एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-43

- विभूति झा, सामाजिक कार्यकर्ता
संपादन: चिन्मय मिश्र
यह अनिवार्य रूप से घटित हुआ भी एक साधारण दस्तावेज है। यह न तो कहानी है, न यात्रा वृतान्त। यह एक व्यक्ति की “लौटने” की गाथा है। विभूति दा की यह डायरी अबूझ सी सच्ची कहानी है। यह सत्य की अभिव्यक्ति है। –चिन्मय मिश्र
मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल जिले मंडला से निकलकर सागर विश्वविद्यालय से एमए और एलएलबी। फिर जेएनयू (नई दिल्ली) से समाज विज्ञान में शोधकार्य किया। भोपाल से वकालत शुरू की और भोपाल गैस त्रासदी मामले में गैस पीड़ितों के वकील बने। एक युवा वकील ने बड़े बड़े वकीलों की दलीलों को खारिज कर भोपाल गैस पीड़ितों को मुआवजा दिलवाने की लड़ाई जीती। जिला अदालत से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक पैरवी और फिर एक दिन अचानक पूरी प्रसिद्धि, अपने समृद्ध भविष्य की संभावना को पुराने वस्त्र की तरह उतार कर चल पड़े एक नए जीवन की खोज में। मन में विचारों का उफान और तन पर एक जोड़ी कपड़ों के साथ सबकुछ छोड़ दिया। परिवार भी। किसी फिल्म की पटकथा सा लगता यह इस डायरी के लेखक विभूति झा के जीवन की वास्तविकता है। एक ऐसा मंथन जो जीवन उद्देश्य खोजने की दिशा में बढ़ा और इस राह में उतने ही विविध अनुभव हुए। यह एक विस्तृत जीवन से साक्षात्कार है। किश्त-दर-किश्त रोचक होती जीवन दास्तां।
भँवरताल: आत्मावलोकन 29 जून 2008
एक वर्ष यानी 365 दिन। अंत और आरंभ का एक वर्ष; विध्वंस और पुनर्निर्माण का एक वर्ष; मृत्यु और पुनरुत्थान का एक वर्ष! जागती आँखों से देखा गया एक स्वप्न जो अब वास्तविकता में परिवर्तित हो चुका है। भोपाल से खटपुरा, शाहगंज, बैकल्या, कुंभराज, मथुरा-वृंदावन-ब्रज, कुकरू, धार, झाबुआ, भँवरताल, हरिद्वार-ऋषिकेश, खट्टाली, कट्टीवाड़ा के पड़ाव यानी एक अनवरत यात्रा में रहा हूँ। एक लक्ष्यहीन यात्रा की शुरूआत जो शनैः-शनैः नये जीवन को नया आयाम, नया अर्थ देती हुई प्रतीत हो रही है। भूत अब भूत हो चुका है; वर्तमान एक ऐसे संक्रमण काल में है जो भविष्य को तय करेगा।
यहाँ भँवरताल में घर के पीछे के कमरे में बड़ी खिड़की के पास बैठे हुए बाहर झमाझम बरसते पानी में हरे-भरे खेत और जंगल दूर-दूर तक दिखाई दे रहा है और उसी में जैसे घुल-मिल गये हैं साल भर के अनुभव में उपजे प्रेम, संयम और आत्मसंतुष्टि के पौधे। आज यहाँ बड़ी उपयुक्त जगह में हूँ। पीछे मुड़कर देखने के लिये-पूर्णतः एकान्त, केवल जंगल, खेत, नदी और पशु-पक्षी। यही अनुभूति है कि किसी ऊँचे टीले पर खड़ा बहुत पीछे छोड़ आए समय को विरक्त भाव से देख रहा हूँ। समय के साथ-ही-साथ एक पूरा-का-पूरा अस्तित्व। खुद को पीछे छोड़कर आगे निकल जाना और फिर दूर खड़े होकर निस्पृह भाव से उस पर दृष्टिपात कर पाना एक विलक्षण स्थिति है।
मकड़ी अपना जाला बुनती है और उसमें खुद ही फँसते चली जाती है और निकल नहीं पाती। जब जाला टूटे, तब छूटे और वही उसका अंत। मकड़ी जाला बुनती है दूसरों को फाँसने के लिये, उनके भक्षण के लिए इसीलिए वह शायद टूटे हुए जाल को देखने के लिए बच नहीं पाती। मनुष्य भी अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए अपने ही बुने हुए जाल में फँसता चला जाता है। किंतु यदि वह पराभक्षी नहीं है तो उसके लिए वह जाला तोड़कर निकल जाना और टूटे हुए जाले को दूर से पलटकर देख पाना संभव है। यही सम्भवतः मकड़ी और मनुष्य में मूलभूत अंतर हो सकता है।
जीवन मनुष्य की एक अनवरत् यात्रा है। इस यात्रा में किसी महत्वपूर्ण पल में एक गलत मोड़ पर मुड़ गये, एक अनुपयुक्त (इनकम्पेटिबल) साथ चुन लिया, तो फिर साथ निभाते हुए सही मार्ग पर वापस चल पाना लगभग असंभव हो जाता है। मानवीय संवेदना से परिपूर्ण मनुष्य के लिये साथ कर लेना फिर भी अपेक्षाकृत आसान है लेकिन साथ छोड़ पाना बेहद कठिन। साथ निभाते जाना ही जैसे जीवन की एक बड़ी चुनौती और प्रयास बनकर रह जाता है। व्यक्ति अपने आसपास जो पर्यावरण निर्मित कर लेता है वह निरन्तर उसे प्रभावित करता रहता है। उस पर्यावरण के लिये मूलतः अनुपयुक्त व्यक्ति निरंतर उसे बदलने की, उसे परिमार्जित करने की चेष्टा में लगा रहता है और अपने को अप्रभावित रखने का संघर्ष छेड़े रहता है। पर्यावरण को बदल पाना संभव नहीं होता क्योंकि व्यक्ति ही उससे ग्रसित होता चला जाता है। तब एकमात्र उपाय उसका परित्याग कर देना ही होता है। जो बेहद कठिन है और कमोबेश असंभव के निकट।
अधिकतर परित्याग करने में नियति मकड़ी की सी ही होती है। उसका परित्याग कर अपने को किसी दूसरे ही पर्यावरण में स्थित करके स्वयं को उसमें ढाल पाना बड़ी सफलता है।
मुझे नहीं लगता कि मानवीय मूल्यों, विश्व-दर्शन और वर्ग-दृष्टि में कहीं कोई बहुत गड़बड़ कभी भी हुई है। गड़बड़ सारी हुई है इन सबको साथ लेकर एक दूषित पर्यावरण में अपनी इच्छानुसार जी पाने का पीड़ादायक प्रयत्न करने से। जीवन-मूल्यों के अनुसार समाज में अपनी सकारात्मक भागीदारी के लिये संघर्ष के स्थान पर यह अपने अस्तित्व की रक्षा का संघर्ष बन कर रह गया। इस वजह से इसमें निरंतर तनाव, कुंठ, आक्रोश और छटपटाहट बनी रही।
दूसरों को सुधारने की सोच और प्रयत्न दोनों ही बेमानी हैं। प्रयत्न खुद को सुधारने का ही किया जाना चाहिए और वही किया भी जा सकता है। जो तुम्हारे आसपास हैं और सचमुच तुम्हारे अपने हैं, जिन्हें तुमसे वास्तविक लगाव है तो उनमें तो तुम्हारे सान्निध्य में अपने आप ही सुधार आएगा वरना वह अलग-थलग, पीछे छूट जाएंगे। मेरा मानना है सुखी जीवन का अर्थ स्वेच्छाचसरिता नहीं है और यहाँ तक कि स्वच्छन्दता भी नहीं, बल्कि स्वाभाविकता ही वास्तविक जीवन है। जो आप हैं, जैसे हैं, वैसे ही जियें। यह यदि कोई अपने लिये सम्भव कर सके तो उसका जीवन सार्थक हुआ माना जाएगा। यही मानव जीवन की सबसे बड़ी चुनौती है और मानव अस्तित्व की भी। एक ऊर्जावान व्यक्ति की ऊर्जा का सार्थक उपयोग स्वाभाविक जीवन जीते हुए ही सर्वोत्तम रूप में हो सकता है। आडंबर से, स्वार्थ से और लोभ से परिपूर्ण सामाजिक परिवेश में स्वाभाविक जीवन जी पाना लगभग असंभव ही है। उस परिवेश को बदलने का एक ही रास्ता है-उससे निकल जाना, उससे दूर चले जाना।
जीवन का हर क्षण, हर पल, हर बिंदु व्यक्ति के समक्ष विकल्प प्रस्तुत करता है, चुनने के लिये। आप सत्य और असत्य, प्रेम और घृणा, लोभ और संतोष, ईमानदारी-बेईमानी, आसक्ति- अनासक्ति, निजस्वार्थ और त्याग, व्यक्तिपरकता और सामाजिकता, और भी बहुत कुछ में से क्या चुनते हैं, यही महत्वपूर्ण है। जीवन की गतिशीलता का अर्थ ही है- ‘हर क्षण विकल्प की उपलब्धता’। यह व्यक्ति विशेष पर निर्भर करता है कि वह कब, कौन-सा विकल्प चुन लेता है। उसकी पृष्ठभूमि, उसके जीवन मूल्य, उसकी विश्व धारणा, उसकी वर्गदृष्टि, और सबसे बढ़कर उसका निरंतर चलता आंतरिक संघर्ष यही तो उसके चयन का निर्धारण करेंगे। चयन का तात्पर्य ही है कुछ पाने के लिये कुछ और छोड़ना। त्वरित और तात्कालिक लाभ के लिये चयन या फिर अपने विश्वदर्शन से सामंजस्य रखते हुए दूरगामी परिणामों को ध्यान में रखते हुए चयन? यह एक विकट परीक्षा है।
निश्चय ही कुछ बड़ा, विशाल, वृहद पाने की दिशा में अग्रसर होते हुए छोटे-मोटे सुख, तुच्छ सुविधाओं और भोग का त्याग करना ही होता है। भौतिक सुख-सुविधाओं का परित्याग किये बिना आध्यात्मिक सुख-शान्ति प्राप्त हो ही नहीं सकती। एक दृष्टि से त्याग वही सकता है जिसके पास त्यागने योग्य कुछ हो। दूसरी दृष्टि से जो है उसे छोड़ना त्याग नहीं है, बल्कि मुक्ति है। क्योंकि जो नहीं है उसे पाने के लिये ही तो कुछ छोड़ा जा रहा है। बहुत ज़्यादा कुछ पाने के लिये बहुत थोड़ा कुछ छोड़ा-यह त्याग कैसे हो सकता है? कुछ उच्चतर पाने की लालसा में निम्नतर से विरक्ति और उसका निरपेक्षभाव से परित्याग, यह वैराग्य भी नहीं है। यह तो केवल दबावमुक्त होकर स्वच्छ पर्यावरण में अपने विश्वदर्शन के अनुरूप जीवनशैली बनाकर स्वाभाविक जीवन जीने का प्रयास मात्र है। निश्चय ही यदि यह सम्भव हो सका तो ऊर्जा की अपवंचना नहीं होगी और उसका अर्थपूर्ण उपयोग होकर जीवन को समाज के परिप्रेक्ष्य में सार्थकता मिलेगी।
क्या यह पलायन है? शायद नहीं! आप तो समाज के अस्तित्व, उपस्थिति और सार्थकता को नकार नहीं रहे हैं। साथ ही समाज और सामाजिक प्राणियों में आपकी पूर्ण आस्था है। केवल एक सामाजिक परिवेश, सामाजिक दृश्य से दूरी स्थापित कर दूसरे सामाजिक परिवेश और दृश्य में अपनी उपस्थिति दर्ज कर रहे हैं। एक आडंबरी, स्वार्थी और दूषित परिवेश से अपेक्षाकृत स्वाभाविक, शुद्ध तथा पवित्र धरातल पर। ऐसा सोच पाना, कह पाना तो सम्भव है लेकिन कर पाना और हो पाना बहुत दुष्कर। कथनी-करनी, सोच-समझ और कर्म, अंतःकरण तथा अभिव्यक्ति के अंतर को कम-से-कम करना और पूरी तरह से समाप्त करने की चुनौती स्वीकार कर पाना गुणात्मक परिवर्तन की ओर अवश्य ले जाता है। इस भौतिकतावादी समाज में बड़ा कठिन है इसे व्यवहार में ला पाना, लेकिन असंभव नहीं!
सिद्धार्थ ने बुद्ध बनने के बाद अपने अतीत की ओर मुड़कर नहीं देखा और न ही महावीर ने देखा. …वे चलते चले गए तथा समाज पर अपनी अमिट छाप छोड़ी। दूसरी ओर मोहनदास ने गांधी बने रहते हुए भी खुद को महात्मा के मुकाम तक पहुँचाया। शायद यह अधिक कठिन परीक्षा थी, ज़्यादा बड़ा आत्मसंघर्ष। क्या कस्तूरबा के सहयोग के बिना मोहनदास महात्मा बन जाते और बने रहते? व्यक्ति की मानवीय संवेदनाएं, उसका मानवतावादी रुझान, उसके आत्मसंघर्ष को और अधिक कठिन-कठोर और उलझन भरा बना देता है। पर्याप्त सहयोग के आभाव में फिर वही चुनाव सामने आता है, “मानवतावादी संवेदना और द्वन्द्वात्मक संघर्ष के बीच।” इसमें ईश्वरवाद की दूर-दूर तक कोई भूमिका नहीं है। हर व्यक्ति गांधी बने रहते हुए भी महात्मा नहीं बन सकता। उसे चुनना होगा।
बिना संहार के,
सर्जन असंभव है;
समन्वय झूठ है,
सब सूर्य फूटेंगे
व उनके केंद्र टूटेंगे
उड़ेंगे खंड
बिखरेंगे गहन ब्रह्मांड में सर्वत्र
उनके नाश में तुम योग दो!
-मुक्तिबोध
क्रमशः…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा की सभी कड़ियां यहाँ देखेंः
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-1: अनजान द्वारा खुद को समझे जाने से जीवन मनोहारी हो गया
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-2: भोजन करने और भोजन पाने के बीच का अंतर भी समझ आने लगा
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-3: उसने मेरे पैर छू कर कहा, बाबा, कहीं मत जाओ…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-4: मैंने सोचा, खतरनाक होने के लिए खतरनाक होना जरूरी नहीं होता
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-5: वाह, पचास रुपए? बड़े दिनों बाद इतने रुपए एक साथ देखे थे…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-6: जीवन में पहली बार रोजदारी की थी, वह भी भक्ति की!
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-7: भोपाल करीब आने लगा तो मैं ट्रेन में ऊपर चढ़कर बैठ गया…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-8: दोनों घूम-घूम कर पार्टी का प्रचार कर रहे हैं, सावधान रहना
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-9: नक्सलवाद के एक काल्पनिक बिजूके को प्रतीक बनाया गया
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-10: मैंने अपना पूरा नाम बताया तो वे एकदम उछल पड़े…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-11: कथा वाचक की नई भूमिका, मुझे अंदर से हँसी आ रही थी…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-12: वृंदावन की कुंज गली में बदल गया मेरा नजरिया
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-13: ब्रज जा कर जाना, श्रद्धा से किस तरह आनंदित रहा जा सकता है
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-14: मैं बाबा नहीं बन पाया…मैं हार गया!
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-15: अहसास हुआ कि लोग सफर को मंजिल से बेहतर क्यों बताते हैं…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-16: मैं संघ का भेदिया हूं, वकील तो ऐसे होते नहीं हैं…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-17: घर बनते जाते हैं, जमीन बंटती चली जाती है लेकिन रहते सब साथ-साथ हैं
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-18: सौ दिन पूरे… लगता है घर से बहुत दूर न जाकर गलती कर दी
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-19: मैं सन् उन्नीस सौ बावन में सातवीं फेल हुआ हूं…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-20: संभवतः किसी को उम्मीद नहीं होगी कि मैं इस तरह फट पडूंगा…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-21: दहेज का दबाव न हो तो हर मर्द चार-पांच ब्याह कर लेगा
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-22: पूरे पच्चीस साल बाद पैदल अपने गांव भंवरताल जा रहा हूं…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-23: अपने गांव भंवरताल में हूं; एक वो दिवाली थी, एक ये दिवाली है, एकदम अलग
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-24: खबर फैल गई कि मैं ‘बैरागी’ हूं, इनाम नहीं मिलेगा
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 25ः भंवरताल में आखिरी रात है, पता नहीं कब आना होगा…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 26ः वकालत छोड़ी, फिर अपनाई, मैं उलझता चला जा रहा था…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 27: उस दिन मैं अचानक छोटा-मोटा ‘महामानव’ बन गया… मगर
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 28ः चोम सिंह ने समझा दिया, 21 वीं सदी में अपनी शर्तों पर जिया जा सकता है
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 29ः आज ऑफिस में लगेगा ताला, नाम पट्टिका हट जाएगी
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 30ः उन जगहों पर लाैटना जहां कभी मन बैरागी बन कर गया था…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 31ः स्वामी अवधेशानंद बाेले, विभूति जी आप अवश्य आइए, मुझे प्रतीक्षा रहेगी
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 32ः नाते-रिश्तेदार ‘माता-पूजन’ कर मनाते हैं ईंद, हैं न अनाेखी बात
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 33: बुढ़े ने रहने बुला लिया, हम सामान लिए चले आए, रात में बोला, घर से निकलो
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 34ः बाबा, मैं ठीक होना चाहता हूँ… बाबागिरी मेरा पीछा नहीं छोड़ रही
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 35ः ऐसा लगा जैसे दुनिया जीत ली, सिर्फ तीन दिन बाद जबर्दस्त मुँह की खाई
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 36: काेई खेत नहीं गया, कोई बाजार, कोई स्कूल, राे कर बोले, बाबा मत जाओ
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 37: मैं विचलित हूं, मुझे बताए बिना महेश जी ने ऐसा क्यों किया?
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 38: जिसे ‘खूनी सोंडवा’ कहते हैं, मुझे वहीं मिला सबसे ज्यादा आनंद
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 39 : जो मैं कहना चाह रहा था, वह खुद न कहकर उनसे कहलवा लिया
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 40 : मरेंगे और मारेंगे, नहीं तो जिंदगी किस काम की! कानून की पढ़ाई दांव पर
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 41 : स्वामी अवधेशानन्द ने कहा− मैं चाहता हूं कि आप…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 42 : आप इतने अच्छे आदमी हैं, कैसे लोगों के बीच फँस गए?

