एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-37

- विभूति झा, सामाजिक कार्यकर्ता
संपादन: चिन्मय मिश्र
यह अनिवार्य रूप से घटित हुआ भी एक साधारण दस्तावेज है। यह न तो कहानी है, न यात्रा वृतान्त। यह एक व्यक्ति की “लौटने” की गाथा है। विभूति दा की यह डायरी अबूझ सी सच्ची कहानी है। यह सत्य की अभिव्यक्ति है। –चिन्मय मिश्र
मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल जिले मंडला से निकलकर सागर विश्वविद्यालय से एमए और एलएलबी। फिर जेएनयू (नई दिल्ली) से समाज विज्ञान में शोधकार्य किया। भोपाल से वकालत शुरू की और भोपाल गैस त्रासदी मामले में गैस पीड़ितों के वकील बने। एक युवा वकील ने बड़े बड़े वकीलों की दलीलों को खारिज कर भोपाल गैस पीड़ितों को मुआवजा दिलवाने की लड़ाई जीती। जिला अदालत से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक पैरवी और फिर एक दिन अचानक पूरी प्रसिद्धि, अपने समृद्ध भविष्य की संभावना को पुराने वस्त्र की तरह उतार कर चल पड़े एक नए जीवन की खोज में। मन में विचारों का उफान और तन पर एक जोड़ी कपड़ों के साथ सबकुछ छोड़ दिया। परिवार भी। किसी फिल्म की पटकथा सा लगता यह इस डायरी के लेखक विभूति झा के जीवन की वास्तविकता है। एक ऐसा मंथन जो जीवन उद्देश्य खोजने की दिशा में बढ़ा और इस राह में उतने ही विविध अनुभव हुए। यह एक विस्तृत जीवन से साक्षात्कार है। किश्त-दर-किश्त रोचक होती जीवन दास्तां।
10 मार्च, 2008
खट्टाली से आने के अगले ही दिन महेश जी को फ़ोन करने पर जो सामने आया वह वास्तव में अकल्पनीय ही था।
महेश जी ने कहा कि कल तो वह खट्टाली हो आए और वहाँ दिन भर रहे।
मैंने कहा- अरे कैसे, क्या हुआ अचानक? मैंने तो कल सुबह फोन किया था। अचानक ही कार्यक्रम बन गया।
मैंने कहा− मुझे बताते तो मैं भी वहीं रुक जाता।
महेश जी ने कहा− पहले से कुछ सोचा ही नहीं था और न ही कुछ तय था, वह तो मेघनगर में बैठक में बैठे-बैठे सब लोग खट्टाली के बारे में पूछने लगे तो उसी समय तय किया कि खट्टाली चलते हैं ताड़ी पीने। जीप का इंतज़ाम किया और सीधे निकल गए।
मैंने कहा− अच्छा और लोग भी गए थे?
बोले− हाँ, करीब 15 लोग थे। वहाँ खूब ताड़ी पी और नदी के किनारे पानिए बनाकर खाए। दिन भर वहाँ ही रहे।
मैंने पूछा कि किसने बनाए और खिलाए?
उन्होंने बताया कि विनय पाण्डे ने केम्टा के लड़कों के साथ मिलकर पानिए बनवाए और सबने खूब ताड़ी भी पी।
मैंने पूछा गाँव का कौन-कौन शामिल था?
वे बोले गाँव में तो स्पष्ट विभाजन है। सरपंच के यहाँ गए थे और अच्छे से मिला, साथ में केम्टा के घर तक भी गया लेकिन खाने-पीने में शामिल नहीं हुआ, जिसका मतलब है वह अलग हो गया। और दरयाव सिंह? वह तो नहीं आया, लेकिन उसके भतीजे ने पानिए बनाए। केम्टा? वह बहुत खुश था लेकिन उसका बेटा मेहताब नाराज था कि आप लोग ही सबके साथ बैठकर ताड़ी पियोगे तो सबको क्या सुधारोगे?
मैंने कहा इतने सारे लोगों ने अचानक इस तरह का कार्यक्रम बना लिया, मुझे पता भी नहीं? आपने ताड़ी पी?
नहीं मैं कहाँ पीता हूँ, पहले से सोचा ही नहीं था, वरना आपको बताते।
सरपंच से और कोई बात हुई? किसी और से?
नहीं, और कोई बात तो नहीं हुई। बस दिन भर वहीं नदी के किनारे रहे, खाया-पीया और आ गए।
मैंने कहा आपके साथ बैठकर तो इस तरह सब लोग शायद ताड़ी नहीं पीते?
बोले कि नहीं-नहीं पहले भी ऐसे ही पीते थे।
मैं पसोपेश में पड़ गया कि आखिर ये क्या हुआ? क्यों हुआ? सच तो यह है कि मेरे कुछ पल्ले नहीं पड़ा। इस तरह मुझसे चर्चा किए बिना और यहाँ तक कि मुझे बताए बिना महेश जी ने ऐसा क्यों किया? देखा जाए तो मुझसे जान-बूझकर छुपाया गया। मैंने तो कल सुबह 9 बजे के करीब महेश जी से बात की थी, तब भी उन्होंने यही बताया कि बैठक चल रही है; और वे चर्चा में व्यस्त हैं। मुझे उनकी बात कुछ जम नहीं रही है। मैं काफी विचलित हो गया। ऐसा क्यों किया गया है? क्या महेश जी की खुद की यह सोच और निर्णय था या उन पर दबाव डालकर थोपा गया? क्या उनकी कार्यपद्धति और विनय पाण्डे के बारे में जो कुछ मैंने कहा वह उन्हें बुरा लग गया? क्या दस दिन लगातार मेरे साथ रहने से वह अपना कद घटा हुआ महसूस करने लगे? या फिर गाँव वालों और भाजपा को दिखाने के लिए यह शक्ति प्रदर्शन किया गया? ढ़ेर सारे प्रश्न दिमाग में उठ रहे हैं। क्या यह बिल्कुल भी नहीं सोचा कि हम लोग जो काम करने गए हैं और जिस तरह से गए हैं उस पर उनकी इस गतिविधि का क्या असर होगा? जो भी हो, उनका यह तरीका मुझे बिल्कुल भी नहीं जमा। यह तो मनमानी और सरासर दादागिरी है। यह एक तरह से मेरे साथ धोखाधड़ी है। मुझे लगता है कि जनतांत्रिक तरीके से काम करना शायद इन्हें आता ही नहीं और न ही इच्छा है। अगर शुरूआत में ही यह रवैया है तो आगे चलकर क्या होगा? यह तो अपनी संगठनात्मक शक्ति का दुरुपयोग है। क्या महेश जी मूलतः बेहद कमज़ोर और स्वेच्छाचारी व्यक्ति हैं?
मुझे बहुत ज़बर्दस्त झटका लगा और सब कुछ पर पुनर्विचार करना आवश्यक लगने लगा। जाहिर है बहुत दुःख और क्रोध दोनों ही हैं। कितना उत्साहित होकर आया था अभी दो-तीन दिन पहले ही खट्टाली से! महेश जी से इस तरह के व्यवहार की अपेक्षा नहीं थी। क्या मुझसे घबरा गए और मुझे झेलना भारी पड़ने लगा? पता नहीं क्यों, ज्यादा समय तक कोई मेरे साथ चल ही नहीं पाता। अकेले? आखिर कब तक?
मैं सुबह से इंतजार करता रहा मगर महेश जी का फोन नहीं आया। 11 बजे के करीब हर्ष को फोन किया कि कब और कहाँ बैठना है? हर्ष ने कहा आप 13 को बैठना चाहते हैं। ऐसा महेश जी ने बताया है, तो 13 को ही सुबह 11 बजे घर पर बैठना है। मैंने कहा ठीक है। उन्हें 15 को झाबुआ जाना है इसके अलावा और कोई बात नहीं हुई। महेश जी ने हर्ष से तो बात कर ली लेकिन मुझे फोन नहीं किया। आकाश भगत का फोन आया, कुछ सामान्य जानकारी लेने के लिए। कहने लगा आपके खट्टाली हो आए, लेकिन आप वहाँ मिले ही नहीं। हमें तो यही पता था कि आप वहाँ हैं, फिर पता चला कि अचानक चले गए।
मैंने पूछा क्या अचानक ही जाने का कार्यक्रम बन गया?
वह कहने लगा, नहीं तो एक दिन पहले ही, यानी 7 तारीख को तय हो गया था कि सबको खट्टाली जाना है और महेश जी ने विनय पाण्डे को पहले ही भेज दिया था व्यवस्था करने और पानिया की तैयारी करने के लिए। सब लोग 12 से 4 बजे तक वहाँ रहे। आकाश ने मुझसे कहा आप तो ऐसे पूछ रहे हैं जैसे आपको कोई जानकारी ही नहीं है?
मैंने कहा, हाँ भाई मुझे जानकारी नहीं है। आप लोग वहां जाने के लिए शायद मेरे वहाँ से जाने का ही इंतज़ार कर रहे थे।
आकाश ने कहा वह थोड़ी देर बाद फोन करेगा और फुर्सत से बात करेगा। फिर आकाश का फ़ोन नहीं आया, जबकि मैंने जानकारी भेज दी। विचित्र यह है कि महेश जी का फोन आज भी नहीं आया। अब सब कुछ निर्भर करता है कि महेश जी और हर्ष जी इस विषय में क्या सोचते, समझते और कहते है। उसी पर उनके साथ भविष्य के संबंध निर्भर होंगे। शाम को आकाश भगत का फोन आया। उसने लगभग एक घंटा बात की। उसे लग रहा है कहीं खट्टाली की ताड़ी पार्टी मेरे सम्बन्धों में हमेशा के लिए खटास न ला दे। वह नहीं चाहता कि ऐसा हो और कहने लगा कि इतने दिन मेरे सम्पर्क में रहने से उसकी सारी सोच और कार्य-पद्धति में निरंतर सुधार हो रहा है। आकाश ने मेरा आगे का कार्यक्रम पूछा। मैंने कहा अब तो इन्दौर भेंट पर निर्भर होगा।
13 मार्च, 2008
पौने ग्यारह बजे इंदौर के रवीन्द्र नाट्य गृह पहुँची बस। हर्ष जी और महेश जी इंतज़ार करते मिल गए। मैं पहली बार हर्ष के घर गया। रास्ते भर कोई बातचीत नहीं हुई। वहाँ पहुँचकर भी महेश जी चुप्पी ही लगाए रहे। कुछ खोए-खोए से भी रहे। हर्ष वैसे तो कम बोलते हैं, लेकिन बात शुरू करने की कोशिश करते रहे और महेश जी जैसे बचते रहे। शायद ऐसा पहली बार हो रहा था। हर्ष ने कहा अब आगे काम की योजना पर चर्चा शुरू करते हैं तो मैंने कहा अब तक जो हुआ है, पहले उसकी समीक्षा कर लें तो ठीक रहेगा और महेश जी से सुनें तो अच्छा है क्योंकि मेरे बाद भी वे खट्टाली होकर आए हैं।
महेश जी ने कहा, अरे वो तो ऐसे ही अचानक विचार आया और ताड़ी पीने कहीं जाने का सबका मन किया तो कहीं और न जाकर खट्टाली चले गए, अच्छी जगह तो है ही।
हर्ष जी ने कहा-अच्छा आप लोग ताड़ी पीने गए थे और ताड़ी पी?
महेश जी ने कहा हाँ, ताड़ी पीने ही गए थे और सारे वनवासी पीते हैं तो अपने लोगों ने भी पी। इसके पीछे और कुछ नहीं था। अब उसका परिणाम क्या हुआ होगा, ये नहीं पता।
मैंने अब स्पष्ट कहा खट्टाली वैसे ही कोई एक गाँव नहीं है। पिछले काफी समय से जिस तरह से और जिस उद्देश्य से वहाँ काम करने का प्रयत्न करते रहे हैं, उस दृष्टि से उसका अलग महत्व है। मैं यह अपेक्षा नहीं कर सकता कि महेश शर्मा जैसा व्यक्ति बिना किसी सोच-विचार के और बिना कोई लक्ष्य ध्यान में रखकर अचानक 15 लोगों को साथ लेकर जीप किराए से लेकर 80 किलो मीटर दूर सिर्फ ताड़ी पीने के उद्देश्य से मेघनगर से खट्टाली चला जाएगा?
महेश जी ने कहा− तो आपको क्या लगता है? किस उद्देश्य से गए होंगे?
मैंने कहा मेरी तो समझ से ही परे है, मैं तो सोच ही नहीं पा रहा हूँ कि अचानक आप ऐसा कैसे कर सकते हैं?
इतने महीनों के साथ में हम लोग शायद पहली बार इस तरह से आमने-सामने थे। इसी बीच हर्ष जी बोलने लगे कि यह तो ठीक नहीं हुआ। इस तरह से सबका एकसाथ बैठकर सबके साथ ताड़ी पीना, नशा करना तो किसी भी तरह से उचित नहीं है। इससे कोई लाभ तो हो ही नहीं सकता, हानि अवश्य हो सकती है।
महेश जी बोले मैं सहमत नहीं हूँ, इस पर चर्चा करनी पड़ेगी और जब पूरा वनवासी समाज इसे बुरा नहीं समझता तो हम क्यों समझें?
मैंने कहा− सवाल बुरा समझने या न समझने का नहीं है। यह कहना एक बात है कि हम कोई भगत नहीं हैं और ताड़ी या शराब पीने वाले या मांसभक्षी व्यक्ति को न तो छोटा समझते हैं और न ही उससे दूरी रखते हैं। किन्तु खुद समारोहपूर्वक समाज के बीच बैठकर ताड़ी खरीदकर पीने का आयोजन तो किसी भी दृष्टि से उचित नहीं माना जा सकता।
हर्ष बोले− हमारा यह आचरण होना चाहिए कि मैं बुरा नहीं मानता लेकिन खुद नहीं पीता।
मैंने कहा− मैं तो स्पष्ट रूप से कहता हूँ कि मैं तो पीना छोड़ चुका हूँ क्योंकि अब सामाजिक कार्य से पूरी तरह से जुड़ गया हूँ, लेकिन आप लोग अगर पीते हैं तो मुझे कोई परेशानी नहीं है। यह भी ज़रूर कहता हूँ कि अधिक पीने से आपका ही नुकसान है, हमें कोई तकलीफ नहीं है। चाहे कोई भी हो, अगर वह ईमानदारी से पूरे समय सामाजिक कार्य से जुड़ा हुआ है तो उसे अपने सामाजिक जीवन में नशा नहीं करना चाहिए। फिर चाहे वह वामपंथी हो या दक्षिण पंथी।
हर्ष ने कहा− बिल्कुल सही बात है।
महेश जी चुप ही रहे।
मैंने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा मेरा प्रश्न केवल ताड़ी पीने या न पीने को लेकर नहीं हैं। मैं तो साथ काम करने के संबंध में कुछ मूलभूत प्रश्न उठा रहा हूँ। खट्टाली में जो काम करने की हम कोशिश कर रहे हैं उससे मैं पूरी तरह से जुड़ा हुआ हूँ। मैं शिवगंगा का सदस्य नहीं हूँ यह शुरू से स्पष्ट है, और जो काम शुरू कर रहे हैं वह शिवगंगा का नहीं है, बल्कि शिवगंगा उसमें केवल सहयोगी है यह भी स्पष्ट है। महेश जी और मेरा लगभग छह महीने से साथ है और खट्टाली में दस दिन तक लगातार हम दोनों ही साथ रहे हैं। इसलिए संवादहीनता की स्थिति भी नहीं है। आगे भी साथ काम करना है, शायद यह भी सबकी इच्छा है! मैंने कहा 7 की शाम तक हम साथ थे। 8 और 9 की सुबह हमारी फोन पर बात भी हुई, ऐसी स्थिति में मुझसे सलाह या चर्चा किए बिना, मुझे बताए बिना और एकतरह से मुझसे छुपाते हुए एक सोची-समझी योजना की तरह आपका खट्टाली जाने का मैं क्या अर्थ निकालूँ? साथ काम करने के लिए एक न्यूनतम प्रजातांत्रिक पद्धति की तो आवश्यकता होती ही है। या तो मैं यह समझूं कि जानबूझकर मुझे अलग रखते हुए शिवगंगा को वहाँ स्थापित करने के लिए यह शक्ति प्रदर्शन किया गया। या फिर ऐसा है कि किसी के साथ काम करने की न आदत है, और न इच्छा इसलिए इन सब मूल्यों का कोई महत्व नहीं है और आप जब जैसा लगेगा करते रहेंगे। दोनों ही तरह से मुझे घोर आपत्ति है और इस तरह तो चल नहीं सकेगा क्योंकि जब शुरू में ही ऐसी स्थिति बन गई है तो भविष्य में क्या होगा?
उनकी नीयत में कोई खोट नहीं है
मेरी बात के दौरान हर्ष लगातार हाँ में सिर हिलाते रहे और महेश जी लगातार अपने चेहरे पर असहमति और पीड़ा दर्शाते रहे। उनके चेहरे पर स्वीकारोक्ति तो कहीं से नहीं दिखी। अंतत: वह कहने लगे आपने ऐसा गलत सोच लिया है ऐसा बिल्कुल नहीं था।
मैंने कहा− तो कैसा था और सही क्या है? कोई भी सामान्य बुद्धि और समझ वाला तो ऐसा ही सोचता।
महेश जी ने कहा− आपने तो एक घटना को बहुत दूर तक देख लिया और परिणाम भी सोच लिया।
मैंने कहा− यह कोई साधारण घटना नहीं है और न ही आपका कोई सामान्य व्यक्तिगत व्यवहार है। जब हम समाज के लिए समाज में रहकर काम करते हैं तो कुछ भी करने से पहले हमें दूर तक सोचना पड़ता है। इसी तरह जब किसी के साथ काम करते हैं तो कुछ नया करते हुए उसके बारे में भी सोचना पड़ता है। मैं नहीं मान सकता कि आपने बिना सोचे-समझे ऐसा किया?
इस बीच महेश जी दो मिनिट के लिए उठकर बाहर चले गए और लौटकर बोले− आप जैसा सोच रहे हैं, वैसा तो कुछ नहीं है लेकिन यह अवश्य है कि बड़ी चूक हो गई है। दोनों बातें कि आपसे चर्चा न करना भी और वहाँ ताड़ी पीना भी। मुझसे चूक हो जाती है, आप ऐसे विचार न लायें। आपका ऐसा सोचना मेरे लिए बड़ी चिंता की बात है।
खाना खाकर मैं बैठ गया। हर्ष जी और महेश जी पाँच मिनिट बाद आए। महेश जी ने कहा हम दोनों केशव विद्यापीठ चलते हैं। हर्ष जी बाद में आएंगे और वह भी रात वहीं रुकेंगे। हर्ष जी की मारूति में हम दोनों निकल गए। महेश जी कार भी चलाते हैं। रास्ते भर और यहाँ पहुँचकर महेश जी स्पष्टीकरण देते रहे कि यह केवल एक भूल थी इसके पीछे और कोई बात नहीं थी। मैं भी कहता रहा भूल थी या नहीं अलग बात है लेकिन जिस तरह से वहाँ जाना हुआ वह निश्चय ही अनुचित था और आपने किसी दबाव में बिना समग्र विचार किए यह कदम उठा लिया जो कि गलत था। महेश जी कहते रहे कि यह बिना सोचे-समझे अचानक हो गया। मैंने अब यह कहना उचित नहीं समझा कि उन्हें और भी लज्जित करने के लिए बता दूँ कि आपने यह कार्यक्रम मुझसे अलग होने के तुरंत बाद बना लिया था और कुछ लोगों को बता भी दिया था। 7 तारीख की रात को ही आप तय कर चुके थे। मैंने यह ज़रूर कह दिया कि आगे से इन बातों का ध्यान रखना ज़रूरी है नहीं तो साथ काम करना मुश्किल है। मैं बोलता रहा कि आपने हतोत्साहित होकर, खींझकर अपनी शक्ति प्रदर्शित करने के लिए अपने आसपास के लोगों के कहने से मुझे बताए बिना यह कदम उठाया क्योंकि आपकी अपेक्षा शायद कुछ और थी। वहीं दूसरी ओर मेरी अपेक्षा के अनुसार ही सब कुछ चल रहा था।
महेश जी में चिंतन की अपरिपक्वता, भोलापन, असुरक्षा की भावना और अपने कार्यकर्त्ताओं के दबाव में क्षणिक आवेश में निर्णय लेने की कमज़ोरी स्पष्ट उभर कर सामने आई। लेकिन इसके साथ ही यह भी साफ लगा कि उनकी नीयत में कोई खोट नहीं है और उनका मेरे प्रति बहुत सम्मान है, जो अब शायद भय में भी परिवर्तित हो रहा है। दूसरी और हर्ष बहुत परिपक्व है और उनकी सोच-समझ में स्पष्टता है।
इसी दौरान हर्ष भी आ गए और काफी समय यही बातें चलती रहीं। मेरे कहने से महेश जी ने सरपंच के लड़के को फोन किया कि अपने पिता से पूछकर बताए कि उन्होंने क्या सोचा? 8.00 बजे दोबारा फोन किया तो उसने बताया कि सबकी आपस में चर्चा हो गई है और यही तय किया है कि आप लोग यहाँ आकर रहें और प्रताप के खेत वाला कमरा तैयार किया जा रहा है। यह सुनकर मैं बहुत अधिक उत्साहित हो गया। अभी तक की कटुता और विषाद सब समाप्त हो गया।
17 मार्च, 2008− आज ताड़ी पी ली जिससे डर दूर हो जाए
कल और परसों के दिन महेश जी को दूसरे स्थानों पर जाना है। परसों खट्टाली का भगोरिया है, लेकिन महेश जी नहीं जा पाएंगे। उनके पास आज का दिन खाली है। तय हुआ कि आज खट्टाली चलते हैं। महेश जी शाम को वापस लौट आएंगे और हो सका तो मैं वहीं रुक जाऊँगा। मेरे कहने से जंगल सिंह को भी साथ ले लिया। जंगल को बस से खट्टाली जाने के लिए रवाना किया और महेश जी के साथ मैं मोटरसायकल पर निकला। साढ़े बारह के करीब हम खट्टाली पहुँच गए। सरपंच तो घर पर नहीं था। प्रताप मिल गया। इस समय तो सब अपने-अपने काम पर या बाज़ार-भगोरिया देखने गए हुए हैं। प्रताप ने कहा कि सभी गाँव वाले चाहते हैं कि आप यहाँ गाँव में रहो। बस, थोड़ी-सी परेशानी खाने को लेकर ही है। रोज़ घर में खाना बनाकर खिलाने में गाँव वालों को परेशानी लग रही है। हमने कहा ऐसी बात तो है ही नहीं, एक बार रहने की जगह तैयार हो गई तो खाना तो वहाँ बनेगा ही। प्रताप ने कहा फिर तो कोई दिक्कत नहीं यहाँ रहने में। सब की इच्छा है कि खेत वाला कमरा तैयार कर देंगे। मैंने महेश जी से कहा कि यही खाने वाली बात डूंगर ने पहले ही कही थी, लेकिन हमने ध्यान नहीं दिया। मुझे तो झाबुआ जिले में शुरू से ही यह लगा कि बाहरी आदमियों को एक बार से ज़्यादा खाना खिलाने में इन लोगों को समस्या होती है और उसके लिए ज़्यादा गर्मजोशी नहीं दिखाते। हाँ, एक दिन तो बड़े उत्साह और प्रेम से खिलाते हैं। दोनों तरह की समस्या हो सकती है वित्तीय और रोजमर्रा की दिनचर्या में विघ्न भी। महेश जी का उल्टा सोचना रहा है कि खाना खिलाने में इन्हें कोई समस्या नहीं होती, जो गलत है। ये लोग अपने हिसाब से बनाते और खाते हैं, लेकिन जब कोई बाहरी व्यक्ति आ जाए तो फिर उसके लिए सब काम छोड़कर समय पर पूरा भोजन तैयार करना होता है, जिसमें समस्या होना स्वाभाविक है।
जंगल सिंह घूमते-घामते चार बजे के करीब आया। हम लोग नदी की तरफ गए। रास्ते में कोई-कोई मिलता रहा और अच्छे से बातें करता रहा। इसी बीच डूंगर सिंह भी जोबट से आ गया। कहने लगा अब तो जल्दी से आपका कमरा बनाना है, बस खाना खिलाने वाली ही बात थी वह साफ हो गर्इ। सरपंच आ जाए तो बात करके तय कर लेते हैं कि कब से काम शुरू करना है। मैंने कहा वैसे इडला ड्राइवर का मकान सबसे अच्छा है लेकिन उससे बात नहीं हो पा रही है। महेश जी और डूंगर मोटरसायकिल पर इडला के घर गए। लेकिन वह मिला नहीं और न ही उसकी पत्नी घर पर मिली। मैंने कहा अब कल मैं उसके यहाँ होकर बात करके आऊँगा। आज रात में तो अब मैं यहीं रुकूँगा और खाना भी यही खाऊँगा, ऐसा डूंगर को बता दिया। महेश जी साढ़े पाँच के करीब मोटरसायकल से निकल गए। मैंने कहा 20 और 21 को सब लोग साथ-साथ भगोरिया देखने का कार्यक्रम बना सकते हैं। महेश जी ने कहा सबसे चर्चा करेंगे। सभी की इच्छा है। जंगल सिंह कुछ अनमना-सा लग रहा है। मैंने उसे रात में अपनी बुआ के घर खाने और सोने को कहा है, लेकिन कुछ उलझन में दिख रहा है। इन पर दो-दो लोगों का भार डालना ठीक नहीं है। वह पता नहीं क्यों नहीं जाना चाहता अपनी बुआ के घर? इसी बीच डूंगर ताड़ी निकालने चला गया। जंगल अपनी बुआ के घर गया।
सरपंच छह बजे के करीब लौटकर आ गया। बोला, थोड़ी देर में बैठते हैं। थोड़ी देर में डूंगर भी आ गया और प्रताप भी। सब लोग वहीं बीच में बैलगाड़ी के पास चाँदनी में बैठ गए। डूंगर ने बाकायदा भाषण के अंदाज में अपना पक्ष रखा कि मेरे जैसे पढ़े-लिखे, बुजुर्ग आदमी के गाँव में रहने से पूरे गाँव और समाज को क्या-क्या फायदे हो सकते हैं। मैं अपना यशोगान चुपचाप सुनता रहा। सरपंच भी उस सब में अपनी बात जोड़ता रहा और प्रताप सहमति में सिर हिलाता रहा। मैंने कहा एक बार इडला से बात करके देखते हैं तो सरपंच ने एकदम इंकार कर दिया और कहा कि अब तो प्रताप के खेत वाले कमरे में ही रहना है, बाद में कोई और बड़ी जगह देखेंगे, इडला से अब बात नहीं करना है। डूंगर सिंह का उत्साह देखने लायक है। आठ बजे के करीब सभा विसर्जित हुई। डूंगर सिंह से मैंने कहा आज तो तुम खूब बोले तो कहने लगा आज ताड़ी पी ली जिससे डर दूर हो जाए और बोल सकूँ। यह हुई स्वीकारोक्ति।
यहाँ कल भगोरिया है। मैंने सरपंच से कहा कि आज अम्बुआ का भगोरिया देखने जाते हैं और कल वापस खट्टाली का भगोरिया देखकर रात यहाँ रुकेंगे सरपंच के घर । सरपंच ने कहा कि रंगमंचमी के बाद कमरा सुधारने का काम लगा देंगे। उसके साथ कमरा खोलकर जो काम कराना है वह समझाते रहे। ईंटें लानी पड़ेंगी जिसके लिए पैसे दे देंगे। बाकी सब तो ए लोग कर ही लेंगे। सरपंच बहुत प्रसन्न है। अब उसकी सारी शंकाओं का समाधान हो गया है और लगने लगा है कि मेरे यहाँ रहने से शायद लाभ ही होगा।
क्रमशः…
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एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 25ः भंवरताल में आखिरी रात है, पता नहीं कब आना होगा…
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एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 30ः उन जगहों पर लाैटना जहां कभी मन बैरागी बन कर गया था…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 31ः स्वामी अवधेशानंद बाेले, विभूति जी आप अवश्य आइए, मुझे प्रतीक्षा रहेगी
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एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 35ः ऐसा लगा जैसे दुनिया जीत ली, सिर्फ तीन दिन बाद जबर्दस्त मुँह की खाई
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