शिव फूल रचते हैं और गौरा सुगंध भरती हैं
उमा-महेश सृष्टि का पहला/ जोड़ा है, उमा-महेश की ही/ जुड़ी सबसे पहले गाँठ/ और धरती ने पहली बार बिआह-सुख निहारा…
शिव फूल रचते हैं और गौरा सुगंध भरती हैं जारी >
उमा-महेश सृष्टि का पहला/ जोड़ा है, उमा-महेश की ही/ जुड़ी सबसे पहले गाँठ/ और धरती ने पहली बार बिआह-सुख निहारा…
शिव फूल रचते हैं और गौरा सुगंध भरती हैं जारी >
शिव ने कोई भी ऐसा काम नहीं किया जिसका औचित्य उस काम से ही न ठहराया जा सके। आदमी की जानकारी में वह इस तरह के अकेले प्राणी हैं जिनके काम का औचित्य अपने-आप में था।
मात खा रहे शिव ने कुछ ऐसा किया कि स्तब्ध रह गई पार्वती जारी >
फ़ैज़ जिस दौर में रच रहे थे तब दुनिया फासीवाद, नाजीवाद और पूंजीवाद की तिहरी मार झेल रही थी। इन तमाम परिदृश्यों ने उनकी पहले से सचेत सामाजिक नागरिक समझ को वंचित और मजलूम तबकों के साथ अधिक गहराई से जोड़ दिया।
इश्क़, इंक़लाब और फ़ैज़ जारी >
मेरे लिए यह सिर्फ एक मैदान नहीं है। इसी मैदान ने यह अहसास कराया कि कोई सावर्जनिक स्थल सत्ता से सवाल पूछने और सबको इंसाफ मिले, बराबरी का दर्जा मिले, इसकी खोज के मंच भी हो सकते हैं।
मेरे अहसासों का इकबाल मैदान, जम्हूरियत और शाहीन जिसकी शान जारी >
शेर जीवन की उस हक़ीक़त को भी बयां कर रहा है जिसमें कई सारे अक़्स हमें नज़र आते हैं। आगे की ओर जाने की इच्छा से कुछ क़दम पीछे लौटना बुरा नहीं होता।
लगानी पड़ती है डुबकी उभरने से पहले… जारी >
इस फिल्म को देखते हुए सिर्फ महसूस किया जा सकता है। महसूस किया जा सकता है कि शाब्दिक, मानसिक और शारीरिक हिंसा किस तरह हमारे जीवन को प्रभावित कर रही है।
14 मिनट सितार दिल को छलनी करता है और तबला विचारों को बेचैन जारी >
भारतीय सिनेमा की यात्रा पर संवाद का आयोजन हुआ। इस अवसर पर दो सशक्त और समकालीन विषयों पर आधारित फिल्मों ‘प्यास’ और ‘ग्वावा– ए मॉब लिंचिंग’ का प्रदर्शन किया गया।
सिनेमाई क्रूरता के इस दौर में कला से ही उम्मीद: प्रो. गोहिल जारी >
सूरत को देखकर किसी की सीरत का अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता। मगर सवाल यह है कि इस असली सीरत को बताए कौन?
आईनों रूह का चेहरा भी दिखा दो उनको… जारी >
कई लोग इस दोराहे पर खड़े हैं कि अपनी किताब छापें या नहीं? असमंजस भी बड़ा है, कौन पढ़ेगा, कौन छापेगा, कैसे छपेगी किताब।
सुधा जैसा असमंजस सीधा-साधा, अपनी किताब छापें या नहीं? जारी >
शांति को केवल युद्ध की अनुपस्थिति के रूप में नहीं देखा जा सकता। आर्थिक स्थिरता, राजनीतिक समावेशन और संस्थागत विश्वसनीयता भी शांति के अनिवार्य तत्व हैं।
बिना गोलियों का युद्ध और वैश्विक शांति की तलाश जारी >