एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-44

- विभूति झा, सामाजिक कार्यकर्ता
संपादन: चिन्मय मिश्र
यह अनिवार्य रूप से घटित हुआ भी एक साधारण दस्तावेज है। यह न तो कहानी है, न यात्रा वृतान्त। यह एक व्यक्ति की “लौटने” की गाथा है। विभूति दा की यह डायरी अबूझ सी सच्ची कहानी है। यह सत्य की अभिव्यक्ति है। –चिन्मय मिश्र
मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल जिले मंडला से निकलकर सागर विश्वविद्यालय से एमए और एलएलबी। फिर जेएनयू (नई दिल्ली) से समाज विज्ञान में शोधकार्य किया। भोपाल से वकालत शुरू की और भोपाल गैस त्रासदी मामले में गैस पीड़ितों के वकील बने। एक युवा वकील ने बड़े बड़े वकीलों की दलीलों को खारिज कर भोपाल गैस पीड़ितों को मुआवजा दिलवाने की लड़ाई जीती। जिला अदालत से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक पैरवी और फिर एक दिन अचानक पूरी प्रसिद्धि, अपने समृद्ध भविष्य की संभावना को पुराने वस्त्र की तरह उतार कर चल पड़े एक नए जीवन की खोज में। मन में विचारों का उफान और तन पर एक जोड़ी कपड़ों के साथ सबकुछ छोड़ दिया। परिवार भी। किसी फिल्म की पटकथा सा लगता यह इस डायरी के लेखक विभूति झा के जीवन की वास्तविकता है। एक ऐसा मंथन जो जीवन उद्देश्य खोजने की दिशा में बढ़ा और इस राह में उतने ही विविध अनुभव हुए। यह एक विस्तृत जीवन से साक्षात्कार है। किश्त-दर-किश्त रोचक होती जीवन दास्तां।
रठौड़ी (कट्टीवाड़ा), जिला आलीराजपुर 29 जून, 2023
आज से ठीक सोलह बरस पहले (29 जून, 2007 को) भोपाल छोड़कर मैं निकल पड़ा था- एक लक्ष्यहीन यात्रा पर। पूरे विश्वास के साथ यह कह सकता हूँ कि आज मैं पूरी तरह से एक दूसरा इंसान हूँ। या यूं कहें कि आज मैं इंसान होने का दावा कर सकता हूँ। मैंने अपने लिये आदिवासी समाज को चुन लिया और उन्होंने मुझे अपना लिया। मैंने इस समाज से इन वर्षों में बहुत कुछ सीखा है, बहुत कुछ पाया है। वह सब पाया जो मेरे पास नहीं था और जिसके बिना मैं अधूरा था। मैं यह भी कह सकता हूँ कि आज मेरे संबंधो का आधार केवल प्रेम और परस्पर विश्वास ही है।
आज मैं जहाँ बैठा हूँ वह मेरा अपना घर है, मेरा अपना परिवार है- ढूंढकर निकाला हुआ। गुजरात के पंचमहाल से लगे हुए मध्यप्रदेश के पश्चिमी कोने के झाबुआ क्षेत्र के आलीराजपुर जिले के कट्ठीवाड़ा जनपद में, वहाँ से लगभग बीस किलोमीटर दूर मुख्य मार्ग के काफ़ी अंदर जाकर यह भीलों की बस्ती है- रठौड़ी। मैं यहाँ विशुद्ध भील बामनिया परिवार में उसके एक सदस्य के रूप में रहता हूँ। जुआन सिंह और उसके कुटुम्ब के साथ। उन्होंने अपनी भूमि पर अपने घर के पास मेरे रहने के लिये एक स्थान बना दिया है। उसे नाम दिया है “बाबा की कुटिया”। लगभग दस बरस हो गए इनके साथ रहते हुए । इस परिवार में मेरी स्थिति एक तरह से परिवार के बुजुर्ग, परिवार के मुखिया जैसी है। इस कुटुम्ब के सुख-दुख, शादी- ब्याह, तीज-त्यौहार में मैं पूरी तरह से शामिल रहता हूँ। न इन्हें मुझसे कुछ चाहिये और न ही मुझे इनसे। चाहिए तो सिर्फ प्रेम और सुख। इस परिवार के बड़े-बुजुर्ग हिन्दी बोलना नहीं जानते और मैं भीली नहीं बोल पाता। लेकिन हममें अद्भुत प्रेम और आपसी समझ है। क्या यह कल्पना से परे नहीं है? यहाँ कुछ भी मेरा नहीं है, लेकिन सब कुछ मेरा है। अविश्वसनीय? कट्ठीवाड़ा कस्बे के लोग आज भी उतने ही अपने हैं और मैं अभी भी उनका चहेता “बाबा”।
जो मैंने पाया है और जैसा जीवन जी रहा हूँ मेरे द्वारा उसकी क्या कभी कल्पना भी की जा सकती थी बिना पुराना सब कुछ छोड़े? यही है बेहतर पाने के लिये कमतर को छोड़ना! परंतु यह त्याग नहीं है। यह तपस्या है, आत्मदर्शन, आत्मबोध है।
मेरा दूसरा घर, या परिवार वह मेरी जन्मभूमि भंवरताल में है। यह विशुद्ध गोंड़ आदिवासियों की बस्ती है। छत्तीसगढ़ से लगे हुए मध्यप्रदेश के पूर्वी कोने में मंडला जिले में बम्हनी बंजर कस्बे से करीब दस किलोमीटर दूर सड़क के बहुत अंदर जाकर यह छोटा सा गांव है जिसकी कुल आबादी सत्तर-पचहत्तर है। यहाँ सभी आदिवासी रहते हैं, सिवाय मेरे, जो जन्म से आदिवासी नहीं है लेकिन इनके द्वारा अब मुझे आदिवासी के रूप में स्वीकार कर लिया गया है। पूरी बस्ती मेरा परिवार है और कलीराम धुर्वे उर्फ गलियार के परिवार का मैं मुखिया हूँ, बुजुर्ग हूँ। वैसे तो यह मेरा पैतृक स्थान है। लेकिन मैं यहां एकदम नये रूप में सन 2010 से समय-समय पर रहने लगा हूँ। यहां रहने का स्थान तो मैंने अपने पुराने जीवन में 2001 में बना लिया था – “दादा का घर”। इस दौरान यहां माता-पिता के खंडहर हो चुके निवास स्थान की जगह पर उनकी स्मृति में एक “स्मारक” बनवा दिया है। यहाँ मैं गलियार के साथ थोडी खेती-बाड़ी भी करता हूँ। मेरी जन्मभूमि बम्हनी बंजर कस्बे में आज भी मेरे प्रति आत्मीयता है जबकि 55 साल हो चुके वहाँ से निकले हुए। बम्हनी आज भी मुझे मेरा अपना लगता है।
इस तरह इस नये जीवन में मेरे द्वारा अर्जित मेरे दो परिवार हैं, जिन्हें मैं “आध्यात्मिक परिवार” कहता हूँ। कट्ठीवाड़ा क्षेत्र में मुझे “बाबा” के नाम से जाना जाता है और मंडला के बम्हनी क्षेत्र में बच्चे से बूढ़े तक के लिये मैं “दादा” हूँ। मेरे मूल नाम से अधिकतर लोग परिचित नहीं है और न ही उन्हें या मुझे इसकी आवश्यकता जान पड़ती है।
मेरे मूल परिवार में जे.एन.यू. की साथी, मेरी “दुःस्साहसी धर्म पत्नी” या “शरीके हयात” नंदिनी, भोपाल के उसी फार्म हाउस में अकेले निवासरत है, जहाँ से मैंने अपनी यह यात्रा सोलह बरस पहले शुरू की थी। हमारी बेटी वन्या – दामाद भी भोपाल में अपने घर रहते हैं और वन्या अपनी माँ का ख्याल रखती है। बेटी से अधिक अपना तो कोई हो ही नहीं सकता और इन वर्षों में हमारे इस अपनापन और परस्पर समझ में लगातार इज़ाफा ही होता आया है। बेटी – दामाद कट्ठीवाड़ा आ चुके हैं और भंवरताल जाते रहते हैं। दोनों स्थानों के बीच दूरी लगभग 900 किलोमीटर है और भोपाल एकदम बीचोंबीच। लिहाजा आते-जाते कभी एक दो दिन भोपाल भी रूक लेता हूं। रुकने का कोई न कोई ठिकाना पुराने चाहने वालों के पास मिल ही जाता है। इस दौरान मेरे बड़े भाई विवेक दादा और दोनों छोटी बहनें अर्चना, अर्पणा तथा उनके पतियों का देहांत हो गया। अपने माता-पिता की नौ संतानों में अब मैं अकेला ही रह गया हूँ।
भोपाल के जीवन में मेरे घनिष्टतम मित्र-भाई प्रख्यात कथाकार मंजूर एहतेशाम को कोरोना महामारी ने हमसे छीन लिया। दूसरे बेहद करीबी दोस्त जाने-माने पत्रकार और लेखक राजकुमार केसवानी भी उसी समय, उसी तरह हमें छोड़कर चले गये। मंजूर भाई मुझसे बड़े थे और केसवानी लगभग बराबर। इनकी कमी भोपाल को मेरे लिये अधूरा बना देती है।
नर्मदा तट पर अपनी पहली आश्रयस्थली शाहगंज मैं कुछ-कुछ अंतराल से जाता रहता था। वह भी मेरे लिये एक तरह से अपना घर ही बना हुआ था। लेकिन कुछ बरस पहले बाबा सियाचरण दास का भी अचानक देहावसान हो गया। तब मैं वहाँ गया था, बेटी – दामाद भी साथ गये थे। वहीं मंदिर में उनकी समाधि बनवाने की पहल भी की थी, जो अब बन गई है ।
सागर के दिनों के मित्र दीपक सूर्यवंशी से करीब आधी सदी पुरानी मित्रता हिचकोले लेते हुए यथावत बनी हुई है। कभी-कभार कोई विशेष प्रयोजन होने पर धार जाकर झिराबाग रुकना भी हो जाता है। दीपक का भी भंवरताल आना हुआ था। ‘शिवगंगा’ की इस दौरान आर.एस.एस. और भाजपा से फिर से नज़दीकी हो गई। एकतरह से कायाकल्प होकर काफ़ी हद तक कॉर्पोरेट स्वरूप बन गया। उसकी “मोदी काल” में न केवल सरकार और प्रशासन से निकटता हुई, वरन, कॉर्पोरेट जगत में भी प्रवेश हुआ। इन्हें इन्फोसिस के सुधा मूर्ति-नारायण मूर्ति का वरदहस्त प्राप्त है और फंडिंग भी होती है। अब उच्च शिक्षा संस्थानों में भी दखल है, आई.आई.टी. के काफी विद्यार्थी और स्नातक जुड़ते जा रहे हैं। राजस्थान में भी आदिवासियों के बीच पैठ हो रही है। महेश शर्मा ‘पद्मश्री’ से अलंकृत हुए हैं और हर्ष चौहान राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष (केन्द्र के कैबिनेट मंत्री के समकक्ष) नियुक्त किये गये हैं।
ज़ाहिर है, मेरा ‘शिवगंगा’ से क्रमिक रूप से पूरी तरह से संबंध विच्छेद हो चुका है- बिना किसी कटुता के। लेकिन, दूसरी ओर, व्यक्तिगत रूप से महेश जी से वैसी ही आत्मीयता और परस्पर सरोकार है जैसा पहले था। बल्कि पहले से अधिक ही है। महेश जी राठौड़ी आते रहते हैं और दो बार भंवरताल भी रहकर आये हैं। आकाश भगत काफी समय से शिवगंगा से अलग इंदौर में योग प्रशिक्षण करते हैं और सपत्नीक वहाँ रहते हैं। उनसे भी आत्मीयता बनी हुई है और कभी-कभार उनके घर रुकता भी हूँ।
झाबुआ/आलीराजपुर और मंडला/डिंडोरी संविधान की पाँचवीं अनुसूची के अंतर्गत पूर्णत: आदिवासी अनुसूचित जिले हैं। कट्ठीवाड़ा में रहने की शुरुआत के कुछ समय बाद ही सन् 2008-09 में मैंने वहाँ उस क्षेत्र में ‘ग्राम सभाओं’ को सशक्त बनाने के लिये ज़मीनी तौर पर सक्रिय भागीदारी शुरू की थी जिसके काफ़ी उत्साहजनक परिणाम सामने आये । मैं यह समझ पाया था कि वास्तव में “ग्राम सशक्तीकरण” का आधार संविधान द्वारा प्रदत्त इन अधिकारों के प्रभावी उपयोग से ही हो सकता है न कि धर्म या राजनीति के सहारे । वास्तव में ग्रामसभाओं को सशक्त बनाकर धर्म और चुनावी राजनीति के दुष्प्रभावों से आदिवासी समाज को बचाया जा सकता है। कट्ठीवाड़ा क्षेत्र में अनुभव और सीख के बाद सन् 2010 से मंडला जिले में भंवरताल और उसके आसपास के क्षेत्र में ग्रामसभाओं को सशक्त बनाने की दिशा में एक आंदोलन खड़ा करने का प्रयास किया। इसके बहुत ही सकारात्मक परिणाम सामने आये। “पेसा” कानून तो औपचारिक रूप से 2022 में म०प्र० में लागू हुआ, लेकिन उसकी भावना और प्रावधानों को 2008-09 से ही इन ग्रामसभाओं में प्रभावशाली बनाने की दिशा में काम किया। गांव के स्तर पर अपने अधिकारों को जानने, समझने और उन्हें प्रभावी तौर पर मूर्तरूप देने की दिशा में यह कदम है। सब से महत्वपूर्ण है अपने गांव, समाज, पर्यावरण के संबंध में स्वयं निर्णय लेने और उसे लागू करने का अधिकार और उसके प्रयोग की क्षमता। दरअसल वास्तविक विकास यही है। मेरा कोई संगठन नहीं है और न ही मैं किसी से संबद्ध हूँ। स्थानीय आदिवासी समाज ही मेरा अपना संगठन और शक्ति है।
अपनी कानूनी पृष्ठभूमि और ज्ञान, नृतत्व शास्त्र – समाजशास्त्र के अध्ययन और रंगकर्म से हासिल समझ का भरपूर और प्रभावी उपयोग मैं सुदूर आदिवासी क्षेत्रों में कर पाया हूँ, ऐसा मुझे लगता है। सबसे महत्वपूर्ण है उनके साथ रहना, एकात्म हो जाना, तभी यह सब संभव है। मुझे लगता है कि ग्रामसभा में उपेक्षित, उत्पीड़ित लोगों की भागीदारी में साथी और सहयोगी बन पाना न्यायालयों में चुनिंदा लोगों की पैरवी करने से शायद अधिक महत्वपूर्ण और संतुष्टिदायक है। इतने बरसों में मुझे तो ऐसा ही महसूस हुआ है।
मेरे किसी भी संबंध या क्रिया-कलाप का आधार अर्थ या धन नहीं है। अर्थोपार्जन का कोई साधन या स्त्रोत भी लंबे समय तक नहीं रहा, आवश्यकताएँ भी बहुत ही सीमित रहीं। पुराने जीवन में अर्जित थोड़ी बहुत सम्पत्ति से काम चलता रहा। इस बीच पुराने जीवन की सौगात हृदयरोग से बचाव के लिये बायपास सर्जरी करानी पड़ी और फिर कोरोनी महामारी की चपेट में आने के बाद पेसमेकर भी लगवाना पड़ा। इस सबमें पुराना अर्जित धन काम आया। अब जाकर यह स्थिति प्राप्त हो गई है कि जीवनयापन के लिये भंवरताल में गलियार की खेती से आवश्यक बचत हो जाती है। आवश्यकताएं भी मुख्यतः दवाइयाँ और आवागमन पर खर्च ही है। न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये अधिक धन की आवश्यकता नहीं होती। कह सकता हूँ कि आर्थिक रूप से भी न मैं किसीपर निभर हूँ और न ही कोई मुझपर।
चुनिंदा लोगों से सम्पर्क रखने के लिये एक भूतकालीन मोबाइल फोन (स्मार्ट फोन नहीं) और बाहरी दुनिया से जुड़े रहने के लिये एक ट्रांजिस्टर मेरे साथ रहते हैं। इनके अलावा कोई भी इलेक्ट्रॉनिक/ डिजिटल उपकरण नहीं। न तो टी.वी, न ही इंटरनेट, न वाट्स एप और न ही यू-ट्यूब/ फेसबुक या ट्विटर जैसे वर्तमान काल के “अनिवार्य” सम्पर्क सूत्र। कभी-कभार अखबार उपलब्ध हो गया तो देख लेता हूँ। इतने लंबे समय में कभी भी महसूस नहीं हुआ कि एक सुखी और सार्थक जीवन जीने के लिये इस सबकी कोई अनिवार्यता है। मुझे तो लगता है यह सब खुद को खुद से और अपने आसपास से दूर करने के साधन हैं। किताबें पढ़ने और कुछ लिखने का मौका अभी भी निकल ही आता है।
ऐसा सुखमय और अर्थपूर्ण जीवन हो पायेगा, यह मेरी कल्पना में भी नहीं था। प्रेम पर आधारित संबंध प्रगाढ़ होते जाते हैं, और जिन संबंधों का आधार कुछ और रहा है वे क्रमश: क्षीण होते जाते हैं, छूटते चले जाते हैं। प्रेम आधारित नये संबंध बनते चले जाते हैं। उपयोगी ‘वस्तु’ न होते हुए भी आत्मीय बने रहना, और आत्मीयता का निरंतर बढ़ते जाना ही प्रेम- आधारित संबंधों की बुनियाद है। आश्चर्य होता है अपने आप पर कि पता नहीं कैसे मैं उतने लंबे समय तक उस दूषित पर्यावरण में जी लिया और जीते जी निकल आया!
लगता है एक “लक्ष्यहीन यात्रा” पर निकल पड़े व्यक्ति को लक्ष्य निर्धारित किये बिना ही सुखमय – सार्थक मनुष्य-जीवन जीने का लक्ष्य काफी हद तक हासिल हो गया। मैंने कितना कुछ पा लिया है। खोया क्या? 71 बरस का हो चुका हूँ। इस जीवन में और क्या चाहिये?
तन को जोगी सब करें
मन को बिरला कोय
सब विधि सहजै पाइए
जे मन जोगी होई।
− संत कबीर
क्रमशः…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा की सभी कड़ियां यहाँ देखेंः
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-1: अनजान द्वारा खुद को समझे जाने से जीवन मनोहारी हो गया
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-2: भोजन करने और भोजन पाने के बीच का अंतर भी समझ आने लगा
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-3: उसने मेरे पैर छू कर कहा, बाबा, कहीं मत जाओ…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-4: मैंने सोचा, खतरनाक होने के लिए खतरनाक होना जरूरी नहीं होता
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-5: वाह, पचास रुपए? बड़े दिनों बाद इतने रुपए एक साथ देखे थे…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-6: जीवन में पहली बार रोजदारी की थी, वह भी भक्ति की!
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-7: भोपाल करीब आने लगा तो मैं ट्रेन में ऊपर चढ़कर बैठ गया…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-8: दोनों घूम-घूम कर पार्टी का प्रचार कर रहे हैं, सावधान रहना
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-9: नक्सलवाद के एक काल्पनिक बिजूके को प्रतीक बनाया गया
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-10: मैंने अपना पूरा नाम बताया तो वे एकदम उछल पड़े…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-11: कथा वाचक की नई भूमिका, मुझे अंदर से हँसी आ रही थी…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-12: वृंदावन की कुंज गली में बदल गया मेरा नजरिया
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-13: ब्रज जा कर जाना, श्रद्धा से किस तरह आनंदित रहा जा सकता है
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-14: मैं बाबा नहीं बन पाया…मैं हार गया!
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-15: अहसास हुआ कि लोग सफर को मंजिल से बेहतर क्यों बताते हैं…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-16: मैं संघ का भेदिया हूं, वकील तो ऐसे होते नहीं हैं…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-17: घर बनते जाते हैं, जमीन बंटती चली जाती है लेकिन रहते सब साथ-साथ हैं
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-18: सौ दिन पूरे… लगता है घर से बहुत दूर न जाकर गलती कर दी
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-19: मैं सन् उन्नीस सौ बावन में सातवीं फेल हुआ हूं…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-20: संभवतः किसी को उम्मीद नहीं होगी कि मैं इस तरह फट पडूंगा…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-21: दहेज का दबाव न हो तो हर मर्द चार-पांच ब्याह कर लेगा
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-22: पूरे पच्चीस साल बाद पैदल अपने गांव भंवरताल जा रहा हूं…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-23: अपने गांव भंवरताल में हूं; एक वो दिवाली थी, एक ये दिवाली है, एकदम अलग
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-24: खबर फैल गई कि मैं ‘बैरागी’ हूं, इनाम नहीं मिलेगा
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 25ः भंवरताल में आखिरी रात है, पता नहीं कब आना होगा…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 26ः वकालत छोड़ी, फिर अपनाई, मैं उलझता चला जा रहा था…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 27: उस दिन मैं अचानक छोटा-मोटा ‘महामानव’ बन गया… मगर
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 28ः चोम सिंह ने समझा दिया, 21 वीं सदी में अपनी शर्तों पर जिया जा सकता है
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 29ः आज ऑफिस में लगेगा ताला, नाम पट्टिका हट जाएगी
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 30ः उन जगहों पर लाैटना जहां कभी मन बैरागी बन कर गया था…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 31ः स्वामी अवधेशानंद बाेले, विभूति जी आप अवश्य आइए, मुझे प्रतीक्षा रहेगी
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 32ः नाते-रिश्तेदार ‘माता-पूजन’ कर मनाते हैं ईंद, हैं न अनाेखी बात
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 33: बुढ़े ने रहने बुला लिया, हम सामान लिए चले आए, रात में बोला, घर से निकलो
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 34ः बाबा, मैं ठीक होना चाहता हूँ… बाबागिरी मेरा पीछा नहीं छोड़ रही
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 35ः ऐसा लगा जैसे दुनिया जीत ली, सिर्फ तीन दिन बाद जबर्दस्त मुँह की खाई
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 36: काेई खेत नहीं गया, कोई बाजार, कोई स्कूल, राे कर बोले, बाबा मत जाओ
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 37: मैं विचलित हूं, मुझे बताए बिना महेश जी ने ऐसा क्यों किया?
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 38: जिसे ‘खूनी सोंडवा’ कहते हैं, मुझे वहीं मिला सबसे ज्यादा आनंद
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 39 : जो मैं कहना चाह रहा था, वह खुद न कहकर उनसे कहलवा लिया
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 40 : मरेंगे और मारेंगे, नहीं तो जिंदगी किस काम की! कानून की पढ़ाई दांव पर
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 41 : स्वामी अवधेशानन्द ने कहा− मैं चाहता हूं कि आप…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 42 : आप इतने अच्छे आदमी हैं, कैसे लोगों के बीच फँस गए?
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 43 : एक साल की यात्रा−सार…स्वाभाविकता ही वास्तविक जीवन

