एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-40

- विभूति झा, सामाजिक कार्यकर्ता
संपादन: चिन्मय मिश्र
यह अनिवार्य रूप से घटित हुआ भी एक साधारण दस्तावेज है। यह न तो कहानी है, न यात्रा वृतान्त। यह एक व्यक्ति की “लौटने” की गाथा है। विभूति दा की यह डायरी अबूझ सी सच्ची कहानी है। यह सत्य की अभिव्यक्ति है। –चिन्मय मिश्र
मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल जिले मंडला से निकलकर सागर विश्वविद्यालय से एमए और एलएलबी। फिर जेएनयू (नई दिल्ली) से समाज विज्ञान में शोधकार्य किया। भोपाल से वकालत शुरू की और भोपाल गैस त्रासदी मामले में गैस पीड़ितों के वकील बने। एक युवा वकील ने बड़े बड़े वकीलों की दलीलों को खारिज कर भोपाल गैस पीड़ितों को मुआवजा दिलवाने की लड़ाई जीती। जिला अदालत से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक पैरवी और फिर एक दिन अचानक पूरी प्रसिद्धि, अपने समृद्ध भविष्य की संभावना को पुराने वस्त्र की तरह उतार कर चल पड़े एक नए जीवन की खोज में। मन में विचारों का उफान और तन पर एक जोड़ी कपड़ों के साथ सबकुछ छोड़ दिया। परिवार भी। किसी फिल्म की पटकथा सा लगता यह इस डायरी के लेखक विभूति झा के जीवन की वास्तविकता है। एक ऐसा मंथन जो जीवन उद्देश्य खोजने की दिशा में बढ़ा और इस राह में उतने ही विविध अनुभव हुए। यह एक विस्तृत जीवन से साक्षात्कार है। किश्त-दर-किश्त रोचक होती जीवन दास्तां।
7 मई, 2008 (कोठार महुड़ा)
सुबह अम्बुआ उतरकर दूसरी बस लेकर दस बजे कट्टीवाड़ा पहुँच गया। आते हुए 14 घण्टे लगे, जाते हुए 16 घण्टे लगे थे। उतरकर सीधे हेरविग- साधना के घर गया-बताया कल इंतज़ार करते रहे, मेरा मैसेज नहीं मिला। लेकिन इनने भी फोन नहीं किया। बाथरूम गया, नहाया, खाया और सोया। मैंने कहा शाम 4-5 बजे निकलूँगा। साधना ने कहा अभी दो-तीन दिन यहीं रहिये, मैंने कहा जाकर तो देखूँ, फिर जैसा होगा देखेंगे। 4.00 बजे चाय पी और हेरविग छोड़ने चलने के लिए तैयार हो गया। एक गद्दा, दो चादर, दो तकिये, दो चटाई, एक बाल्टी-मग्घा, झाडू पहले से ही इकट्ठे कर रखे थे जो गाड़ी में रख लिये। हेरविग के साथ ही उसकी गाड़ी में हम दोनों चल दिये अपने नये घर की ओर। रास्ते में पार सिंह की दुकान पर गये, तो उसने कहा बाद में आयेगा। मकान पर पहुँचे तो ताला लगा हुआ मिला। इनके घर गये तो शैलेन्द्र बीमार सोया हुआ मिला और उसकी माँ ने कहा चाबी नहीं है, गुम गई। ये क्या हुआ? क्या इन लोगों ने विचार बदल दिया? अब खट्टाली अनुभव के बाद कुछ भी असंभव नहीं लगता। पता नहीं कब, क्यों और किस बात से इनका विचार बदल जाये? शैलेन्द्र की माँ थोड़े-थोड़े नशे में है। उसने कहा आरी लेकर आये हैं, अभी ताला काटते हैं। शैलेन्द्र को भी उठाया। सब लोग आये और फिर थोड़ी देर में ताला काटकर घर के अन्दर घुसे। सोचा अंत भला तो सब भला। सारी कुशंकाएं ख़त्म हो गई।
हेरविग इतनी देर मज़े लेता रहा और आदिवासियों की अविश्वसनीयता और लापरवाही पर कटाक्ष करता रहा। उन पर कटाक्ष भी करता है और रहता और काम भी उन्हीं के बीच करता है। अन्दर थोड़ी-बहुत साफ-सफाई तो की हुई लगती है। सामान अंदर रखा। हेरविग के घर में जो आदिवासी भित्तचित्र ‘पिथौरा’ बने हुए हैं, उसका एक फोटो-फ्रेम उसने भेंट किया। वह थोड़ी देर बैठा और “बैस्ट ऑफ लक” कहकर चल दिया। लगता है हेरविग में लाग-लपेट नहीं है, थोड़ा रूखा है मगर एकदम साफ़ है जबकि साधना आम भारतीय मध्यवर्गीय प्रवृत्ति की मिलनसार और माधुर्य लिये हुए है। कुछ भी हो, इनका यहाँ होना काफी अच्छा है।
अपने नये घर में थोड़ी देर अपना सामान जमाया और बातचीत करता रहा। खाने और सोने की व्यवस्था तो करनी होगी। धीरे-धीरे सब जमेगा। शैलेन्द्र से कहा आज तो घर से खाना ला देना, कल से देखेंगे। थोड़ी ही दूर पर इनका घर है, जहाँ सब रहते हैं। ये मकान साल भर पहले सरकारी ज़मीन पर बनाया है, जिसमें कोई रहता नहीं है। आधा मकान मुझे दे दिया है, बाकी अपने पास रखेंगे। बाज़ार तरफ़ टहलने गया और शक्कर, चायपत्ती, दूध पाउडर ले आया। शैलेन्द्र ने एक पलंग दे दिया और एक कुर्सी भी। वैसे मैं तो ज़मीन पर ही सोऊँगा। ज़्यादा गर्मी हुई तो बाहर सोना होगा। आज तो दिनभर बादल छाये रहे। कोई खास गर्मी नहीं लगी।
यह शैलेन्द्र की माँ कजली बाई का मायका है। उसका बूढ़ा पिता है जो गाँव का कोटवार था। कजली का पति पिछले साल मर गया। पिता और बेटी दोनों शराबी हैं। तीन लड़कियाँ हैं-संगीता, शान्ता और कान्ता। संगीता और कान्ता की शादी हो गई, लेकिन ज़्यादातर यहीं रहती है। शान्ता गूँगी है। शैलेन्द्र सबसे छोटा है और इसी साल उसकी शादी हुई है। तो ये है हमारा स्थानीय नया ‘परिवार’ । दाल-रोटी खाई और दस बजे सो गया-इस तरह हमारा गृह प्रवेश हो गया। नये घर में पहली सुबह । बाहर देखा तो बहुत अच्छा मौसम है, थोड़ी बूँदा बाँदी हो रही है। चारों तरफ़ खुला खुला, ठण्डी बयार बहती हुई और तीन तरफ से घेरे हुए ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों के बीच एक वादी की तरह है यह जगह ।
नींद बहुत अच्छी आई। शौचालय तो है नहीं, अंधेरे में ही मैदान होकर आया। इसके बाद घूमने निकल गया, आम के बगीचे की ओर। लौटकर आया तो शैलेन्द्र के साथ बैठ गया। यह तय हुआ कि जब तक कोई और स्थाई व्यवस्था नहीं हो जाती और जब तक ये लोग यहाँ हैं, यही खाना बनाकर खिला देंगे और पानी वगैरह की भी व्यवस्था कर देंगे। खाने के लिए राशन वगैरह शैलेन्द्र ले आयेगा। पैसे दे दिये। कुछ समय बाद ये सब मज़दूरी के लिये गुजरात चले जायेंगे, तब कोई व्यवस्था करनी होगी। पार सिंह ने कहा था स्कूल खुलने पर गाँवों के बच्चे पढ़ने आते हैं, उनमें से कोई रह जायेगा। देखते हैं? पार सिंह तो अभी तक आया नहीं। मुरमुरे-नमकीन और देबू के घर से आए प्रसाद का नाश्ता कर लिया। फिर चाय मिल गई। नहाने के लिए बाल्टी में पानी भी रख दिया गया। हैण्ड-पम्प थोड़ा दूर है। ठीक 12.00 बजे खाना लग गया-आज रोटी-सब्जी। लिखता और पढ़ता रहा और फिर थोड़ी देर सोया। दोपहर अच्छी बीत गई, बिना किसी पंखे-वंखे के। 4.00 बजे चाय मिल गई। शाम को फिर दूर तक घूमकर आया। साढ़े आठ बजे खाना लग गया-दाल-रोटी। रेडियो पर समाचार सुना और सो गया। यह है मेरी नए परिवेश में पहली जीवन चर्या।
दो रातें बिताने के बाद अब एकदम अपनी जगह लगने लगी। बड़ी अच्छी जगह है और जैसा घर रहने के लिये चाहता था, वैसा ही है। न मालूम क्यों यह पुरानी कहावत याद आ गई।
“राजा चले हाथी घोड़ा,पालकी सजाये के,
साधू चले पैयां-पैयां, चिटियां बचाय के ।।”
मेरा नया जीवन पैयां-पैयां यानी कमोवेश धीमी मंदगति के प्रवाह सा होना चाहिए। मेरी कोशिश होनी चाहिए कि मुझसे किसी को तकलीफ न हो। मैं चिटियां (चीटी) को भी बचाकर चातुर्मास जैसा जीवन बिता सकूं। देखते हैं संभव हो पाएगा क्या?
आज साधना का फोन आया, हालचाल पूछने के लिये। उनका पार सिंह तो अभी तक नहीं मिला। साधना भी शायद इतवार को इन्दौर जाये-शिवगंगा के सिम्पोजियम के लिये। मैंने तो सोच ही रखा था और कल ही दीपक के साथ तय हुआ है कि धार से दोनों साथ जायेंगे। मैं शनिवार की शाम तक धार पहुँच जाऊँगा। इस बीच महेश जी से भी बात हुई। उनका सुमेर सिंह अभी तक कट्ठीवाड़ा नहीं आया है। प्रवीण कल दिखा लेकिन मिलने की आतुरता नहीं दिखाई। पार सिंह भी शायद अभी दूरी ही रखना चाहता है। खट्टाली का भारत, भूरी अम्बा का प्रवीण, कट्ठीवाड़ा का पार सिंह-ये सभी सत्ता के केन्द्रों से जुड़े हुए युवा आदिवासी हैं जो शायद किसी से सम्बन्ध बनाने में पहले अपनी स्वार्थसिद्धि देखते हैं। मुझे इस सबके रहते ही अपना काम करना है।
आज सुबह दो लोग मोटरसायकल पर गाँव में आये और थोड़ी देर में चले गये। बाद में पूछने पर कान्ता ने बताया छोटा उदयपुर से आये थे “लड़की खरीदने”। यहाँ से ‘खरीदकर’ अहमदाबाद में ‘बेचते’ हैं। एक मुसलमान युवक और एक आदिवासी बुजुर्ग थे जो यही लड़कियों की दलाली का काम करते हैं। कान्ता की गूँगी बहन शान्ता को खरीदना चाहते हैं। इसकी विस्तृत जानकारी धीरे-धीरे इकट्ठी करनी होगी। सब कुछ इतना खुल्लम-खुला जैसे अभी भी मध्ययुग में रह रहे हों। यहाँ की विषमताओं और विभीषिकाओं से यह पहला साक्षत्कार भी है। बहुत साल पहले अरुण शौरी की लड़कियों की खरीद फ़रोख्त वाली न्यूज़ स्टोरी ‘कमला’ याद आ गई। शाम को अंधेरा होने पर गिरते-पड़ते कजली बाई शादी से मस्त होकर आ गई और देर रात तक हल्ला करती रही। इस पर नियंत्रण करना होगा।
अब धीरे-धीरे समझ में आ रहा है कि पार सिंह ने जानते-बूझते एक तरह से धोखा-धड़ी करते हुए मुझे यह घर दिला दिया है, जिसमें कोई और रह ही नहीं सकता। ये अलग बात है कि मेरे लिये यह उपयुक्त है, लेकिन पार सिंह की समझ के अनुसार तो यह पूरी तरह से अनुपयुक्त है। अब वह मुँह छुपा रहा है और पूरी तरह से असहयोग कर रहा है। लगभग 8.00 बजे अंधेरे में यहाँ पहुँचा तो बाहर खाट पर शैलेन्द्र की माँ बैठी हुई कराह रही है और कान्ता भी उसके पास है। थोड़ी दूर पर उनके घर से रोने-चिल्लाने की आवाजें आ रही हैं। कान्ता ने पूछने पर बताया कि अभी-अभी पाँच मिनट पहले ही गाँव के कुछ लोग उसकी माँ की पिटाई करके गये हैं और अब शैलेन्द्र और उसकी पत्नी को पीटने गये हैं। कान्ता की शादी हो चुकी है और वह दूसरे घर की हो गई है, इसलिए उसे नहीं मारा। गजब का रिवाज है। दो साल पहले शैलेन्द्र गाँव की एक लड़की को लेकर भागा था और जब लौटकर आये तो लड़की वालों ने शादी करने से इंकार कर दिया। शैलेन्द्र के पिता की टाँग तोड़ दी और दस हज़ार रुपये तथा चार बकरे दण्ड में लिये। अब उस लड़की की कहीं और शादी कर रहे हैं तो शैलेन्द्र कहता है कि दहेज की रकम वापस करो या उसी से शादी करो नहीं तो लड़की की ससुराल में जायेगा और तंग करेगा। इसी बात पर पिटाई हुई है। शैलेन्द्र की शादी उसकी मर्जी के खिलाफ पार सिंह ने उसके ससुराल की लड़की से करा दी है और दोनों ही खुश नहीं हैं। उसकी बहू से इस घर में कोई भी खुश नहीं है। इस अनूठी न्याय व्यवस्था से मेरा पहला साक्षात्कार काफी चिंतित कर देने वाला था। मैंने जो कानून-पढ़ा-सीखा और व्यवहार में लाया वह इससे बिलकुल अलग ही है। इस तरह का सामाजिक या पारिवारिक न्याय कितना उचित-कितना अनुचित है, यह सच में विचारणीय विषय है।
बुढ़िया तो थोड़े नशे में है। कराह और चिल्ला रही है कि मेरे लड़के को बचाओ नहीं तो मार डालेंगे।यहाँ कोई बचाने वाला नहीं है और कोई भी इनके बीच में नहीं पड़ता। ये लोग बाहर से आकर यहाँ बसे हैं, इसलिए अभी-भी बाहरी आदमी माने जाते हैं और पूरा गाँव इनके खिलाफ है। शैलेन्द्र का बाप तो धार जिले में बाघ के पास का था, जहाँ से भागकर आया। उसकी माँ पास के एक-दूसरे गाँव इंदलावट की है। शैलेन्द्र की नानी ने उसके नाना के मरने के बाद दूसरा पति किया था, उसी के घर में ये लोग यहाँ रहने लगे। अब शैलेन्द्र का सौतेला नाना, माँ और उसकी बहनें तथा अपनी पत्नी के साथ वह सब साथ रहते हैं। छोटे से घर में सब साथ-साथ रहते हैं। यह घर अभी तक खाली पड़ा हुआ था और यहाँ रहने की कोई हिम्मत नहीं करता था। सरकारी जमीन पर अतिक्रमण करके दो साल पहले बनाया गया है, जिसमें गाँव वालों ने तोड़-फोड़ कर दी थी, जब शैलेन्द्र लड़की लेकर भागा था। तब से यहाँ रहने में डरते हैं। अब मैं आ गया हूँ तो सोचते हैं कि आबाद हो जायेगा। तो इस तरह श्री पार सिंह ने मुझे यहाँ ला कर बैठाला।
कान्ता ने बताया कि पार सिंह ने आकर शैलेन्द्र और उसकी पत्नी को बचाया और अपने घर ले गया। माहौल बड़ा तनावपूर्ण हो गया। मैंने कहा मैं तो अभी नया-नया ही आया हूँ, बीच में नहीं पडता। यहां की सामाजिक स्थिति का ठीक से आकलन के पश्चात् ही सीधा हस्तक्षेप करना ठीक होगा। कान्ता ने कहा कल उसकी माँ के गाँव के लोग आयेंगे और बदला लेंगे। कल तो मुझे जाना है। कान्ता ने बताया था कल ही उसकी बहन के बारे में बात करने उदयपुर वाले भी आयेंगे।
12 मई
वापसी में तीन बजे के बाद बस चली, बाजार की सवारियाँ और सामान खचाखच भरके धीरे-धीरे, रुकते-चलते, पहाड़ी पर चढ़ते 28 कि.मी. का सफ़र दो घण्टे में तय करके 5.00 बजे के करीब कट्टीवाड़ा पहुँच गये। सीधे पार सिंह की दुकान पर उतरा, दुकान बंद मिली। उसके घर होते हुए निकला तो पत्नी ने बताया सो रहा है, अभी आया है। शैलेन्द्र लोगों के घर की तरफ़ गया तो सिर्फ बुड्डा मिला। बताया चाबी दरवाजे के ऊपर रखी है। उसने बताया कान्ता अपने घर चली गई है और बाकी सब लोग अहमदाबाद गये हैं, कल आयेंगे। मैंने कहा कांता को बुला दो। उसने कोई जबाव नहीं दिया। ताला खोलकर अन्दर घुसा। अच्छी-खासी भूख लग रही है। सोचा कुछ बिस्किट-नमकीन खाकर लेट जाऊँगा। अन्दर घुसकर देखा तो बिस्किट, नमकीन वगैरह सब साफ। मोमबत्ती, तेल सब नदारद। खाना पकाने का सारा सामान भी खत्म। सारे जूठे बर्तन फैले हुए हैं और बीयर, शराब की खाली बोतले पड़ी हुई हैं। गुस्सा आया-भूख, गर्मी और थकान के कारण कुछ ज्यादा ही। वापस पार सिंह के घर गया तो सोता हुआ ही मिला और उसकी पत्नी ने नहीं उठाया, बुड्ढे का मकान बंद मिला। आकर बस लेट गया। इस समय नेटवर्क नहीं है, इसलिये फोन भी काम नहीं कर रहा है। कुछ हताशा-सी लगने लगी और पार सिंह पर बहुत क्रोध आया।
थोडी देर में करीब एक घण्टे बाद कांता अपने छोटे से ढाई-तीन महीने के बच्चे को लेकर आ गई। बताया कि बुड्ढे ने उसे बुलाया, वह दो दिन से अपने घर चली गयी थी। बच्चे को बडवा के पास लेकर जाना ज़रूरी था। शैलेन्द्र, उसकी माँ और गूँगी बहन दलाल के साथ अहमदाबाद गये हैं, उसकी शादी पक्की करने। शैलेन्द्र की पत्नी लड़ाई के बाद अपने मायके चली गई। मैंने पूछा और लड़ाई हुई क्या? बताया कि उसके बाद कोई लड़ाई नहीं हुई। मेरे जाने के बाद उसी दिन उदयपुर वाला दलाल आ गया और साथ में वह लड़का भी जिसे शादी करनी है। उस दिन वे यहीं रुके और कल सुबह सब लोग उसका घर देखने अहमदाबाद के आगे कहीं गये हैं, अब कल सुबह तक वापस आयेंगे। शैलेन्द्र की पिटाई की बात खत्म होकर यह नई कहानी शुरू हो गई। कान्ता से मैंने कहा कि अब मुझे नहीं लगता कि तुम्हारी बहन वापस आये। उसे तो वहीं बेचकर पैसे लेकर तुम्हारा भाई और माँ आ जायेंगे। कान्ता ने कहा नहीं, ऐसा नहीं करेंगे। कहने लगी उदयपुर से आकर मेहमान यहीं रुके थे और उसकी माँ भी थी। सबने बैठकर यहाँ शराब पी होगी और उन्हीं लोगों ने सारी चीजें खत्म कर दी होंगी। मैंने कहा आने दो, मैं छोडूंगा नहीं, पुलिस में शिकायत कर दूँगा। पार सिंह ने जानबूझकर मुझे फँसा दिया। न तो पूरा मकान देते और न ही बीच में दरवाजा लगाते-ऐसे नहीं चलेगा। लाइट तो यहाँ आती ही नहीं। तार तो डाला हुआ है मगर बिजली नहीं जलती।
इस तरह का यह मेरा पहला ही अनुभव था। यह तो एक तरह से चोरी ही है। कहीं जाने की इच्छा नहीं हुई और न ही हिम्मत पड़ी। आज का दिन बड़ा थकाने और हताश करने वाला रहा। कान्ता ने दाल-रोटी बना दी और खिलाकर अपने घर चली गई। पूरे परिवार में यही अकेली है जो दारू नहीं पीती। मैं खाकर सो गया। आज यहाँ बिलकुल अकेला हूँ।
रात थोड़े मच्छर लगे पहली बार । नींद लगती-उचटती रही। सुबह थोड़ी देर से पौने छः बजे उठा। कान्ता घर से चाय बनाकर ले आई। यहाँ तो दूध पाउडर, चाय, शकर सब गायब हो गया। आज घूमने नहीं गया। नहाने के बाद सब्ज़ी लेने चला गया और खाने का तेल, बिस्किट भी ले आया। कान्ता ने बताया अहमदाबाद से सब लोग सुबह लौटकर आ गये हैं और उन्हें बताया कि मैं नाराज़ हो रहा था। अभी तक यहाँ कोई मेरे सामने नहीं आया है, शायद शर्म आ रही है।
शैलेन्द्र की माँ शाम को कम नशा करके आई और माफी माँगकर कहा, शैलेन्द्र सब सामान ला देगा और अब से यहाँ बैठकर कोई नहीं पियेगा। उसने कहा शांता की शादी तय कर दी है। हिम्मत नगर के पास लड़के का घर है। वह आदिवासी नहीं ‘ठाकुर’ है तथा खेती-बाड़ी है। पच्चीस हज़ार रुपये और गहने-जेबर देंगे। तीस हज़ार माँगे थे लेकिन पार सिंह ने पच्चीस में तय कर दिया। वैसे तो लड़के से पैंतीस हज़ार लेंगे लेकिन दस हज़ार बीच में दलालों का खर्चा निकल जायेगा। दलाल छोटा उदयपुर का नार सिंह बारया भी साथ आया हुआ है। अच्छा चलता-पुरजा अधेड़ आदमी है। लगता है पार सिंह बारया भी दलाली में शामिल है। शैलेन्द्र लोगों का परिवार तो बहुत सीधा-सादा है और पार सिंह के कहने पर ही चलते हैं। इस इलाके में इस तरह की खरीद-फरोख्त-क्या आम बात है? पता तो करना होगा। गूँगी लड़की शांता बहुत खुश दिख रही है और थोड़ा-थोड़ा बोलने की भी कोशिश कर रही है। शाम को टहलते हुए हेरविग-साधना के घर गया, चाय पी और पार सिंह के बारे में बताया। मैंने पूछा कि क्या यहाँ आदिवासी लड़कियों का शादी के नाम पर गुजरात में बेचा जाना आम बात है तो साधना ने कहा उसे तो ऐसी कोई जानकारी नहीं है। थोड़ी देर बैठकर लौट आया। रास्ते में शैलेन्द्र दुकान पर सामान खरीदते दिखा। यहाँ घर पर आज लाइट है, शैलेन्द्र ने शायद ठीक की है। उसकी माँ और दलाल नार सिंह बाहर बैठे हुए हैं। थोड़ी-थोड़ी पी रखी है। कल सुबह कांता की बड़ी बहन संगीता को साथ लेकर जायेगा जो पैसे और जेवर लेकर आयेगी तब शादी की तैयारी शुरू होगी। आज एक अर्द्धविक्षिप्त-सी लड़की कमली भी आई है। उसकी शादी उदयपुर में ट्रक ड्राइवर से हुई थी, दो बच्चे हैं। मार-मार कर उसे पागल बना दिया और अब घर से निकाल दिया। साल भर से यहाँ पड़ी हुई है और कहीं-कहीं खा लेती है। उसके माँ-बाप भी नहीं हैं। शादी अपनी मर्जी से की थी। अब पहले से सुधार है उसमें। अजीब निराशा से भरा वातावरण है। मैंने जैसा सोचा था, कट्ठीवाड़ा के शुरूआती अनुभव अभी तक उससे ठीक उलट ही हैं।
आधी रात में क़रीब तीन-साढ़े तीन बजे एक शराबी बगल के कमरे में घुस गया। वहाँ दलाल नार सिंह, कान्ता और उसकी माँ सोये हुए हैं। नार सिंह से बीड़ी माँग कर पीता रहा और बातें करता रहा-आधा घण्टे बाद चला गया। मैं भी दरवाज़ा खोलकर ही सोता हूँ। यहाँ कोई ठिकाना नहीं कब, कौन, कहाँ से अन्दर घुस आये। नींद खुल गई, फिर नहीं आई। सुबह पता चला कि पड़ोस के एक घर में वह युवक आया हुआ था, आलीराजपुर के पास का है। ऐसे ही नशे में बेहोश रहता है, लेकिन किसी का नुकसान नहीं करता।मुझे कल शाम को नाले के पास शायद यही गिरा हुआ मिला था। दो बच्चे उसे उठाने की कोशिश कर रहे थे। उदयपुर वाला दलाल सुबह चला गया। शैलेन्द्र की बहन संगीता तो अभी नहीं गई है। दलाल वहाँ से जाकर फोन करेगा। वह गूँगी लड़की शांता इतनी खुश है कि कुछ कहने की इच्छा नहीं हो रही है। वैसे यह सब गड़बड़ ही लग रहा है। कुछ तो बात होगी ही जो गैर-आदिवासी लड़के पैसे देकर यहाँ से गूँगी-बहरी लड़की को शादी के लिए ले जाते हैं। शैलेन्द्र ने बताया कि शांता ने ही ज़िद की वह शादी करके ही जायेगी, नहीं तो ये लोग तो बिना शादी के ही पैसे लेकर देने को तैयार थे। शाम को दलाल ने फोन किया कि पैसे और जेवर कम करने होंगे। अब उसे समझ में आ गया है कि लोग लड़की देने को उतावले बैठे हैं।
सुबह आम के बगीचे की तरफ घूमने गया। बगीचा कट्ठीवाड़ा राजा के खानदान का है। इसके किनारे एक ध्वस्त-सा रेस्ट हाउस की तरह दिखाई देता है, आज उसके पास गया। पास में ही शिव मंदिर है काफी पुराना जिसमें बड़ा सुन्दर पीतल का नाग बना हुआ है। अभी भी पूजा होती है। उसी मंदिर से लगे हुए दो कमरे और कम्पाउण्ड है जो बिना उपयोग के पड़ा हुआ है। रहने के लिये अच्छी जगह है। वह मशहूर आम देखने गया जिसे ‘पाँच सेरी’ कहते हैं और ‘नूरजहाँ’ नाम रखा गया है। वाकई पेड़ पर लटके हुए बड़े-बड़े आम बेहद सुन्दर दिखते हैं। वजन इतना है कि डालें झुक गई हैं और नीचे से लकड़ियाँ लगाकर उन्हें सहारा दिया गया है। पाँच सेर तो नहीं, लेकिन काफी बड़े और आकर्षक हैं। वैसे अभी और बढ़ेंगे, अभी तो एक आम डेढ़-दो किलो का होगा।
यहाँ पड़ोस में शादी हो रही है। रात भर गाना-बजाना चलता रहा। कल सुबह लड़के की बारात लड़की के घर दूसरे गाँव जायेगी। आज शाम लड़के के मामा लोग बारात की शक्ल में आयेंगे और यहाँ इकट्ठे हो जायेंगे और दूसरी बारात बुआ लोगों की तरफ से आयेगी। कल सुबह फिर सब लोग एक-साथ मिलकर लड़की के घर जायेंगे जहाँ शादी होगी। आज भी रात भर गाना-बजाना चलेगा। पारम्परिक वाद्य यंत्रों और आधुनिक स्पीकर दोनों का घाल-मेल होकर गाना कर्कश हो जाता है। जब आधुनिक बैंड और स्पीकर नहीं होते, तब इनका पारम्परिक गाना-बजाना और नाच बहुत मधुर और दर्शनीय होता है। लेकिन अब बैंड और स्पीकर होना सम्पन्नता और विकास का मापदण्ड बन गया है। जिसके लड़के की शादी हो रही है वह चपरासी है और लड़के के मामा लोग शिक्षक हैं। यहां इसलिए यह परिवार बहुत सम्पन्न और विकसित माना जाता है। किसी भी सरकारी नौकरी वाले परिवार को इस क्षेत्र में बड़े सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। निश्चय ही उसकी आर्थिक स्थिति बाकी लोगों से अच्छी होती है। नौकरी-पेशा कुछ लोग बाज़ार की शराब के चक्कर में पड़कर अपनी हालत बिगाड़ लेते हैं-जैसे हमारी ‘मकान मालकिन’ कजली बाई। लगभग पाँच हज़ार रुपये महीना तनखाह मिलती है, विधवा है और पूरे समय नशे में रहती है। कहती है जब नौकरी पर जाती है, तब भी इसी तरह पीती है। लड़का भी कुछ नहीं करता, माँ की कमाई खाता है। पति भी पी-पीकर मर गया। कहती है “बी.पी. की बीमारी” हो गई थी।
लड़के शैलेन्द्र की शादी कर दी है, लेकिन उसकी कोई जवाबदारी नहीं है। ये लोग भिलाला हैं। जिस लड़की को लेकर भागा था वह धानुक परिवार की है। धानुक यहाँ सबसे नीचे माने जाते हैं और अनुसूचित जाति में गिने जाते हैं। यह अधिकतर मज़दूरी पेशा और कारीगर होते हैं। भिलालों के यहाँ धानुक का घुसना, खाना-पीना नहीं हो सकता। शैलेन्द्र फिर भी शादी करने को तैयार था, उन्होंने ही अपनी लड़की नहीं दी और दंड ले लिया-दस हजार रुपये और चार बकरे। अब शैलेन्द्र कहता है कि लड़की की शादी नहीं कर सकते, पहले दंड वापस करो। परंतु वे तो उसकी पिटाई कर गये। शैलेन्द्र कहता है कि लड़की की शादी नहीं होने देगा। उसके एक साथी की भी जंगल में ले जाकर हत्या कर दी थी। यहाँ तो वह कमज़ोर पड़ता है लेकिन सोच रहा है कि गुजरात के जंगल में मामा लोगों का गाँव है, जहाँ म.प्र. पुलिस नहीं जाती। अपराधी प्रवृत्ति के हैं, उन्हें पाँच हजार रुपये देकर रास्ते में बारात रुकवा देगा और शादी नहीं होने देगा। इस तरह बदला लेगा, जिसमें खून-खराबा तो होगा ही। पीढ़ी-दर-पीढ़ी दुश्मनी चलेगी। कोई पुलिस में रिपोर्ट भी नहीं करेगा, आपस में ही निपटेंगे। शैलेन्द्र बहुत उत्साहित होकर यह सब बता रहा है। कहता है, यह तो सामाजिक रीति है और ऐसे तो करना ही पड़ता है-मरेंगे और मारेंगे, नहीं तो जिन्दगी किस काम की! मेरा कानून का पढना और प्रेक्टिस एक बार पुनः दांव पर था।
इधर बस्ती के कुछ लोगों से भी मुलाकात और जान-पहचान होनी शुरू हो गई है। मुल्ला जी दो पीढ़ी से यहाँ दुकान कर रहे हैं। ओमगुप्ता जी की यह तीसरी पीढ़ी है। यहाँ का सारा व्यवसाय तो गुप्ता या बोहरा लोगों के हाथ में है। आमतौर पर ठीक-ठाक लोग हैं। यहाँ खट्टाली जैसा सेठों का वर्चस्व नहीं दिखता। कुलकर्णी गुरुजी यहाँ शिक्षक थे, अब रिटायर होकर यहीं बस गये हैं और बच्चों के लिये स्कूल चलाते हैं। उनका काफी सम्मान है। अब धीरे-धीरे सब जानने लगे हैं।
सुबह कवछा गाँव की तरफ घूमने गया। लौटते में बाजार में पोहा खाया और चाय पी। कांता साफ-सफाई करने आ गई। कजली बाई ने कहा है पैसे आज लौटा देगी, नहीं तो रास्ते में दिक्कत होगी। कान्ता से उसकी गूँगी बहन के रिश्ते और परिवार की बातचीत करता रहा। यह परिवार अलग-सा ही है। एक तरह से ‘कुजात’ या निष्कासित-सा है। कान्ता का पिता भील था और माँ भिलाला है। पिता को शादी करके अपना घर छोड़कर भागना पड़ा। माँ ने भील से शादी की इसलिए उसे भी गाँव छोड़ना पड़ा, भटकते रहे। यहाँ कान्ता की नानी दूसरे आदमी के घर बैठ गई, तब सब यहाँ रहने लगे, लेकिन गाँव वालों ने इन्हें नहीं अपनाया। कान्ता की बड़ी बहन संगीता आलीराजपुर के एक लड़के दिलीप के साथ भाग गई। चार बच्चे हो चुके हैं लेकिन अभी तक शादी नहीं हुई है। दिलीप को भी उसके घर से भगा दिया और अब दोनों यहाँ पड़े हुए हैं, माँ के साथ। दो बच्चे जीवित हैं। कान्ता ने बताया एक बच्चा मर गया और एक को दिलीप ने मार दिया। पति-पत्नी दोनों शराबी हैं। कान्ता को भी इसी गाँव का डावर परिवार का लड़का उठाकर ले गया और अब एक बच्चा भी है, लेकिन अभी तक शादी नहीं की। लड़के के परिवार वाले नहीं चाहते ऐसे परिवार में संबंध । कान्ता अधिकतर यहीं पड़ी रहती है। अब गूँगी बहन को भी ऐसे ही कहीं बैठाने की तैयारी है। शैलेन्द्र की पत्नी भी यहां इनके साथ खुश नहीं रहती। पार सिंह ने शादी करा दी है। संबंधो में भारी जटिलता है। ठीक से समझ पाना भी बहुत कठिन है।
दोपहर में कजली बाई बाज़ार से नशे में धुत होकर आई। आज उसे तनख्वाह मिल गई। मुझसे कहने लगी पैसे बाद में देगी, किसी और को दे दिये। मैं काफ़ी बिगड़ा और कान्ता को बोला कि शैलेन्द्र को बुलाकर लाओ। बहुत देर बाद वह घबराते हुए आया और पाँच सौ रुपये दे गया। बोल दिया कि अब से उसकी माँ इस घर में नहीं आयेगी और न ही दारू पीकर गड़बड़ करेगी। एक-दो दिन में बीच में दरवाजा लगा देंगे या दीवार उठा देंगे। पार सिंह ने उससे कहा है कि लौटने तक काम करने वाली की भी व्यवस्था कर देगा। पार सिंह तो सामने आता ही नहीं, यह शैलेन्द्र सीधा और अच्छा लड़का लगता है, लेकिन पीने की लत इसे भी है। अब तो दस-बारह दिन बाद लौटना है। देखते हैं आगे कैसा चलता है? 15-20 दिन में ये सब लोग मजदूरी के लिये गुजरात चले जायेंगे। गूँगी शान्ता की शादी के संबंध में तो अनिश्चितता है।
बस से 1 बजे के करीब मेघनगर पहुँच गया। महेश जी की बगिया अब काफी अच्छी हो गई है और सब्जियाँ लगने लगी हैं। इन्दौर कार्यक्रम के बाद से मुझसे फिर से घनिष्ठता बन गई है। आकाश भी आया हुआ है। आकाश का अब पेटलावाद में मन नहीं लग रहा है। कुछ दूसरे किस्म का काम करना चाहता है। शायद मेघनगर में ही रहे। हर्ष जी और महेश जी के साथ स्वामी अवधेशानन्द के आश्रम, हरिद्वार जाने का कार्यक्रम बन रहा है। मेरी तो इच्छा वहाँ कुछ ज़्यादा समय बिताने की थी, लेकिन इन लोगों को लौटना है, इसलिए साथ ही आ जायेंगे।
क्रमशः…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा की सभी कड़ियां यहाँ देखेंः
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-1: अनजान द्वारा खुद को समझे जाने से जीवन मनोहारी हो गया
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-2: भोजन करने और भोजन पाने के बीच का अंतर भी समझ आने लगा
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-3: उसने मेरे पैर छू कर कहा, बाबा, कहीं मत जाओ…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-4: मैंने सोचा, खतरनाक होने के लिए खतरनाक होना जरूरी नहीं होता
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-5: वाह, पचास रुपए? बड़े दिनों बाद इतने रुपए एक साथ देखे थे…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-6: जीवन में पहली बार रोजदारी की थी, वह भी भक्ति की!
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-7: भोपाल करीब आने लगा तो मैं ट्रेन में ऊपर चढ़कर बैठ गया…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-8: दोनों घूम-घूम कर पार्टी का प्रचार कर रहे हैं, सावधान रहना
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-9: नक्सलवाद के एक काल्पनिक बिजूके को प्रतीक बनाया गया
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-10: मैंने अपना पूरा नाम बताया तो वे एकदम उछल पड़े…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-11: कथा वाचक की नई भूमिका, मुझे अंदर से हँसी आ रही थी…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-12: वृंदावन की कुंज गली में बदल गया मेरा नजरिया
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-13: ब्रज जा कर जाना, श्रद्धा से किस तरह आनंदित रहा जा सकता है
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-14: मैं बाबा नहीं बन पाया…मैं हार गया!
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-15: अहसास हुआ कि लोग सफर को मंजिल से बेहतर क्यों बताते हैं…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-16: मैं संघ का भेदिया हूं, वकील तो ऐसे होते नहीं हैं…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-17: घर बनते जाते हैं, जमीन बंटती चली जाती है लेकिन रहते सब साथ-साथ हैं
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-18: सौ दिन पूरे… लगता है घर से बहुत दूर न जाकर गलती कर दी
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-19: मैं सन् उन्नीस सौ बावन में सातवीं फेल हुआ हूं…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-20: संभवतः किसी को उम्मीद नहीं होगी कि मैं इस तरह फट पडूंगा…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-21: दहेज का दबाव न हो तो हर मर्द चार-पांच ब्याह कर लेगा
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-22: पूरे पच्चीस साल बाद पैदल अपने गांव भंवरताल जा रहा हूं…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-23: अपने गांव भंवरताल में हूं; एक वो दिवाली थी, एक ये दिवाली है, एकदम अलग
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-24: खबर फैल गई कि मैं ‘बैरागी’ हूं, इनाम नहीं मिलेगा
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 25ः भंवरताल में आखिरी रात है, पता नहीं कब आना होगा…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 26ः वकालत छोड़ी, फिर अपनाई, मैं उलझता चला जा रहा था…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 27: उस दिन मैं अचानक छोटा-मोटा ‘महामानव’ बन गया… मगर
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 28ः चोम सिंह ने समझा दिया, 21 वीं सदी में अपनी शर्तों पर जिया जा सकता है
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 29ः आज ऑफिस में लगेगा ताला, नाम पट्टिका हट जाएगी
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 30ः उन जगहों पर लाैटना जहां कभी मन बैरागी बन कर गया था…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 31ः स्वामी अवधेशानंद बाेले, विभूति जी आप अवश्य आइए, मुझे प्रतीक्षा रहेगी
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 32ः नाते-रिश्तेदार ‘माता-पूजन’ कर मनाते हैं ईंद, हैं न अनाेखी बात
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 33: बुढ़े ने रहने बुला लिया, हम सामान लिए चले आए, रात में बोला, घर से निकलो
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 34ः बाबा, मैं ठीक होना चाहता हूँ… बाबागिरी मेरा पीछा नहीं छोड़ रही
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 35ः ऐसा लगा जैसे दुनिया जीत ली, सिर्फ तीन दिन बाद जबर्दस्त मुँह की खाई
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 36: काेई खेत नहीं गया, कोई बाजार, कोई स्कूल, राे कर बोले, बाबा मत जाओ
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 37: मैं विचलित हूं, मुझे बताए बिना महेश जी ने ऐसा क्यों किया?
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 38: जिसे ‘खूनी सोंडवा’ कहते हैं, मुझे वहीं मिला सबसे ज्यादा आनंद
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 39 : जो मैं कहना चाह रहा था, वह खुद न कहकर उनसे कहलवा लिया

