एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-41

- विभूति झा, सामाजिक कार्यकर्ता
संपादन: चिन्मय मिश्र
यह अनिवार्य रूप से घटित हुआ भी एक साधारण दस्तावेज है। यह न तो कहानी है, न यात्रा वृतान्त। यह एक व्यक्ति की “लौटने” की गाथा है। विभूति दा की यह डायरी अबूझ सी सच्ची कहानी है। यह सत्य की अभिव्यक्ति है। –चिन्मय मिश्र
मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल जिले मंडला से निकलकर सागर विश्वविद्यालय से एमए और एलएलबी। फिर जेएनयू (नई दिल्ली) से समाज विज्ञान में शोधकार्य किया। भोपाल से वकालत शुरू की और भोपाल गैस त्रासदी मामले में गैस पीड़ितों के वकील बने। एक युवा वकील ने बड़े बड़े वकीलों की दलीलों को खारिज कर भोपाल गैस पीड़ितों को मुआवजा दिलवाने की लड़ाई जीती। जिला अदालत से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक पैरवी और फिर एक दिन अचानक पूरी प्रसिद्धि, अपने समृद्ध भविष्य की संभावना को पुराने वस्त्र की तरह उतार कर चल पड़े एक नए जीवन की खोज में। मन में विचारों का उफान और तन पर एक जोड़ी कपड़ों के साथ सबकुछ छोड़ दिया। परिवार भी। किसी फिल्म की पटकथा सा लगता यह इस डायरी के लेखक विभूति झा के जीवन की वास्तविकता है। एक ऐसा मंथन जो जीवन उद्देश्य खोजने की दिशा में बढ़ा और इस राह में उतने ही विविध अनुभव हुए। यह एक विस्तृत जीवन से साक्षात्कार है। किश्त-दर-किश्त रोचक होती जीवन दास्तां।
हरिद्वार/ऋषिकेश प्रवास 23 मई, 2008
मेघनगर पहुंचकर पता लगा ट्रेन लेट है। स्टेशन के नोटिस बोर्ड पर पढ़ा हमारी पश्चिम एक्सप्रेस और बम्बई-दिल्ली के बीच अन्य गाड़ियाँ मार्ग बदल कर नागदा-भोपाल होकर लम्बे रास्ते से चलाई जा रही हैं। मालूम हुआ कि आज से राजस्थान में गुर्जर आन्दोलन शुरू हो गया है। मैंने कहा फँस जायेंगे? महेश जी ने कहा चलते हैं।
करीब 45 घंटे की निरन्तर यात्रा के बाद अंततः लगभग दो-ढ़ाई बजे घनघोर आधीरात में भोपाल से हरिद्वार पहुँच ही गया। दिल्ली से महेश जी का मोबाइल चलता रहा और आखिर में यह तय हुआ कि हरिद्वार पहुँचकर भीम गौड़ा में हर की पौड़ी से आगे जयराम आश्रम में एक कमरे में जगह मिल जाएगी। अब हरिद्वार बस स्टैंड से भीम गौड़ा जाना है। बड़ी मुश्किल से एक ऑटो वाला तैयार हुआ। बड़ा भारी आश्रम है। आश्रम क्या एक बड़ा-सा हॉटल ही है। अनुनय-विनय करके मुश्किल से गेट खुला और तीन बजे के करीब बिस्तर पर लेट गए। आश्रम एकदम गंगा किनारे है और इस समय अच्छी हवा चल रही है। लेटते ही नींद आ गई।
कमरे में बाथरूम तो है, लेकिन आश्रम के नीचे ही सुन्दर घाट है। मई की भयंकर गर्मी में गंगाजी के बर्फ की तरह ठंडे पानी में घुसकर खूब नहाये। कई साल बाद गंगा में नहाया। धार्मिक दृष्टिकोण से चाहे जो भी हो, लेकिन यह तो निश्चय है कि गंगा की महिमा निराली है। इसके तट पर कम-से-कम यहाँ आकर एक अलग-सी अनुभूति होती है, पवित्रता और शांति की। रुड़की से लेकर इस तरफ़ एक अलग-सा माहौल है। भयंकर गर्मी में इतनी हरियाली और बीच-बीच में ठंडी बयार। सच है कि गंगा की तुलना किसी भी दूसरी नदी से नहीं की जा सकती। यहाँ तो गंगा का पानी और घाट काफ़ी साफ-सुथरे भी हैं। बनारस में जाकर बहुत गंदगी हो गई है लेकिन रात में तो बनारस के घाट पर भी बहुत अच्छा लगता है। दिसम्बर 1991 में रात में बनारस में गंगा के किनारे घूमा था, दिन में तो शायद कर्फ्यू लगा हुआ था-बाबरी मस्ज़िद गिराने की पहली असफल कोशिश जो ठीक एक साल बाद सफल कर दी गई – 6 दिसम्बर, 1992। इतनी सुंदर और पवित्र तथा शांत जगहों को धार्मिक उन्माद का कोपभाजन होना पड़ता है। क्या यही ‘धर्म’ की अंतिम परिणति है? ‘धर्म’ क्या है? जाहिर है ‘धर्म’ को परिभाषित किया जाना आवश्यक है। मगर करेगा कौन? और किसी ने कर भी दिया तो मानेगा कौन?
हर्ष जी दो दिन पहले से यहाँ आकर रुके हुए हैं उनके साथ इन्दौर के केशव विद्यापीठ की टीम भी है। केशव विद्यापीठ भी संकटग्रस्त है। ये लोग आपसी मन्त्रणा करने और स्वामी जी का आशीर्वाद लेने आए हुए है। स्वामी जी अपनी कुटिया में दैनिक कर्मकांड के बाद साढ़े नौ बजे के करीब दर्शन देते हैं। हम लोगों को तभी उनसे मिलना है। नाश्ता करके सब कनखल के लिए निकल पड़े। यहाँ से कनखल 5-6 किलो मीटर होगा। कनखल में बाकी आश्रमों की अपेक्षा छोटा ‘हरिहर आश्रम’ है जिसे ‘जूनापीठ’ कहते हैं। ‘जूना’ यानी ‘प्राचीन। यही स्वामी अवधेशानन्द गिरी की पीठ है। बताते हैं कि कुंभ आदि में जूनापीठाधीश्वर का ही प्रथम स्थान होता है और इस दृष्टि से यह महत्वपूर्ण है। स्वामीजी के व्यक्तित्व के कारण भी शायद इसका महत्व बढ़ गया है। स्वामीजी देश-विदेश घूमते रहते हैं और ‘रामकथा’ कहते हैं। शैव संप्रदाय प्रमुख और रामकथा? टी.वी. पर भी प्रसारित होते हैं। अभी कुछ दिन पहले किसी ने मुझसे कहा था कि टी.वी.पर जितने भी संत-महात्माओं के प्रवचन आते हैं, उनमें अवधेशानन्द ही ठीक लगते हैं। अभी-अभी इसरायल के किसी समारोह में भाग लेकर लौटे हैं। कनखल को देखकर स्पष्ट झलकता है कि गंगा किनारे का मूल धार्मिक स्थान यही है और हरिद्वार बाद में बसाया गया आधुनिक केन्द्र है। कनखल में बड़े-बड़े पुराने आश्रम बने हुए हुए हैं। महात्मा गांधी मार्ग पर है ‘हरिहर आश्रम’ । लगभग आधा एकड़ क्षेत्र में होगा। एक प्राचीन शिव मंदिर, जिसका आधुनिकीकरण चल रहा है। एक नया पारेश्वर महादेव मंदिर, जिसका उद्घाटन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने किया था। एक प्राचीन कुटिया-जिसके बगल में आधुनिक सुविधायुक्त भवन बन रहा है और एक पाकशाला तथा अन्य साधुओं के रहने का धर्मशालानुमा स्थान।
महेश जी स्वामी अवधेशानंद को उनके वर्तमान अवतार के पूर्व से जानते हैं। वह पश्चिमी उत्तरप्रदेश के खुर्जा जिले के ब्राह्मण परिवार में जन्मे वैष्णव ब्रह्मचारी हैं। डॉक्टरी शिक्षा प्राप्त की है और उसी काल में आर.एस.एस. के प्रचारक बन गये। बाद में हरियाणा में विश्व हिन्दू परिषद् के प्रमुख रहे। आर.एस.एस. में संगठनात्मक मतभेद होने पर साधू बन गए और वैष्णव से शैव सम्प्रदाय अपना लिया। महंत, मण्डलेश्वर और फिर जूनापीठ के महामण्डलेश्वर, यह इनकी यात्रा रही। जूनापीठ पर रहते हुए हरियाणा और मध्यप्रदेश में काफी भक्त मण्डली जुटा ली और साधुओं के बीच प्रभाव बढ़ गया। अम्बाला में इनका एक बडा केन्द्र है। राजस्थान में भी भक्त है। लगभग साठ वर्ष के प्रभावशाली व्यक्तित्व वाले साधु हैं, जो हिन्दी के साथ-साथ अंग्रेजी भी समझते हैं और ठीक-ठाक बोल लेते हैं। इसलिए भी साधुओं के बीच एक महत्त्वपूर्ण स्थान है। स्वामी जी अति-महत्वाकांक्षी हैं। धार्मिक कर्मकाण्ड के साथ ही साथ लोक-व्यवहार में भी कुशल हैं। झाबुआ जिला और शिवगंगा पर उनकी विशेष कृपा है।
भोपाल में इनकी रामकथा की शुरूआत अर्जुन सिंह के पुत्र राहुल सिंह ने की थी। इन्दौर में भाजपा के लक्ष्मण सिंह गौड़ ने इनके विभिन्न कार्यक्रम कराए, हर्ष जी वगैरह सब इन्दौर के कार्यक्रमों के संयोजक रहे हैं। उसके बाद इन लोगों ने शिवगंगा की ओर से झाबुआ में रामकथा कराई और झाबुआ के कुछ क्षेत्रों में घुमाया। तभी से शिवगंगा से जुड़ गये। अभी ये लोग जनवरी का कार्यक्रम तय करने आये हैं। दस बजे के करीब स्वामी जी दर्शन देने के लिये निकले। भीड़ में महेश जी को पहचान लिया और सार्वजनिक दर्शन के बाद अलग से मिलाने की हिदायत अपने चेलों को दे दी। शिव मंदिर में स्वामी जी स्वयं विशेष यजमानों के लिए पूजा करते हैं, वहाँ भी महेश जी और मुझे प्रवेश दिलवा दिया। 12 बजे के करीब हम लोगों से अलग से थोड़ी बात की। हर्ष जी ने उनके झाबुआ कार्यक्रम की तिथियाँ नियत करने की बात की। भीड़ काफी है। स्वामी जी ने अपनी एयर कंडीशंड कुटिया में बुलाकर और विशिष्ट अतिथियों के साथ बैठाया। कुछ साधु-सन्त भी बाहर से आए हुए हैं। दो-तीन श्रेष्ठि परिवार भी हैं और मध्यप्रदेश के पूर्व मंत्री लक्ष्मण सिंह गौर की विधवा मालिनी और पुत्र भी। एक भजन गायक दम्पति कुछ देर गाकर सुनाते रहे। फिर एक लड़की से भजन सुनाने को कहा गया। उसकी माँ और नानी भी साथ है। लड़की ने गाना शुरू किया और बहुत ही अच्छा गाया। उसके हाव-भाव कुछ असामान्य से लगे और आँखें भी। बाद में बताया कि यह चंडीगढ़ की तेजस्विनी है जो लगभग बीस साल की अर्द्ध-विकसित लड़की है। वैसे तो वह ठीक से चल नहीं पाती और बोल नहीं पाती। इतना ही नहीं 12 साल की उम्र तक तो कुछ भी नहीं बोली, फिर भजन गाना शुरू किया और अब उसे दो सौ भजन आते हैं। इस लड़की से मिलकर बडा अच्छा लगा और अपनी छोटी बहन अर्चना की बेटी भव्या की बहुत याद आई। लगभग उसी के जैसी है। भव्या को अगर समय पर संभाला जाता तो शायद आज कुछ और होती। इस लड़की पर स्वामी जी की विशेष कृपा है। यह भी समझना होगा कि उसके साथ जो हुआ वह चमत्कार है या क्रमिक विकास।
आश्रम में अन्नक्षेत्र यानी लंगर भी चलता है। स्वामी जी ने साधु-संतों के साथ बैठा कर भोजन करवाया। भोजन के समय बताया कि भोपाल में कोलार के पास काफी सारी ज़मीन ली है, जहाँ आधुनिक आश्रम, शिक्षा केन्द्र, स्कूल आदि बनाने का विचार है। इसमें सबके सहयोग की आवश्यकता होगी। भोजन के बाद सभी साधु-सन्तों और गुरु भाइयों को विदाई देकर ससम्मान विदा कर दिया गया। झाबुआ का कार्यक्रम जनवरी के अन्त में रखने के लिये तारीखें निकाली गईं जिसके लिये बाकायदा एक सचिवनुमा सन्यासी डायरी और कैलेण्डर लेकर आया। स्वामी जी ने कहा शाम को लगभग 7बजे से खुले मंच पर कार्यक्रम होता है, जिसमें गाने-भजन होते हैं और स्वामी जी लिखित प्रश्नों के उत्तर देते हैं। उसके बाद भोजन यहीं करने का कहकर विश्राम के लिये चले गये। यह भी कहा कि रात्रि भोजन के बाद महेश जी और मुझसे अलग से कुछ चर्चा करेंगे। उत्सुकता बनी हुई है कि क्या चर्चा होगी?
दोपहर में हम लोग आश्रम में ही रुके रहे। शाम को कार्यक्रम देखा। तेजस्विनी ने बहुत सुन्दर भजन गाये, कुछ अन्य गायकों ने भी। प्रश्न-उत्तर का कार्यक्रम भी अच्छा था। स्वामी जी अच्छे वक्ता हैं। सारे कार्यक्रम की वीडियो शूटिंग होती है और कैसेट्स बनते हैं। इस कार्यक्रम में काफी बड़ी संख्या में श्रद्धालु रहते हैं। दस दिन तक रोज़ यह कार्यक्रम चलता है। इस बीच हरिद्वार क्षेत्र में 2-3 दिन काफ़ी बारिश हो चुकी है इसलिए शाम बहुत अच्छी हवा चलती है, वरना हरिद्वार इस समय काफी गरम होता है। स्वामी जी का काफी बड़ा स्टाफ है जिसमें पुलिस गार्ड भी शामिल है। मध्यप्रदेश पुलिस के भी जवान हैं। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री ने भी दीक्षा ली है। अब और क्या कहा जा सकता है, जब……!
भोजन के बाद अलग से बैठना तय हुआ था लेकिन आज स्वामी जी की व्यस्तता बहुत अधिक है। कल सुबह हम लोगों को निकलना है। शाम को करीब 10 बजे दिल्ली से ट्रेन पकडनी है। इन्दौर वालों को 7 बजे मालवा एक्सप्रेस पकडनी है। स्वामी जी ने कहा कि सुबह 10 बजे अल्पाहार के बाद बैठेंगे और उसके बाद निकल जाएँ।
रात अच्छी नींद आई। यहां अच्छी ठंडक है। कल रात शायद ऊपर पहाड़ों की ओर काफ़ी वर्षा हुई है इसलिए गंगा का पानी मटमैला है। तय हुआ कि नौ बजे के करीब निकलना है। नहा-धोकर ‘जयराम आश्रम’ से सामान लेकर सब निकल पड़े। हरिहर आश्रम में अल्पाहार किया। इस समय तक रेल्वे से जानकारी मिल गई कि हमारी सम्पर्क क्रांति एक्सप्रेस रद्द हो गई है। कुछ गाड़ियाँ तो मार्ग बदलकर भोपाल होकर चलाई जा रही हैं, लेकिन इस तरह की राजधानी आदि गाड़ियाँ रद्द हो गई हैं। सम्पर्क क्रान्ति तो रतलाम, दाहोद, गोधरा भी नहीं रुकती, इसलिए तय था कि बडौदा उतरेंगे और वहाँ घूमते हुए वापस मेघनगर आएंगे। हिंदुस्तान में ईश्वर की कृपा तो आप पर हो सकती है, पर भारतीय रेल्वे कृपावान हो यह ज्यादा कठिन है। मेरी तो पहले ही इच्छा नहीं थी अभी लौटने की और अब ट्रेन कैंसिल होने के बाद तो एकदम ही नहीं है।
स्वामी जी ने कहा साढ़े दस बजे मिलते हैं। साढे दस बजे उनकी कुटिया में मिले तो और भी बहुत से लोग बैठे हुए मिले। स्वामी जी ने मुझे और महेश जी को उनके अन्दर के कमरे में बुला लिया और कहने लगे कि मुझसे लम्बी बात करना चाहते हैं, लेकिन अभी बहुत भीड़ है, आपको जाना है नहीं तो रात में फुर्सत से बात कर सकते थे। मेरी जिज्ञासा और भी बढ़ गई। मैंने महेश जी की तरफ देखा तो वह कहने लगे आप रुक जाइये। मैं तो खुद ही यही चाह रहा था। मैंने कहा ठीक है, स्वामी जी अगर चाहते हैं तो मैं एक दिन रुक जाता हूँ। स्वामी जी ने कहा यह तो बहुत अच्छा होगा और शाम को भोजन के बाद मिलने का तय करके सब बाहर निकल आए।
कुटिया से निकल मैंने महेश जी को भी किसी तरह रुकने के लिये राज़ी कर लिया। बाकी सब लोग दिल्ली निकल गए। अब ‘जयराम आश्रम’ तो छोड़ आए हैं। कहीं और व्यवस्था करनी होगी। स्वामी जी ने तो कह दिया था कि रुकने की व्यवस्था हो जाएगी। अब जब उनके कार्यालय में सम्पर्क किया गया तो समझ में आया कि वह किसी शासकीय कार्यालय की तरह ही काम करता है। इस समय हरिद्वार में बड़ी भीड़ है, पहले से बुकिंग करानी पड़ती है। आख़िर में कनखल में ही किसी हॉटल का पता दिया गया। इस आश्रम की व्यवस्था पूरी तरह से ब्यूरोक्रेटिक है। स्वामीजी के अपने सगे-संबंधी और नाते-रिश्तेदार यहां जमे हुए हैं जो सब कुछ अपने हाथों से नियंत्रित करते हैं। धनाढ्य व्यक्तियों का स्वाभाविक रूप से विशेष सम्मान है। स्वामी जी हमें विशेष सम्मान दे रहे हैं, जो सम्भवतः उनके स्टाफ और संबंधियों को कुछ जम-सा नहीं रहा है। झाबुआ के लिये कल 7 दिन का कार्यक्रम तय किया था, लेकिन उनके ‘सी.ई.ओ’ श्री गौर ने काटकर आज 5 दिन कर दिया। फाइनेन्शियल मैनेजमेंट का भी ध्यान रखना पड़ता है! स्वामी जी झाबुआ में धनार्जन नहीं करते हैं, इसलिए एक सप्ताह अधिक होगा!
महेश जी की इच्छा है कि बाबा रामदेव का पतंजलि योग केन्द्र देखा जाये। बाबा रामदेव ने अपना कामकाज मूल रूप से कनखल से ही शुरू किया था। वहाँ तो अब सिर्फ फार्मेसी है। नया भवन बहादुराबाद में है, रुड़की से पहले। यहाँ फार्मेसी से योगाश्रम तक उन्हीं की बस चलती है। बस में बैठ गए। इण्डस्ट्रियल एरिया में बड़ा भारी कारखाना है जिसमें ज़बर्दस्त सिक्यूरिटी है और कोई भी अन्दर नहीं घुस सकता। वहाँ से आधे घंटे में योगाश्रग पहुँचे। एकदम आधुनिक केन्द्र है और बहुत अच्छा उद्यान है, फव्वारे चलते हैं। बहुत से परिवार पिकनिक मनाते दिखे। 20-25 मिनिट ही रुक पाए। महेश जी ने कहा कल फिर आएंगे, पूरा देखेंगे।
‘पतंजलि’ से लौटकर ‘पार्थ’ में स्नान किया और ‘हरिहर’ में भोजन करने आ गए। भोजन के उपरांत स्वामी जी से बातचीत की प्रतीक्षा। साढ़े नौ बजे के करीब अपनी कुटिया में अन्दर के कमरे में मुझे ले गये और बोले−
“विभूति जी, मैं कुछ ऐसा करना चाहता हूँ कि धर्म लोकोन्मुखी हो और सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बने। ऐसा प्रयास जिससे शोषित-पीड़ित लोगों का कल्याण हो। झाबुआ से इसकी शुरूआत करना चाहता हूँ और आपका विशेष सहयोग चाहिये। मैंने मार्क्सवाद-लेनिनवाद पढ़ा है, लेकिन इसे और अच्छी तरह से समझने और अपने काम को उसकी कसौटी पर रखने के लिये आपसे समय-समय पर विचारों का आदान-प्रदान चलता रहे, यह चाहता हूँ।”
मैंने कहा “मुझे बड़ी प्रसन्नता होगी। आप जब और जहाँ चाहें मैं उपस्थित हो जाऊँगा। ऐसा कुछ हो सके तो बड़ा अच्छा होगा।”
स्वामी जी ने कहा “अभी तो बहुत देर हो गई और बाहर अभी बहुत लोग प्रतीक्षा कर रहे हैं। कल और विस्तार से बात करेंगे। ठीक चार बजे आ सकें तो एक घंटा पूरा मिल जाएगा।”
हम बाहर आ गए और महेश जी के साथ मैं निकल गया।
‘पतंजलि योगपीठ’ की यात्रा
सुबह नहा-धोकर महेश जी की इच्छानुसार ‘पतंजलि योगपीठ’ के लिये निकल गए। 9 बजे के करीब पहुंच गए। घूम-घामकर देख लिया। महेश जी की बाहों में काफी समय से खुजली होती है। सोचा उसका इलाज करा लें। करीब सवा घंटे में “नि:शुल्क परामर्श” का परचा बन पाया। एक आधुनिक युवा वैद्य जी के पास भेजे गये। लगभग पन्द्रह मिनट तक उनकी फोन पर किसी से अनवरत बातचीत चलती रही। फिर उन्होंने महेश जी को देखा। मशीनी तरीके से वे पूछते रहे और सिर झुकाए लिखते रहे और पर्चा लिखकर चलता कर दिया। पूरी व्यवस्था किसी सरकारी अस्पताल की तरह ही है। किसी की कोई व्यक्तिगत रुचि नहीं दिखती और न ही कोई कुछ बताने को तैयार दिखता। बहुत ही रूखा व्यवहार सामने आया। अच्छा-खासा आधुनिक भवन बनाकर खड़ा कर दिया है लेकिन यह अन्दर से खोखला है। दवाइयाँ यहीं से, इन्हीं की बनाई हुई लेनी होती हैं। दवाएँ 455 रुपए की आई। जब दवाइयों को ध्यान से देखा तो उसमें से 120 रुपए की तो महेश जी के रोग से सम्बन्धित है और शेष 335 रुपए हृदय रोग से संबंधित पूर्णतः अनावश्यक हैं। तो यह है “निःशुल्क चिकित्सा”! इसके बाद उनकी कैण्टीन में ‘ऑर्गनिक भोजन’ किया। यहां सामान्य से दो से ढाई गुना दाम लिया गया।
जितनी देर महेश जी ने परचा बनवाया था उतनी देर मैंने भवन की ऊपरी मंज़िलें घूमकर देखीं और वहाँ एक लाइब्रेरी दिख गई-जो खाली पड़ी हुई है। बस यही एक काम की चीज़ दिखी। बहुत समृद्ध लाइब्रेरी है- हिन्दू दर्शन और चिकित्सा की बिरली पुस्तकों के साथ ही साथ अन्य साहित्य भी यहां रखा हुआ है।
आज गीता आश्रम गए और वहाँ एक कमरा मिल ही गया-दो सौ रुपये में काफी बडा और अच्छा कमरा, बड़ी राहत मिली। ठीक चार बजे स्वामी जी की कुटिया के पास पहुँच गए। थोडी देर में अन्दर से ‘स्टाफ’ के एक सज्जन निकले तो उनसे कहा कि बता दें आ गये हैं, चार बजे बुलाया था। लौटकर आये और बताया कि एक आवश्यक मीटिंग चल रही है, एक घंटा रुकने को कहा है। बगीचे में हवा खाते हम बैठे रहे। पाँच बजे के करीब स्टाफ के दूसरे सज्जन निकले तो हमने कहा एक घंटा रुकने को कहा था, पूछ लीजिये। कहने लगा अभी तो आप नहीं मिल पाएंगे, समय नहीं है, स्नान के लिए जाना है और आवश्यक मीटिंग चल रही है, आप कोई दूसरा समय ले लें। मुझे लगा कि जैसे मेरे धैर्य की परीक्षा ली जा रही है और जाहिर है मैं ऐसी कोई परीक्षा देने को तैयार नहीं हूँ। अब मुझे थोड़ा-सा बुरा लगा और मैंने कहा उससे कि “उन्हें जाकर बता दो कि हमें नहीं मिलना था, उन्हीं को कोई काम था। हमारे पास अब समय नहीं है। उन्हें बता दो हम जा रहे हैं।”
बेचारे महेश जी कुछ परेशान से हो गए। वह आदमी अन्दर गया और स्वामी जी बाहर आ गए। अपना बड़प्पन दिखाते हुए क्षमा माँगी और कहने लगे “फाइनेंशियल मीटिंग” के लिये सी.ए. बाहर से आ गये थे इसलिए ऐसा हो गया। अभी दस मिनिट में गंगा स्नान करके आते हैं फिर बैठते हैं। जाइयेगा नहीं। स्वामी जी चाय तैयार करने का बोलकर कार में बैठकर अंगरक्षकों के साथ स्नान के लिए चले गये। स्वामी जी के चेलेगण हमें घेरकर खड़े रहे और बैठाने का प्रयत्न करते रहे। थोड़ी देर में स्वामी जी स्नान करके आ गये-यूडी कोलोन की खुशबू से तर-बतर। हमें कुटिया के अन्दर ले जाकर बैठाय और चाय पिलाई। बस हम दोनों ही रहे और अनौपचारिक बातें होती रहीं। कहने लगे, बहुत व्यस्तता रहती है, समय नहीं मिलता, भक्तों की भीड़ हो जाती है। मैंने कहा जो भी हो, आपका मैनेजमेंट बहुत अच्छा है। हर व्यक्ति को आप महसूस करा देते हैं कि आपके लिए वही सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। हँसने लगे। कहा प्रयत्न तो यही करता हूँ। मैंने कहा काफी हद तक सफल है आपका प्रयत्न।
थोड़ी देर में मुझे अंदर के कमरे में ले गये और कहने लगे−
“और सब बातों के लिए तो अभी समय नहीं है, बस दो बात आपसे अकेले में अभी करना चाहता था। एक तो यह कि झाबुआ में कार्य करते हुए यदि कभी-भी किसी भी तरह का अर्थसंकट लगे तो आप निःसंकोच मुझे फोन कर दें, मेरा मोबाइल नम्बर ले लें। दूसरा यह कि आप महेश जी का साथ न छोड़ें। वे बड़े भोले मगर लगनशील व्यक्ति हैं, लेकिन दृष्टि की कमी है। आप जैसे वृहद दृष्टिकोण और विचारशील व्यक्ति का साथ रहे तो बहुत कुछ कर सकते हैं। आप झाबुआ के लिये हमारे असेट हैं, आपके पास बहुत कुछ है। आप दूर मत जाना।”
बस इतना कहकर बाहर आकर फिर महेश जी के साथ बैठ गये। पूछने लगे अब आपका क्या कार्यक्रम है? हमने कहा अब ऋषिकेश जाएंगे और फिर वापस। बोले ऋषिकेश में रुकने का प्रबन्ध करा देते हैं और दिल्ली से इन्दौर का प्लेन का टिकिट करा देते हैं। यहाँ कहाँ रुके थे? उसका भुगतान करा देते हैं। मैंने कहा यहाँ तो रुक चुके और बेवजह आठ सौ रुपये दे चुके। यदि ऋषिकेश में व्यवस्था हो सके तो ठीक रहेगा। प्लेन का टिकिट तो कराने की आवश्यकता नहीं है, आपने कहा यही बहुत है। ट्रेन से चले जाएंगे, कभी तो चलेगी। कहने लगे ऋषिकेश में चेतन आश्रम चले जाएँ और बता दें यहाँ से आये हैं। ऋषिकेश जा रहे हैं तो गरुड़ चट्टी अवश्य जाएँ, बड़ा रमणीक स्थान है-एक गुफा है और जलप्रपात, जहाँ मैंने एक वर्ष तक तपस्या की थी। मुझसे कहने लगे वह स्थान आपको ज़रूर अच्छा लगेगा। मैंने कहा ज़रूर जाएंगे।
स्वामी जी ने आग्रह किया कि आज साथ में भोजन करके ही जाएंगे और अपने स्टाफ को बुलाकर कहा कि कुटिया में ही तीनों साथ में भोजन करेंगे। स्वामी जी के साथ रात्रि में बहुत स्वादिष्ट भोजन किया और उनसे आज्ञा लेकर निकल पड़े। स्वामी जी में पंजाबियत काफी है। हरिद्वार- कनखल यात्रा सम्पन्न हो गई। अब सुबह ऋषिकेश जाना है।
सुबह-सुबह कनखल से बस पकड़कर ऋषिकेश पहुँच गये। टहलते हुए रेल्वे स्टेशन गये और गाडियों का पता किया। अभी तो गाड़ियाँ चलनी शुरू नहीं हुई है। कल गुर्जरों का दिल्ली राजधानी क्षेत्र बंद का आह्वान है तो और भी गाड़ियाँ निरस्त हो रही हैं। अब कल के दिल्ली बंद के बाद ही समझ में आएगा कि आगे कैसी स्थिति इसके बाद बनती है। लक्ष्मण झूला पहुँच गए। लक्ष्मण झूला पार करके दूसरी ओर गए। यहाँ गंगा का रूप बहुत ही सुन्दर है। मुझे हमेशा से ऋषिकेश अच्छा लगता है। पहले भी जब भी आया लक्ष्मण झूला पार करके दूसरी ओर गंगा के तट पर निर्जन स्थान में दिन-दिर भर बैठा रहा, भीड़-भाड़ से दूर। वहाँ बहुत शांति है। वैसे ऋषिकेश में हरिद्वार जितनी भीड़-भाड़ नहीं रहती। यहाँ बड़े-बडे आश्रम हैं। सैकड़ों साल पहले बंगाल से आए एक साधु ने यहाँ पहला आश्रम बनाया। अब उनके नाम से बहुत सारे बड़े-बड़े आश्रम बन गए हैं। उन्हें काली कमली वाला बाबा के नाम से जाना जाता है और उनके आश्रमों को स्वर्गाश्रम कहा जाता है। लगभग आधा ऋषिकेश स्वर्गाश्रम ट्रस्ट का ही है। दूसरे सबसे महत्वपूर्ण संत यहाँ स्वामी शिवानंद हुए जिनके नाम से नया रामझूला बना है जिसे शिवानंद सेतु भी कहा जाता है। इनके भी बहुत बड़े-बड़े आश्रम हैं। ऋषिकेश में निश्चय ही भक्ति और अध्यात्म का वातावरण काफी हद तक कायम है। गंगा यहाँ बहुत ही स्वच्छ और पवित्र है। पर्यटन की दृष्टि से भी यह बहुत अच्छा स्थान है और काफ़ी सारे टूरिस्ट कैम्प्स चलते हैं। रोविंग और बोटिंग आदि का भी काफ़ी और मँहगा इन्तज़ाम है।
लक्ष्मण झूले के दूसरी तरफ से ही गरुड़ चट्टी का रास्ता है। नीलकंठ मंदिर करीब 25 किलो मीटर है जिसके रास्ते पर लगभग 5 किलो मीटर गरुड़ चट्टी है। पुराने समय में जब तीर्थयात्री पैदल चारधाम की यात्रा पर ऋषिकेश से निकलते थे, तब गरुड़ चट्टी पहला पड़ाव होता था बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री, यमनोत्री पहुंचने के लिए। वह पैदल मार्ग अभी भी है। नीलकंठ तक तो अब रोड बन गई है और गाड़ियाँ चलती हैं। बद्रीनाथ-केदारनाथ रोड गंगा के दूसरे तट से जाती है। हमने उसी पुराने पैदल मार्ग पर चलना तय किया और बस चलते चले गए। ऊपर चढ़ते-चढ़ते इतना आनंद आया कि गरुड़ चट्टी की सिद्ध गुफा किनारे छोड़ते हुए अपनी धुन में बहुत आगे निकल गए। अच्छा-खासा जंगल है और बीच में एक झरना बहता है। पहाड़ की चोटी पर गाँव बसे हुए हैं। नीचे लौटते हुए फिर गरुड़ चट्टी की सिद्ध गुफा मिल गई और उससे लगा हुआ बहुत सुंदर झरना है। बड़ी पुरानी और डरावनी प्राकृतिक गुफा है और साथ ही बहुत ही सुंदर जलप्रपात। सचमुच तपस्या योग्य स्थान है। दूर-दूर तक मीलों कोई नहीं।
हेमामालिनी की एक झलक पाने के लिये खड़े भगवा वस्त्रधारी
सिद्ध गुफा से नीचे सड़क तक आते हुए शाम हो गई और लक्ष्मण झूला तक पहुँचते हुए अँधेरा सा होने लगा। यहां अच्छी-खासी गर्मी भी है। स्वामी अवधेशानंद जी के बताये अनुसार स्वामी चिदानंद के परमार्थ आश्रम का पता पूछते-पूछते चल दिए। गंगा तट के इसी ओर लक्ष्मण झूला से करीब ढाई-तीन किलो मीटर दूर है। जब थोड़ी दूर रह गया तो एक गली में किसी व्यक्ति से सीधा रास्ता पूछा तो उसने हम दोनों की ओर देखकर मुस्कुराते हुए लगभग व्यंग्य करते हुए कहा- “हाँ, हाँ वही घण्टा घर पर। बस पहुँच ही गये, इस सीधे रास्ते से जल्दी पहुँच जाओगे। जल्दी कर लो, नहीं तो चूक जाओगे।”
हमने एक-दूसरे की ओर प्रश्नवाचक नज़रों से देखा तो उसने कहा- “हेमामालिनी को देखने जा रहे हो न? बस आने ही वाली होगी। अब वहीं घण्टाघर पर गंगापूजन करेगी।”
हम दोनों को ज़ोर की हँसी आ गई और आगे चल दिये। यह भी खूब रही। हमारे आगे-आगे हेमामालिनी! परमार्थ आश्रम पहुँचे। बहुत विशाल, भव्य आश्रम, एकदम गंगा के किनारे। खूब सारे वीडियो कैमरे, पुलिस और भीड़। पता चला इसी आश्रम में आ रही हैं हेमामालिनी और इसी के घाट पर पूजन होगा। इस समय सूरज बादलों से निकल कर अस्त हो रहा है, यहां बहुत ही सुन्दर दृश्य है।
मार्ग के दोनों ओर लोग हेमामालिनी की एक झलक पाने के लिये खड़े हैं। भगवा वस्त्रधारी, दण्ड-कमण्डल और रुद्राक्ष वाले अत्यन्त बूढ़े साधू-महात्माओं में हेमामालिनी की झलक पाने के लिये सबसे अधिक उत्साह दिख रहा है और सब भक्तगण तो रेल-पेल मचाये हुए ही हैं। मैंने महेश जी से कहा मैं सामान के पास बैठता हूँ, आप आश्रम के कार्यालय में कमरे की बात कर लें। अंधेरा हो रहा है। महेश जी जा कर थोड़ी देर में आ गए। कहा अभी तो कहीं कुछ नहीं हो रहा है, सब हेमामालिनी की प्रतीक्षा में है। कार्यालय बंद कर दिया गया है। आरती रोज ठीक सात बजे होती है लेकिन स्थगित कर दी गई है। अब हेमामालिनी के आगमन और प्रस्थान के बाद होगी। आश्रम के प्रमुख महामण्डलेश्वर स्वामी चिदानन्द जी हेमामालिनी की अगवानी के लिए घाट के किनारे खड़े हुए हैं। अब तो हेमा जी का कार्यक्रम समाप्त होने के बाद ही कुछ हो पाएगा। ठीक है भाई, और क्या कर सकते हैं। वहीं बैठे रहे।
थोड़ी देर में एकदम हलचल हुई और हेमामालिनी जी हमारे बगल से जुलूस की शक्ल में चलते हुए साध्वी वेश में निकल गई। स्वामी चिदानंद जी उनके पीछे-पीछे चले जा रहे थे। सचमुच काफी आकर्षक लगती है, अभी भी। शायद अब ही। इसके बाद घंटा भर गंगा घाट पर पूजन आदि चलता रहा और भाषण भी हुए। सारे साधू-संत हेमामालिनी जी की महिमा बखान करते रहे। सिर्फ वही अच्छा बोली। ये स्वामी चिदानंद उत्तराखण्ड सरकार के खास साधु हैं। इनके आश्रम का क्षेत्र बढ़ता जा रहा है और गंगा जी सकरी होती जा रही हैं। पूरा वातावरण “हेमामालिनीमय” हो गया है।
लगभग आधा घंटा बाद महेश जी को एक कमरा जुटाने में सफलता मिल पाई और उसके आधा घंटा बाद उसमें प्रवेश कर पाए। रात का 9 बज चुका है। कमरा बहुत ही अच्छा और सुविधाजनक है। किराया मात्र अस्सी रुपया है। खूब नहा-धोकर बाहर गंगा किनारे खाने चले गए। और कुछ हो न हो, यह तो निश्चित है कि तीर्थयात्रियों और पर्यटकों के लिये सस्ते, स्वच्छ आश्रयस्थल जुटाने में इन आश्रमों का बहुत बड़ा सामाजिक योगदान है। महेश जी को अब वापस लौटने की पड़ी है। कल तो दिल्ली बंद के कारण सम्भव नहीं है।
इस आश्रम का कमरा इतना अच्छा है और वातावरण भी इतना सुन्दर है कि इतनी जल्दी छोड़ने की इच्छा नहीं हो रही है। ऋषिकेश में अधिक समय रुका जा सकता है। परंतु फिर कभी। तैयार हुए और ‘चेक-आउट टाइम’ 12 बजे कमरा छोड़ दिया। बाहर जाकर भोजन किया, महेश जी ने अपना टिकिट लिया और चल दिए। रामझूला से गंगा पार की। वैसे तो लक्ष्मण झूला से राम झूला अधिक लम्बा-चौड़ा और मज़बूत है लेकिन लक्ष्मण झूला पर चलते हुए जो अनुभूति होती है वह पता नहीं क्यों इस पर नहीं होती। लक्ष्मण झूला प्राचीन है और रामझूला मेरे देखते-देखते बना है। आवागमन भी लक्ष्मण झूला पर ही अधिक रहता है। गंगा दोनों तरफ़ बहुत ही सुंदर दिखाई देती है। राफ्टिंग करती हुई रंग-बिरंगी नावें भी अक्सर दिख जाती हैं। पहाड़ की ओर एकदम अधिक पानी है।
भवानी बाबू की कविता की पंक्तियां हैं:
हिमालय के खड़े रहने का ढंग
उसका मन जाहिर करता है…
उसी तरह तुम्हारे व्यवहार की
हर तफसील तुम्हारा अंग है
कवि के समूचे दिखने में
उसके समूचे दिखने का हाथ रहता है।।
क्रमशः…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा की सभी कड़ियां यहाँ देखेंः
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-1: अनजान द्वारा खुद को समझे जाने से जीवन मनोहारी हो गया
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-2: भोजन करने और भोजन पाने के बीच का अंतर भी समझ आने लगा
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-3: उसने मेरे पैर छू कर कहा, बाबा, कहीं मत जाओ…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-4: मैंने सोचा, खतरनाक होने के लिए खतरनाक होना जरूरी नहीं होता
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-5: वाह, पचास रुपए? बड़े दिनों बाद इतने रुपए एक साथ देखे थे…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-6: जीवन में पहली बार रोजदारी की थी, वह भी भक्ति की!
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-7: भोपाल करीब आने लगा तो मैं ट्रेन में ऊपर चढ़कर बैठ गया…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-8: दोनों घूम-घूम कर पार्टी का प्रचार कर रहे हैं, सावधान रहना
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-9: नक्सलवाद के एक काल्पनिक बिजूके को प्रतीक बनाया गया
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-10: मैंने अपना पूरा नाम बताया तो वे एकदम उछल पड़े…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-11: कथा वाचक की नई भूमिका, मुझे अंदर से हँसी आ रही थी…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-12: वृंदावन की कुंज गली में बदल गया मेरा नजरिया
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-13: ब्रज जा कर जाना, श्रद्धा से किस तरह आनंदित रहा जा सकता है
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-14: मैं बाबा नहीं बन पाया…मैं हार गया!
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-15: अहसास हुआ कि लोग सफर को मंजिल से बेहतर क्यों बताते हैं…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-16: मैं संघ का भेदिया हूं, वकील तो ऐसे होते नहीं हैं…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-17: घर बनते जाते हैं, जमीन बंटती चली जाती है लेकिन रहते सब साथ-साथ हैं
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-18: सौ दिन पूरे… लगता है घर से बहुत दूर न जाकर गलती कर दी
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-19: मैं सन् उन्नीस सौ बावन में सातवीं फेल हुआ हूं…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-20: संभवतः किसी को उम्मीद नहीं होगी कि मैं इस तरह फट पडूंगा…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-21: दहेज का दबाव न हो तो हर मर्द चार-पांच ब्याह कर लेगा
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-22: पूरे पच्चीस साल बाद पैदल अपने गांव भंवरताल जा रहा हूं…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-23: अपने गांव भंवरताल में हूं; एक वो दिवाली थी, एक ये दिवाली है, एकदम अलग
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-24: खबर फैल गई कि मैं ‘बैरागी’ हूं, इनाम नहीं मिलेगा
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 25ः भंवरताल में आखिरी रात है, पता नहीं कब आना होगा…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 26ः वकालत छोड़ी, फिर अपनाई, मैं उलझता चला जा रहा था…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 27: उस दिन मैं अचानक छोटा-मोटा ‘महामानव’ बन गया… मगर
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 28ः चोम सिंह ने समझा दिया, 21 वीं सदी में अपनी शर्तों पर जिया जा सकता है
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 29ः आज ऑफिस में लगेगा ताला, नाम पट्टिका हट जाएगी
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 30ः उन जगहों पर लाैटना जहां कभी मन बैरागी बन कर गया था…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 31ः स्वामी अवधेशानंद बाेले, विभूति जी आप अवश्य आइए, मुझे प्रतीक्षा रहेगी
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 32ः नाते-रिश्तेदार ‘माता-पूजन’ कर मनाते हैं ईंद, हैं न अनाेखी बात
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 33: बुढ़े ने रहने बुला लिया, हम सामान लिए चले आए, रात में बोला, घर से निकलो
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 34ः बाबा, मैं ठीक होना चाहता हूँ… बाबागिरी मेरा पीछा नहीं छोड़ रही
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 35ः ऐसा लगा जैसे दुनिया जीत ली, सिर्फ तीन दिन बाद जबर्दस्त मुँह की खाई
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 36: काेई खेत नहीं गया, कोई बाजार, कोई स्कूल, राे कर बोले, बाबा मत जाओ
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 37: मैं विचलित हूं, मुझे बताए बिना महेश जी ने ऐसा क्यों किया?
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 38: जिसे ‘खूनी सोंडवा’ कहते हैं, मुझे वहीं मिला सबसे ज्यादा आनंद
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 39 : जो मैं कहना चाह रहा था, वह खुद न कहकर उनसे कहलवा लिया
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 40 : मरेंगे और मारेंगे, नहीं तो जिंदगी किस काम की! कानून की पढ़ाई दांव पर

