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अपने गांव भंवरताल में हूं; एक वो दिवाली थी, एक ये दिवाली है, एकदम अलग

सब कुछ छोड़ देने की संकल्पना के बावजूद ऐसा बहुत कुछ हम सबके पास होता है, जो कभी भी छूटता नहीं। शायद यही अपनापन और जुड़ाव हमें हमेशा जीवंत भी बनाए रखता है।

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पूरे पच्चीस साल बाद पैदल अपने गांव भंवरताल जा रहा हूं…

झाबुआ से धार आते हुए मैं सोच रहा था कि लगातार विरोधाभासी रहवासी परिस्थितियों में रह पाना कितना सार्थक हो पाएगा। जब तक आगे के कार्य की स्पष्टता तक यह चलाया जा सकता है।

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55 की उम्र में एवरेस्ट फतहः प्रामाणिक होकर ही छू सकते हैं शिखर….

आज बातें अदम्य साहस और संकल्प की धनी एक अज़ीम शख्सियत विदुषी ज्योति रात्रे की, जो पर्वतारोहण के रिकार्ड के पन्नों पर एक स्वर्णाक्षर हैं।

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दहेज का दबाव न हो तो हर मर्द चार-पांच ब्याह कर लेगा

मैंने स्पष्ट किया कि धर्म और धर्म जागरण की जो आप लोगों की समझ है उसे लेकर आप में और मुझमें गंभीर मतभेद हैं जो आगे चलकर और गहरे हो सकते हैं।

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संभवतः किसी को उम्मीद नहीं होगी कि मैं इस तरह फट पडूंगा…

मैंने स्पष्ट किया कि धर्म और धर्म जागरण की जो आप लोगों की समझ है उसे लेकर आप में और मुझमें गंभीर मतभेद हैं जो आगे चलकर और गहरे हो सकते हैं।

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मैं सन् उन्नीस सौ बावन में सातवीं फेल हुआ हूं…

उस जीप में कम से कम 30 लोग तो रहे ही होंगे। यह समझ नहीं आ रहा था कि ड्राइवर अंदर है या बाहर? वह आगे देख कैसे पा रहा होगा?

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सौ दिन पूरे… लगता है घर से बहुत दूर न जाकर गलती कर दी

इन आदिवासियों की नैसर्गिक प्रतिभा और सौंदर्य दृष्टि को लेकर मैं जरूर सम्मोहित हो रहा था। स्पष्ट कहूं तो सम्मोहित हो गया था।

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घर बनते जाते हैं, जमीन बंटती चली जाती है लेकिन रहते सब साथ-साथ हैं

मैं नैतिक और अनैतिक की दुविधा से गुजर रहा था। मगर यहां का आदिवासी समुदाय इसे जिस सहजता से स्वीकार और अंगीकार कर रहा है, वह वास्तव में शोध का विषय हो सकता है।

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मैं संघ का भेदिया हूं, वकील तो ऐसे होते नहीं हैं…

वैसे देखा जाए तो पिछले लगभग दो महीने में, जब से मैं सम्पर्क में हूं, शिवगंगा ने कांवड़ यात्रा और गणेश उत्सव आयोजन में ही सारी शक्ति झोंक रखी है।

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अहसास हुआ कि लोग सफर को मंजिल से बेहतर क्यों बताते हैं…

सोचता हूं पिता का न रहना, हमें एकाएक वयस्क से प्रौढ़ बना देता है। उनके रहते हम हमेशा निर्णय लेने की प्रक्रिया में बहुत सक्रिय नहीं रहते।

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