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वे कौन हैं जो सहते हैं, झेलते हैं? नहीं जानता, लेकिन वे मेरे लोग हैं

पाब्लो नेरूदा को 1971 में साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उन्‍होंने एक साक्षात्‍कार में कहा था, लिखना मेरे लिए सांस लेने जैसा है।

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सहज प्रवृति है: प्रतीक्षा करते रहना,मांग करते रहना सामर्थ्य से अधिक

विश्‍व कविता दिवस: तिब्बत के महान योगी, संत और कवि मिलारेपा की लगभग एक हजार रचनाएँ ‘मिलोरेपा के सहस्र गीत’ के नाम से प्रसिद्ध हैं, जिनमें संसार की नश्वरता का बोध प्रमुख है।

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एक तरफ विज्ञान अपने श्रेष्‍ठतम रूप में, दूसरी तरफ…

ऐसे समय में जब विज्ञान और प्रौद्योगिकी अपने अब तक के सबसे प्रखरतम स्वरूप में हमारे सामने हैं, जब संभावनाओं के असीमित अवसर हमारे सामने हैं तब हमारे देश के युवाओं के सामने क्या विकल्प हैं और उनके क्या चयन हैं?

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Grok: व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी का झूठ टूट रहा है पर इसे क्षणिक ही मानिए

एलोन मस्क उसी लक्षण, अर्थात् मुनाफे की प्रवृत्ति का जीवंत उदाहरण हैं। वह कोई विचारक या नैतिकतावादी नहीं, बल्कि मुनाफे की मशीन का एक सजीव रूप है।

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… तो पांच साल ज्‍यादा जी सकते हैं हम भारतीय

पृथ्वी पर कोई अन्य स्थान ऐसा नहीं है जहां वायु प्रदूषण की चुनौती दक्षिण एशिया से ज्यादा कठिन हो। बांग्लादेश, भारत, नेपाल और पाकिस्तान (जहां वैश्विक आबादी का 22.9 प्रतिशत हिस्सा रहता है) दुनिया के शीर्ष चार सबसे प्रदूषित देश हैं।

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भीगी पतंग: बड़ा ताल, कटी पतंग और उसे लूटने भागती नाव

उड़ती पतंगें यदि अंबर का सौंदर्य है तो धरा की ओर आती कटी हुई पतंग को लूट लेने को आतुर भागते बच्‍चे, युवा पृथ्‍वी का हौसला है। आकाश उड़ती पतंगें यदि हमारे अरमानों का प्रतिबिंब है तो धरती की ओर आती पतंगों को पा लेने की जद्दोजहद हमारी कोशिशों और परिश्रम का पर्याय है।

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भला एक शाइर किताबें जलाने की बात कैसे कर सकता है?

हमारी रवायत में हर अंधेरे को मिटाने के लिए एक दीप जलाने की सीख दी गई है। हम हर काविश से पहले चिराग़ रोशन करते हैं तो क्‍या क़िताबों को जलाया जाना चाहिए?

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प्यार के एहसास को ओढ़ना, सलीके से गुजरना

आख़िर तुम्हें गुजरना तो ज़िंदगी की तेज हवाओं के बीच से ही है! ये हवाओं के चिराग़ तुम्हारे पैरहन को जला सकते हैं, तुम्हें बेलिबास कर सकते हैं। तुम नशे में लड़खड़ाओगे ज़रूर और अपने आप को ख़त्म कर लोगे।

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जो कविताएँ जागती रहती हैं सारी रात, किसी एक सुबह…

यह कविता न तो केवल सौंदर्य का बखान है और न ही केवल सामाजिक यथार्थ का निरूपण। यह “आनंद सिद्धांत” और “उल्लासोद्वेलन” के बीच की उस झीनी दीवार को पार करने का प्रयास है, जहाँ विचार, दृश्य और भाषा अपनी स्थिरता खो देते हैं।

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ट्रंप के क्रियाकलापों से भारत ही क्यों इतना ज्‍यादा परेशान?

यह एक गंभीर सवाल है कि ट्रंप के क्रियाकलापों से भारत ही क्यों इतना ज्‍यादा परेशान हो रहा है? क्यों ट्रंप भारत के अवैध आप्रवासियों को अन्य देशों के आप्रवासियों की तुलना में ज्‍यादा सता रहे हैं और उनकी यातनाओं का सारी दुनिया के सामने प्रदर्शन भी कर रहे हैं?

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