मांं की जगह कोई हो नहीं सकता
आज दुनिया भर मातृ दिवस यानी मदर्स डे मना रही है। मां के नाम रखे गए इस खास दिन कुछ तस्वीरों में मां की झलक।
मांं की जगह कोई हो नहीं सकता जारी >
आज दुनिया भर मातृ दिवस यानी मदर्स डे मना रही है। मां के नाम रखे गए इस खास दिन कुछ तस्वीरों में मां की झलक।
मांं की जगह कोई हो नहीं सकता जारी >
मदर्स डे पर मां का फोटो देख कर मुझे बस एक बात ही याद आई.. बाई तू आज वेती तो (मां तू आज होती तो) …
यादों का कारवां: बाई आज तू वेती तो… जारी >
क्या मां की ममता, करुणा, त्याग का मोल मात्र एक दिवसीय शुभकामनाएं हो सकती हैं? क्या हमें साल में एक दिन के महिमा-मंडन से खुश-संतुष्ट हो सालभर उस यशगान की धुन गाते-गुनगुनाते अपनी सभी परेशानियां ताक पर रख देनी चाहिए?
मां… कुछ फिक्र अपनी भी कर लें जारी >
मानव संबंध तो जटिल होते ही हैं पर जितनी जटिलता मां, बेटे और बहू के संबंध में अभिव्यक्त होती है, वह तो अद्भुत और असाधारण होती है! उसकी कोई तुलना ही नहीं!
रिश्तों की सियासत में उलझा मां का दुलारा जारी >
पद्मश्री डॉ. सुरजीत पातर जिन्हें पंजाब के युग कवि पुकारा गया और जिन्हें शब्दों का समर्थ कवि की संज्ञा दी गई। उनकी कविताएं भले ही पंजाबी में लिखी गईं लेकिन उनमें सारे जहान की अनुभूति समाहित है और इसी कारण कविताएं अनुवाद के रूप में पंजाब, भारत का दायरा लांघ कर पूरे विश्व में पहुंची हैं।
दाड़ी पगड़ी वाला कवि जो जादूगर समझा गया… सच में जादूगर था जारी >
विगत दिनों एक ऐसी पेंटिंग या कहूं चित्रकृति पर नजर ठिठक गईं जिसमें प्रदर्शित कम हो रहा था मगर जो छुपे हुए अर्थ वह पेंटिंग बताना चाह रही थी उसकी आवाज मुझ तक जाने कैसे पहुंच गई कह नहीं सकता। इस आवाज को आप भी सुनें।
बोलते संगीत वाद्यों का चित्रकार नागनाथ मानकेश्वर जारी >
जीना, असल में सरल आचरण और मनोभाव का समुच्च्यन है। हम विज्ञान, विचारणा, वितर्क और चिंतन के जंगल में मानवीयता को लगभग भूल चुके हैं, ऐसे में कुछ लोग मिले जो फरिश्तों जैसे हैं।
कुछ लोग मिले फरिश्तों जैसे…वो जिनके हाथ में रहता है परचम-ए-इंसां जारी >
गुलमोहर हमें बताता है कि सबके साथ रहकर भी सबसे अलग रहना, सबमें अलग होना क्या होता है। कैसे सबके बीच रहकर भी अपनी विशिष्टता के कारण अलग से पहचाने जाते हैं हम।
अपनी गलियों में अपने गुलमोहर की छांंह जारी >
सुंदर मठ, झरनें, झीलें और शांत कैफे, जहां आज का कर्कश विदेशी संगीत नहीं बल्कि धीमे स्वर में चलते बौद्ध मंत्र मैक्लोडगंज को एक दिलचस्प पर्यटन स्थल बनाने में योगदान करते हैं।
‘उपस्थित होना’ ही है वहां रहने का आनंद जारी >
शब्दों और तस्वीरों का मिला जुला रंग हमें खुद से, अपनी यादों से जोड़ता है। हमरंग में उसी शाम का रंग जो हमारी अपनी है। हमारी यादों वाली शाम। हमारे अहसासों वाली शाम।