प्रताप के जन्म के बाद उसके पिता की मृत्यु हो गई और चाची की भी कुछ समय बाद मृत्यु हो गई तो चाचा ने उनकी माँ को रख लिया जिनकी सन्तान नरसिंह है। यह इन लोगों में सामान्य प्रचलन है जिससे सम्पत्ति कुटुम्ब के बाहर न जाए और कोई बाहरी व्यक्ति परिवार में प्रवेश न करे। नरसिंह के घर से लगा हुआ ही सरदार सिंह का घर है जिसके बेटे थानसिंह और राजू हैं। नरसिंह के घर से निकलते हुए उनके घर में रात का खाना तय हो गया।
कुछ मिनट पहले तो स्थिति अलग थी और अब एकदम से अनुकूल
भाओ सिंह के घर आए। चाय बनवाई। इतने में ही वह भी बाज़ार से आया। हमने कहा काम आज भी चालू नहीं हुआ और सुबह भेंट भी नहीं हो पाई। कहने लगा सुबह इंतजार किया फिर पता चला कि आप लोग पूर्व सरपंच दयाबाई के यहाँ बैठे चाय पी रहे हो तो मैं बाजार निकल गया। लगता है दयाबाई के यहाँ जाना इसे अच्छा नहीं लगा। इस गाँव में सारी बात एकदम फैलती है। हमने सफाई देने के अंदाज में कहा कि रात उसका लड़का मोहकाम सिंह के यहाँ मिल गया था और सुबह चाय के लिए बुलाया था इसलिए चले गए थे, लगता है बहुत पैसा बनाया है। भाओ सिंह कहने लगा वह अच्छी औरत नहीं है। उसने अपने पति के भाइयों की सारी ज़मीन हड़प ली है। सेठों के साथ भी धोखाधड़ी की है। हम भी हाँ−हाँ करते रहे। फिर वह पूछने लगा कि दरयाव सिंह से आपकी गरमा-गरमी हो गई थी, क्या बोल रहा था?
हमने कहा− हमने तो किसी को नहीं बताया, तुम्हें कैसे पता लगा?
भाओ सिंह बोला− बाजार में बोहरा सेठ को दरयाव ने बताया कि यह दोनों बड़े कट्टर लोग हैं कहते हैं हम तो ज़बर्दस्ती गाँव में रहेंगे।
हम लोग हँसने लगे। कहा ऐसा तो नहीं बोला लेकिन मतलब यही था।
बोला− अभी समझता नहीं है, इडला को भी उसी ने भड़काया है, नहीं तो मकान देता। उपसरपंच से बात हो गई है, बोला तुम्हें जैसा ठीक लगे करो। अभी 31 मार्च तक काम का बहुत दबाव है, पंचायत के मजदूर कारीगर नहीं मिलेंगे। खुद ही बनाना पड़ेगा। कुछ करते हैं।
हमने कहा− एक-एक दिन करके समय निकलता जा रहा है। ज़्यादा दिन इस तरह से पड़े रहना अच्छा नहीं लगता।
हमें चाय पीता छोड़कर सरपंच बाहर चला गया। थोड़ी देर में अंदर आया और कुदाल उठाकर जाने लगा।
मैंने पूछा− कहाँ चल दिए?
बोला काम पर जा रहा हूँ।
मैंने कहा- कहाँ खेत पर?
बोला नहीं, कमरा बनाने का काम निबटा ही देते हैं।
हमने कहा क्या?
हम हतप्रभ से रह गए। एकाएक कुछ समझ में नहीं आया। कुछ मिनट पहले तो स्थिति अलग थी और अब एकदम से अनुकूल? आदिवासी समाज की निर्णय क्षमता की व्यापकता और त्वरितता भी समझ में आ रही थी। किसी अनजान परिस्थिति का सामना करने की मानसिक तैयारी के मद्देनजर हम भी उसके साथ हो लिए। सरपंच भाओ सिंह ने अपने हाथ से टूटी हुई दीवार की ईंटें निकालनी शुरू कर दीं। धीरे-धीरे और लोग भी इकट्ठे हो गए-प्रताप और उसका परिवार, भाओ सिंह के लड़के-लड़कियाँ, वेर सिंह और बहुत से बच्चे। प्रताप के चेहरे पर बेहद खुशी दिखी। कहने लगा मैंने तो शुरू में ही कहा था कि यहाँ रहो। मुझे तो लगा कि खुशी से आँसू ही निकलने लगे, गला रुंध गया। महेश जी का कैमरा चालू हो गया। हम सभी काम में लग गए। थोड़ी देर में मिट्टी में पानी मिलाकर गारा बनाया और सरपंच ने दीवार की चिनाई भी शुरू कर दी। बड़े उत्सव जैसा माहौल बन गया। सब लोग बेहद खुश। शाम 5 बजे काम शुरू हुआ था, एकदम अंधेरा होने तक चला। थोड़ी सी दीवार चिन ही ली गई। अब कल काम लगायेंगे और बस दो-तीन दिन में रहने लायक हो जाएगा।
इतने कम समय में इतनी बड़ी सफलता! सहसा विश्वास नहीं हो रहा है। इतिहास की बहुत बड़ी घटना होगी यह। मुझे ध्यान नहीं आता कि किसी ने आज तक धर्म का नाम लिए बिना अनजाने व्यक्ति के रूप में जाकर ऐसी सफलता पाई हो। ऐसे किसी व्यक्ति के लिए गाँव के लोग खुद जगह दें और खुद निर्माण कार्य में लग जाएँ, यह तो एक अचम्भा ही है। बनाने का काम भी कर रहा है सरपंच खुद अपने हाथों से। मैं सचमुच भाव-विभोर हो गया और अपनी खुशी बाँटने के लिए पहली बार रात के समय भोपाल फोन किया।
धार ,झाबुआ व आलीराजपुर के आदिवासी में एक बेहद अनूठी, और विस्यमकारी संवेदनशील और सामुहिकता को समारोहित करने वाली परंपरा अभी भी कई जगहों पर प्रचलन है। इसे स्थानी भाषा में ढास बुलाना कहते हैं। (महाराष्ट्र में यह लाह बुलाना कहलाती है।) इस प्रथा में सभी ग्रामवासी किसी के मकान के निर्माण या खेतो में बुलाने पर जाते हैं और उसके यहां नि:शुल्क शारीरिक श्रम से उस कार्य को पूरा करते हैं। कुछ वर्षों पूर्व तक तो इस क्षेत्र में निर्माण एवं खेती में मजदूरी की परंपरा ही नहीं थी। इतना ही नहीं बदले में ढास बुलाने वाला भोजन करा दे तो भी ए लोग उसके प्रति कृतज्ञ रहते हैं। दुनिया में बहुत कम समुदायों में अब यह परंपरा बची है। जब कोई स्थानीय व्यक्ति ढास हेतु जा रहा होता है, और कोई उससे पूछता है कि कहां जा रहे तो वह जवाब देता है ढासिया जा रहें हैं। सचमुच एक विलक्ष्ण परंपरा। हम भी अब ढासिया पर जा रहे हैं।
सब लोग सरपंच के यहाँ बैठकर बातों में लग गए और आगे की योजना बनाने लगे। इसी समय एक मोटरसाइकल पर बाजार से तीन लोग आ गए-अनिल माहेश्वरी और दो लोग और। अनिल माहेश्वरी तो वही जिसकी दुकान पर चाय पी थी, जब पहली बार आए थे। शिकायत करता रहा कि फिर नहीं आए वह तो बहुत खुश लगा। उसके साथ एक राठौर संविदा शिक्षक जिसने बड़े उत्साह से अपने को संघ का पुराना कार्यकर्त्ता बताया और एक विद्यार्थी जो संघ का काम करता है, थोड़ी देर बातचीत करते रहे। महेश जी ने स्पष्ट किया कि अब वे संघ के साथ नहीं हैं और शिव गंगा अलग से काम करता है। यह भी बताया कि मेरा तो कभी भी संघ से किसी तरह का कोई सम्बन्ध नहीं रहा है और यह काम तो शिवगंगा से भी अलग है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया वे तो सिर्फ सहयोगी बनकर कुछ समय के लिए आए हैं। थोड़ी देर बैठे, सबने चाय पी और तीनों चले गए। अनिल माहेश्वरी बार-बार आने का आग्रह करते गया लेकिन बाकी दोनों का उत्साह थोड़ा कम हुआ सा लगा। रात में देर बहुत हो गई। भारत ने राजू के घर देखकर बताया कि वहाँ सब सो गए। सरपंच ने कहा अब आज यहीं खाओ और यहीं सोओ। हमने भी कहा ठीक है, आज तो जश्न का माहौल है सरपंच के यहाँ सभी बहुत खुश हैं। लड़कियों और बहू ने मिलकर जल्दी-जल्दी खाना तैयार किया।
हम दोनों सुबह बहुत जल्दी उठ गए। नदी गए, टहलते रहे। लौटते हुए महेश जी ने कहा वे राजू के घर होकर आते हैं क्योंकि रात में नहीं जा पाए थे। मैं प्रताप के यहाँ चला गया। लोगों से लगातार संपर्क करने और उनके घर जाने का सकारात्मक प्रभाव पड़ता दिखाई दे रहा है। चाय पी और बातचीत करता रहा। कल कमरे का काम शुरू होने के बाद से माहौल बहुत अच्छा है। डूंगर सिंह अब मुझसे बहुत बात करता है। काफी गम्भीर और समझदार लड़का है। महेश जी से बल्कि थोड़ा कन्नी काटता है। आज मीरा ने भी “गुरुजी प्रणाम” कहकर अभिवादन किया, भारत सिंह ही अभी भी थोड़ा खिंचा-खिंचा दिखता है। प्रताप तो बहुत खुश है।
इस बीच राजू के घर होकर महेश जी दरियाव सिंह के घर चले गए। आज वह अच्छे से मिला। दरियाव सिंह कहने लगा-अब इडला के घर आपके रहने की व्यवस्था कर देते हैं। इसी समय थानसिंह वहाँ आया और बताया कि कमरे का काम तो शुरू हो गया, तब दरयाव ने कहा ये तो अच्छा हुआ, अब पूरा हो जाए तो नदी के किनारे पार्टी करेंगे। मैंने मन ही मन सोचा वाह, ये तो कमाल ही हो गया। अब तो अंतिम अवरोध भी दूर हो गया। एक भीली कहावत है, “भाग बिना भोजन के करम बिना सगा नी मिले।” यानी भाग्य बिना भोजन और कर्म बिना सम्बन्धी नहीं मिलते हैं। जाहिर है मेरा भाग्य साथ दे रहा था, तभी तो इस अन्जानी जगह कभी भूखा नहीं सोया और अपनी धुन में काम करता रहा हूँ, तो दरयाव सिंह सरीखा विरोधी सगे जैसा मिल रहा है।
आज चन्द्रशेखर आज़ाद जयंती है। भाबरा उनकी जन्मस्थली होने से झाबुआ जिले में इसका काफी महत्व है। सरपंच भाओ सिंह भी कार्यक्रम में भाग लेने भाबरा गया है। आज कमरे का काम नहीं लगा। अब तो सरपंच के आने पर ही लगेगा। सरदार सिंह के यहाँ भोजन किया और थोड़ी देर आराम किया। दोपहर में नदी चले गए। हमारे पीछे-पीछे बहुत सारे छोटे बच्चे भी नदी पर आ गए। यहां 10-12 साल के सभी बच्चे तैरना जानते हैं। आज से उनका नदी में नहाना शुरू। जितनी देर कपड़े सूखे उतनी देर बच्चों को कबड्डी खिलाता रहा। खूब मज़ा आया। यहां बच्चे तो सब हमारे दोस्त बन गए हैं।
नदी से वापस लौटकर कपड़े प्रताप के यहाँ अपने डेरे में रखे और फिर सरपंच के घर गए। वह अभी लौटा नहीं है। सरपंच के घर में बड़े भारी बर्तन में महुए की शराब बन रही है। उसकी पत्नी और दोनों छोटे लड़के राजेश और बृजेश इसी काम में लगे हुए हैं। ये दोनों लड़के ही घर का और खेत का बहुत सारा काम संभालते हैं। बड़े होशियार और सभ्य बच्चे हैं। पढ़ाई में मन नहीं लगता। वैसे भी इन सारे कामों से उन्हें समय कहाँ मिलता होगा। हमने पूछा तो सरपंच की पत्नी और माँ ने बताया कि शराब बेचते नहीं मेहमान के लिए बनाते हैं, पीते भी नहीं।
चाय बनवाई और बैठकर बातें करते रहे। इतने में सरपंच भी आ गया-थका-हारा, चिंतित सा दिखा। हमने कहा, कमरे का काम आज नहीं हुआ तो कहा बहुत सारे कामों का बोझ आ गया है, टाइम ही नहीं मिलता। 31 मार्च तक काम का दबाव है। सरपंच बैठा नहीं, खेत पर चला गया। महेश जी ने पूछा वहाँ कार्यक्रम में सब एमएलए, नेता लोग मिले होंगे, सरपंच ने बताया तो पर बात नहीं हुई। सरपंच कुछ उखड़ा-उखड़ा-सा लगा। उसका विचलित होना मुझे भी थोड़ा परेशान तो कर रहा है। परंतु परिस्थिति का सामना करना ही पड़ेगा।
रात प्रताप के यहाँ खाने का पहले ही बोल दिया था। आज बुधवार को खट्टाली में बाजार है। पूरा गाँव शराब में डूबा हुआ है। सरपंच के यहाँ महफिल जमी है, बस प्रताप का घर ही शांत है। रात अच्छी नींद आई प्रताप के घर । सुबह दोनों नदी गए। लौटते हुए जमरा फलिया के कलम सिंह के यहाँ चले गए। सड़क के किनारे ही घर है। उसका बूढ़ा पिता बाहर आग जलाकर तापते हुए मिला। अकेला बेटा और उसके छोटे-छोटे बच्चे हैं, पिता बूढ़ा है इसलिए पूरा काम संभाले हुए है। अच्छी खेती है, सम्पन्न किसान है। दूसरे की ज़मीन भी अधिया हिस्से में जोतते हैं। इनके पास पानी की व्यवस्था है। ज़मीन दूसरे किसान की और पानी-सिंचाई इनका बाकी सब कुछ आधा-आधा। यह व्यवस्था पहली बार देखी। बूढ़ा बहुत भला है। चाय बनवाकर पिलाई। कलम भी आ गया। 5-6 साल हुए होंगे शादी को, एकदम जवान लड़का है। उसके पाँच बच्चे हैं- ओने सिंह, महेश, रेसली, लीला, सोनू, संजना। पिता का नाम धंधू सिंह है। हमारे आने से बूढ़ा खुश हो गया। पूछने लगा, आदिवासियों के घर उनका बनाया खाना नहीं खाते होंगे? हमने कहा, अब आज दोपहर में यही खाएंगे।
सरपंच ने मिलना बंद कर दिया…
सरपंच के घर गए कि बोलकर काम लगवाएं; नहीं मिला। सुबह-सुबह ही कहीं निकल गया। लगता है ग्राम पंचायत का काम लगा है इसलिए समस्या आ रही है। मैंने भारत सिंह से कहा कि सरपंच को कह देना मज़दूरी वगैरह का जो भी खर्चा आएगा, वह चंदा करके इकट्ठा कर लेंगे, ईंट भी ले आयेंगे। उसकी वजह से काम न रोकें। भारत ने कहा ऐसी कोई बात नहीं है। जल्दी हो जाएगा, बस सरपंच को सामने खड़े रहकर कराना होगा। अब जब सब तय हो गया है, तो यह देरी अखर रही है। महेश जी को मेघनगर जाना है, और भी काम हैं लेकिन मुझे लगता है कमरे का काम पूरा करके ही यहाँ से जाएँ। मैं भी एक हफ्ते के लिए मेघनगर रहकर आगे की रूपरेखा बनाऊँगा और लिखूँगा।
नहा-धोकर महेश जी जोबट चले गए। उनके साथ आज डुंगर सिंह और सावन सिंह भी जाने के लिए मान ही गए। महेश जी का अपना संगठनात्मक काम शुरू हो गया है। संगठन वाले लोग उसके बिन रह ही नहीं सकते। इसका लोभ-संवरण नहीं कर पाते; चाहे वामपंथी हों या दक्षिण पंथी। भले ही उसके कारण चलते हुए काम में रुकावट आ जाए। मैं भी खाना खाने कलम सिंह के यहाँ चला गया। थ्रेशर में गेरहूँ की उड़ावनी चल रही है। वहीं खटिया डालकर बैठ गया। कुछ बच्चे आ गए और जालम सिंह भी आ गया। कहने लगा बाबा मुझे मालूम है तुम मुझे ठीक कर दोगे और मेरी खेती भी सुधार दोगे, मैं समझ गया हूँ, तुम वैज्ञानिक भी हो!
शाम को नदी गया। महेश जी का फोन आया कि कल आएंगे। डूंगर लौट आया लेकिन बहुत उत्साहित नहीं लगा। नदी से लौटते हुए उसी शराबी छगन मास्टर ने ज़बर्दस्ती अपने घर बैठाल लिया। कहने लगा उस दिन मुझे नहीं मालूम था कि आप महान व्यक्ति हैं, अब समझ गया हूँ। डावर भी बड़े सम्मानपूर्वक मिला। दोनों बियर पी रहे थे। प्रताप के घर खाना खाया, डूंगर से खूब बातें हुईं और सो गया।
सुबह जल्दी उठकर नदी गया। आज तो सरपंच को पकड़ना ही है। लौटकर आया और पूछा तो बताया नदी तरफ़ गए हैं। प्रताप के यहाँ जाकर चाय पी, सरपंच के यहाँ किसी ने चाय के लिए भी नहीं पूछा। थोड़ी देर में फिर लौटकर आया। सरपंच जाते हुए बस दरवाज़े पर मिल गया। मैंने कहा आप से दो दिन से भेंट ही नहीं हो पा रही है। मैं बरामदे में जाकर बैठ गया और लड़के से चाय बनाने को कहा। सरपंच को भी जैसे मजबूरी में रुकना पड़ा। ऐसा लगा जैसे जानबूझकर बात करने से बचना चाह रहा है।
पूछने लगा दूसरे कहा हैं? मैंने बताया जोबट गए हैं, रात आ नहीं पाए, अभी आ जाएंगे। काम तो आगे बढ़ ही नहीं रहा है, क्या हो गया?
वह बोला बहुत सारे काम हैं, टाइम ही नहीं मिलता; हमारे यहाँ किसी को भी फुर्सत नहीं है। मैंने कहा, हाँ दो-तीन दिन से तो शंकर और बहू भी नहीं है, आपने खुद काम शुरू किया था इसलिए आपके नेतृत्व में ही होना है। आपको खुद करने या खड़े रहने की ज़रूरत नहीं है, हमें बता दो कैसे, क्या करना है? हम सब कर लेंगे।
बोला-अरे कोई मज़दूर-कारीगर ही तैयार नहीं होता।
मैंने कहा− वह सब हम कर लेंगे।
दो मिनिट चुप रहकर सोचता रहा और एकदम बोला- “बाबूजी आप तो किसी दूसरे गाँव में अपनी व्यवस्था कर लो, यहाँ हो नहीं पाएगा, गाँव वालों का बड़ा विरोध है और मुझे उनके साथ चलना है, वैसे मैं आपके साथ हूँ।”
मुझे एकदम झटका सा लगा। यद्यपि पिछले दो दिन से उसके बर्ताव से असहयोग तो दिखाई दे रहा था, लेकिन ऐसे स्पष्ट कथन की अपेक्षा नहीं थी। उसके चेहरे से भी लगा कि जैसे उसका बड़ा भारी बोझ उतर गया हो और वह एकदम उठने लगा।
मैंने कहा− ठीक है कोई बात नहीं। यही कोई आखिरी जगह नहीं हैं लेकिन बताओ तो सही कौन-सा गाँव वाला और क्या कहता है?
कहने लगा− अब किस-किसका नाम बताऊँ-सभी कह रहे हैं।
मैंने कहा− नहीं ऐसा तो नहीं है। पहले भले ही ऐसा रहा हो। आपने खुद ही अपने हाथों से बनाना शुरू किया था और अब तीन दिन बाद ऐसा कह रहे हो, आखिर बात क्या है? क्या आपकी ही सोच बदल गई?
बोला− नहीं मैं तो ठीक समझता हूँ लेकिन लोग नहीं समझते तो मैं क्या करूँ? आप तो बाजार फलिया में रह लो या किसी दूसरे गाँव चले जाओ।
मैंने कहा− ठीक है जो भी है अपन सारी बात स्पष्ट समझ लेंगे, आप तो शाम तक लौट ही आओगे, शर्माजी भी आ जायेंगे। अपन शाम को और भी दो-चार लोग बैठ लेंगे, सबसे चर्चा करके ही तो काम शुरू किया था।
सरपंच ने टालते हुए बोला- मैं तो पता नहीं कब तक आऊँ, कोई ठिकाना नहीं है। अब बात और क्या करना है? मैंने बता तो दिया यहाँ नहीं हो पाएगा। आप लोग कहीं निकल जाओ। मैं भी जा रहा हूँ।
मैंने कहा-ठीक है, आप जाओ, मैं तो अभी चाय पीयूँगा फिर शर्माजी आएंगे और आपस में बातचीत करेंगे तथा शाम तक तय करेंगे कि क्या करना है? मैंने आपकी बात सुन ली है।
वह चला गया। मैंने चाय पी और प्रताप के घर चला गया।
कितना अजीब घटनाक्रम है। तीन दिन में ही क्या से क्या हो गया? 26 की शाम ऐसा लगा जैसे दुनिया जीत ली हो और अब सिर्फ तीन दिन बाद 29 की सुबह ऐसा महसूस हो रहा है जैसे जबर्दस्त मुँह की खाई हो! आखिर हुआ क्या है? क्यों हुआ ऐसा? हमसे कहाँ भूल हुई, क्या चूक हुई? उसके मन में क्या-क्या चल रहा है? क्या यह उसकी व्यक्तिगत सोच है, या पारिवारिक, या सचमुच ही गाँव वालों का दबाव या फिर कोई बाहरी कारण? या फिर सब कुछ मिला-जुलाकर उसकी परिणति?
क्रमशः…
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एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-11: कथा वाचक की नई भूमिका, मुझे अंदर से हँसी आ रही थी…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-12: वृंदावन की कुंज गली में बदल गया मेरा नजरिया
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-13: ब्रज जा कर जाना, श्रद्धा से किस तरह आनंदित रहा जा सकता है
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-14: मैं बाबा नहीं बन पाया…मैं हार गया!
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-15: अहसास हुआ कि लोग सफर को मंजिल से बेहतर क्यों बताते हैं…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-16: मैं संघ का भेदिया हूं, वकील तो ऐसे होते नहीं हैं…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-17: घर बनते जाते हैं, जमीन बंटती चली जाती है लेकिन रहते सब साथ-साथ हैं
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-18: सौ दिन पूरे… लगता है घर से बहुत दूर न जाकर गलती कर दी
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-19: मैं सन् उन्नीस सौ बावन में सातवीं फेल हुआ हूं…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-20: संभवतः किसी को उम्मीद नहीं होगी कि मैं इस तरह फट पडूंगा…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-21: दहेज का दबाव न हो तो हर मर्द चार-पांच ब्याह कर लेगा
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-22: पूरे पच्चीस साल बाद पैदल अपने गांव भंवरताल जा रहा हूं…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-23: अपने गांव भंवरताल में हूं; एक वो दिवाली थी, एक ये दिवाली है, एकदम अलग
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-24: खबर फैल गई कि मैं ‘बैरागी’ हूं, इनाम नहीं मिलेगा
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 25ः भंवरताल में आखिरी रात है, पता नहीं कब आना होगा…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 26ः वकालत छोड़ी, फिर अपनाई, मैं उलझता चला जा रहा था…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 27: उस दिन मैं अचानक छोटा-मोटा ‘महामानव’ बन गया… मगर
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 28ः चोम सिंह ने समझा दिया, 21 वीं सदी में अपनी शर्तों पर जिया जा सकता है
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 29ः आज ऑफिस में लगेगा ताला, नाम पट्टिका हट जाएगी
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 30ः उन जगहों पर लाैटना जहां कभी मन बैरागी बन कर गया था…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 31ः स्वामी अवधेशानंद बाेले, विभूति जी आप अवश्य आइए, मुझे प्रतीक्षा रहेगी
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 32ः नाते-रिश्तेदार ‘माता-पूजन’ कर मनाते हैं ईंद, हैं न अनाेखी बात
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 33: बुढ़े ने रहने बुला लिया, हम सामान लिए चले आए, रात में बोला, घर से निकलो
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 34ः बाबा, मैं ठीक होना चाहता हूँ… बाबागिरी मेरा पीछा नहीं छोड़ रही

