एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-36

- विभूति झा, सामाजिक कार्यकर्ता
संपादन: चिन्मय मिश्र
यह अनिवार्य रूप से घटित हुआ भी एक साधारण दस्तावेज है। यह न तो कहानी है, न यात्रा वृतान्त। यह एक व्यक्ति की “लौटने” की गाथा है। विभूति दा की यह डायरी अबूझ सी सच्ची कहानी है। यह सत्य की अभिव्यक्ति है। –चिन्मय मिश्र
मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल जिले मंडला से निकलकर सागर विश्वविद्यालय से एमए और एलएलबी। फिर जेएनयू (नई दिल्ली) से समाज विज्ञान में शोधकार्य किया। भोपाल से वकालत शुरू की और भोपाल गैस त्रासदी मामले में गैस पीड़ितों के वकील बने। एक युवा वकील ने बड़े बड़े वकीलों की दलीलों को खारिज कर भोपाल गैस पीड़ितों को मुआवजा दिलवाने की लड़ाई जीती। जिला अदालत से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक पैरवी और फिर एक दिन अचानक पूरी प्रसिद्धि, अपने समृद्ध भविष्य की संभावना को पुराने वस्त्र की तरह उतार कर चल पड़े एक नए जीवन की खोज में। मन में विचारों का उफान और तन पर एक जोड़ी कपड़ों के साथ सबकुछ छोड़ दिया। परिवार भी। किसी फिल्म की पटकथा सा लगता यह इस डायरी के लेखक विभूति झा के जीवन की वास्तविकता है। एक ऐसा मंथन जो जीवन उद्देश्य खोजने की दिशा में बढ़ा और इस राह में उतने ही विविध अनुभव हुए। यह एक विस्तृत जीवन से साक्षात्कार है। किश्त-दर-किश्त रोचक होती जीवन दास्तां।
खटिया पर पुलिस वाले बैठे थे और कंघा करता हुआ मैं
प्रताप के यहाँ तो वातावरण सामान्य ही लगा। डूंगर सिंह ने कहा पानी गरम हो रहा है, नहा लीजिए। मीरा ने गरम पानी लाकर रख दिया। मैं वहीं आँगन में गरम पानी से नहाया और परछी में आकर कपड़े बदलने लगा। इतने में ही प्रताप और सरपंच के घर के बीच की गली में एक मोटरसाइकल आकर रुकी। मैं कंघा करते हुए देखता रहा। दो पुलिस वाले और भारत सिंह उतरे। भारत उन्हें अंदर लेकर आया। दरवाज़े से ही घुसते हुए धीरे से मेरी तरफ इशारा किया, ज़ल्दी से परछी में खटिया डालकर उन्हें बैठाया और तेजी से बाहर निकल गया। मैंने उनकी तरफ देखा भी नहीं, कंघा करता रहा। एक सब इंस्पेक्टर और एक हवलदार। डूंगर सिंह बाल्टी में लोटा डाले वैसे का वैसा ही वहीं बैठा रहा गया। मीरा अंदर चली गई। अब परछी में खटिया पर पुलिस वाले बैठे थे और कंघा करता हुआ मैं।
सब इंस्पेक्टर ने नमस्कार किया, बैठे-बैठे तम्बाकू मलते हुए, कहा –“पंडित जी आपसे कुछ जानकारी लेना है।”
मैंने कहा- “अच्छा आप खट्टाली चौकी से आए है क्या?”
उसने कहा- “जी हाँ…”
मैंने कहा- “पूछिए।“
“आप तो दो लोग हैं न, दूसरे कहाँ हैं?”
मैंने कहा- “दूसरे जोबट गए हैं, आते होंगे, आप तो बोलिए क्या जानना चाहते हैं?”
कहने लगा- “बस ऐसे ही पता लगाने आ गए, सरपंच ने बताया कि कुछ दिन से बाहर से दो बाबू जी लोग आए हैं, पता नहीं क्या करने?”
मैंने कहा- “अच्छा। सरपंच ने भेजा है। कब, अभी बताया?”
बोला, “नहीं-नहीं सरपंच ने नहीं भेजा, हम ही आए हैं देखने। सरपंच ने तो परसों बताया था, कोई नया आदमी आए तो जानकारी तो लेते ही हैं।”
मैंने कहा “हाँ-हाँ क्यों नहीं आपका तो फर्ज़ है, आप तो यहीं के आदिवासी लगते हो।”
“जी आदिवासी ही हूँ, धार जिले का और ये दीवान जी भी धार जिले के ही हैं।”
मैंने कहा “तब तो आप समझ सकते हो-मैं वकालत करता था, अब छोड़ दी है। आदिवासियों के बीच काम करना चाहता हूँ, उन्हें कानूनी अधिकारों की जानकारी देना चाहता हूँ जिससे वे अपना हक पा सकें।”
बोला- “आपको किसी ने भेजा है या आप खुद आए हैं? आप किसी संगठन से हैं?”
मैंने कहा- “मुझे कोई नहीं भेज सकता, मैं ही स्वयं को भेज देता हूँ, खुद ही आया हूँ और किसी संगठन से नहीं जुड़ा हूँ। मेरे साथ जो हैं वे शिवगंगा से जुड़े हैं और दस साल से झाबुआ में हैं। मैं छह माह से झाबुआ में हूँ। अब खट्टाली रहने का सोचा है। क्यों क्या सोचना है आपका?”
“काम तो बहुत अच्छा है, लेकिन आप बाज़ार में क्यों नहीं रहते?”
मैंने पूछा “किसी को कोई परेशानी है क्या? एस.डी.एम. ने फोन नहीं किया था क्या? मोबाइल है आपके पास?”
“अरे नहीं सर, किसी को कोई परेशानी नहीं है, मैं तो वैसे ही पूछ रहा था। साहब ने तो 24 तारीख को ही फोन करके बताया था कि दो लोग आने वाले हैं। हमें पता नहीं था कि आप ही हैं, इसलिए देखने आ गए। हम सोच रहे थे कि फोर व्हीलर से आएंगे, इसलिए रास्ता देखते रहे। आप तो बहुत बड़ा काम कर रहे हैं, सर। आपको कोई तकलीफ हो तो फोन कर देना। साहब ने कहा था मिल लेना इसलिए आ गए।“
मैंने कहा “बहुत अच्छा किया और आपसे मिलकर बहुत अच्छा लगा, खासकर आप आदिवासी हैं इसलिए। अब एस.डी.एम. को बता देना कि मिल लिए और वो कलेक्टर को बता देंगे। ठीक है। ये शर्मा जी भी आ गए। इनका नम्बर आप लिख लो।”
बोला− “शर्मा जी का नम्बर तो पहले से है, साब ने दिया था। कल फोन लगाया था लेकिन मिला नहीं। हम चलते हैं सर, कोई सेवा हो तो बता दीजिए। शर्मा जी का नम्बर है हमारे पास।”
तो इस तरह पुलिस का सामना भी हो गया-दरयाव सिंह ने तो बाज़ार में बोहरा सेठ से कहा ही था कि हमारे गाँव में दो गुण्डे आ गए हैं। डूंगर सिंह और मीरा तो बस यह सब देखते-सुनते ही रह गए। डूंगर नहाना भूल गया। पुलिस वाले बाहर निकले और बाहर खड़े भारत सिंह को साथ लेकर सरपंच के घर घुस गए। सरपंच तो घर में है नहीं। महेश जी ने बताया भारत भी बाहर दरवाज़े से लगा सारा वार्तालाप सुन रहा था। बाद में भारत ने बताया कि पुलिस वालों को ताड़ी वगैरह पिलाने की व्यवस्था सरपंच के यहाँ की थी। मैंने कहा तुम्हीं लेकर आए थे पुलिस को तो कहा− सरपंच ने मुझे साथ भेजा था। वह भी वहीं चौकी में था।
महेश जी ने कहा जोबट से खाकर आए हैं और डूंगर से मैंने कहा कि मैं तो एक रोटी यहीं खाऊँगा। इसके बाद दोनों नदी की ओर निकल गए। ऐसा लग रहा है ‘शोले’ फ़िल्म के जय और वीरू हैं। अब गब्बर सिंह को तलाश करना है। कलेक्टर को ख़बर कराना ठीक रहा, नहीं तो क्या पता ये पुलिस वाले हमसे भी पुलिस की तरह पेश आते। अब क्या करें? महेश जी को तो वैसे भी कल जाना ही है। 2 को इन्दौर में उनकी बैठक है। मैं भी कुछ दिन मेघनगर में आराम करना चाहता हूँ। कल जाना है यह तो पहले से ही सोच रहा था। आज ये सब हो गया। पहले सरपंच की स्पष्ट मनाही फिर पुलिस। खैर, जो होना है वह तो होगा ही। अब प्रताप के खेत वाला कमरा बनवाने का तो कोई औचित्य नहीं है। वैसे भी रात भर उनके अगल-बगल रहने वाले परिवारों ने शराब के नशे में इतना शोर-शराबा किया कि मैंने सुबह ही डूंगर से कहा कि वहाँ रह पाना मुश्किल होगा। अब सरपंच के स्पष्ट इंकार के बाद ज़बर्दस्ती करना उचित नहीं है। कुछ नया सोचना पड़ेगा। शायद नए सिरे से बसेरे की तलाश भी दोबारा शुरू करना पड़ेगी।
परन्तु अभी तो सब संकट में लग रहा है। ऐसा लगता है कि शिवगंगा के कारण यह सब हो रहा है। महेश जी का सोचना है कि आर.एस.एस. और बीजेपी की ओर से सरपंच पर दबाव डाला गया है कि इनके साथ किसी तरह का सहयोग मत करो। यहाँ के सेठ लोग भी सब भाजपा से जुड़े हैं और उनके द्वारा भी दबाव डाला गया होगा। सरपंच जब भाबरा गया तब वहाँ उसे सबने कहा होगा और तभी से उसका रुख बदला हुआ है। यह सब तो मुझे भी लगता है लेकिन लगता है इसके साथ ही साथ सरपंच खुद भी घबरा गया है और जब उसे पता चला कि जिला प्रशासन इनके साथ है तो और भी घबरा गया है। मुझे ये भी लगता है कि उसका लड़का विरोध कर रहा है; क्योंकि उसे लगता है कि उसका भी वर्चस्व ख़त्म हो जाएगा। गाँव वालों के विरोध की बात में तो खास दम नज़र नहीं आता, क्योंकि विरोध तो पहले था जब उसके रहते सरपंच ने बनाना शुरू किया था। हाँ, सेठों का विरोध ज़रूर होगा, जो स्वाभाविक और अपेक्षित भी है। सरपंच के सहारे तो जमने आए नहीं थे। सरपंच का साथ हो जाना तो बस संयोग था। फिर भी लगता है कि वह बुरा आदमी नहीं है और दबाव में है। जो भी हो इस स्थिति से निपटना तो होगा।
अब आज तो नहीं जाएंगे। आज तो यहीं रुकेंगे। देखते हैं शाम को क्या होता है। सरपंच पर पुलिस कार्रवाई का क्या असर होता है? गाँव वालों को क्या लगता है? नहा-धोकर आए। मैंने प्रताप के घर खाना खाया। महेश जी ने कहा वह बाजार तक जाएंगे, कुछ सेठों से मिलेंगे। उनके परिचित कोई तापड़िया जी इन्दौर से आ रहे हैं, जिनकी सेठों के यहाँ रिश्तेदारी है। कल कोई शादी है, उस दिन अनिल माहेश्वरी भी बता रहा था। मैंने कहा आप हो आइए, मैं तो नहीं जाऊँगा। ऐसा लगता है इस सब घटनाक्रम से महेश जी अपमानित सा महसूस कर रहे हैं और काफी विचलित हैं। मुझे तो इस सब में ऐसा कुछ भी अस्वाभाविक या अनपेक्षित नहीं लगता। हाँ, सरपंच का पाला बदलना ही थोड़ा नाटकीय हो गया। महेश जी की विपरीत परिस्थितियों में सहारा ढूँढ़ने और बाहरी मदद लेने की आतुरता कभी-कभी दिखती है, दबाव से काम लेने की इच्छा-संघ और सत्ता से लम्बे समय तक जुड़े रहने का परिणाम है जो धीरे-धीरे ही जाएगा। परंतु मैंने तय किया है कि मैं धैर्य बनाए रखूंगा ।
महेश जी चले गए, मैं लेट गया। करीब घंटे, बाद महेश जी का फोन आया कि बाजार तरफ़ आकर नदी के दूसरी तरफ मंदिर में आ जाइए, भगत जी से मिलाएंगे।
मैंने कहा आप वहाँ क्या कर रहे हैं? कहने लगे आप आयें तो, अच्छा लगेगा।
मैं मुँह धोकर निकल पड़ा। आधे रास्ते में मोटरसाइकल पर सुशील मिल गया। उसके साथ नदी के दूसरी तरफ पलाशदा गाँव में एक मंदिर में गए जहाँ एक भगत जी रहते हैं जो पलाशदा पंचायत के उप-सरपंच हैं। महेश जी को अचानक मिल गए। होले खाने बुला लिया। थोड़ी देर वहाँ सब साथ रहे। आसाराम बापू का व्यावसायिक मन्दिर देखा। हम दोनों पैदल लौटे।
भारत मिला, पुलिस आने के बाद उसके व्यवहार में बहुत सुधार है। बताया कि मीरा का पंचायत सचिव पद पर नियुक्ति आदेश आ गया है। उसने आदेश दिखाया। थोड़ी देर में महेश जी आ गए-प्रताप के यहाँ बताया कि हम कल सुबह मेघनगर जा रहे हैं, आज यहीं रहेंगे। नदी जाते हुए सरपंच खेत में खाट पर बैठा दिखा। हमने दूर से ही कहा, नदी से अभी आते हैं, आप से बात करना है। उसने कहा ठीक है, मैं कहीं नहीं जाऊँगा। एक-दो घरों में और बताया कि हम कल मेघनगर जा रहे हैं, कुछ समय के लिए। नदी से लौटे तो पता चला सरपंच अपने साले के यहाँ दूसरे फलिया चला गया और घर अंदर से बंद। सरपंच और प्रताप के घर के बीच पड़ी बैलगाड़ी पर बच्चों के साथ बैठे भजन गाते रहे। छगन मास्टर आया और वह भी बैठ गया, आज कम नशे में है। सरपंच के घर से पीकर निकला है। काफ़ी देर बैठा रहा और बोलकर गया कि कल दोनों वक़्त उसके घर खाना है। हमने कहा दोनों वक़्त तो नहीं, सुबह खाएंगे। भारत ने कहा कि कल तो सेठों के शादी वाले घर में भी आपका निमंत्रण है। हमने कहा हम तो मास्टर के घर खाएंगे। आज चाय नहीं पी। प्रताप के घर गए । एकदम खामोशी है। सब लेट गए हैं। ऐसा लगा आज भूखे रहना पड़ेगा। फिर डूंगर ने खाना खिलाया और हम सो गए।
हम समझ गए सरपंच मिलना ही नहीं चाहता
सुबह काफी जल्दी उठकर दोनों नदी की ओर गए। मुझे घर से निकले हुए पूरे आठ माह हो चुके हैं, खट्टाली में नौ दिन हो चुके हैं। फरवरी खत्म हो चुकी है-लीप इयर भी। खट्टाली से आज रवानगी है। महेश जी ने बताया कि कल सेठों ने कहा कि गाँव के फलिए में न रहें, बाज़ार में रहें, मंदिर में रहें या आसपास के पलाशदा, मसनी गाँव में रहें। सारी व्यवस्था करा देंगे। खट्टाली के फलिए रहने लायक नहीं हैं, असुरक्षित हैं। हमने तय किया कि अभी सरपंच से चर्चा करेंगे; कुछ और घरों में जाएंगे तथा 11 बजे तक छगन मास्टर के यहाँ खाना खाकर मेघनगर निकल जाएंगे। कुछ दिन बाद फिर से लौटकर आयेंगे। मैंने कहा, अब सेठ लोग अगर कह रहे हैं कि इस फलिए में न रहो, तब तो अब यहीं रहेंगे, चाहे कुछ भी हो जाए। सरपंच के घर गए, वह गायब मिला। घर के लोगों ने बताया मोटर चलाने नदी गए। वहाँ भी गए तो वहां भी नहीं मिले। कल देर रात तक साले के यहाँ से लौटे ही नहीं। हम समझ गए कि वह मिलना ही नहीं चाहता तो छोड़ो। प्रताप के घर आए उसे बताया कि आज जा रहे हैं। कहने लगा मेरा बस चले तो न जाने देता। मेहमान की तरह तो आठ-दस दिन ही रख सकता हूँ। अब सरपंच की मर्जी के खिलाफ तो मैं भी रोक नहीं सकता। गाँव वालों को पता नहीं क्या हो गया है? हमने कहा मिलकर आते हैं।
बताया मेघनगर जा रहे हैं। सरपंच आगे कमरा नहीं बना रहा है। केम्टा ने पूछा क्यों? हमने कहा पता नहीं, कहता है गाँव वाले नहीं चाहते। इतने में सरदार सिंह आ गया। उसे बताया कि जा रहे हैं तो एकदम आँखें डबडबा गयीं। कहने लगा मत जाओ। मेरा नया घर बन गया होता तो वहाँ रहते। अब जैसे ही छत पड़ेगी हम उसमें चले जायेंगे, हमारा पुराना घर तुम ले लो, वहीं रहना-गाँव छोड़कर मत जाओ। केम्टा एकदम उठा-कहने लगा मेरे साथ आओ। घर के बगल में चढ़ाई की ओर ले गया। अपने दो खेतों के बीच की मेढ़ पर खड़े होकर बोला-यहाँ बँधेगा तुम्हारा घर; गाँव के बीचों-बीच ऊँचाई पर। सब तरफ देखोगे, सब यहाँ आयेंगे। तुम यहीं रहोगे, होली के समय गेहूँ कटेगा, तब मकान बाँध लो। मेहताब, रेम सिंह, रन सिंह बोले मकान तो हम बाँध देंगे, आपको कुछ नहीं करना।
रेम सिंह बोला तब तक के लिए इडला का घर ले लेंगे, मैं बात करूँगा, आपको कुछ नहीं करना। आप लोगों को इसी गाँव में रहना है। तो ये था गाँव वालों का विरोध।
फिर से सब कुछ बदल गया। एकदम उत्साहित हो गए हम। एक हफ्ते बाद आएंगे बोलकर चल दिए। मैंने कहा चलो दरयाव सिंह से भी मिलते चलते हैं। नहाने के लिए कपड़े उतार रहा था-एकदम पहन लिए और बड़े प्रेम से आग्रहपूर्वक बैठाया, ज़बर्दस्ती दूध और चाय मँगवा लिया। कहने लगा लौटकर आओ, मैं इडला से बात करके रखूँगा। छह महीने के लिए तो दे देगा। वाह, क्या बात है? बाजी फिर पलट गई। समझ में आया कि गांव तो पूरी तरह से हमारे साथ ही है।
प्रताप के घर आए। कपड़े उठाकर नदी नहाने जाएंगे। वहीं से मास्टर के यहाँ भोजन करके आएंगे और सामान उठाकर चल देंगे। भारत की पत्नी आकर खड़ी हो गर्इ। मुझसे पहली बार बोली- “जा रहे हो क्या बाबा?”
मैंने कहा, “हाँ मेघनगर जा रहे हैं, बहुत दिन हो गए।”
उसने पूछा “क्यों जा रहे हो?”
मैंने बताया “अभी कोई रहने का ठिकाना नहीं है।”
वह बोली- “अभी यहीं रहो, 2-3 महीना रहो, खाना खाओ, अभी मत जाओ।”
मैंने कहा- “नहीं, छोड़कर, नहीं जा रहें हैं लौटकर आएंगे। मगर ऐसे कब तक मेहमानी करें, अपना ठिकाना तो हो।”
बोली- “अलग घर बाँधोगे?”
मैंने कहा- “हाँ।” कहने लगी-“वार लो, ठीक है, मगर रोटी यहीं खाना।”
इसे प्रेम कहते हैं। सिर्फ व्यवहार से, चरित्र से। मेरे जाने की खबर से दुखी डूंगर सिंह और मीरा आज आईटीआई नहीं गए। बच्चे आज स्कूल नहीं गए । भारत आज बाजार नहीं गया। प्रताप आज खेत नहीं गया… नदी से लौटते हुए छगन मास्टर के यहाँ गए तो वहाँ ताला मिला। मैंने कहा इसे किसी ने प्रभावित कर दिया और वह छुप गया। प्रताप के घर आए, सामान जमाया। बाहर गाँव के स्कूल की सारी लड़कियाँ अपने यूनीफॉर्म पहने आकर खड़ी हो गयीं-पहली से पाँचवीं तक, बोली क्यों जा रहे हो बाबा? मैंने उन्हें समझाया नहीं बेटे, जा नहीं रहे, लौटकर आएंगे। कुछ देर तक स्कूल के गीत गाते रहे। फिर बच्चों को समझाकर स्कूल भेजा। परिस्थिति बहुत भावुक होती जा रही थीं।
सामान उठाने लगे तो मीरा और बहू ने कहा खाना लग गया है। मीरा की माँ ने कहा बिना खाए कैसे जाओगे? दिन भर भूखे रहोगे क्या? ये है महात्मा का घर! और अब हमारा भी।
खाना खाकर चलने को हुए तो सरपंच आ गया। बोला “मोटरसाइकल पर छुड़वा देता हूँ।”
हमने कहा “नहीं हम चले जाएंगे। ऐसे ही आए थे और ऐसे ही जाएंगे।”
“अरे, आए होगे ऐसे मगर ऐसे जाने थोड़े ही देंगे।”
मैंने कहा “कोई बात नहीं। हम निकलते हैं, पीछे से कोई आ जाएगा तो देखेंगे। सरपंच जी, रहेंगे तो यहीं बड़ी खट्टाली में, डुडवे फलिया में। घर नहीं होगा तो पेड़ के नीचे रह लेंगे। हम लौटकर आने के लिए काम से जा रहे हैं। इस बीच गाँव में सबसे बात करके और सोच के रखना कि हमें कहाँ रहना है। आएंगे तो हम तुम्हारे यहाँ ही, तुम मुखिया हो न?”
सरपंच ने कहा, “मैं क्या करूँ, गाँव वाले खिलाफ हैं।”
मैंने कहा “गाँव वालों की छोड़ो और ये भूल जाओ कि तुम सरपंच हो। तुम तो ये बताओ कि तुम हमारे साथ हो या नहीं?”
कहने लगा-“साथ तो हैं ही, नहीं तो अब तक क्या न करते?”
मैंने कहा- “सरपंच जी करते-वरते तो भूल जाओ। ये सब छोड़ो, करने को तो शायद तुम्हें नहीं मालूम कि हम क्या नहीं कर सकते तुम्हारा। हम तो प्रेम से रहने आए हैं, कुछ करने- कराने नहीं। तुम्हारे यहाँ घर जैसे रहे, अभी वैसे ही बने रहने दो। करने-वरने की बात मत करो। तुम्हारी मर्जी है। सोच के रखना हमें किस तरह से रहना है।”
शायद पहली बार थोड़ी तल्खी भी थी,बात में। लौट के आने के लिए चल दिए।
बस आकर खड़ी हुई। हम बस में बैठ गए। साढ़े तीन बजे चलेगी। अचानक जमरा फलिया का बच्चा भूरू और दो अन्य बच्चे हमारे पास सकुचाते हुए आए। मैंने पूछा-यहाँ कहाँ घूम रहे हो? उसकी आँखों में जैसे आँसू गिरने को हों। मैंने उसे गले लगा लिया। नहीं बेटे, हम आएंगे, यहीं रहेंगे। करीब डेढ़ किलो मीटर चलकर ये बच्चे हमें विदा करने आए हैं। बच्चों से ज़्यादा इंसान को और कोई नहीं पहचानता।
बस चल दी। महेश जी थोड़े दुःखी हैं क्योंकि रहने का ठिकाना बनाए बिना वापस जा रहे हैं। मैंने कहा महेश जी दुःखी और निराश न हों। शायद आपने सुना होगा, हर आन्दोलन और हर शुरूआत के लिए कहा गया यह सत्य। लेनिन ने कहा था- “वन स्टेप फॉरवर्ड, टू स्टेप्स बैक।”
6 मार्च, 2008
आज खट्टाली जाना है। वहां से आने के बाद आज छठवाँ दिन है। देखें क्या मिलता है? सुबह जल्दी उठकर बस स्टैण्ड निकल गया। राणापुर में महेश जी आ गए और 10 बजे से पहले जोबट पहुँच गए। यहाँ से बस बदल कर खट्टाली पहुँच गए। मैंने कहा अनिल माहेश्वरी के यहाँ चाय पीकर चलते हैं। भजिए खाए और चाय पी और उन्हें बताया कि शाम को लौट जाएंगे। वहां से चल दिए। बाजार से गाँव के रास्ते में सबसे पहले वेरसिंग, भरेला और कलम सिंह मिले। कलम सिंह ने नई मोटरसाइकल खरीद ली है। उस दिन उसके पिता ने हमसे सलाह-मशवरा किया था। वेरसिंग को बताया कि शाम को चले जाएंगे तो बोला आज रुककर जाना। थोडी आगे चले तो दरयाव सिंह मोटरसायकल पर आता हुआ दिखा। रोककर बात की और कहा कि बाजार से होकर अभी आकर मिलता हूँ। स्कूल से बच्चों ने देख लिया तो सब दौड़कर मिलने आ गए, अभी मास्टर जी नहीं आए हैं। लग रहा था कि जैसे घर वापसी हो रही है। महेश जी केम्टा वाली गली में मुड़ने लगे तो मैंने कहा पहले प्रताप और सरपंच के यहाँ चलते हैं, पिछली बार वहीं रुके थे इतने दिन। प्रताप बाहर ही मिल गया। सबसे पहले उसे बताया कि रुकेंगे नहीं, थोड़ी देर में लौट जाएंगे। आज तो छोटे-छोटे थैले ही हैं हमारे पास। नहीं तो बेचारा घबरा ही जाए कि फिर से कहीं जम न जाएँ। प्रताप ने पानी पिलाया, थोड़ी देर उसके यहाँ खटिया में बैठे। घर में कोई नहीं है, सभी के काम का समय है।
थोड़ी देर में प्रताप के यहाँ से उठकर सरपंच भाओ सिंह के घर की तरफ बढ़े। उसका एक छोटा बेटा दिखा और बताया कि सरपंच बाज़ार गया हुआ है। हमने कहा घर में जो भी है मिलते हुए जाएंगे। इतने में ही भाओ सिंह भी आ गया-हाथ में शक्कर और चायपत्ती लिए हुए। उसके यहाँ बैठकर काली चाय पी। सरपंच से बातचीत होती रही। सभी की भाव भंगिमा अच्छी लग रही है। सरपंच से मैंने पूछा कि इस बीच बातचीत करके कुछ तय किया क्या? हम तो वही पूछने ही आए हैं। सरपंच ने कहा बातचीत क्या करना सब तय है। खाना खाकर तो आए नहीं होंगे, अब यहीं बनवाते हैं, भोजन करके, आराम करके ही वापस जाना। खाना बनाने को बोला और कहा कि उसे अभी काम से जोबट जाना है। इसके बाद महेश जी को अकेले बाहर बुलाकर ले गया और क़रीब दस मिनट दोनों की बातें होती रहीं। इसके बाद सरपंच बाज़ार चला गया। महेश जी और मैं कपड़े उठाकर नदी की ओर नहाने चल दिए। नदी ही हमारा कॉन्फ्रेंस पॉइंट जो है।
महेश जी ने बताया कि सरपंच ने कहा कि गाँव वाले सब तैयार है हमें यहाँ रखने को लेकिन ये बताओ कि शैलेष दुबे क्यों मना कर रहा है? इससे पहले सरपंच ने उनसे यह भी कहलवा लिया कि ये बात और किसी से भी नहीं बतायेंगे।
मैंने पूछा, ये शैलेष दुबे कौन है?
महेश जी ने बताया कि जिला भाजपा का अध्यक्ष है, आर.एस.एस. से जुड़ा हुआ है। सरपंच ने जाते हुए मेरा फोन नम्बर भी ले लिया है, शायद मुझसे बात कराए। महेश जी ने कहा कि उन्होंने फिर से सरपंच को सब कुछ बताया और कहा कि यहां जो काम करने वाले हैं वह शिवगंगा से अलग हैं और भाजपा या संघ के खिलाफ नहीं है। महेश जी ने कहा कि अब तो स्पष्ट हो गया कि सरपंच का विरोध और उदासीनता केवल भाजपा और संघ के दबाव के कारण थी। मैंने कहा वह सब जो भी हो, मुझे तो सरपंच की बातों और दूसरे गाँव वालों के व्यवहार से यह साफ दिखाई दे रहा है कि पूरा गाँव हमारे साथ है और यही हमारी सबसे बड़ी सफलता है। भाजपा और संघ के विरोध की कोई चिंतानहीं है और न ही अब सरपंच के सहारे हैं। अब तो गाँव वाले साथ देंगे। परंतु हमें धीरे-धीरे चलना होगा। सरपंच से बोल ही दिया है कि भगोरिया में आएंगे। मैंने महेश जी से कहा कि सरपंच के विश्वास को ठेस नहीं लगना चाहिए और आप भी शैलेष दुबे वाली बात किसी से न कहें, खास तौर पर अपने कार्यकर्त्ताओं से।
आज यहां बड़ा अच्छा लग रहा है। नदी से लौटकर आए और सरपंच के यहाँ खाना खाया। उसकी पत्नी कहने लगी कि आज ही क्यों जा रहे हो, आज तो रुको। फिर पूछने लगी कि फिर कब आओगे? बेटी ने कहा कुछ दिन में परीक्षाएँ ख़त्म हो जाएंगी फिर सब फुर्सत में रहेंगे। हमने कहा अब भगोरिया में आएंगे और फिर होली के बाद यहीं आकर रहेंगे।
महेश जी ने कहा ये ही आकर रहेंगे, मैं तो मेघनगर में रहता हूँ, कभी-कभी मिलने आता-जाता रहूँगा।
सरपंच के यहाँ खाना खाकर थोड़ी देर बैठे और वहाँ से केम्टा के घर की ओर चल दिए। महेश जी से मैंने हँसते हुए कहा कि आप तो इतना ज़ोर देकर बार-बार बोलने लगे हैं कि ये ही रहेंगे, इनका ही काम है, मैं तो बस साथ आ गया कि मुझे लगने लगा है कि आगे चलकर आप ये भी न बोलने लगें कि ‘मैं तो सिर्फ फोटोग्राफर हूँ, फोटो खींचने इनके साथ आ गया। वह जोर-जोर से हँसने लगे। मैंने कहा कि अब कानूनी ज्ञान के लोकव्यापीकरण का केन्द्र यहाँ बने या न बने, इतने दिन में ये तो हो ही गया है कि यहाँ शिवगंगा और महेश शर्मा को सब जान गए और शिवगंगा के काम के लिए ज़मीन तैयार हो गई। आप भले ही यह घोषणा करते रहें कि यहाँ का काम इनका है, शिवगंगा का नहीं। अप्रत्यक्ष रूप से शिवगंगा की पैठ भी तो हो ही गई है। महेश जी मुस्कुराते रहे।
क्रमशः…
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एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-24: खबर फैल गई कि मैं ‘बैरागी’ हूं, इनाम नहीं मिलेगा
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 25ः भंवरताल में आखिरी रात है, पता नहीं कब आना होगा…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 26ः वकालत छोड़ी, फिर अपनाई, मैं उलझता चला जा रहा था…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 27: उस दिन मैं अचानक छोटा-मोटा ‘महामानव’ बन गया… मगर
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 28ः चोम सिंह ने समझा दिया, 21 वीं सदी में अपनी शर्तों पर जिया जा सकता है
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 29ः आज ऑफिस में लगेगा ताला, नाम पट्टिका हट जाएगी
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 30ः उन जगहों पर लाैटना जहां कभी मन बैरागी बन कर गया था…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 31ः स्वामी अवधेशानंद बाेले, विभूति जी आप अवश्य आइए, मुझे प्रतीक्षा रहेगी
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 32ः नाते-रिश्तेदार ‘माता-पूजन’ कर मनाते हैं ईंद, हैं न अनाेखी बात
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 33: बुढ़े ने रहने बुला लिया, हम सामान लिए चले आए, रात में बोला, घर से निकलो
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 34ः बाबा, मैं ठीक होना चाहता हूँ… बाबागिरी मेरा पीछा नहीं छोड़ रही
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 35ः ऐसा लगा जैसे दुनिया जीत ली, सिर्फ तीन दिन बाद जबर्दस्त मुँह की खाई

