एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-38

- विभूति झा, सामाजिक कार्यकर्ता
संपादन: चिन्मय मिश्र
यह अनिवार्य रूप से घटित हुआ भी एक साधारण दस्तावेज है। यह न तो कहानी है, न यात्रा वृतान्त। यह एक व्यक्ति की “लौटने” की गाथा है। विभूति दा की यह डायरी अबूझ सी सच्ची कहानी है। यह सत्य की अभिव्यक्ति है। –चिन्मय मिश्र
मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल जिले मंडला से निकलकर सागर विश्वविद्यालय से एमए और एलएलबी। फिर जेएनयू (नई दिल्ली) से समाज विज्ञान में शोधकार्य किया। भोपाल से वकालत शुरू की और भोपाल गैस त्रासदी मामले में गैस पीड़ितों के वकील बने। एक युवा वकील ने बड़े बड़े वकीलों की दलीलों को खारिज कर भोपाल गैस पीड़ितों को मुआवजा दिलवाने की लड़ाई जीती। जिला अदालत से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक पैरवी और फिर एक दिन अचानक पूरी प्रसिद्धि, अपने समृद्ध भविष्य की संभावना को पुराने वस्त्र की तरह उतार कर चल पड़े एक नए जीवन की खोज में। मन में विचारों का उफान और तन पर एक जोड़ी कपड़ों के साथ सबकुछ छोड़ दिया। परिवार भी। किसी फिल्म की पटकथा सा लगता यह इस डायरी के लेखक विभूति झा के जीवन की वास्तविकता है। एक ऐसा मंथन जो जीवन उद्देश्य खोजने की दिशा में बढ़ा और इस राह में उतने ही विविध अनुभव हुए। यह एक विस्तृत जीवन से साक्षात्कार है। किश्त-दर-किश्त रोचक होती जीवन दास्तां।
भगोरिया: संक्रमण का
सुबह जंगल सिंह आ गया। सामान उठाकर उसकी बुआ के यहाँ जमरा फलिया चले गए। मुहकाम सिंह की तबियत खराब है। वह भी बड़ा शराबी है। शायद इसीलिए जंगल रात में आने में घबरा रहा था। बच्चे और बहन भगोरिया जाने की तैयारी में हैं और खाना तैयार है। खाना खाया तथा साढ़े नौ बजे थैला उठाकर निकल पड़े। यहाँ से जोबट और फिर जोबट से आम्बुआ करीब 12-13 किलो मीटर आलीराजपुर रोड़ पर जाना है। बाजार में थोड़ी देर इंजजार के बाद जीप मिली जो खचाखच भरने के बाद चली। जोबट से आम्बुआ के लिए दूसरी जीप में बैठे। सामने की सीट पर एक अधेड़ महिला, उसका बच्चा, दो नवयुवतियाँ और जंगल, मैं और ड्राइवर इस तरह कुल सात लोग बैठे। स्टेयरिंग पकड़ने से पहले ड्राइवर दूर खड़ा मुझे सामने की सीट पर बैठा देखकर नाक-भौं सिकोड़ते हुए कह रहा था कि मोटे आदमी के बैठने से एक सवारी कम हो जाती है। मुझे भी यह समझ में आया कि झाबुआ में रहने के लिए चौड़ाई और कम करनी ज़रूरी है। हथनी नदी के पार आम्बुआ है जो आलीराजपुर तहसील में है और नदी के इस पार बोरझाड़ है जो जोबट में है। जीप बोरझाड़ तक ही गई। कुल 70 सवारी उतरीं ज़्यादा तो छत पर बैठती हैं। ड्राइवर की मैंने तारीफ की तो उसने बताया कि अभी तक सबसे ज़्यादा 90 सवारी एक बार आम्बुआ से आलीराजपुर के बीच बैठाई हैं। खुद बैठे बिना और देखे बिना कोई विश्वास नहीं कर सकता कि सचमुच ऐसा भी हो सकता है-एक साधारण सी कमाण्डर जीप में 90 सवारियाँ!
थोड़ी दूर पैदल चलकर आम्बुआ के भगोरिया में पहुँचे, आम्बुआ छोटी जगह है, खट्टाली जैसी। काफी बड़े मैदान में भगोरिया हो रहा है, और यहाँ आकर लगा कि सचमुच भगोरिया देख रहे हैं। भगोरिया इस अंचल और यहां के आदिम समाज का सबसे महत्वपूर्ण उत्सव है। पलायन पर गया पूरा समुदाय कमोबेश इन दिनों यहां लौट आता है। यह वैसे तो होली का पूर्व रंग ही है, लेकिन इसे भगोर देवता की स्मृति में मनाया जाता है। इसमें सभी अपनी हैसियत के हिसाब से सज संवर कर आते हैं। यह होली के एक हफ्ते पहले से साप्ताहिक हाट वाले दिन अलग-अलग जगह मनाया जाता है। इन दिनों ये हाट “भगोरिया हाट” कहलाती है। इस दौरान हाट में सभी नाचते गाते इकटठा होते है और कई लोग अपने जीवन साथी का चयन भी इसी में करते हैं। इस दौरान लड़के और लड़कियां अलग-अलग समूहों में घूमते हैं। एक दूसरे पर गुलाल डालना यानी विवाह की स्वीकृति। वैसे सामान्यता ये जोड़े पूर्व परिचित होते हैं। इसके बाद ये भाग जाते हैं। बाद में घर वाले आपस में मिलकर दहेज़ आदि तय कर विवाह करा देते हैं। एकदम विशुद्ध ग्रामीण परिवेश, रंग-बिरंगे कपड़ों में सजे हुए युवक-युवतियाँ। एक गाँव की सभी लड़कियाँ एकदम एक जैसी पोशाक पहने हुए। गहरे चटक रंग, चाँदी के जेवरों से लदी हुई स्वस्थ और आकर्षक युवतियाँ, सिर से पैर की उँगलियों तक जेवरों से ढकीं हुई। 5 से 25 किलो तक चाँदी के जेवरों से। वैसी ही रंग-बिरंगी पोशाकों में जवान लड़के बाँसुरी बजाते, ढोल बजाते, नाचते हुए। एकदम स्वच्छन्द और उन्मुक्त वातावरण। कोई छेड़-छाड़ नहीं, कोई धक्का-मुक्की नहीं और कोई लूट-पाट नहीं। हज़ारों की संख्या में लोग, लेकिन सब कुछ अपने-आप नियंत्रण में। लगातार ढोल-ढमाकों-मांदल से गूँजती स्वर-लहरियाँ। छोटे से लेकर बड़े-बड़े झूले ही यहाँ का सबसे बड़ा आकर्षण है। जहाँ झाबुआ और मेघनगर में एक बड़े हाट का स्वरूप दिखाई देता था, वहीं आम्बुआ में यह एक सांस्कृतिक पर्व दिखाई पड़ रहा है। यही है वह भगोरिया जिसकी हर तरफ चर्चा होती है-भील-भिलालों का सबसे बड़ा वार्षिक उत्सव। करीब 12 बजे से 4 बजे तक भरी दोपहरी में समय कैसे बीत गया, पता ही नहीं चला। थोड़ी देर मैं ग्राम पंचायत के तम्बू में बैठकर नज़ारा देखता रहा और जंगल सिंह मित्रों के साथ घूमता रहा। उसका गाँव बड़ागुड़ा यहाँ से 5-6 किलो मीटर दूर रोड पर ही है। आज रात वहीं रुकना है।
12 बजने वाला है खट्टाली पहुंच गए है। यहां अब धीरे-धीरे भगोरिया भरना शुरू हुआ है। यहाँ कोई खास बड़ा भगोरिया नहीं भरता। एक तरफ कुछ दूरी पर जोबट है और दूसरी तरफ नानपुर और फिर आलीराजपुर जहाँ बड़े-बड़े भगोरिये होते हैं। सरपंच से बोल दिया था कि पंचायत भवन में आएंगे। पंचायत भवन पहुँचे। यह दो मंजिला भवन है मुख्य बाज़ार में। नीचे बंद पड़ा है और ताला लगा हुआ है। पता लगा इसकी चाबी सेठ लोगों के पास रहती है। वैसे पंचायत की चाबी भी शायद इन्ही के पास होगी।
खैर। बगल में धनराज सेठ का मकान है। ऊपर जाने का रास्ता पीछे से दुकानों के बीच में से एक गलीनुमा है जो बड़ी मुश्किल से मिला। पीछे सामुदायिक भवन और बहुत सारे शौचालय आदि बने हुए हैं जिन पर लोगों ने कब्ज़े कर रखे हैं और उनका आवास तथा व्यवसाय है। ऊपर चढ़कर एक हॉलनुमा कमरा है जिसमें कुछ कुर्सियाँ और एक टेबल पड़ी हुई है। यही स्थान शायद ग्राम पंचायत के उपयोग के लिए उपलब्ध है। अब धीरे-धीरे समझ में आ रहा है कि यहाँ के सेठ लोग हमारे यहाँ रहने से इतने परेशान क्यों हैं? सरपंच अभी आया नहीं। उतर कर वापस बाज़ार तरफ गए, वहाँ एक कपड़े की दुकान वाले ने ज़बर्दस्ती अपने यहाँ बुलाकर बैठा लिया। पिछली बार यही सेठ बस स्टैण्ड से लेकर आया था। सरपंच भी वहीं मिलने आया और काम से चला गया। सेठ पूरे समय बताता रहा कि वह आदिवासियों का कितना बड़ा हितैषी है और आदिवासी कितने अच्छे हैं। एक-दो लोग आए तो उन्हें मेरा परिचय दिया कि बड़े संत जी हैं अब यहीं आदिवासियों के बीच डुडवे फलिये में रहकर समाज सुधार का काम करेंगे। ये वही सेठ लोग हैं जो पहले बता रहे थे कि आदिवासी कितने खराब हैं और उनके बीच रहना सुरक्षित नहीं है। महीने भर में सब कुछ बदल गया है।
सेठ के यहाँ से चाय पीकर निकले और पंचायत भवन की ओर जाने लगे तो थोड़ी दूरी पर पीछे से सर-सर आवाज़ लगाता पुलिस चौकी का इंचार्ज सब इंस्पेक्टर और एक हवलदार आ गए। सब इंस्पेक्टर ने हवलदार को बताया कि सर अब यहीं रहेंगे और आदिवासियों के लिए काम करेंगे। हलवदार ने कहा कि इनके साथ शायद एक शर्मा जी हैं तो इंस्पेक्टर ने कहा कि अरे वो तो मेघनगर में रहते हैं, शिवंगगा वाले हैं। सर का काम अलग है और सब लोग बस सहयोगी हैं। वह बोला सर, हमसे जो भी सहयोग होगा हम करेंगे। आप तो आदेश कर देना। मैंने कहा कि अब तो यहीं रहना है और जो भी करना है वह एक-दूसरे से सहयोग करेंगे ही। मैं अभी होली पर घर जाऊँगा, पंचमी के बाद आकर यहीं रहूँगा। तो अब पुलिस-सेठ सब को सब स्पष्ट हो गया है कि मैं यहाँ जम गया हूँ।
पंचायत भवन पहुँचे तो ऊपर से कुछ लोग उतर कर बाहर जाते मिले। भारत भी साथ में है और केम्टा भी बड़ी गर्मजोशी से मिला और पूछा अभी तो रुकोगे न? बताया कि ‘पटवारी साहब’ के पीछे-पीछे सब लोग कहीं काम से जा रहे हैं। ऊपर पहुँचे तो सरपंच और तीन लोग मिले। सबने बड़े सम्मान के साथ बैठाया। दरयाव का भाई राम सिंह बहुत खुश हुआ कि हम पंचायत में आए। कहने लगा कि वह तीनों भी पंच हैं और सिर्फ सरपंच की नहीं सबकी पंचायत है, जहाँ आपकी सलाह की जरूरत पड़ेगी। हमें बैठा कर वे लोग व्यवस्था में चले गए। तो अब पंच-सरपंच सभी स्वागत कर रहे हैं हमारा।
थोड़ी देर बैठकर भगोरिया में गए। उनके साथ घूमते रहे। खट्टाली के लोग मिलते रहे और बड़े खुश होते रहे। जंगल को दोस्तों के साथ घूमने भेज दिया। पंचायत भवन के सामने चौक में तम्बू लग गया और थोड़ी देर बाद एक ढोल-नगाड़ा लाकर वहाँ बजाने लगे। धीरे-धीरे करके थोड़ी-थोड़ी संख्या में लोग आने लगे और गुलाल लगाकर नाचने लगे। सरपंच भी नाचता रहा। कुछ लोगों ने पी रखी है। थोड़ी देर बाद मैं भी नीचे उतर आया। फोटो खींचता रहा और जुगड़िया दादा के साथ बैठा रहा। सरपंच कहीं चला गया और फिर शराबी देह सिंह और छगन चपरासी के साथ मिलकर थोड़ी देर मैं भी नाचता रहा। बड़ा मज़ा आया। खूब सारे लोग आकर मिले। खट्टाली के लोग मुझसे मिलकर बहुत खुश लग रहे हैं। सभी यही पूछ रहे हैं कि अब तो रुकेंगे न? सबको बताया कि आज रुककर कल दूसरे भगोरिया देखने जाऊँगा और रंगपंचमी के बाद आऊँगा।
अंधेरा होने लगा जब सरपंच के घर लौटे। सरपंच भी आ चुका है। आज तो इसी के यहाँ खाना और सोना तय है। प्रताप भी मिल गया। आज सरपंच ने पहली बार मुझसे पूछा कि आपके घर में क्या काम होता है? मैंने कहा तुम्हें तो सब मालूम हो चुका होगा? तो बोला बस वकालत का मालूम है। प्रताप ने भी आज पहली बार पूछा कि घर में कौन-कौन लोग हैं और कहाँ रहते हैं, क्या करते हैं? मैंने संक्षेप में बता दिया। तो अब जा कर इन लोगों ने मन में निश्चय कर लिया है कि मुझे यहीं रहना है और तभी आत्मीय, व्यक्तिगत सवाल पूछने शुरू किए हैं। मुझे लगता है धीरे-धीरे मैं अपने लक्ष्य पर पहुंच ही जाऊंगा।
यहाँ गांधी की यह बात ठीक जान पड़ती है कि “लोग कहते हैं साधन आखिर साधन ही है। मैं कहूँगा साधन ही आखिर सब कुछ है। जैसे साधन होंगे वैसा ही साध्य होगा। साधन और साध्य के बीच दोनों को अलग करने वाली कोई दीवार नहीं है। बेशक सरजनदार प्रभु ने साधनों पर नियंत्रण रखने की शक्ति हमें दी है। वह भी अत्यंत सीमित मात्रा में। परंतु साध्य पर नियंत्रण रखने की कोई शक्ति नहीं दी है। लक्ष्य की सिध्दि ठीक साधनों की सिध्दि के अनुपात में होती है। यह एक ऐसा सिध्दांत है,जिसमें अपवाद की गुंजाइश नहीं है।
उसने ठान लिया है कि मेरे साथ ही रहेगा
बाहर अच्छी चाँदनी छिटकी हुई है। जंगल सिंह को साथ लेकर स्कूल की तरफ गया, जहाँ केम्टा का खेत भी है। रास्ते में पिये हुए कोई लड़का मिला, तो किनारे से निकलकर खेत की मेढ़ पर पहुँच गए जहाँ केम्टा ने घर बनाने का कहा है। थोड़ी दूर पर यही ताड़ी की महफिल जमी हुई है। हमें देखकर एक-एक करके सब उठकर आ गये-रमेश, रेम सिंह, मेहताब, जालम सिंह। सबने कहा कि आज हमारे घर ही खाओ और सोओ। रमेश तो बहुत खुश है। उसने मुझे भगोरिया में नाचते देख लिया। कहने लगा आज पूरे गाँव ने समझ लिया कि आप हमारे बीच रह लेंगे और आप हमारे आदमी हैं। पूरे गाँव में यही चर्चा है। कहने लगे अब मत जाओ, यहीं रहो। जल्दी से मकान बना लेंगे। स्नेह का अतिरेक फिर से डरा रहा है। मैंने कहा कुछ दिन के लिए तो घर जाऊँगा और फिर यहीं आना है, तब तक बना लेना। आज तो सरपंच के यहाँ ही खाना है और सोना पड़ेगा क्योंकि उसे पहले से हाँ कह दिया है। जालम सिंह पीछे पड़ गया कि अभी साथ चलकर सरपंच से बात कर लेता हूँ कि आज हमारे साथ रहेंगे। मैंने बड़ी मुश्किल से उन्हें समझाया। यह भी कहा कि खेत वाला कमरा तो कुछ दिन के लिए रहेगा, बाद में वहाँ रहते हुए यहीं मेढ़ पर मकान बनाएंगे और यही रहूँगा मैं। बड़ी मुश्किल से वापस सरपंच के यहाँ आने दिया। जंगल सिंह यह सब देखकर हतप्रभ है। उसे विश्वास नहीं हो रहा है कि यहाँ के लोग इतनी जल्दी इतना ज़्यादा मुझसे कैसे जुड़ गए हैं? उसे यह भी मालूम है कि मैं ज़्यादा बात भी नहीं करता। जंगल सिंह चार-पाँच साल से शिवगंगा में काम कर रहा है। मैंने उसे समझाया कि सबसे पहले यह प्रमाणित करना होता है कि आप सद्चरित्र, भले व्यक्ति हैं, तब लोग सम्मान और स्नेह देने लगते हैं। काम की बात उसके बाद अपने आप सुनने लगते हैं। शुरू से ही उपदेश देने लगो तो कोई नहीं अपनाता है, मन से। जंगल सिंह बहुत प्रभावित है और उसने ठान लिया है कि मेरे साथ ही रहेगा।
सरपंच के यहाँ पहुँचे तो वह परछी में बैठा हुआ मिला। कहने लगा खाना तैयार हो गया, खा लो। मैंने पूछा आप? तो बोला वह थोड़ी देर से खाएगा। मैंने कहा आज तो गाँव का भगोरिया है। थान सिंह भी आ गया। सरपंच ने ताड़ी का डिब्बा और ग्लास निकाला और दोनों पीने लगे। पहली बार ऐसा हुआ कि सरपंच ने सामने बैठकर ताड़ी पी, पहले पीछे जाकर पी लेता था। महेश जी के सार्वजनिक ताड़ी समारोह का प्रभाव है कि इसने अब आँख की शरम भी छोड़ दी। अभी तक किसी ने भी गाँव में मेरे सामने बैठकर ताड़ी शराब नहीं पी थी, जालम सिंह ने भी नहीं। कोई बुराई न होते हुए भी मुझे कुछ अच्छा-सा नहीं लगा समझ में आया कि महेश जी ने बड़ी अपरिपक्वता दिखाई है।
मैंने तो अपना बिस्तर ज़मीन पर ही लगाया। थोड़ी देर लेटे-लेटे बातें करते रहे। आज तो गाँव का भगोरिया है इसलिये पीकर मौज-मस्ती करने वालों की आवाज़ें हर तरफ से आ रही हैं। थोड़ी देर में आँख लग गई। कुछ देर बाद दरवाज़े पर आवाज़ होने से नींद खुली, साढ़े बारह बजा है। पहले धीरे-धीरे और बाद में ज़ोर-ज़ोर से कोई दरवाजा ठोंक रहा है फिर आवाज़ देने लगा। सरपंच आखिर में उठकर गया। रूमाल सिंह कह रहा है कि मुझे शराब दो या फिर पैसे वापस करो। तुम्हारे घर वालों ने शराब के लिये पैसे लिये थे। रूमाल सिंह और जालम सिंह ने रात भर सोने नहीं दिया। सरपंच के घर के सारे लोग परेशान होते रहे। शराब बनाकर बेचने का धंधा करने से तो ये सब भुगतना ही पड़ेगा। सरपंच का घर पीने वालों का अहाता भी है। उसकी माँ और एक छोटा लड़का इसी काम में लगे रहते हैं। सरपंच के घबराने का वह भी एक कारण रहा होगा, शायद !
सुबह सरपंच बाज़ार फलिया की तरफ निकल गया। हम भी सामान उठाकर चल दिए। सरपंच और प्रताप के घर बताया कि अब कमरा बन जाएगा, तब रहने आऊँगा। रंगपंचमी के बाद जंगल सिंह आएगा और पैसे की जरूरत हुई तो लेता आएगा। बाजार में मुर्गों और बकरों की हाट लगी हुई है। गाँव के बहुत लोग मिले। सरपंच भी मिल गया। दरयाव का भतीजा राजेन्द्र जीप में कंडक्टर है, उसने बैठने की अच्छी व्यवस्था की। यहां जीप में ठीक बैठ जाना भी एक बड़ी उपलब्धि है।
सोचता हूँ बड़ा कष्टप्रद जीवन होगा यहाँ
इस बार यहाँ आकर लगा कि खट्टाली अब अपनी जगह बन चुकी है और मैं इसका हिस्सा बन गया हूँ। जोबट पहुँच गया। दोपहर 2 बजे के करीब महेश जी व अन्य सभी आ गए और फिर सब लोग भगोरिया देखने गये। यहां विशाल जनसमूह है। कमोबेश सैलाब ही है। अभी तक का सबसे बड़ा भगोरिया यही है। जैसे-जैसे दिन बीतता है, जोश बढ़ता जाता है। खूब सारे झूले हैं और पुलिस का भी ज़बर्दस्त बंदोबस्त है। शहरी और ग्रामीण दोनों किस्म के ही लोग यहां बहुत बड़ी संख्या में हैं। जोबट का भगोरिया काफ़ी मशहूर है। जोबट झाबुआ जिले के बीचोबीच स्थित है। यहाँ झाबुआ और आलीराजपुर क्षेत्र दोनों की ही मिली-जुली संस्कृति दिखाई देती है।
आज सोंडवा का भी भगोरिया है। रात में सोंडवा के आसपास ही कहीं रुकना है। कल वालपुर का प्रसिद्ध भगोरिया है जो नदी तरफ़ है। झाबुआ जिले का सबसे खूंखार क्षेत्र सोंडवा ही माना जाता है और बताते हैं कि म.प्र. में सोंडवा थाने में ही अपराध की दर अधिकतम है। मैंने कह-कह कर सबको अंधेरा होने से पहले सोंडवा पहुँचने के लिए तैयार किया जिससे थोड़ा-बहुत भगोरिया वहाँ का भी देख सकें। जोबट में सबने चाय पी-महेश जी,और बाकी सब तूफान गाड़ी करके आए हैं। 4.00 बजे के करीब जोबट से निकले-आम्बुआ, आलीराजपुर, उमराली और सोंडवा क़रीब 70-75 किलो मीटर की दूरी है। उमराली के पास एक जगह गाड़ी रोक कर पानी पिया और कुछ लोगों ने एक कार्यकर्त्ता के घर ताड़ी पी। समझ में आ गया कि अब तो सार्वजनिक ताड़ीपान की प्रथा आरंभा हो ही गई है। उमराली के बाद सोंडवा भगोरिया से लौटते हुए जीपों और ट्रेक्टरों में रंग-बिरंगी पोशाकों में सजे हुए लोग दिखाई देने लगे। किसी भी जीप में 60-70 से कम लोग नहीं थे। लड़के-लड़कियाँ छतों पर जमे हुए गाते-बजाते और झूमते। मौज-मस्ती का ज़बर्दस्त आलम। चाँदी के जेवरों से ढकीं हुई स्त्रियाँ और रंग-बिरंगे साफा लपेटे हुए पुरुष। साढ़े पाँच के क़रीब सोंडवा पहुँचे। यहाँ अलग-अलग समूहों में गाना-बजाना-नाचना चल रहा है। बड़े-बड़े विशालकाय ढोल जिन्हें दो आदमी मिलकर उठाते हैं और स्टैण्ड पर रखकर दो लोग मिलकर बजाते हैं। बाँसुरी पर तान छेड़ते हुए युवकों के झुण्ड के झुण्ड एक जैसी पोशाक पहनकर और एक जैसी बाँसुरियाँ लेकर समूह में धुन निकालते हैं। पूरी तरह से स्वच्छन्द वातावरण। कोई भी शहरी आदमी दिखाई नहीं देता, सिवाय दुकानदारों के। बड़े-बूढ़े, बच्चे, स्त्री-पुरुष में कोई भेद नहीं, सभी अपने में मस्त और खोये हुए। बहुतों के हाथ में धारदार फालिये, तीर-कमान और बंदूक । कहीं कोई गड़बड़ नहीं और न ही कोई छेड़छाड़। पुलिस भी कहीं नहीं। मैं समझ गया कि असली भगोरिया यही है। परंतु इसी जगह को लोग “खूनी सोंडवा” कहते हैं जबकि यहीं मुझे सबसे अधिक शांत और प्राकृतिक लगा।
अंधेरा होने को आ गया। अब अचानक थाने से पुलिस की गाड़ियाँ निकलीं और स्थानीय लोगों के उत्सव में बाहरी हस्तक्षेप से विराम लगना शुरू हुआ। अभी तक कहीं भी कोई गड़बड़ी किसी भगोरिया में देखने को नहीं मिली। जो भी होती है वह या तो राजनेताओं या पुलिस के आगमन से ही होती है। बिल्कुल अंधेरा होने लगा, तब सोंडवा से निकले। आज सोंडवा में भगोरिया का सही आनंद आया।
कच्ची सड़क पर करीब 10 किलो मीटर चलकर उड़वत गाँव आया। अभी भी भगोरिया से लोग वापस आ रहे हैं-जीप, ट्रेक्टर और पैदल। एक बस भी मिली। चाँदनी खिली हुई है लेकिन मौसम बहुत गरम है। बाहर ज़मीन पर दरियाँ बिछाई। महिलाओं के झुण्ड अभी भी पैदल वापस आ रहे हैं साथ में कोई पुरुष नहीं। रात का लगभग साढ़े आठ बज चुका है। कितना सुरक्षित है यह क्षेत्र जिसे अत्यंत आपराधिक क्षेत्र कहकर लोग यहाँ आने में डरते हैं। एकदम वीरान और एकांत। बस, किसी भी तरह की हरियाली, पेड़-पौधों का न होना बहुत अखरता है। इसीलिए बहुत गरम भी है। सोचता हूँ बड़ा कष्टप्रद जीवन होगा यहाँ।
समझ की कमी भारी पड़ रही
हम कुल मिलाकर 16 लोग हैं। खाना बनाना शुरू हुआ जिसमें काफी समय लगा। इस बीच कुछ लोग चुपचाप गाड़ी लेकर कहीं चल दिए। महेश जी का पारा चढ़ गया। जहाँ रुके हैं वे लोग पक्के भगत हैं। फोन पर फोन खड़के। महेश जी मोटर साइकल पर ढूँढ़ने जाने की ज़िद करते रहे। करीब एक घंटे बाद लौट आए। सभी ताड़ी पीने और लाने सोंडवा गए थे, लेकर नहीं आए। महेश जी ने खुद ही तो खट्टाली में शुरूआत कराई और अब संभाल नहीं पा रहे हैं। यह है अदूरदर्शिता और समझ की कमी। इसका परिणाम भी इतनी जल्दी मिलना शुरू हो गया है। वही गांधी का साधन और साध्य वाला फार्मूला याद आ रहा है।
सबने खाना खाया और वहीं बाहर दरी पर चाँदनी में सो गए। यहाँ तो ओढ़ने को भी नहीं है। रात नींद अच्छी आ गई। सुबह-सुबह थोड़ी ठण्डक हुई। साढ़े छह के क़रीब निकल गए और सोंडवा पहुँचकर चाय तलाश करते रहे। आज भगोरिया का अंतिम दिन है, रात में होलिका दहन है। झाबुआ जिले का प्रसिद्ध ‘वालपुर का भगोरिया’ आज भरना है। यहाँ से करीब 10 किलो मीटर दूर है। आज दोपहर में भोजन की कहीं व्यवस्था नहीं है। खूब सारा नमकीन और बिस्किट खरीदे और ककराना के लिये निकल पड़े। रास्ते में जुबलट गाँव से खूब सारे मिर्च के पकौड़े भी खरीद लिए। सोंडवा से करीब 20-25 किलो मीटर अलग रास्ते से ककराना जाना होता है।
ककराना नर्मदा परिक्रमा में एक महत्त्वपूर्ण स्थान है। यहाँ नर्मदा और हथनी नदी का संगम है। नर्मदा का दूसरा तट महाराष्ट्र का नंदुरबार जिला है और कुछ दूर पश्चिम में चलकर सरदार सरोवर बाँध है और फिर गुजरात। पूर्व में बड़वानी और धार जिले हैं। इस तट पर धार और दूसरे दक्षिणी तट पर बड़वानी। सरदार सरोवर बाँध बनने से यहाँ दूर-दूर तक पानी ही पानी दिखाई देता है। नर्मदा और हथनी को मिलाकर करीब डेढ़-दो कि.मी. चौड़ा पाट हो गया है और गहराई अथाह। बड़ा सुंदर स्थान है। बीच में एक टापू है जिसके ऊपर एक मंदिर है और उस तरफ नर्मदा जी की मूलधारा। इसी टापू पर पहले ककराना गाँव बसा हुआ था, जो अब विस्थापित हो गया। दूर-दूर तक पानी ही पानी है और छोटे-छोटे गाँव और टोले एक-दूसरे से अलग हो गए हैं। बहुत से मंदिर और घाट भी डूब में आ गए हैं। आने-जाने के लिए जमीनी मार्ग है ही नहीं। एनवीडीए ने यहाँ कुछ बड़ी-बड़ी मोटर बोट रखी हैं, उन्हीं से किराया देकर आवागमन होता है। यहां ककराना में बहुत सी नाव एम्बुलेंस भी दिखाई दी। कुछ वास्तविक एम्बुलेंस है। परंतु अधिकांश गुजरात में शराब तस्करी में काम में आती है। पता चला कि ककराना में शराब का ठेका मध्यप्रदेश में संभवतः सबसे ज्यादा राशि पर नीलाम होता है। अब हम 27-28 लोग हो गए हैं। एक मोटर बोट करके सब टापू पर गए और वहाँ कपड़े रखकर फिर नहाये। नर्मदा में तैर कर नहाने में बहुत आनंद आया। कुछ तो है नर्मदा में कि उसके पास आकर मुझे एक अलग ही सुखद अनुभूति होती है। खूब नहाया। मंडला और बचपन बहुत दिनों बाद याद आया। मंदिर के पास बैठकर सबने बिस्किट-नमकीन-भजिये का आहार किया और नर्मदा का जल पिया। ककराना यात्रा बहुत सुखद रही।
12 बजे के करीब वालपुर पहुँच गये। यहां अभी लोग आ रहे हैं। बाहरी लोग भी काफी हैं। पुलिस प्रशासन की भारी व्यवस्था है। यहां ज़्यादा बड़ी जगह नहीं है। झूले भी इने-गिने हैं, एक बड़ा झूला है और लकड़ी के तीन। धीरे-धीरे भीड़ होने लगी। बीच में एक बड़े मैदान में प्रशासन द्वारा आयोजित नृत्य स्पर्धा चल रही है जिसमें अलग-अलग गाँव से नर्तक दल आए हुए हैं। आदिवासी विकास विभाग का आयोजन है। इन नर्तक दलों को देखकर ऐसा नहीं लग रहा है कि यहीं के हैं। किसी भी आदिवासी क्षेत्र के हो सकते हैं-मण्डला, बस्तर, छत्तीसगढ़। वालपुर भगोरिया के स्वाभाविक सौंदर्य को इस तरह के प्रशासकीय हस्तक्षेप ने बिगाड़ दिया है। यहाँ कुछ मज़ा नहीं आया। ढाई-तीन बजे के करीब हम लोग निकल पड़े सोंडवा, उमराली, आलीराजपुर, जोबट, राणापुर, झाबुआ होते हुए करीब डेढ़ सौ किलोमीटर चलकर मेघनगर पहुँच गए।
पिछला एक हफ्ता भगोरियामय रहा। झाबुआ जिले के अलग-अलग क्षेत्र का भगोरिया देखा और उसमें सांस्कृतिक विविधता देखी। झाबुआ क्षेत्र और आलीराजपुर क्षेत्र एक-दूसरे से एकदम भिन्न हैं और जोबट क्षेत्र दोनों का मिश्रण। अब 6 अप्रैल से तो आलीराजपुर नया जिला बनने वाला है जिसमें जोबट भी शामिल होगा। भगोरिया के बीच सबसे महत्वपूर्ण खट्टाली यात्रा रही। अब देखें आगे क्या होता है?
क्रमशः…
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एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-15: अहसास हुआ कि लोग सफर को मंजिल से बेहतर क्यों बताते हैं…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-16: मैं संघ का भेदिया हूं, वकील तो ऐसे होते नहीं हैं…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-17: घर बनते जाते हैं, जमीन बंटती चली जाती है लेकिन रहते सब साथ-साथ हैं
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-18: सौ दिन पूरे… लगता है घर से बहुत दूर न जाकर गलती कर दी
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-19: मैं सन् उन्नीस सौ बावन में सातवीं फेल हुआ हूं…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-20: संभवतः किसी को उम्मीद नहीं होगी कि मैं इस तरह फट पडूंगा…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-21: दहेज का दबाव न हो तो हर मर्द चार-पांच ब्याह कर लेगा
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-22: पूरे पच्चीस साल बाद पैदल अपने गांव भंवरताल जा रहा हूं…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-23: अपने गांव भंवरताल में हूं; एक वो दिवाली थी, एक ये दिवाली है, एकदम अलग
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-24: खबर फैल गई कि मैं ‘बैरागी’ हूं, इनाम नहीं मिलेगा
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 25ः भंवरताल में आखिरी रात है, पता नहीं कब आना होगा…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 26ः वकालत छोड़ी, फिर अपनाई, मैं उलझता चला जा रहा था…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 27: उस दिन मैं अचानक छोटा-मोटा ‘महामानव’ बन गया… मगर
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 28ः चोम सिंह ने समझा दिया, 21 वीं सदी में अपनी शर्तों पर जिया जा सकता है
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 29ः आज ऑफिस में लगेगा ताला, नाम पट्टिका हट जाएगी
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 30ः उन जगहों पर लाैटना जहां कभी मन बैरागी बन कर गया था…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 31ः स्वामी अवधेशानंद बाेले, विभूति जी आप अवश्य आइए, मुझे प्रतीक्षा रहेगी
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 32ः नाते-रिश्तेदार ‘माता-पूजन’ कर मनाते हैं ईंद, हैं न अनाेखी बात
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 33: बुढ़े ने रहने बुला लिया, हम सामान लिए चले आए, रात में बोला, घर से निकलो
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 34ः बाबा, मैं ठीक होना चाहता हूँ… बाबागिरी मेरा पीछा नहीं छोड़ रही
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 35ः ऐसा लगा जैसे दुनिया जीत ली, सिर्फ तीन दिन बाद जबर्दस्त मुँह की खाई
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 36: काेई खेत नहीं गया, कोई बाजार, कोई स्कूल, राे कर बोले, बाबा मत जाओ
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 37: मैं विचलित हूं, मुझे बताए बिना महेश जी ने ऐसा क्यों किया?

