फैंड्री: सिर्फ सिनेमा नहीं, समाज का आईना

‘फैंड्री’ फिल्म ने एक बार फिर याद दिलाया कि जिंदगी अमर चित्रकथा जैसी बिल्कुल नहीं है। शहरों में पले बढ़े युवाओं को ‘फैंड्री’ के गांव को देखकर झटका सा लगता है। वह फिल्मों में नजर आने वाला कोई यूटोपियन गांव नहीं है।

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एक दूजे के लिए: एक खूबसूरत मौसम की याद

‘एक दूजे के लिए’ उस ज़माने की फ़िल्म थी जब प्रेम होते ही प्रेमीजन बिस्तर पर कूद नहीं जाते थे। प्रेम का मतलब तब रोमांस ही होता था,’लव मेकिंग’ नहीं। कुछ झिझक बाक़ी थी। उदारीकरण आठ दस साल और दूर था।

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लव ऑल: जिंदगी की कोर्ट पर अपना मैच

अगर यह कहूं कि यह फिल्‍म सिनेमा की भाषा में लिखी गई कविता है तो यह बहुत सतही टिप्‍पणी होगी। आसान सी। ऐसा लगेगा कि उस कवित्‍त तक पहुंचा ही नहीं जो सिनेमा में रचा गया है।

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