मैं एक ‘बुरी’ मां हूं और मुझे इसका कोई पछतावा नहीं

पूजा सिंह, स्‍वतंत्र पत्रकार

रेखांकन: वत्‍सल विभोर राय

आज ‘मदर्स डे’ है। मां का दिन, मां के गुणगान का दिन, उसके त्याग उसकी महिमा के बखान का दिन। आज मांओं पर अच्छा होने का दबाव है। गुणों की खान होने का, बच्चों की शिक्षिका, परिवार की धुरी, सबका ख्याल रखने वाली देवी, सबको भोजन देने वाली अन्नपूर्णा। मां यानी एक महिला की यह विविधतापूर्ण व्याख्या दरअसल उसकी पहचान का विस्तार नहीं करती बल्कि उसे सीमित कर देती है, समेट देती है।

वह सबकुछ हो सकती थी, होती भी है। वह पुलिस इंसपेक्टर हो सकती है, लोको पायलट या पायलट हो सकती है, इंजीनियर, डॉक्टर या एस्ट्रोनॉट होती है लेकिन उसके सामने हमेशा बड़ी कसौटी एक ही होती है- वह कैसी मां है?

एक औरत कैसी मां है? इसे बात को आंकने के कई पैमाने हो सकते हैं: वह अपने बच्चों को कैसे रखती है? उन्हें क्या सिखाती है? उनके लिए क्या करती है वगैरह…वगैरह। इन पैमानों पर खुद को परखते हुए मैं अक्सर सोचती हूं कि मैं कैसी मां हूं? मैं कैसी मां हूं यह तो शायद बड़ी होकर मेरी बेटी ही बता पाएगी लेकिन खुद से थोड़ी दूरी पर खड़ी होकर जब खुद को देखती हूं तो पाती हूं कि दुनियावी पैमानों पर मैं एक बुरी मां हूं।

मैं ‘बुरी’ मां क्यों हूं?

जी हां, मैं ‘बुरी’ मां हूं और मेरे पास उसकी अपनी वजहें हैं। जरूरी नहीं कि दूसरे लोग भी इससे इत्तफाक रखें। मैं बुरी मां हूं क्योंकि मैं बच्चों (मेरे मामले में बेटी) या किसी और के लिए अपने जीवन को पूरी तरह समर्पित नहीं कर सकती। अपने सपनों पर मिट्‌टी नहीं डाल सकती। मैं बुरी मां हूं क्योंकि मैं तबसे काम पर जा रही हूं जब मेरी बेटी एक साल की भी नहीं हुई थी। एक स्पष्टीकरण जरूर दूंगी कि इस दौरान मैंने बेटी की समुचित देखभाल भी सुनिश्चित की। यहां मैं बता दूं कि मैं काम पर केवल पैसे कमाने के लिए नहीं जाती हूं। मैं काम पर इसलिए जाती हूं क्योंकि यह मेरे आत्मविश्वास और आत्मसम्मान के लिए जरूरी है। यह एक मनुष्य के रूप में मेरे ‘ग्रो’ करने के लिए जरूरी है।

मैं इसलिए भी एक ‘बुरी’ मां हूं क्योंकि मैंने अपने दिन का एक हिस्सा अपने लिए निकाला है। मैं उसे अपनी बेटी क्या किसी के साथ भी बांटना पसंद नहीं करती। वह हिस्सा मैं अपने मनचाहे कामों में लगाती हूं। मुझे रोज सुबह पार्क में जाकर मीलों दौड़ना पसंद है और यह काम मैं रोज करती हूं। इसके अलावा भी कई काम हो सकते हैं। वह पढ़ना भी हो सकता है और लिखना भी, अपने प्रिय लोगों से मिलना और सोशल सर्विस भी हो सकती है, अकेले लेटे-लेटे संगीत सुनना भी हो सकता है, अपनी बुलेट पर अकेले राइड पर निकल जाना या कोई भी ऐसा काम जो मुझे पसंद हो।

यह समझना होगा कि कर्मठ और घर के कामकाज में डूबी रहने वाली मां एक ‘ओवररेटेड’ अवधारणा है जो कहीं से भी नॉर्मल नहीं लगती। अगर एक औरत दिन का कुछ वक्त अपने लिए निकालती है तो यह न केवल उसके लिए बल्कि उसके परिवार के लिए भी अच्छा होता है। भले ही यह बात कुछ देर से समझ में आती है।

मैं ‘बुरी’ मां इसलिए भी हूं क्योंकि मैं अपनी बेटी की दोस्तों की मम्मियों और अपने पति के दोस्तों की पत्नियों को बाई डिफॉल्ट अपना दोस्त नहीं मानती या बना लेती। ऐसा भी नहीं है कि मैंने उनसे दोस्ती न करने की कसम खायी हो लेकिन सच यही है कि एक स्वतंत्र व्यक्ति के रूप में मैं अपनी दोस्तियां खुद चुनती हूं जिनके पीछे निश्चित रूप से कुछ साझा कारण होते हैं।

मैं ‘बुरी’ मां हूं क्योंकि मैं हर गलत बात पर बच्ची का साथ नहीं देती। मैं इस बात की अहमियत समझती हूं कि सही उम्र में अगर उसे सही-गलत का अंतर सिखाऊंगी तो वह जीवन भर उसके काम आएगा। अगर बच्चे की गलतियों को ढकना, उसकी कमियों को छिपाना, उसके गलत कामों पर परदा डालना ही अच्छी मां के गुण हैं तो मैं जोर देकर कहना चाहती हूं कि मैं न ऐसी अच्छी मां हूं और न ही बनना चाहती हूं।

मैं इसलिए भी ‘बुरी’ मां हूं क्योंकि घर पर खाना पकाने को मैं ‘केवल’ अपनी जिम्मेदारी नहीं मानती। खाना पकाना मेरा शौक जरूर है लेकिन मैं अपने आप को विकल्पहीन ढंग से रसोई में नहीं झोंक सकती। मैं इस बात को लेकर किसी किस्म का गिल्ट भी नहीं महसूस करती हूं। मैं यह जरूर सुनिश्चित करती हूं कि घर में खाने-पीने की चीजों की कोई कमी न हो लेकिन मैं खाना बनाने को अपना कर्तव्य नहीं मानती।

मैं ‘बुरी’ मां हूं क्योंकि मैं रोबोट की तरह व्यवहार नहीं कर सकती। मुझे भी गुस्सा आता है, मुझे भी रोना आता है, मैं फिल्मों और टीवी और फिल्मों में नजर आने वाली मां की तरह आदर्श और व्यवस्थित मां नहीं हूं जो तमाम पीड़ाओं और कष्ट के बावजूद अपने बच्चों के सामने हंसमुख और दिलदार बनी रहती है।

मातृ दिवस की बात हो और अपनी मां का जिक्र न हो यह तो मुमकिन नहीं है। इन बातों को लिखते हुए मां की याद दिमाग में समांतर चलती रही। मेरी मां ने वह जीवन जिया जो समाज में एक आदर्श मां की मान्य परिभाषा के हिसाब से मान्य है। उन्होंने पिता के मित्रों और रिश्तेदारों की आवभगत की। अपने बच्चों को पाला, फिर बच्चों के दोस्तों की आवभगत की। उम्र भर उन्होंने जो कुछ किया उसका श्रेय न तो उन्हें पिता से मिला और न ही अपने बच्चों से। समाज में तो उनकी खैर क्या ही कद्र होनी थी।

मैं अक्सर सोचती हूं कि क्या ही अच्छा होता कि वह भी एक बुरी मां होती और स्वार्थी होकर थोड़ा सा समय अपने लिए निकालती।


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