एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-39

- विभूति झा, सामाजिक कार्यकर्ता
संपादन: चिन्मय मिश्र
यह अनिवार्य रूप से घटित हुआ भी एक साधारण दस्तावेज है। यह न तो कहानी है, न यात्रा वृतान्त। यह एक व्यक्ति की “लौटने” की गाथा है। विभूति दा की यह डायरी अबूझ सी सच्ची कहानी है। यह सत्य की अभिव्यक्ति है। –चिन्मय मिश्र
मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल जिले मंडला से निकलकर सागर विश्वविद्यालय से एमए और एलएलबी। फिर जेएनयू (नई दिल्ली) से समाज विज्ञान में शोधकार्य किया। भोपाल से वकालत शुरू की और भोपाल गैस त्रासदी मामले में गैस पीड़ितों के वकील बने। एक युवा वकील ने बड़े बड़े वकीलों की दलीलों को खारिज कर भोपाल गैस पीड़ितों को मुआवजा दिलवाने की लड़ाई जीती। जिला अदालत से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक पैरवी और फिर एक दिन अचानक पूरी प्रसिद्धि, अपने समृद्ध भविष्य की संभावना को पुराने वस्त्र की तरह उतार कर चल पड़े एक नए जीवन की खोज में। मन में विचारों का उफान और तन पर एक जोड़ी कपड़ों के साथ सबकुछ छोड़ दिया। परिवार भी। किसी फिल्म की पटकथा सा लगता यह इस डायरी के लेखक विभूति झा के जीवन की वास्तविकता है। एक ऐसा मंथन जो जीवन उद्देश्य खोजने की दिशा में बढ़ा और इस राह में उतने ही विविध अनुभव हुए। यह एक विस्तृत जीवन से साक्षात्कार है। किश्त-दर-किश्त रोचक होती जीवन दास्तां।
खट्टाली के बाद? 01 अप्रैल 2008, मेघनगर
रात में करीब ढ़ाई बजे मेघनगर स्टेशन पर उतरा। रास्ते में थोड़ी नींद आ गई थी। वेटिंग रूम में पाँच बजे तक बैठा और फिर चल दिया। थोड़ी देर में पून सिंह और जंगल सिंह उठे और कोई तो अभी है नहीं यहाँ। महेश जी अभी इन्दौर में ही हैं। एक-दो दिन लगेगा अभी आने में। महेश जी के आने पर ही भावी रूपरेखा बनेगी।
दोपहर में जंगल सिंह से चर्चा हुई। उसके अनुसार खट्टाली में लोगों का व्यवहार उत्साहजनक नहीं है। मुझे भी लगता है कि मैंने अनुपयुक्त स्थान का चयन कर लिया। यहाँ के स्तर से कुछ अधिक ही सम्पन्न स्थान है और नगर से सम्बद्धता और निर्भरता भी कुछ ज़्यादा ही है। सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि इनकी किसी बात का भरोसा नहीं किया जा सकता- सामने कुछ, पीठ पीछे कुछ और। जंगल ने बताया कि सरपंच के अनुसार प्रताप के परिवार को यह डर हो गया है कि कहीं उसके खेत के कमरे को हड़प ही न लें और यही डर इडला को भी है। सरपंच भी चिंतित है कि अगर शराबियों ने दुर्व्यवहार किया तो उसकी जबावदारी होगी। ऐसा लगता है कि किसी तरह पीछा छुड़ाने के लिए टीले पर घर बनाने वाली बात कह दी है, लेकिन उसमें भी सहयोग नहीं मिलना है। महेश जी की “खट्टाली ताड़ी पार्टी” ने भी आग में घी का काम किया है। ऐसा लगता है कि उससे लोग और सशंकित हो गए हैं। प्रशासनिक दबाव का भी भय है। तलाश फिर जारी करनी होगी।
अब आगे खट्टाली में काम करने की सोचना….
आज गुड़ी पड़वा है। हिन्दुओं का नववर्ष। खीर बनाई जाएगी। सुबह उठकर थोड़ी देर में महेश जी के साथ चर्चा के लिए गया। काफी देर तक बात होती रही। खट्टाली का विश्लेषण करते रहे। यह तो लगा कि अब वहाँ रहने का प्रयत्न करना बेमानी है। महेश जी ने कहा खट्टाली के बाजार फलिया में कोई मकान लेकर रहने का सोच सकते हैं। उन्हें लग रहा है कि अगर खट्टाली छोड़ दी तो क्षेत्र में कुप्रचार होगा कि यहाँ जमने नहीं दिया। ऐसा कुप्रचार शिवगंगा को लेकर ही होगा और इसी क्षेत्र में होगा। मैंने कहा अब मेरा तो जरा भी मन नहीं है कि खट्टाली में रहा जाए। शायद हम लोगों का निर्णय और तरीका ही गलत था। कुछ और सोचना चाहिए।
महेश जी ने कहा फिर तो जोबट क्षेत्र यानी जोबट तहसील ही छोड़ देनी चाहिए।
मैंने कहा मुझे जोबट तहसील से कोई विशेष लगाव थोड़े ही है, वह तो उसकी भौगोलिक स्थिति को देखते हुए दीपक ने सुझाया था। अब तो वैसे भी आलीराजपुर अलग जिला बन रहा है।
महेश जी ने थोड़ी देर सोचा और कहा, फिर तो कट्ठीवाड़ा में आप रहकर काम कर सकते हैं।
मैंने सोचा कमाल है। आज फिर लगा कि बहुत सी बातों में महेश जी और मेरी सोच एकदम एक जैसी हो जाती है, लेकिन शायद तभी जब संगठनात्मक विवशताएँ आड़े नहीं आतीं। यह बड़ी सफलता है कि जो मैं कहना चाह रहा था, वही खुद न कहकर उनसे कहलवा लिया। बड़ा अच्छा और हल्का लगा। अब 10-11 को हर्ष जी भी आ रहे हैं। मैंने ही कहा कि उनसे भी विचार-विमर्श करके अंतिम निर्णय लेंगे। वैसे तो निर्णय हो चुका और उचित तथा मेरी आंतरिक इच्छा के अनुसार ही हुआ। झाबुआ छोड़कर जाना पड़ता या महेश जी और हर्ष की इच्छा के एकदम विपरीत यहाँ कुछ शुरू करना पड़ता तो मुझे अच्छा न लगता।
सोच-विचार के साथ ही साथ महाभारत का पाठ भी चल रहा है। दो खण्ड तो पूरे हो गये। कौरव-पाण्डव युद्ध तो अपनी जगह है, उसके अलावा जो नीति, धर्म आदि की चर्चा है, वह बड़ी रोचक और ज्ञानवर्द्धक है। नारद द्वारा राजा के गुण और कर्त्तव्य, द्रोपदी-युधिष्ठिर संवाद, और युधिष्ठिर-यक्ष प्रश्नोत्तर बहुत रोचक है।
तुल्ये प्रियाप्रिये यस्य सुखदुःखे तदैव च।।
अतीतानास्यते सोचे से वै सर्वधनीनरः।।
भूत अव्यभविष्येषु निस्पृहः शान्तमानसः।।
सुप्रसन्नः सदा योगी स वै सर्वधनीश्वरः।।
“जो प्रिय-अप्रिय, सुःख-दुःख और भूत भविष्यत-इन सबों में समभाव है, वही सबसे बड़ा धनी है। जो भूत, वर्तमान और भविष्य सभी विषयों की ओर से निस्पृह, शान्तिचित्त, सुप्रसन्न और सद योगयुक्त है, वही सब धनवानों का स्वामी है।”
धीरे-धीरे करके महाभारत के चार खण्ड पूरे पढ़ लिये। वहां युद्ध समाप्त हो गया है। कुल साढ़े चार हज़ार पृष्ठ!
अब कुछ दिन तो यहीं विश्राम है। महेश जी 8 को आएंगे और हर्ष जी 9 या 10 को। तभी बातचीत, चर्चा होगी। देखें, हर्ष का क्या सोचना है? दीपक क्या कहता है? अब खट्टाली की गलतियों से सबक लेकर उन्हें नहीं दोहराना है। तो, अब लगता है “खट्टाली अध्याय” समाप्त और नववर्ष में “कट्ठीवाड़ा अध्याय” प्रारम्भ ।
मुक्तिबोध ने शायद खुद अपने (और अपने जैसे और भी तमाम लोगों) से पूछा था :
ओ मेरे आदर्शवादी मन, ओ मेरे सिद्धान्तवादी मन
जीवन क्या जिया? अब तक क्या किया?
लिया बहुत ज़्यादा, दिया बहुत कम;
मर गया देश, अरे, जीवित रह गये तुम?
कट्ठीवाड़ा: अंततः?
तो अब क्या करना है और कैसे? दीपक का कहना है कि वह भी कट्ठीवाड़ा साथ चलेगा। वहाँ फॉरेस्ट रेस्ट हाउस में रुकेंगे । वहाँ एक इंडो-ऑस्ट्रियन दम्पती रहता है और कुछ काम आदिवासियों के बीच करता है। दीपक उन्हें काफी समय से जानता है लेकिन अभी लंबे समय से संपर्क में नहीं है। उनसे भी मिला जा सकता है। उसके बाद वहीं रहते हुए देखेंगे कि कैसे आगे बढ़ें।
सन् 1830 में भारत के एक ब्रिटिश गवर्नर सर चार्ल्स मेटकाफ ने भारतीय ग्राम समाजों का कुछ इस तरह से वर्णन किया था– “ये ग्राम समाज छोटे प्रजातंत्र है, जिन्हें अपनी आवश्कता की लगभग हर वस्तु अपने भीतर ही मिल जाती है और जो विदेशी सम्बन्धो से लगभग स्वतंत्र होते हैं। वे ऐसी परिश्थिति में भी टिके रहते हैं, जिसमे दूसरी हर वस्तु का अस्तित्व मिट जाता है। ग्राम-समाजों का यह संघ-जिनमें प्रत्येक समाज अपने आप में एक छोटा सा स्वतंत्र राज्य होता है, उनके सुख का बड़ी हद तक साधन बनता है और उसके अंतर्गत वे बड़ी मात्रा में स्वतंत्रता और स्वाधीनता का उपभोग करते हैं।”
आज करीब 200 बरस बाद भी भारत के कई अंचलो में इस तरह की आत्मनिर्भरता को देख पाते है। खासकर आदिवासी अंचलों में। अपने पिछले नौ महीनों की यात्रा में मैंने कई बार इसका अनुभव भी किया और कई बार यह भी अनुभव किया कि किस तरह हमने एक स्वावलंबी समाज को परावलंबी बना कर शहरों पर आश्रित भी कर दिया। खैर, मैं तो अब एकदम नए सिरे से बसने की खोज में निकल पड़ा हूँ परंतु नया ढूंढने से पहले पुराने को अलविदा कहना भी जरुरी लगा।
सुबह तैयार होकर चाय पीकर बस स्टैण्ड से साढ़े सात की पहली बस पकड़ी और खट्टाली पहुँच गया। बस से उतरते ही वहीं भाओ सिंह सरपंच मिल गया। वहीं अनिल माहेश्वरी की दुकान में नाश्ता कराया और चाय पिलाई। कल आम्बुआ क्षेत्र में मुख्यमंत्री के आने का कार्यक्रम है, उसी की तैयारी में निकल रहा था। अच्छा हुआ अभी मिल गया। सामान का पूछा तो मैंने बताया जोबट में है, शाम को लौट जाऊँगा। सरपंच ने बाइक पर मुझे अपने घर तक छोड़ दिया और यहीं खाएंगे बताकर निकल गया। थोड़ी देर सरपंच के घर के लोगों से बातचीत करता रहा, फिर गाँव में घूमने निकल गया। आजकल शादियों और छुट्टियों का माहौल चल रहा है। या तो लोग स्वयं कहीं गए हुए हैं या उनके यहाँ मेहमान आए हुए हैं। इस समय खेत के काम से छुट्टी है, बस ताड़ी और महुआ बीनना चल रहा है। यहां प्रकृति और समाज दोनों ही खेती के साथ सामंजस्य बनाकर चलते हैं। या यह कहें कि प्रकृति के अनुसार खेती और उसके अनुसार सामाजिक रीति-रिवाज़। किसी भी कृषि आधारित समाज में सारे तीज-त्यौहार, शादी-ब्याह सब ऐसे समय ही होते हैं जब खेत में काम करने से थोड़ी फुर्सत मिली हुई हो। अब सिंचाई की सुविधा बढ़ने के साथ कुछ जगहों में स्थिति थोड़ी बदल रही हैं, लेकिन सामाजिक रीति-रिवाज़ में बदलाव की प्रकिया तो बहुत धीमी होती है।
मैं केम्टा के घर गया, वहाँ मेहताब मिला। कल ही आया है, परसों उसकी परीक्षा खत्म हुई है। उसने बताया कि 9 मार्च की शिवगंगा की पार्टी का कार्यक्रम मेरे यहाँ रहते ही तय हो गया था। विनय पाण्डे मसनी गया था और वहीं मेहताब भी था, तभी बात होकर तय हो गया था। और पाण्डे ने वहीं से मेहताब की महेश जी से भी बात करा दी थी। ताड़ी तो यहाँ आने के बाद जुड़ गई। शहरी चालाकी का कोई अंत नहीं है, यह मैं ठीक से समझ पा रहा था। परंतु मेहताब को आश्चर्य हुआ कि मुझे ये सब मालूम नहीं है। उसने स्पष्ट कहा कि उस दिन जिस तरह से ताड़ी पीकर सब नशे में धुत्त हो गये और बहकी-बहकी बातें करने लगे, तभी मेहताब को लगने लगा था कि इनका यहाँ रहना ठीक नहीं है। मेहताब थोड़ा संघ विरोधी भी है और उसे लगा कि ये लोग संघ का ही काम करेंगे। मैंने अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए ये बताया कि अब यहाँ रहने का विचार तो त्याग दिया है लेकिन संबंध बनाये रखूँगा और आना-जाना लगा रहेगा।
नदी तरफ गया, जहाँ आज नदी की मन्नत पूरी करने के लिए बलि प्रदान और पूजा हो रही है। साल में एक बार सारा फलिया मिलकर नदी को बलि प्रदान करता है।
“माई, हमारी फसल को सींचते रहना और हमारी मोटरों की रखवाली करना और गाँव के किसी आदमी की सिंचाई करते हुए बलि मत लेना।”
सब अलग-अलग अपने-अपने खेत में मोटर के पास नारियल फोड़ते हैं, पूजा करते हैं, फिर एक जगह इकट्ठे होकर बकरे की बलि देते हैं। गाँव के ज़्यादातर लोग वहीं मिल गए-प्रताप, सरदार सिंह, मेदला, राम सिंह, थान सिंह, वगैरह। नारियल खाकर वापस सरपंच के घर आ गया। धूप भी काफी हो गई। जुगड़िया दादा रास्ते में मिल गया, नदी की तरफ़ जाते हुए। राजू उसके खेत में हार्वेस्टर से गेहूँ उड़ाते मिला। उसकी माँ और भतीजी मनीषा और भाभी खूब खुश हुए। मैं सोच रहा था कि किसी नई जगह जाना, वहां लोगों के आत्मीय हो जाना और जब लगने लगे कि दूरियां ख़त्म हो गई है और अब साथ-साथ रहा जा सकता है, काम किया जा सकता है, तभी एकाएक सबकुछ प्रतिकूल हो जाना। कमोबेश निश्चित हो रहे रहवास को छोड़ना वास्तव में काफी कष्टदायी प्रक्रिया है। परंतु इस सच्चाई को जितनी जल्दी और बिना पूर्वाग्रह के स्वीकार कर लिया, उतनी ही जल्दी सुकून मिलने लगता है और नई राह का रास्ता आसान हो जाता है।
उधर भारत सिंह ने न तो किसी को बताया था कि मैं आ रहा हूँ और न ही मेरे सामने आया। चोर की तरह -छुपता रहा। डूंगर और सावन परीक्षा देने गये हुए हैं। वेर सिंह के बेटे सुर सिंह को पता लगा होगा तो वह राजेश के साथ मिलने आ गया। यह वही अंधा बालक है जो भोपाल में पढ़ता है। बहुत देर तक बैठा रहा और खूब बातें की। बड़ा होशियार-समझदार और जागरुक लड़का है। दसवीं की परीक्षा दी है। बार-बार बोलता रहा कि आप यहीं रहो, अपना विचार मत बदलो, गाँव वाले धीरे-धीरे सब समझ जाएंगे। उसने कहा मैं तो जिससे भी बात करता हूँ सभी कहते हैं कि बहुत अच्छे आदमी हैं। पूरा गाँव सुधर जाएगा। लेकिन मकान क्यों नहीं बनाया? इसका जबाव कोई नहीं देता।
मैंने उसे समझाया बेटे बहुत-सी मज़बूरियाँ होती हैं। तुम्हें धीरे-धीरे समझ में आयेंगी। मैं इस गाँव में रहूँगा तो नहीं, लेकिन हमेशा जुड़ा रहूँगा। मैंने तो इसे अपना लिया है।
सुर सिंह से मिलकर बहुत अच्छा लगा। इस लड़के की मदद करनी चाहिए। सरपंच अभी तक लौटा नहीं। परिवारजनों ने एक बजे के करीब मुझे खाना खिला दिया। सरपंच की पत्नी ने गरम-गरम मक्के की रोटी बनाकर खिलाई, खूब अच्छी लगीं। उसकी माँ और सभी बेटियाँ आग्रह करके खिलाते रहे। उनका घर अब अपना घर ही लगने लगा है। खाकर थोड़ी देर लेट गया। यहाँ गर्मी कम लगती है। सोकर उठा तो सरपंच आ गया था और पेड़ के नीचे खाट डालकर सब बैठे थे। मैं वहीं चला गया। सुर सिंह तथा शंकर भी आ गए। जोबट से लौटते हुए डूंगर और सावन सिंह भी थोड़ी देर बाद आ गए। शंकर ने बताया कि गाँव के लगभग सभी लोग चाह रहे थे कि प्रताप के खेत वाला कमरा ठीक करके वहीं रहें, लेकिन भारत, उसकी पत्नी और माँ अड़ गए कि अपनी जगह रहने के लिए नहीं देंगे, हमारा नुकसान हो जाएगा। क्या पता कब्ज़ा ही कर लें। घर के बाकी लोगों ने बहुत समझाया। परंतु वे नहीं माने। मैंने भी लौटने की बात छेड़ दी।
सरपंच ने बाइक से बस स्टैंड छोड़ दिया और काम से निकल गया। जाते-जाते मन के अंदर से उसने कहा-आते रहना, संबंध मत तोड़ना। अनिल माहेश्वरी ने बताया शिवगंगा की ताड़ी पार्टी के बाद संघ के लोगों का बहुत दबाव बढ़ा कि इन लोगों से संबंध मत रखो। कुल मिलाकर खट्टाली यात्रा बड़ी सुखद रही।
24 अप्रैल, 2008 (कट्ठीवाड़ा)
भाबरा होते हुए साढ़े दस बजे के करीब कट्ठीवाड़ा के फॉरेस्ट रेस्ट हाउस पहुंच गए। बाज़ार से लगा हुआ ही है; ठीक है। इसमें दो कमरे हैं, एक कमरे में कुछ दिन टिका जा सकता है। फॉरेस्ट के स्थानीय अधिकारी मिलने आ गए। कट्ठीवाड़ा छोटी-सी जगह है। यह आलीराजपुर तहसील में एक विकासखण्ड का मुख्यालय है। दो-ढाई हज़ार आबादी होगी। जनपद पंचायत है और एक हाई-स्कूल है, साथ ही छोटा-सा बाजार है। इसका आदिवासी चरित्र अभी बचा हुआ है। ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों से घिरी हुई वादी है जिसमें आम और महुआ के पेड़ों के झुरमुट हैं। यहां तापमान झाबुआ से दो-तीन डिग्री कम तो रहता ही होगा। झाबुआ जिले का एकमात्र जंगल यहीं है। पुराने राजा की कोठी है और यहाँ राज घराने का प्रभाव अभी भी है। राजा तो बंबई चला गया था, उसका लड़का भी वहीं रहता था। भारत सिंह शराब पी पीकर और कैंसर से साल-दो साल पहले वहीं मर गया। उसकी पत्नी संगीता शायद बंबई में ही फैशन डिज़ाइनर है जो यहाँ के महल का रेस्टोरेशन करा रही है, शायद बेच दिया हो या बेचने के लिए। कुल मिलाकर अच्छी रमणीक जगह है कट्ठीवाड़ा। इसे झाबुआ का कश्मीर भी कहते हैं। लेकिन वैसा तो नहीं पर हाँ, झाबुआ का पचमढ़ी तो कह ही सकते हैं।
फॉरेस्ट रेस्ट हाउस में थोड़ी देर बैठकर और खाने की तैयारी करने का बोलकर दीपक और मैं उस इंडो-आस्ट्रियन कपल को टटोलने निकल गए। कट्ठीवाड़ा से भूरी अम्बा रोड पर थोड़ी सी दूर पर उनका अच्छा-खासा सेट-अप है। दीपक ने तो बताया ही है कि उसे बहुत अच्छे से पहचानते हैं और उनकी शादी में भी उसका योगदान था। देखते हैं! साधना इंदौर की है, महाराष्ट्रीयन ब्राह्मण परिवार की। हैरविग ऑस्ट्रिया का है। दोनों इंदौर में बहाई इन्स्टीट्यूट में साथ रहे हैं और वहीं शादी कर ली। हैरविग बहाई धर्म को मानने वाला है। लगभग 15 साल पहले शादी की है और करीब 10 साल से यहाँ काम कर रहे हैं। सन् 2000 से यहीं रह रहे हैं। कुछ ज़मीन खरीदकर उसी पर अपने रहने की आधुनिक जगह, कार्यालय, बच्चों के खेलने की जगह. वर्कशॉप के लिए हॉल और बगीचा बना लिया है। दोनों 45 से 55 के बीच के होंगे। अच्छे लोग लगे। ‘कल्याणी इंस्टीट्यूट फॉर कम्युनिटी डेवलेपमेंट’ के नाम से काम करते हैं। बहुत-सी शासकीय योजनाओं में काम कर रहे हैं। बहुत ही सुंदर घर बना रखा है। साधना ने याद दिलाया कि 1998 में यहाँ पहली बार ये लोग दीपक के साथ ही आए थे। दोनों ही काफी समझदार, समर्पित और मित्रवत लगे। उनसे मिलकर अच्छा लगा।
साधना-हेरविग के घर में शाम बहुत सुहानी लगी। उन्होंने बड़ी अच्छी जगह घर बनाया है। पूरा घर घूमकर देखा। सभी आधुनिक सुविधाओं से लैस है। शादी के फोटो देखे, जहां दीपक भी विशिष्ट व्यक्ति के रूप में दिखाई दिए। फिर बैठकर बातें शुरू हुई। दीपक के साथ पुराने संबंधों और अन्य परिचितों की बातों में ही काफी समय निकल गया। खाना काफी अच्छा बनाया, सादा भोजन। ये लोग शाकाहारी भोजन ही करते हैं और पीना-पिलाना भी बिल्कूल नहीं। हेरविग को तीन साल पहले हार्ट अटैक भी हो चुका है। हेरविग 54 वर्ष का है और साधना 45। दोनों कुछ साल आस्ट्रिया में भी रहे। हेरविग की मातृभाषा जर्मन है और साधना की मराठी। खाने के बाद फिर बातें करने बैठ गये और अच्छे प्रशासन की मिसाल के तौर पर दीपक ने नरेंद्र मोदी की प्रशंसा शुरू कर दी। हेरविग गोधरा को लेकर बहुत दुःखी है। फिर तो अच्छी-खासी बहस छिड़ गई। उस समय मुस्लिम-ईसाई भगाओ आंदोलन के चलते हेरविग पर तीरों से आक्रमण भी हुआ था और वह बाल-बाल बचा। कुल मिलाकर हेरविग की भारत और भारतवासियों के बारे में बिल्कुल भी अच्छी धारणा नहीं है। पता नहीं फिर यहाँ क्यों रह रहा है? जब पता लगा कि मैं अभी रुक रहा हूँ तो दोनों कहते रहे कि उनके ही घर में रहूँ। मैंने कहा मिलते रहेंगे, कोई कमरा देखना है। कुल मिलाकर बहुत अच्छा लगा इनसे मिलकर। सभ्य और ईमानदार लोग लगे। दीपक वापस धार चला गया।
रेस्ट हाउस में नींद अच्छी आई। सुबह घूमने के बाद वापस रेस्ट हाउस पहुँचा तो रेंजर साहब मिलने आ गए। उनसे भी कहा कि कोई रहने लायक कमरा तलाश करवाएं। नहा-धोकर थोडा पढ़ने-लिखने बैठ गया। विजय सिंह ने खाना लगा दिया। खाने बैठा ही था कि उसी समय साधना खोज-खबर लेने आ गई। मैंने सोचा था उसको शाम को फोन करूँगा। करीब आधा घंटा बैठी और कहती रही कि उन्हीं के घर चलकर रहें। मैंने कहा यह तो सम्भव नहीं है। उनकी यह भी इच्छा है कि उन्हीं के साथ जुड़कर काम करूँ। मैंने कहा आगे देखते हैं, क्या होता है। वह मेरे बारे में पूछती रही। वैसे भी कल तो दीपक ने किसी को बोलने का मौका ही नहीं दिया था। साधना ने कहा कि कल सुबह उनके साथ नाश्ता करूँ और फिर साथ में उनका कार्यक्षेत्र देखने चलूँ। दोपहर तक या तो लौट आयेंगे या फिर वहीं किसी गाँव में खा लेंगे। मैंने कहा ठीक है, कल सुबह आठ बजे आता हूँ। साधना अच्छी सुलझी हुई, साफ-सुथरी गंभीर लड़की लगी। उसमें पारिवारिक लड़की के भी गुण और समझ दिखती है। हेरविक काफ़ी तेज़ और तुनक मिजाज़ लगा। मुझे लगा साधना ही उसे संभालती होगी। आगे शायद इनसे संपर्क बना रहे।
शाम को दूर तक घूमने निकल गया-पहाड़ों के पास तक। दूर-दूर तक मैदान ही मैदान हैं और आम तथा महुआ के सैकड़ों पेड़ों के झुरमुट। यहां गर्मी अपेक्षाकृत बहुत कम है। बड़ा सुंदर स्थान है। मुझे लगता है कि सही समय पर जोबट क्षेत्र से निकलकर कट्टीवाड़ा आ गया-जैसे प्लान किया हो। लौटकर आया। थोड़ी देर विजय सिंह से बातें करता रहा। अच्छा लड़का है। एक सस्ती सी घड़ी उसे दे दी तो बहुत खुश है। सादा खाना अच्छा बनाता है। बहुत दिन बाद अपने पैसे खर्च करके खाना खा रहा हूँ। खाने-पीने का सब जरुरी सामान यहाँ मिल जाता है। बिजली ही नहीं है और जब बिजली नहीं रहती तो फोन भी नहीं चलता। यहां नींद अच्छी आई। सुबह ठण्डक हो जाती है। मच्छरों को शायद पता नहीं है कि झाबुआ जिले में कट्ठीवाड़ा भी कोई जगह है। बड़ी राहत है। आज साधना-हेरविग के साथ घूमने जाना है। अब अपने रहने के लिये मकान भी तलाश करना है।
सुबह घूमते हुए राजेन्द आश्रम गया। काफी सारी जमीन लेकर आदिवासी बालकों के लिए छात्रावास, स्कूल और खेत-खलियान, डेरी सभी बनवाया हुआ है। बंबई के किसी सेठ चुन्नीलाल महाराज ने करीब 50 साल पहले डॉ. राजेन्द्र प्रसाद से प्रभावित होकर यहाँ रहना शुरू किया था और यह आश्रम धीरे-धीरे बना। अब तो एक ट्रस्ट बन गया है, जिस पर वर्तमान में शायद संघ का कब्जा है। एक कन्या आश्रम भी अलग से बन गया है। देखने में तो बहुत प्रभावशाली लगा, अंदर से अब जैसा भी हो।
अगले दिन बहुत दूर तक घूमने गया, झरने तक। इस समय तो झरने में पानी नहीं है। परंतु आम का बगीचा भरा हुआ है, पेड़ लदे हुए हैं और भी फल हैं-चीकू, काजू वगैरह। बहुत सुंदर बगीचा है। आज कहीं जाने का मन नहीं है। दिनभर रेस्ट हाउस में ही रहूँगा। दोपहर में लिखता-पढ़ता रहा। यहां दोपहर में गर्मी हो जाती है और लाइट भी नहीं रहती। शाम को फॉरेस्टर गजेन्द्र सिंह के साथ घर तलाशने निकला। अभी तक तो कोई ठीक ठाक सा नहीं मिला। उसके बाद पार सिंह के घर गया। वह बहुत उत्साही भिलाला युवक है। उसकी छोटी सी चाय, खाने की दुकान है और फलिया में रहता है। अस्पताल में अभी-अभी उसका भतीजा हुआ है। कहता है गाँव में ही किसी घर में रहने की व्यवस्था कर देगा। यहाँ सर्व-धर्म उत्सव समिति से भी जुड़ा हुआ है। कट्ठीवाड़ा में मुस्लिम आबादी काफी बड़ी है-बोहरे ज़्यादा हैं, ईसाई कम हैं। यह वही सर्वधर्म समिति है जो गणेशोत्सव मनाती है और शिवगंगा की बैठक में जिसका मज़ाक उड़ाया गया था और मैं नाराज हुआ था। अब शायद शिवगंगा का साथ छूट ही जाए।
हेरविग को फोन किया तो साधना ने उठाया। बोली अब कल सुबह इंदौर जा रही है और शायद एक को लौट पाएगी। मुझसे अभी मिलना शायद ही हो पाए। मुझे ‘विभूदा’ कहने लगी है। सुबह घूम रहा था तो बस स्टैण्ड पर साधना और हेरविग मिल गए। साधना बस में चली गइर्। हेरविग छोड़ने आया था। मैंने कहा मैं दोपहर में आऊँगा। मैंने उसे बताया कि पार सिंह मकान ढूँढ़ रहा है।
नहा-धोकर साढ़े दस के करीब हेरविग के घर के लिए निकला। यहाँ से करीब डेढ़ किलो मीटर है। रास्ते में गर्मी नहीं लगी, हवा में ठंडक है। हेरविग काम में लगा हुआ है, कम्प्यूटर पर। उसने मुझे अपनी लाइब्रेरी दिखा दी। “दी मोन्क हू सोल्ड हिस फेरारी” रॉबिन शर्मा की किताब दिख गई। कुछ खास नहीं। हिन्दू दर्शन को ही अपने शब्दों में बिना किसी का नाम लिए स्वरचित जैसा है-कुछ गीता से, कुछ उपनिषद, कुछ महाभारत और यहाँ तक कि संत कबीर भी बिना पहचान बताए उल्लेखित हैं। सिर्फ पतंजलि का उल्लेख है, योग और ध्यान के संबंध में चर्चा करते हुए। बस शुरूआत और अंत बड़ा रोचक है। किसी को भी ऐसा लगे कि जैसे इसे पढ़कर मैंने यह जीवन अपनाया, या फिर ये कि मुझे देखकर एक काल्पनिक चरित्र रचा गया। व्यक्ति और परिस्थितियों में बहुत समानताएँ हैं। खाने के समय और शाम को हेरविग के साथ थोड़ी-बहुत बाचतीत होती रही। आदमी तो ठीक-ठाक है, लेकिन बहुत मित्रवत नहीं है। व्यवहार में कुछ रूखापन है। भारतीयों के प्रति उसकी धारणा काफी खराब है। कुछ भी हो परंतु यहाँ रहने के लिए अच्छे साथी हो सकते हैं। साधना तो बहुत मिलनसार है, दोनों बहाई हैं।
चाय पीकर वापस रेस्ट हाउस लौट आया। गजेन्द्र सिंह के साथ कुछ जगह मकान तलाश किए और फिर पार सिंह के घर गया। वह मिला नहीं काफी देर इंतजार भी किया। एक अधबने घर को देने के लिए शायद तैयार हो जाएंगे, ऐसा लगता है। उनसे पार सिंह ही बात करेगा। गजेन्द्र सिंह को तो अभी तक सफलता नहीं मिली है। मकान की व्यवस्था करके ही यहाँ से जाना चाहता हूँ, जिससे लौटकर उसमें रहना शुरू कर दूँ। उम्मीद तो है कल तक यह हो जाना चाहिए। सुबह घूमने गया तो पार सिंह उसकी दुकान पर मिल गया। बताया कि गोविन्द मकान देने को तैयार हैं, दरवाजे वगैरह का काम कराना पड़ेगा। सुनकर मन बड़ा प्रसन्न हो गया। अब दस बजे के करीब देखने जाएंगे और तभी सब तय कर लेंगे। वैसे अन्दर फलिया में ही एक दूसरा कच्चा मकान भी है, घर के नजदीक। सुबह तो फलिया वाला मकान अन्दर से देखने को नहीं मिल पाया। दोपहर में जिसका मकान है शैलेन्द्र वास्केल वह आ गया। नौजवान लड़का है, अभी शादी हुई है। पिता की मृत्यु हो गई है, माँ बाहर नौकरी करती है। भला लड़का लगा। पार सिंह का भक्त है। 5 बजे उसका घर देखने गया। वह तो नहीं मिला, उसकी माँ ने दिखाया। बहुत अच्छा लगा। कट्ठीवाड़ा-कोठार मोहड़ा सड़क पर है। यहाँ से करीब आधा किलो मीटर की दूरी पर। बस्ती से थोड़ा अलग-थलग। लेट्रीन-बाथरूम और पानी की व्यवस्था करनी होगी। घर में चार कमरे हैं। दो मिल गए तो भी काम चल जाएगा। पार सिंह बाद में मिल गया। अब कल सुबह सब कुछ तय होकर कुछ पैसे दे दूँगा जिससे व्यवस्था शुरू हो जाए।
28 साल बाद फिर 300 रुपए किराए पर मकान
शैलेन्द्र का परिवार मिल गया। चार कमरे का मकान है, दो दे रहे हैं। बाकी अपने पास रखेंगे। कल उसकी माँ ने किराया 350 रुपए बताया था और आज शैलेन्द्र ने कहा 250 रुपए दे देना। मैं एक हज़ार एडवांस देने लगा तो पाँच सौ वापस कर दिए। मैंने किराया 300 रुपए महीना तय कर दिया। आज से 28 साल पहले मई 1980 में भोपाल में 300 रुपए महीने किराये पर मकान लिया था। उस समय हमारे लिए बड़ी रकम थी। आज फलिये गाँव के मकान के हिसाब से बड़ी राशि है। पिछला पूरा जीवन जैसे कुछ क्षणों में आँखों के सामने से गुजर गया। करीब 28 साल बाद कमोबेश उसी स्थिति में। उसी तरह तोल-मोल करते,बेहद रोमांचक लग रहा है। इस उम्र में नई शुरुआत का भी अपना ही रोमांच है। आज लग रहा है कि असुरक्षा कितना उर्जावान और आत्मविश्वासी बना देती है। तब भोपाल मेरे लिए निपट नया था और आज कट्ठीवाड़ा भी एकदम नया है। कल से यानी 1 मई 2008 से किरायेदारी शुरू और मैं कट्ठीवाड़ा का निवासी हो जाऊँगा। बहुत सुखद अनुभूति है। करीब एक हफ़्ता लग ही गया ढूँढ़ने में। अब फिर एक नई तरह से शुरूआत होनी है। मुझे तो यही लग रहा है कि अब ये आखिरी शुरूआत है!
क्रमशः…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा की सभी कड़ियां यहाँ देखेंः
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-1: अनजान द्वारा खुद को समझे जाने से जीवन मनोहारी हो गया
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-2: भोजन करने और भोजन पाने के बीच का अंतर भी समझ आने लगा
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-3: उसने मेरे पैर छू कर कहा, बाबा, कहीं मत जाओ…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-4: मैंने सोचा, खतरनाक होने के लिए खतरनाक होना जरूरी नहीं होता
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-5: वाह, पचास रुपए? बड़े दिनों बाद इतने रुपए एक साथ देखे थे…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-6: जीवन में पहली बार रोजदारी की थी, वह भी भक्ति की!
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-7: भोपाल करीब आने लगा तो मैं ट्रेन में ऊपर चढ़कर बैठ गया…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-8: दोनों घूम-घूम कर पार्टी का प्रचार कर रहे हैं, सावधान रहना
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-9: नक्सलवाद के एक काल्पनिक बिजूके को प्रतीक बनाया गया
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-10: मैंने अपना पूरा नाम बताया तो वे एकदम उछल पड़े…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-11: कथा वाचक की नई भूमिका, मुझे अंदर से हँसी आ रही थी…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-12: वृंदावन की कुंज गली में बदल गया मेरा नजरिया
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-13: ब्रज जा कर जाना, श्रद्धा से किस तरह आनंदित रहा जा सकता है
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-14: मैं बाबा नहीं बन पाया…मैं हार गया!
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-15: अहसास हुआ कि लोग सफर को मंजिल से बेहतर क्यों बताते हैं…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-16: मैं संघ का भेदिया हूं, वकील तो ऐसे होते नहीं हैं…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-17: घर बनते जाते हैं, जमीन बंटती चली जाती है लेकिन रहते सब साथ-साथ हैं
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-18: सौ दिन पूरे… लगता है घर से बहुत दूर न जाकर गलती कर दी
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-19: मैं सन् उन्नीस सौ बावन में सातवीं फेल हुआ हूं…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-20: संभवतः किसी को उम्मीद नहीं होगी कि मैं इस तरह फट पडूंगा…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-21: दहेज का दबाव न हो तो हर मर्द चार-पांच ब्याह कर लेगा
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-22: पूरे पच्चीस साल बाद पैदल अपने गांव भंवरताल जा रहा हूं…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-23: अपने गांव भंवरताल में हूं; एक वो दिवाली थी, एक ये दिवाली है, एकदम अलग
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-24: खबर फैल गई कि मैं ‘बैरागी’ हूं, इनाम नहीं मिलेगा
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 25ः भंवरताल में आखिरी रात है, पता नहीं कब आना होगा…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 26ः वकालत छोड़ी, फिर अपनाई, मैं उलझता चला जा रहा था…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 27: उस दिन मैं अचानक छोटा-मोटा ‘महामानव’ बन गया… मगर
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 28ः चोम सिंह ने समझा दिया, 21 वीं सदी में अपनी शर्तों पर जिया जा सकता है
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 29ः आज ऑफिस में लगेगा ताला, नाम पट्टिका हट जाएगी
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 30ः उन जगहों पर लाैटना जहां कभी मन बैरागी बन कर गया था…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 31ः स्वामी अवधेशानंद बाेले, विभूति जी आप अवश्य आइए, मुझे प्रतीक्षा रहेगी
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 32ः नाते-रिश्तेदार ‘माता-पूजन’ कर मनाते हैं ईंद, हैं न अनाेखी बात
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 33: बुढ़े ने रहने बुला लिया, हम सामान लिए चले आए, रात में बोला, घर से निकलो
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 34ः बाबा, मैं ठीक होना चाहता हूँ… बाबागिरी मेरा पीछा नहीं छोड़ रही
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 35ः ऐसा लगा जैसे दुनिया जीत ली, सिर्फ तीन दिन बाद जबर्दस्त मुँह की खाई
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 36: काेई खेत नहीं गया, कोई बाजार, कोई स्कूल, राे कर बोले, बाबा मत जाओ
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 37: मैं विचलित हूं, मुझे बताए बिना महेश जी ने ऐसा क्यों किया?
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 38: जिसे ‘खूनी सोंडवा’ कहते हैं, मुझे वहीं मिला सबसे ज्यादा आनंद

