एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-42

- विभूति झा, सामाजिक कार्यकर्ता
संपादन: चिन्मय मिश्र
यह अनिवार्य रूप से घटित हुआ भी एक साधारण दस्तावेज है। यह न तो कहानी है, न यात्रा वृतान्त। यह एक व्यक्ति की “लौटने” की गाथा है। विभूति दा की यह डायरी अबूझ सी सच्ची कहानी है। यह सत्य की अभिव्यक्ति है। –चिन्मय मिश्र
मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल जिले मंडला से निकलकर सागर विश्वविद्यालय से एमए और एलएलबी। फिर जेएनयू (नई दिल्ली) से समाज विज्ञान में शोधकार्य किया। भोपाल से वकालत शुरू की और भोपाल गैस त्रासदी मामले में गैस पीड़ितों के वकील बने। एक युवा वकील ने बड़े बड़े वकीलों की दलीलों को खारिज कर भोपाल गैस पीड़ितों को मुआवजा दिलवाने की लड़ाई जीती। जिला अदालत से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक पैरवी और फिर एक दिन अचानक पूरी प्रसिद्धि, अपने समृद्ध भविष्य की संभावना को पुराने वस्त्र की तरह उतार कर चल पड़े एक नए जीवन की खोज में। मन में विचारों का उफान और तन पर एक जोड़ी कपड़ों के साथ सबकुछ छोड़ दिया। परिवार भी। किसी फिल्म की पटकथा सा लगता यह इस डायरी के लेखक विभूति झा के जीवन की वास्तविकता है। एक ऐसा मंथन जो जीवन उद्देश्य खोजने की दिशा में बढ़ा और इस राह में उतने ही विविध अनुभव हुए। यह एक विस्तृत जीवन से साक्षात्कार है। किश्त-दर-किश्त रोचक होती जीवन दास्तां।
वापस कट्ठीवाड़ा: स्थायित्व 7 जून, 2008
कट्टीवाड़ा पहुँचकर भूख और थकान से लस्त होकर उतरे। एक दुकान में मिर्ची के पकौड़े ठंडे मिल गए वही खाए। यहाँ चाय मिलना ज़रा मुश्किल होता है, लेकिन मिल ही गई। आगे बढ़े तो एक दुकान के अन्दर से किसी ने आवाज़ दी-हमारा ‘मकान मालिक’ शैलेन्द्र निकला। वह तो भाभरा जा रहा है, बताया कि कमरे में ताला लटका हुआ है, बिना चाबी के खुल जाएगा, वह दो दिन में लौटेगा। उसके चेहरे पर चोट का निशान दिखा। उससे कुछ पूछा नहीं। शैलेन्द्र से मिलकर आश्वस्त हुआ कि मकान अभी सुरक्षित है। घर पहुँचकर सुमेर सिंह ने साफ-सफाई की। बिस्तर वगैरह जो छोडकर गया था, सब यथावत है। इस बार किसी ने हाथ नहीं लगाया।
शाम को टहलते हुए पार सिंह की दुकान पर चला गया और वह मिल गया। बोला कि थोड़ी देर में आ रहा है फिर बात करेंगे। मैं लौटकर आ गया तो काफी अंधेरा हो गया था, तब पार सिंह आया। काफी देर तक बातें होती रहीं। बातें तो बड़ी अच्छी करता है और उत्साह भी बहुत दिखाता है। यहाँ सारे लोग उसे जानते हैं और अभी तक किसी ने उसकी बुराई नहीं की। अगर साथ जुड़ गया तो काम का साबित हो सकता है। कहने लगा एक पंचायत के लिए कल दूसरे गाँव जाना है, मुझे ले चलेगा। रात की बूँदा बाँदी से थोड़ी ठंडक हो गई। अब सुमेर सिंह भी है तो दोनों तरफ के दरवाजे खुले रखकर एक-एक दरवाजे के सामने सोते हैं, हवा लगती है। पास के एक झोपड़े में एक परिवार रहता था वह मजदूरी के लिए गुजरात जा चुका है इसलिए अब यहाँ आसपास कोई नहीं है। पार सिंह बता रहा था कि यहाँ यह चर्चा का विषय है कि एक अजूबा शहरी इंसान आया है जो डरता बिल्कुल नहीं है, यहाँ तक कि रात में दरवाजे खुले रखकर अकेला अंधेरे में सोता है।
पार सिंह तो आया नहीं। उसकी बातों पर भरोसा नहीं किया जा सकता। वैसे यहाँ यह सामान्य बात है और इन लोगों की चारित्रिक विशेषता है-कुछ भी कहकर पूरी तरह से भूल जाना। एक राम सिंह बारया मिलने आ गया, बगल के कोठार मोहड़ा गाँव में रहता है और जनपद सदस्य है। बड़े सम्मानपूर्वक बातचीत करता रहा। कहने लगा इस घर में कैसे आ गए? मैंने कहा पार सिंह ने दिलाया। शाम को टहलते हुए पार सिंह के पिता के घर के सामने से निकला। गुल सिंह नाम है। जनपद पंचायत में चौकीदार है। थोड़ा पिए हुए बैठा है। मुझे बुलाकर बैठा लिया। कहने लगा बहुत खराब लोगों के बीच रह रहे हो, बचकर रहना-या तो “गांडी” है या “भड़वी” यानी कम अक्ल या दुश्चरित्र। मैंने कहा तुम्हारे लड़के ने ही दिलाया। कहने लगा ऐसी “छकली रांड का घर छोड़ दो-पियक्कड़ विधवा, कहीं फँसा देगी।” इस तरह की भाषा से यहाँ यह मेरा पहला साक्षात्कार था।
घूमते-घूमते गुप्ता जी की किराने की दुकान पर कुछ सामान लेने गया। वहां बचीखुची कसर भी पूरी हो गई। वह कहने लगा “आप इतने अच्छे आदमी हैं, कैसे लोगों के बीच फँस गए? वह तो एकतरह का वैश्यालय ही है। आप वहाँ मत रहो। अब तो सब आपको पहचानने लगे हैं। कोई दूसरी जगह देख लेंगे।” यानी नए घर की तलाश? परीक्षा अनवरत जारी है। विश्वास करना क्या मेरी कोई कमी है? शायद इसी तरह कोई रास्ता निकले।
दुकान से लौटते हुए टेलीफोन एक्सचेंज के सामने एक व्यक्ति कुर्सी पर बैठा हुआ मिला। बुलाकर बैठाल लिया। नशे में धुत्त है। मैंने पूछा आप इस एक्सचेंज के इन्चार्ज हैं क्या? बोला नहीं, मैं तो शिक्षक हूँ, इन्चार्ज तो आलीराजपुर रहता है और मैं पड़ोस में रहता हूँ। मुझसे पूछने लगा आप कौन हो? सुना है आप बहुत बड़े सीआईडी हो? मैंने कहा किससे सुना? बोला फॉरेस्ट रेस्ट हाउस के चौकीदार ने बताया। बड़ी ऊटपटांग बात दारू पीकर बोलता है आपके बारे में। कहता है, केन्द्र सरकार ने भेजा है सीआईडी को यहाँ फॉरेस्ट वालों की जासूसी करने के लिए। मैंने कहा, अगर लोग ऐसा सोचते हैं तो बड़ी अच्छी बात है, चोरी कम होगी। तो वह बोलने लगा वहाँ छकली-रांड के यहाँ, कहाँ अकेले पड़े रहते हो, कोई रात में गला काट देगा। तुम्हारे बहुत दुश्मन हैं यहाँ। इधर बस्ती में रहो, मैं कल घर दिला दूँगा। मैंने कहा मेरा गला काटकर किसी को क्या मिलेगा? मुझे कोई डर नहीं है। इसके बाद वह बेहोश होकर कुर्सी से गिर पड़ा। मैं हँसते हुए चल पड़ा। टेलीफोन एक्सचेंज वाला छतर सिंह आलीराजपुर रहता है और एक्सचेंज का डीजल बेचता है।
आज शांता भी नहीं आई। हमने खुद खाना बनाया और खाया। सुबह भी कान्ता-शान्ता में से कोई नहीं आया। इसका मतलब है असहयोग करने का तय कर लिया गया है। पार सिंह ने भी बताया था कि कजली बाई कह रही थी कि ऐसा लगता है मकान पर कब्ज़ा ही कर लेंगे। उसने बताया कि उसे कोई धाकड़ गुरु जी ने कहा था कि बड़े खराब आदमी हैं, सब हड़प लेंगे। सुमेर सिंह ने बताया कि धाकड़ गुरु जी यहाँ के आर.एस.एस. प्रमुख हैं। तो संघ वाले यहाँ भी शुरू हो गए! यहाँ की स्थिति और लोगों की सलाह को देखते हुए वैसे भी अब यहाँ रहने का औचित्य नहीं दिखता। उखाड़ने का कार्य जमने से पहले ही शुरू हो गया! मैंने यह घर पार सिंह के कारण लिया था और वही नहीं मिलता। सुमेर से मैंने कहा कि आप दिन में मकान ढूँढ़े, मैं यहीं रहूँगा।
सुमेर दोपहर में लौटा। मुरमुरा-नमकीन-प्याज का भोजन किया। उसने एक-दो जगह देखी है, शाम को जाएंगे। बादल अच्छे-खासे हैं। करीब 4 बजे ही निकल गए। सुमेर के देखे हुए मकान तो नहीं जमे। बबलू उर्फ कमल कनेस नाम का दूध बाँटने वाला लड़का मिल गया। उसने एक बन्द मकान दिखाया, जो बहुत अच्छा लगा। मकान मालिक भाभरा में रहता है और पेशे से शिक्षक है। पड़ोस में एक आदिवासी ईसाई शिक्षक जितेन्द्र सिंह डावर रहते हैं। उनके यहाँ बैठकर जानकारी ली। कल सुबह भाभरा जाएंगे। प्रवीण चौहान सरपंच भी मिला। उसके पिता की मृत्यु हो गई है। एक और गाँव हवेली खेड़ा के पास एक ज़मीन देखने गए। बहुत अच्छी लगी। आज बहुत से लोग बड़ी आत्मीयता से मिले।
सुबह सुमेर सिंह के साथ आठ बजे की बस से भाभरा निकल गया। डावर मास्टर भी उसी बस से गया और हमें मकान मालिक का घर समझा दिया। कमल सिंह गुरु जी के यहाँ पहुँचे। पढ़ा-लिखा और सम्पन्न आदिवासी परिवार है। पत्नी के भाई धनराज का मकान है जो शराबी है और झाबुआ रहता है। मकान इन्हीं के जिम्मे है। अच्छे से बातचीत हुई और तय हुआ कि थोड़ी देर में उनकी पत्नी कट्ठीवाड़ा आकर मकान दिखा देगी। वापस कट्ठीवाड़ा आ गए। थोड़ी देर में मकान देख लिया, बहुत जमा। खूब सारी खुली जगह है। 700 रुपया माहवार किराया तय हुआ और 350 रुपए एडवांस दे दिया। वे लोग परसों आकर साफ-सफाई करवा कर दे देंगे। अब बड़ा हल्का लगा। अब जाने से पहले यहाँ सामान रख लेंगे।
यहाँ बस्ती में मुझे लेकर सब पसोपेश में हैं। शुरू में हैरविग के साथ घूमते और उनके घर आते-जाते देखकर संघ व वीएचपी वालों ने प्रचार किया कि ये ईसाई पादरी है, जो भेष बदलकर धर्मांतरण के लिए आया है इसलिए इससे दूर रहो। फिर फॉरेस्ट रेस्ट हाउस में रहने से और प्रशासन के लोगों के मिलने आने से अफवाह उड़ी कि ये “सीआईडी” है! अब शिवगंगा के सुमेर सिंह को मेरे साथ घूमते देखकर परेशान हैं कि ये कैसा ईसाई पादरी और सीआईडी है? बहरहाल, संघ वालों को तो यह निश्चय हो गया है कि यह उनके तो काम का आदमी नहीं ही है और इसकी खिलाफत करनी चाहिए। चाय के समय राम सिंह बारया के घर गया। उसने आम खिलाए और चाय पिलाई।
सुबह घूमते हुए शिवराज सिंह जाधव के घर गया। आम के बगीचे में बैठकर बातें करते रहे। घर के स्वादिष्ट आम खाए और चाय पी। यहाँ के राज परिवार का युवक है, भला लगा। पंचायत सचिव भी है। राजा के भाई का बेटा है। परिवार सहित यहीं बगीचे में रहता है। इसके पिता ने बड़े आम के दो पेड़ तैयार किए थे जिनका नाम नूरजहाँ रखा है। शायद इतने बड़े आम और कहीं नहीं होते। काफ़ी बड़ा आम का बगीचा है। झरने की तरफ इसके चचेरे भाई भरत सिंह का घर और बगीचा है। वे ज्यादा सम्पन्न हैं। जिस घर में शिव मंदिर है, वहाँ इनके परिवार के एक सदस्य ने आत्महत्या कर ली थी, इसलिए अब वहाँ कोई नहीं रहता। आगे चलकर रहने के लिए अच्छी जगह हो सकती है। चलने लगा तो बोला आम रख देते हैं। मैंने कहा 2-3 दिन में भोपाल जाऊँगा तब कुछ बड़े आम दे देना। बोला ठीक है।
आज नए मकान वाले उसे साफ करने आने वाले हैं। सुमेर को देखने भेजा। शाम को आकर उसने बताया कि बहन, भाई और उसकी पत्नी आकर साफ-सफाई करवा रहे हैं। शाम तक साफ हो जाएगा और आज रात वे लोग यहीं रुकेंगे। शाम को मैं भी उनसे मिलने गया। भाई धनराज शराबी है लेकिन भला लड़का लगा, उसकी पत्नी भी अच्छी है। अभी ये लोग झाबुआ में रहते हैं। बहन-बहनोई भाभरा में हैं, वही जिम्मेदार हैं। हमेशा की तरह इस बार कुल मिलाकर अच्छे लोग लगे। कल सुबह जाएंगे। सुबह उठकर नए घर में गया और वहाँ अपना ताला लगा दिया। मकान मालिक का परिवार चला गया। अब कल सुबह यहाँ सामान रखकर फिर मेघनगर के लिए दोपहर में निकल जाएंगे। यह काफी अच्छी जगह है जिसमें कुआँ और अमरूद का बगीचा भी है। कजली बाई कल से मकान की खपरैल सुधरवा रही है। आज पैसे माँगने लगी। मैंने कहा पैसे नहीं हैं, एडवांस दे चुका हूँ। बाद में सुमेर से कह रही थी, पैसे नहीं देते हैं, खाली करा लूँगी। उससे कहने लगी मुझे कोई पैसे नहीं दिए। लड़के को दिए होंगे तो वो जाने परंतु मकान तो मेरा है।
सुमेर के पास घर से फोन आया कि कल सुबह पारा की बाज़ार में उसे लड़की देखना है। अगर दोनों ने एक-दूसरे को पसंद कर लिया तो शादी हो जाएगी। औपचारिक शादी तो नहीं होगी, बिना लेन-देन के साथ रहने लगेंगे। इसे ‘लुगड़ा-लाड़ी’ विवाह कहते हैं। आगे चलकर जब लड़के के परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी हो जाएगी तो लड़की के परिवार को दहेज देकर औपचारिक शादी की जाएगी और तब समाज की मान्यता इन्हें और इनके बच्चों को मिलेगी। परस्पर सहमति से ऐसा ‘लिव-इन’ वैवाहिक संबंध इन लोगों में काफी प्रचलित हैं। सुमेर बहुत उत्साहित है। अब शिवगंगा के काम में भी उसका मन नहीं लग रहा है, अपने घर रहकर खेती करना चाहता है।
11 बजे तक सुमेर को पारा पहुँचना है, इसलिए अब रात में ही सामान नए घर में ले जाएंगे। मैंने सोचा था कल सुबह बगीचे से आम मँगा लेंगे, लेकिन अब आज शाम को ही मँगाना पड़ेंगे। तय किया कि दोपहर में उपवास रखते हुए शाम को यहाँ बनाकर खा लेंगे और फिर सामान ले जाएंगे। आज गर्मी बहुत तेज है। पानी गिरना चाहिए। सुमेर ने आकर बताया आम लेने शाम को बुलाया है। शाम अच्छी खासी बारिश आई। सुमेर आम लेने गया और लौट आया। उसे देर हो गई थी। शाम को थोड़ा जल्दी खाना बना लिया और खा लिया। इस मकान में आखिरी खाना। बारिश अच्छी-खासी हो रही है। बबलू की सायकिल लेकर सुमेर आ गया। एक बार सायकल पर रखकर आधा सामान उसने नए घर में पहुँचा दिया-इंदलावट में है वह घर। यहाँ से करीब एक किलोमीटर, कट्टीवाड़ा-भाभरा रोड पर बस स्टैंड से करीब आधा किलो मीटर। रात दस बजे के करीब बाकी सामान उठाकर दोनों पैदल चल पड़े। अपनी कुल जमा गृहस्थी अब एक साइकल में समा जाती है। कितना संतोषजनक है यह। अलविदा कोठार मोहड़ा रोड।
15 जून, 2008 – इंदलावाट
रात इंदलावाट में अपने नए मकान में सोए। जगह तो बहुत अच्छी है, लेकिन नाले-नदी के एकदम किनारे होने से पास के पेड़ों पर बगुलों का डेरा है जो रात भर आवाज़ करते हैं और उनकी गंध भी आती है। देखते हैं? सुबह जल्दी उठ गए। यहां बूँदा-बाँदी चल रही है। रात अच्छी बारिश हो गई। वैसे तो कट्ठीवाड़ा में जून के पहले हफ्ते में ही मानसून आ जाता है, इस बार देर हो गई। बाकी जगह इस साल मानसून जल्दी आ गया। घूमते-टहलते शिवराज के बगीचे में पहुँच गया। खूब आवभगत की। चार आम तुड़वाकर रख दिए। टूटने के बाद उनका रूप पूरा दिखता है। मैं देखते ही रह गया। तुलवाकर देखा तो चार आम नौ किलो के निकले। बताया कि अभी और बड़े होना है और तोड़ने का समय नहीं आया है। एक आम साढ़े तीन किलो तक का होता है। शिवराज इसे लिमका बुक में दर्ज कराना चाहता है। कोशिश करेंगे। बहुत देर बैठा और अच्छे-अच्छे आम खाए। कहने लगा कि इतने दिन से सब लोग आपको घूमते हुए देखते थे, लेकिन कोई रोककर बात करने की हिम्मत नहीं कर पाता था। उस दिन पार सिंह ने बताया तब आपसे बात करने की हिम्मत की।
थोड़ी देर में उसका चचेरा भाई भारत सिंह भी आ गया। अच्छा सभ्य, सुसंस्कृत लड़का लगा। शिवराज से छोटा है। काफी देर बातें कीं। कहने लगा “आप तो ब्राह्मण है?” मैंने कहा कैसे जाना? बोला “देखकर और बात करके ही लगता है।” मैंने कहा “अज़ीब बात है। हाँ, जन्म तो ब्राह्मण परिवार में ही हुआ है, किन्तु ब्राह्मणत्व किसी भी तरह से नहीं है।” यह अजीब बात है, जो आज तक मेरी समझ में नहीं आई। ऐसी क्या वजह है कि लोग मुझे ब्राह्मण कहने लगते हैं? जबकि वेश-भूषा, शक्ल-सूरत चाहे कैसी भी हो। अब तो इस आदिवासी अंचल में भी ब्राह्मण की पहचान की जाने लगी है। शायद यही अपसंस्कृति है!
कट्ठीवाड़ा का चयन करने के बाद से प्रत्येक प्रवास एकदम अलग होता आया है। पहली बार तो फॉरेस्ट रेस्ट हाउस में करीब एक हफ़्ता रुकना हुआ और कोठार मोहड़ा का मकान लेकर वापस गया। दूसरी बार कोठार मोहड़ा के मकान में पूरा मन लगाकर जमने और उसे रहने योग्य बनाने का प्रयत्न किया। तीसरी बार कोठार मोहड़ा से मोहभंग का दौर चला, जिसके अंत में उसे छोड़कर इंदलावट के मकान को लेकर लंबे अंतराल के लिए निकल आया। कोठार मोहड़ा के मकान में रहने का निर्णय एक तरह से एडवेंचरिस्ट ही साबित हुआ, वास्तविक परिस्थितियों को नज़रअंदाज़ करते हुए अतिविश्वास के साथ लिया गया एक अतिवादी फैसला था। अब लगता है सही स्थान चुन लिया गया है। लोगों ने भी अब स्वीकार करना शुरू कर दिया है। अब तो महीने भर बाद ही लौटना होगा। देखें, तब क्या मिलता है? समझ में आ रहा है कि बसने के लिए बहुत बार उजड़ना भी पड़ता है। शायद यह स्वयं को दोहरती परिस्थिति अंततः लाभकारी सिध्द हो!
क्रमशः…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा की सभी कड़ियां यहाँ देखेंः
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-1: अनजान द्वारा खुद को समझे जाने से जीवन मनोहारी हो गया
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-2: भोजन करने और भोजन पाने के बीच का अंतर भी समझ आने लगा
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-3: उसने मेरे पैर छू कर कहा, बाबा, कहीं मत जाओ…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-4: मैंने सोचा, खतरनाक होने के लिए खतरनाक होना जरूरी नहीं होता
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-5: वाह, पचास रुपए? बड़े दिनों बाद इतने रुपए एक साथ देखे थे…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-6: जीवन में पहली बार रोजदारी की थी, वह भी भक्ति की!
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-7: भोपाल करीब आने लगा तो मैं ट्रेन में ऊपर चढ़कर बैठ गया…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-8: दोनों घूम-घूम कर पार्टी का प्रचार कर रहे हैं, सावधान रहना
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-9: नक्सलवाद के एक काल्पनिक बिजूके को प्रतीक बनाया गया
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-10: मैंने अपना पूरा नाम बताया तो वे एकदम उछल पड़े…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-11: कथा वाचक की नई भूमिका, मुझे अंदर से हँसी आ रही थी…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-12: वृंदावन की कुंज गली में बदल गया मेरा नजरिया
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-13: ब्रज जा कर जाना, श्रद्धा से किस तरह आनंदित रहा जा सकता है
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-14: मैं बाबा नहीं बन पाया…मैं हार गया!
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-15: अहसास हुआ कि लोग सफर को मंजिल से बेहतर क्यों बताते हैं…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-16: मैं संघ का भेदिया हूं, वकील तो ऐसे होते नहीं हैं…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-17: घर बनते जाते हैं, जमीन बंटती चली जाती है लेकिन रहते सब साथ-साथ हैं
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-18: सौ दिन पूरे… लगता है घर से बहुत दूर न जाकर गलती कर दी
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-19: मैं सन् उन्नीस सौ बावन में सातवीं फेल हुआ हूं…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-20: संभवतः किसी को उम्मीद नहीं होगी कि मैं इस तरह फट पडूंगा…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-21: दहेज का दबाव न हो तो हर मर्द चार-पांच ब्याह कर लेगा
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-22: पूरे पच्चीस साल बाद पैदल अपने गांव भंवरताल जा रहा हूं…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-23: अपने गांव भंवरताल में हूं; एक वो दिवाली थी, एक ये दिवाली है, एकदम अलग
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एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 34ः बाबा, मैं ठीक होना चाहता हूँ… बाबागिरी मेरा पीछा नहीं छोड़ रही
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 35ः ऐसा लगा जैसे दुनिया जीत ली, सिर्फ तीन दिन बाद जबर्दस्त मुँह की खाई
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 36: काेई खेत नहीं गया, कोई बाजार, कोई स्कूल, राे कर बोले, बाबा मत जाओ
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 37: मैं विचलित हूं, मुझे बताए बिना महेश जी ने ऐसा क्यों किया?
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 38: जिसे ‘खूनी सोंडवा’ कहते हैं, मुझे वहीं मिला सबसे ज्यादा आनंद
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 39 : जो मैं कहना चाह रहा था, वह खुद न कहकर उनसे कहलवा लिया
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 40 : मरेंगे और मारेंगे, नहीं तो जिंदगी किस काम की! कानून की पढ़ाई दांव पर
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 41 : स्वामी अवधेशानन्द ने कहा− मैं चाहता हूं कि आप…

