vibhuti Jha

मैं संघ का भेदिया हूं, वकील तो ऐसे होते नहीं हैं…

वैसे देखा जाए तो पिछले लगभग दो महीने में, जब से मैं सम्पर्क में हूं, शिवगंगा ने कांवड़ यात्रा और गणेश उत्सव आयोजन में ही सारी शक्ति झोंक रखी है।

मैं संघ का भेदिया हूं, वकील तो ऐसे होते नहीं हैं… जारी >

अहसास हुआ कि लोग सफर को मंजिल से बेहतर क्यों बताते हैं…

सोचता हूं पिता का न रहना, हमें एकाएक वयस्क से प्रौढ़ बना देता है। उनके रहते हम हमेशा निर्णय लेने की प्रक्रिया में बहुत सक्रिय नहीं रहते।

अहसास हुआ कि लोग सफर को मंजिल से बेहतर क्यों बताते हैं… जारी >

ब्रज जा कर जाना, श्रद्धा से किस तरह आनंदित रहा जा सकता है

समझ में आ गया साधु और भिखारी में यही अंतर है। वैसे हम दोनों ही बिना टिकट हैं। पर हम से होने वाला व्यवहार एकदम अलग-अलग है।

ब्रज जा कर जाना, श्रद्धा से किस तरह आनंदित रहा जा सकता है जारी >

वृंदावन की कुंज गली में बदल गया मेरा नजरिया

बस, वृंदावन की गलियां में चलते चले गए। वृंदावन की गलियों का जिक्र तो कई गानों, भजनों में है, लेकिन प्रत्यक्ष देखने का मौका अभी मिला। वह अनदेखा जैसे अब साकार हो रहा है।

वृंदावन की कुंज गली में बदल गया मेरा नजरिया जारी >

कथा वाचक की नई भूमिका, मुझे अंदर से हँसी आ रही थी…

लो तो अब हम पिताजी भी हो गए इस बतीस साल के लड़के की मां और छह साल की पोती की दादी के पिताजी! अब यहां से दण्ड-कमण्डल समेटने का समय आ गया है।

कथा वाचक की नई भूमिका, मुझे अंदर से हँसी आ रही थी… जारी >

मैंने अपना पूरा नाम बताया तो वे एकदम उछल पड़े…

करीब बीस-पच्चीस मिनिट की चढ़ाई के बाद झरने तक पहुंच गए। बेहद रमणीक स्थान है। मैं तो खड़ा देखता ही रह गया। यहां से हटने का मन ही नहीं कर रहा था।

मैंने अपना पूरा नाम बताया तो वे एकदम उछल पड़े… जारी >

नक्सलवाद के एक काल्पनिक बिजूके को प्रतीक बनाया गया

आज तय किया है कि घोसलिया से काफी दूरी पर तीसरा बांध देखने जाएंगे जो इसी साल पूरा हुआ है और जिसमें पहली बार पानी भरा है।

नक्सलवाद के एक काल्पनिक बिजूके को प्रतीक बनाया गया जारी >

दोनों घूम-घूम कर पार्टी का प्रचार कर रहे हैं, सावधान रहना

झाबुआ जिले में जल संरक्षण का काम बड़े स्तर पर काफी समय से चल रहा है। मैं पहले कभी झाबुआ नहीं गया था इसलिए जाने की इच्छा तो है।

दोनों घूम-घूम कर पार्टी का प्रचार कर रहे हैं, सावधान रहना जारी >

भोपाल करीब आने लगा तो मैं ट्रेन में ऊपर चढ़कर बैठ गया…

अब मैं केवल भविष्य की बातें करता हूं। अतीत की नहीं। एक माह में यह बड़ा परिवर्तन आया प्रतीत हो रहा है। महसूस हो रहा है कि मुझमें अब काफी स्पष्टता आती जा रही है।

भोपाल करीब आने लगा तो मैं ट्रेन में ऊपर चढ़कर बैठ गया… जारी >

जीवन में पहली बार रोजदारी की थी, वह भी भक्ति की!

अब मैं केवल भविष्य की बातें करता हूं। अतीत की नहीं। एक माह में यह बड़ा परिवर्तन आया प्रतीत हो रहा है। महसूस हो रहा है कि मुझमें अब काफी स्पष्टता आती जा रही है।

जीवन में पहली बार रोजदारी की थी, वह भी भक्ति की! जारी >