वृक्षों सी हम लड़कियां
सच में अजीब ही होती हैं हम बचपन से लेकर बुढ़ापे को लांघती लड़कियां! हम जिसे भी अपनाते हैं, वो हमारे दिलों में आजीवन हमारा होकर ही रहता है।
सच में अजीब ही होती हैं हम बचपन से लेकर बुढ़ापे को लांघती लड़कियां! हम जिसे भी अपनाते हैं, वो हमारे दिलों में आजीवन हमारा होकर ही रहता है।
अमीन सयानी ने परंपरा से हट कर काम किया। भाइयो और बहनों सुनने के आदी समाज में बहनों और भाइयों कह कर महिलाओं को सम्मान देने की शुरुआत की।
Ameen Sayani Death: ख्वाबों सी आवाज, जादू सा असर जारी >
जब भी घर पर मां बेसन गट्टे बनाती थी हम चौके चुल्हे के आसपास मंडराते रहते थे। बेसन में मिर्च-मसाला और मोइन डाल जब लकड़ी के पाटले पर दोनों हाथों से बेलनाकार बना कर उन्हे उबला जाता तो हमारे मुंह में स्वाद घुल जाता।
मालवा का स्वाद: बेसन गट्टे बनने के पहले बालभोग जारी >
प्रख्यात हिंदी भाषाविद, लेखक और रतलाम महाविद्यालय के पूर्व प्राचार्य डॉ. जयकुमार जलज का बीते दिनों देहांत हुआ। उनके कृतित्व को नमन करते हुए उनके ही द्वारा बताई गई घटना यहां प्रस्तुत है। आपातकाल के दौरान की यह घटना वास्तव में मूल्यों के प्रति आस्था और जीवन का सटीक उदाहरण है।
आपातकाल, एक खत और सरकारी नौकरी पर संकट जारी >
मेरा पहला प्यार मुझे जब मिला तब मैं शायद साढ़े पांच साल की रही होंगी। मैं बोलती गयी, वो मुस्कुराता रहा और फिर जब मैंने अपने आसपास देखा तो सभी मुझे तारीफ भरी नजरों से देख रहे थे।
पहला प्यार और मैं: साथ भी और पास भी जारी >
मालवा के परिचय का एक चेहरा यहां की बोली की मिठास और आहार के स्वाद का है। मालवा का अपना खास स्वाद है। पड़ोसी राज्य गुजरात और राजस्थान का सिग्नेचर फूड भी मालवा में आ कर यहां का स्वाद पा कर इठला गया है।
स्वाद आस्वाद: गुजरात के ढोकलों से अलग है मालवा के ढोकले जारी >
सरकारी सर्वे के दौरान महिलाओं से बात करने के लिए घर आंगन में कुछ देर बैठना हो जाता था। ऐसे ही सर्वे में एकबार सुवासरा के मीणा मोहल्ले में जाना यादगार अनुभव बन गया।
गली-मोहल्ले में यूं मिल जाता है इनोवेशन जारी >
आज से कई दशकों पहले मैनपुरी में साल में चार-चार मेले लगा करते थे ठाकुर जैत सिंह जी और ठाकुर माधव सिंह जी (माधौ) की जमींदारी में। जैतसिंह जी की बिटिया और माधव सिंह जी की बहना हमारी अम्मा मतलब दादी मां थी। समय बीतते के संग लोग भी वैकुंठ चले गए। पीछे जो रह गया वे हैं …
यादों के गलियारों में खूशबुओं का फेरा जारी >
आपाधानी से भरे जीवन के बीच एक दिन में एक पेड़ से मिलने गया था। चित्र में जो पेड़ दिख रहा है उससे मेरा परिचय तकरीबन 25 साल पुराना है। सन् 2000 से पहले की बात है जब मैंने पहली बार इस पेड़ को देखा था। उस समय मेरे पास कैमरा भी नहीं रहता था…
शुक्र है, आंगन का यह नीम बचा हुआ है अब तक जारी >
निदा फाजली साहब ने क्या खूब कहा है, धूप में निकलो, घटाओं में नहा कर देखो, जिंदगी क्या है, किताबों हटा कर देखा। मुझे लगता है कि बतौर शिक्षक किसी की सफलता को सिर्फ उसकी कक्षा के परिणाम से नहीं देखना चाहिए। किसी भी शिक्षक का आकलन उसके पूरे काम से करना चाहिए…
तब तुम्हें मारा था, मुझे दर्द अब तक होता है जारी >