एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-45

- विभूति झा, सामाजिक कार्यकर्ता
संपादन: चिन्मय मिश्र
यह अनिवार्य रूप से घटित हुआ भी एक साधारण दस्तावेज है। यह न तो कहानी है, न यात्रा वृतान्त। यह एक व्यक्ति की “लौटने” की गाथा है। विभूति दा की यह डायरी अबूझ सी सच्ची कहानी है। यह सत्य की अभिव्यक्ति है। –चिन्मय मिश्र
मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल जिले मंडला से निकलकर सागर विश्वविद्यालय से एमए और एलएलबी। फिर जेएनयू (नई दिल्ली) से समाज विज्ञान में शोधकार्य किया। भोपाल से वकालत शुरू की और भोपाल गैस त्रासदी मामले में गैस पीड़ितों के वकील बने। एक युवा वकील ने बड़े बड़े वकीलों की दलीलों को खारिज कर भोपाल गैस पीड़ितों को मुआवजा दिलवाने की लड़ाई जीती। जिला अदालत से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक पैरवी और फिर एक दिन अचानक पूरी प्रसिद्धि, अपने समृद्ध भविष्य की संभावना को पुराने वस्त्र की तरह उतार कर चल पड़े एक नए जीवन की खोज में। मन में विचारों का उफान और तन पर एक जोड़ी कपड़ों के साथ सबकुछ छोड़ दिया। परिवार भी। किसी फिल्म की पटकथा सा लगता यह इस डायरी के लेखक विभूति झा के जीवन की वास्तविकता है। एक ऐसा मंथन जो जीवन उद्देश्य खोजने की दिशा में बढ़ा और इस राह में उतने ही विविध अनुभव हुए। यह एक विस्तृत जीवन से साक्षात्कार है। किश्त-दर-किश्त रोचक होती जीवन दास्तां।
कट्ठीवाड़ा की सीख- मकर संक्रांति 2009
बिना संहार के सर्जन असंभव है। समन्वय झूठ है।
मुक्तिबोध की इन पंक्तियों को मैं स्वयं के साथ साकार होते देख पा रहा था। पिछला एक साल मैंने कमोवेश स्वयं के अहंकार और ज्ञान के संहार में बिताया था। साधुओं से आदिवासियों तक का मेरा सफ़र और अपने बचपन की ओर वापसी मुझे समझा रहे थे कि समाज को गतिमान बनाने के तत्व कुछ और हैं और वह अब तक मुझसे अबूझे से हैं। यह तय है कि पिछला एक वर्ष मेरे लिए अभी भी एक पहेली बना ही हुआ है। मुझे लग रहा है कि मेरे साथ जो घटित हो रहा है उसमें मेरी भूमिका न्यूनतम ही है। एक स्थान से दूसरे स्थान तक का सफर जैसे स्वचलित सा रहा। अब संभवतः मैं अपने सफ़र में किसी प्रस्थान बिंदु तक पहुंच गया हूँ। अंततः एक ऐसे समुदाय में कार्य करने पहुंच गया हूँ, जहां मैं उनकी भाषा नहीं जानता और उस समुदाय के अधिकांश लोग मेरी भाषा नहीं जानते। पर हम परस्पर संवाद कर पा रहे हैं। क्यों और कैसे संभव हो पाया यह अपने आप में किसी रहस्य से कम नहीं है।
गांधी एक बड़ी महत्वपूर्ण टिप्पणी सामाजिक कार्यकर्ताओं के संदर्भ में स्वयं के लिए करते हैं। वे कहते हैं-
“मैंने अपने जीवन के लिए जो धर्म चुना है,वह उस परोपकारी योध्दा का नहीं है, जो लोगों को कठिन परिस्थितियों से छुटकारा दिलाने के लिए सर्वत्र घूमता रहता है। मैं लोगों के सामने ऐसे उदाहरण पेश करने का प्रयास करता हूँ जिसमे वे अपनी कठिनाइयाँ स्वयं हल करना जान सकें।”
साथ ही वे यह भी कहते थे कि
“जो लोग स्वतंत्रता की अपेक्षा सुरक्षा अधिक पसंद करते हैं,उन्हें जीने का कोई अधिकार नहीं।”
इन बातों को ध्यान में रखते हुए मैं अंततः अब जीवन के अपने संभवतः सबसे रचनात्मक काल में प्रवेश कर रहा हूँ। देखते हैं, कितना क्या संभव हो पाता है! कट्ठीवाड़ा मेरे जीवन में एक ऊर्जा लेकर तो आया ही है। यहाँ एक बहुत सुंदर कहावत प्रचलित है “एक तवा की रोटी कोई पतली कोई मोटी” यानी मनुष्य द्वारा निर्मित प्रत्येक वस्तु में थोड़ी बहुत भिन्नता होती है और यही भिन्नता या विविधता प्रत्येक मनुष्य में भी है। तभी तो आदिवासी समाज व्यक्तिगत स्वतंत्रता का चरम ही है।
यहाँ शुरुआत धीरे-धीरे हो ही रही थी। अफवाहें या चिंताएं धीरे-धीरे मेरे कानो में पड़ने लगी थीं। सबसे पहला सवाल तो वैसे भी दिमाग में ही उठा था कि पारसिंग ने मुझे यहाँ इस मकान में क्यों रखा? यह भी सुनने आया कि संघ से जुड़े उत्साही कार्यकर्ता पादरी समझकर मुझे शारीरिक क्षति पहुँचाने की जुगत में हैं। शायद हेरविग से सम्पर्क का प्रभाव। इसी बीच यहाँ से लगे हुए गुजरात के कुछ स्थानों में बम विस्फोट हुए और कहा गया मुस्लिम चरमपंथी यह कर रहे हैं, जिनके संबंध इस इलाके में भी हैं। तो अब एक नई आशंका कुछ लोगों के दिमाग में घर करने लगी-कहीं यह मुस्लिम आतंकवादी तो नहीं है? बाबा की तरह रहता है लेकिन चंदन-तिलक नहीं लगाता, दाढ़ी रखता है और मुसलमानों से भी बड़े प्रेम से बात करता है? इस तरह मैं एक साथ आर.एस.एस. का प्रचारक, ईसाई प्रचारक और मुस्लिम आतंकवादी – तीनों ही अलग-अलग लोगों की नजरों में हो गया। इससे हटकर तो कुछ सोच ही नहीं पाते थे कस्बाई मानसिकता वाले अर्द्धशिक्षित लोग। भला कोई पढ़ा-लिखा ‘सभ्य’ आदमी ऐसी जगह में क्यों आयेगा ? उनकी जिज्ञासा स्वाभाविक ही थी। कट्ठीवाड़ा के जंगल बड़े ही खूंखार इलाके माने जाते हैं जहाँ छोटी-छोटी बात पर हत्या और चोरी-डकैती, लूट-पाट बहुत ही आम बात है। यहाँ मार-पीट जैसी छोटी-मोटी बात नहीं होती, सीधे हत्या ही होती है जिससे कि मरने वाला न तो बयान दे सके न बदला ले सके। चोरी-डकैती तो एक व्यवसाय है।
कोई बाहरी आदमी के स्वेच्छा से यहाँ आने और रहने का प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता, जब तक कोई विवशता न हो या धर्म-परिवर्तन जैसा कोई निश्चित ध्येय न हो। ऐसा व्यक्ति भी बस्ती-बाजार में रहता है, दूर सुनसान में अकेले नहीं रहता। ज़रूर कोई गड़बड़ है ! जिसने भी मुझसे पूछा तो मैंने यही बताया कि मैं आदिवासियों के बीच रहकर अध्ययन के लिए आया शोधकर्ता हूँ। परंतु ज्यादातर लोगों को यह बात पची नहीं। इसी दौरान मुझें दो बातें साफ़ समझ आ चुकी थीं। पहली रहने के लिये कोई दूसरा स्थान कट्ठीवाड़ा से ही लगा हुआ ढूँढ़ना ज़रूरी है और दूसरा आत्मरक्षा के लिहाज से कुछ तैयारी होना भी ज़रूरी है। इसी बीच एक दिन अखबार में मध्यप्रदेश मानव अधिकार आयोग से संबंधित रपट पढ़ी। ध्यान आया कि साल-दो साल पहले आयोग ने एक योजना बनाई थी विभिन्न व्यक्तियों और संगठनों को सामाजिक कार्य के लिए ‘आयोग मित्र’ का दर्जा देने से संबंधित । उस स्कीम को तैयार करने में मेरी भी भूमिका थी। वहाँ सभी परिचित हैं – जस्टिस धर्माधिकारी, जस्टिस आजाद और विजय शुक्ल । विजय शुक्ल लंबे समय से परिचित और मित्रवत रहे हैं, पुलिस से सेवानिवृत हो अभी-अभी आयोग के सदस्य बन गये थे। उनसे फोन पर ही बात की और हफ्ते-पन्द्रह दिन में ‘झाबुआ’ क्षेत्र के लिये ‘आयोग मित्र’ की मान्यता प्रदान करते हुए पत्र आ गया। प्रारंभिक पहचान वाली समस्या पुलिस और प्रशासन के लिहाज से तो सुलझ गई। खट्टाली के अनुभव से यह सबक लिया था।
मैं नये घर में पहुंच गया था। तभी ऐसा लगा साथ रहने और रोज़मर्रा का काम करने के लिये किसी लड़के का साथ में रहना जरूरी है। पारसिंग की मदद ली। एक के बाद एक स्कूली लड़कों को साथ रखने की कोशिश की लेकिन कोई चल नहीं पाया। ये आदिवासी लड़के अकेले नहीं रह सकते, समूह में ही रहना चाहते हैं और दूसरा अनुशासन में नहीं रह पाते। अंततः साथ रहने वाला कोई नहीं मिला, धीरे-धीरे अकेले रहने की आदत पड़ गई और अच्छा भी लगने लगा सब कुछ खुद करना अपने लिये । गृहस्थी जम गई। कभी-कभार दूधवाला लड़का कमल और फिर धीरे-धीरे पड़ोस के घर का लड़का अविनाश मिलने आने लगे। सामान लेकर आने के बाद से पारसिंग से सम्पर्क रहने लगा और उसकी दूकान पर अक्सर जाकर बैठने लगा। वहीं लोगों से धीरे- धीरे जान-पहचान होने लगी। पारसिंग को लगने लगा कि मैं महत्वपूर्ण व्यक्ति हूँ और उसके लिए काफी काम का आदमी साबित हो सकता हूँ। मुझे भी लगने लगा कि यहाँ काम करने के लिये पारसिंग का साथ बहुत उपयुक्त हो सकता है और उसी के माध्यम से मैं आदिवासियों से जुड़ सकता हूँ।
पारसिंग कभी-कभार खाने के लिए भी घर बुलाने लगा। 15 अगस्त को उत्कृष्ट उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में पारसिंग की संस्था ‘सर्वधर्म’ की ओर से पुरस्कार वितरण के लिये मुझे बुला लिया और मैं वहाँ बोला भी। अब लोगों ने धीरे-धीरे पहचानना शुरू किया। उसी दिन मैं रक्षा बंधन के लिये सागर चला गया और 19 अगस्त को लौटा । पारसिंग की दूकान पर बैठे हुए चर्चा हुई कि कई दिन से बिजली गुल होने से गुस्से में आये युवकों ने 16 तारीख की रात में हंगामा किया और छोटे से बिजली दफ्तर को आग लगा दी। उसके बाद बिजली तो ठीक नहीं हुई लेकिन पुलिस ने लगभग 30 लोगों के खिलाफ़ आगजनी और सार्वजनिक सम्पत्ति को क्षति पहुँचाने का मुकदमा दर्ज किया है। इसमें एक ही व्यक्ति है नामजद, बाकी भीड़ है जिसमें वे किसी को भी पकड़ सकते हैं। डरकर सारे नवयुवक छुपे हुए हैं और नेताओ के चक्कर लगा रहे हैं। पुलिस भी उन्हें डरा रही है। पारसिंग ने इच्छा व्यक्त की कि मैं इस मसले को सुलझाऊँ। मेरे लिए भी यह एकतरह का टर्निंग पॉइंट ही रहा।
गांधी बाबा कहा जाने लगा
20 अगस्त 2008 का दिन बहुत महत्वपूर्ण रहा। पारसिंग और शिवराज जादव ने मिलकर शाम को लोगों को इकट्ठा किया, धीरे-धीरे लगभग सौ लोग इकट्ठे हो गये । इस मामले में इरशाद शेख को नामज़द मुल्ज़िम बनाया गया था । वह डर के छुपा हुआ था, उसे भी बुलाया। सरपंच वगैरह सब आये। घंटों बैठक चली। मैं काफ़ी देर बोला और पहली बार बताया कि मध्यप्रदेश मानव अधिकार आयोग ने भी मुझे मान्यता दी है। वहीं सब के बीच बैठकर कलेक्टर के नाम प्रतिवेदन तैयार किया और आश्वस्त किया कि सब साथ चलेंगे तो मामला सुलझ जायेगा, बिजली भी सुधर जायेगी। रात में ही सबके साथ पुलिस थाने गया और कहा कि मामला निपटा लेंगे अभी कोई गिरफ्तारी न करें। दूसरे दिन प्रतिवेदन टाइप कराया गया और नवयुवकों की टोली ने जुटकर उस पर कट्ठीवाड़ा और आसपास के गाँवों के सैकड़ों लोगों के हस्ताक्षर-अंगूठे करवा लिये।
यह मेरे लिये अवसर और परीक्षा की घड़ी दोनों ही थी। इसी के साथ मुझे शुरूआत के लिये एक मुद्दा मिल गया था। रात में नारे लग गये थे “बाबा तुम आगे बढ़ो, हम तुम्हारे साथ हैं।” हिन्दू-मुस्लिम, काँग्रेस- भाजपा, सभी इकट्ठे हो गये क्योंकि सभी के घरों से कोई न कोई लड़का हंगामे, तोड़-फोड़ में शामिल रहा था और सभी गिरफ्तारी से भयभीत थे। ऐसा लगा मेरी अब तक की ‘तपस्या’ फलीभूत हो रही है। मैं काफ़ी अधिक उत्साहित हो गया। 1975 का आपातकाल, जे.एन.यू. का छात्र आन्दोलन, भोपाल में ट्रेड यूनियन आंदोलन, हाईकोर्ट बैंच के लिये आंदोलन, कार्बाइड से गैस रिसन के बाद 1984-85 के आंदोलन, 1992-93 में साम्प्रदायिक दंगों के बीच और बाद में साम्प्रदायिकता विरोधी आंदोलन आदि सभी एक- एक करके आँखों के सामने घूमने लगे जिनमें में सब कुछ भूलकर, छोड़कर जुट जाता था। यहाँ मुद्दा तो था, लेकिन मेरी भूमिका कुछ फ़र्क होनी थी। कुछ ही समय में यहाँ के सारे नवयुवक आपसी बोल चाल में मुझे “गांधी बाबा” संबोधित करने लगे। मुझे पता लगा तो मैं हतप्रभ रह गया और बहुत गौरवान्वित भी हुआ। बस इतने से में ही इतना बड़ा सम्मान ! क्या लोग तरसते हैं इस तरह के लोगों के लिये? भारतीय समाज में सार्वजनिक क्षेत्र में शून्यता भी बड़ी समस्या है। साथ ही यह विस्मय का विषय था कि इस आदिवासी अंचल में भी गांधी की इतनी स्वीकार्यता है।
एक हफ्ते के अंदर ही दिनांक 27 अगस्त को ‘जन अधिकार मंच’ का गठन कर दिया गया और इसी नाम से ज्ञापन आदि भी दिये जाने लगे। कट्ठीवाड़ा से जाकर प्रतिनिधिमंडल पुलिस अधीक्षक से मिला, क्योंकि कलेक्टर अस्वस्थ होने से छुट्टी पर थे। उसके बाद मैं कलेक्टर से भी मिला। जून 2008 में ही नया-नया जिला बना है आलीराजपुर और पहले कलेक्टर, एस.पी. पदस्थ हुए हैं; चन्द्रशेखर बोरकर और जितेन्द्र सिंह कुशवाह। दोनों बहुत सकारात्मक लगे। कट्ठीवाड़ा दौरे पर आये तो उन्हें सामुदायिक भवन में ‘जन अधिकार मंच’ द्वारा आमंत्रित किया गया और उन्होंने लोगों से चर्चा की। ‘जन अधिकार मंच’ ने यह नई परम्परा डाली कि लोग अधिकारियों से मिलने नहीं जायेंगे, बल्कि अधिकारी ही लोगों से मिलने आयेंगे। कलेक्टर बोरकर बहुत संतुलित और उत्साही वामपंथी रूझान वाला नवयुवक लगा, जिसके साथ मिलकर कुछ काम किया जा सकता है। एस.पी. कुशवाह वैसे तो पदोन्नत हैं, लेकिन उन्होंने बहुत अधिक सहयोग किया।दोनों से ही अच्छा सामंजस्य हो गया। यह तय हुआ कि बिजली विभाग के अधिकारियों के साथ चर्चा करके मामले में समझौता कर लिया जायेगा और कोई गिरफ्तारी नहीं होगी। कलेक्टर और एस.पी. से इस तरह मित्रवत चर्चाएँ होती देख इस कस्बे के निवासी भौंचक्के रह गये और उन्हें लगने लगा कि अब तो हर मर्ज की दवा एक आदमी मिल गया है। मुझे बड़ा सम्मान और प्रेम मिलने लगा।
परंतु इस सबके चलते स्थानीय नेताओं और क्षेत्रीय विधायक आदि की पूछ परख कम हो गई। धीरे-धीरे काँग्रेस और भाजपा दोनों के स्थानीय नेता लोग बैठकों से गायब रहने लगे और असहयोगात्मक रुख अपनाने लगे। उन्हें लगा अगर इसी तरह सब चलता रहा और सब एकजुट हो गये तो उन्हें कौन पूछेगा? स्थानीय पुलिस और अधिकारियों को भी कष्ट होना स्वाभाविक था। सब दहशत में थे कि यह कौन सी बला आ गई गाँव में? सबके हित, या कहें तो स्वार्थ, आड़े आने लगे थे। भारत में राजनीति और समाजसेवा में कोई स्पष्ट विभाजन न होने से समस्या और जटिल हो जाती है। राजनेताओं के लिए जनहित गौण ही रहता है। उनका व्यक्तिगत और दलगत हित ही प्रमुख बने रहते हैं। उधर जन्माष्टमी, नवदुर्गा, ईद, गणेशोत्सव सब में अब बाबा ही प्रमुखता से दिखाई देने लगा।
इसी बीच बिजली वाले अधिकारियों से भी निरंतर सम्पर्क रहा और बिजली की स्थिति में बहुत सुधार आ गया। आसपास के गाँवों से लोग आने लगे जहाँ ट्रान्सफार्मर महीनों से ख़राब पड़े थे ।अभी तक कोई पूछने वाला नहीं था। हम लोगों ने गाँव-गाँव जाकर हस्ताक्षर अभियान चलाया और धीरे-धीरे लगभग सभी ट्रान्सफार्मर बदल दिये गये और गाँवों में भी नियमित बिजली मिलने लगी। अभी तक शिवगंगा का यहां की गतिविधियों में कोई सम्पर्क नहीं रहा था। दशहरा के दिन महेश जी अपने दल के साथ आये और एक दिन सब लोग यहाँ रुके, बनाया- खाया और घूमे-फिरे । यहाँ लोगों का मेरे प्रति आदर और प्रेम देखकर चमत्कृत होकर महेश जी चले गये। शायद सोच रहे होंगे कि सबकुछ इतना जल्दी कैसे घटित हो गया। मेरे कट्ठीवाड़ा आने से पहले हर्ष जी और महेश जी ने स्पष्ट रूप से मुझसे कहा था कि भारतीय ग्रामीण समाज में ‘धर्म’ का नाम लिए बिना कोई भी स्वीकार्य नहीं हो सकता।
इस दौरान मैंने मानव अधिकार आयोग ‘मित्र’ को कुछ अधिक गंभीरता से ले लिया। ऐसा लगा कि इस तरह से भी कुछ सार्थक काम किया जा सकता है। लेकिन कट्ठीवाड़ा में पुलिस केस के संबंध में आयोग की ओर से कोई कार्यवाही नहीं हुई। बस निरन्तर पत्रिका और पत्र पोस्ट से आते रहे जिसमें लिखा रहता कि सेमीनार करो, दिवस मनाओ, रैली निकालो, खर्च का विवरण भेजो और भुगतान प्राप्त करो! इसके कार्यक्रमों में प्रशासनिक अधिकारियों को बुलाओ और उन्हें मुख्य अतिथि बनाओ! यह समझने में बहुत समय नहीं लगा कि यह मानव अधिकार आयोग निरर्थक है और प्रदेश सरकार के एक विभाग की तरह ही काम करता है। सार्थक काम करने में किसी की रुचि नहीं है। यह पूर्णत: एक बनावटी और दिखावटी संस्था है जिसमें काम कर रहे लोग अपनी व्यक्तिगत सुख-समृद्धि और रुतबे की तरफ़ ही ध्यान देते हैं। हाँ, यह जरूर हुआ कि प्रारंभिक रूप से पुलिस, प्रशासन और नेताओं से सुरक्षित रहने के काम आया!
दशहरे तक गाँव में सबका जोश बरकरार रहा और सारे लोग मिलते-जुलते रहे। जब यह स्पष्ट हो गया कि गिरफ्तारियाँ अब नहीं होंगी, लोगों का डर खत्म हो गया, पूरे समय बाबा का चक्कर लगाना भी अब कम हो गया। मगर सम्मान तो बना रहा। कुछ दिन पहले पारसिंग ने पास के गाँव के कुछ लोगों को भेजा था जिनको जंगल में लकड़ी ले जाते नाकेदारों ने पकड़ा था, मारपीट की थी और पैसे लिये थे। इस मामले में हाथ डालना चाहिये या नहीं इस पर चर्चा हुई और उसी दौरान मतभेद उभरा। वन विभाग द्वारा पकड़ना सही था, मगर मारपीट और पैसे लेना ग़लत था। जंगल में जाकर देखा। उसके बाद जब नाकेदारों ने मंच के कुछ लोगों को धमकाया, तब मामला उठाना ज़रूरी हो गया। नाकेदारों की शिकायत की और कहा कि पैसे वापस दिलाए जाएँ। उनके पैसे तो वापस मिल गये लेकिन फॉरेस्ट वालों ने कट्ट्ठीवाड़ा के लोगों को चेतावनी दी कि अब किसी को भी जंगल से लकड़ी नहीं लाने देंगे। एक नयी समस्या खड़ी हो रही थी।
कट्ठीवाड़ा का प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र इस बहुत बड़े इलाके में यह अकेला अस्पताल है। सबका कहना था कि यहाँ बड़ी अव्यवस्था है, न इलाज होता न एम्बुलेंस मिलती है। मैं सबके साथ अस्पताल भी गया। कलेक्टर से भी बात की। जब बारी आई कि इस सब के लिये जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्यवाही की जाये तो कोई सामने नहीं आया। लगभग सारे लड़कों के परिवारों को अस्पताल से कुछ न कुछ मिलता है-इलाज छोड़कर। इसके अलावा किसी न किसी का रिश्तेदार या भाई-बंद, दोस्त ज़िम्मेदार हैं इन सारी गड़बड़ियों के लिये। कोई सामने नहीं आना चाहता, बस बाबा ठीक कर दें। सबकुछ व्यक्तिगत स्वार्थ से ही संचालित है। सार्वजानिक या सामुदायिक जीवन की अवधारणा अभी भी स्थापित नहीं हो पाई मगर कुछ तो सुधार हो गया।
इंदलवाट ग्राम पंचायत का भवन बना हुआ है। सड़क पर ही है, लेकिन उजाड़ पड़ा हुआ है। यहां कभी भी किसी को आते-जाते नहीं देखा, दरवाजे- खिड़कियाँ भी टूट रहे हैं। इसके लिए कुछ करना चाहिए। बताया गया कि शिवराज सिंह जादव इस पंचायत के सचिव (मंत्री) हैं और उसका काम उनके घर से ही चलता है। उनसे कौन बुराई ले ? शिवराज के सभी से अच्छे संबंध हैं, पुराने राजपरिवार का युवक है। उसे कहीं से पता लग गया कि ऐसी चर्चा चल रही थी और उसने भी मिलना-जुलना, और बैठकों में आना बंद कर दिया। असहयोग बढ़ता ही जा रहा है।
दशहरे के अर्से बाद इरशाद और पारसिंग दोनों ने अलग-अलग मिलकर एक ही प्रश्न किया कि ये लोग कौन हैं, क्यों आये थे और आपके इनसे क्या संबंध हैं? ये लोग से उनका आशय है महेश जी और उनकी टोली ! बताने, समझाने और बात साफ़ करने की कोशिश की, लेकिन बात कुछ बनी नहीं। इस वजह से दोनों के ही व्यवहार में और सक्रियता में फ़र्क आ गया। महेश जी का पूरी टोली के साथ आना तो मुझे भी ठीक नहीं लगा था, लेकिन क्या करता, महेश जी बहुत भोले हैं और उन्हें इतनी समझ नहीं है। खट्टाली में भी ऐसा ही कर चुके थे । यहाँ तो खैर अब वैसी स्थिति नहीं थी और मेरी पहचान बन चुकी थी, लेकिन अंतर तो पड़ा ही।
कार्यकारणी बनने के बाद सबका कहना शुरू हुआ कि हमें क्या मिलेगा? जो युवक जुड़े थे वे सभी कस्बे के ही थे। उनमें से ज़्यादातार छोटे-मोटे व्यवसाय में लगे हुए या नौकरी तलाश रहे बेरोजगार। नौकरी वाले तो पहले ही दूर हो चुके थे। युवकों ने सवाल किया कि इस काम में लगने से उन्हें क्या आर्थिक लाभ मिलेगा? कुछ ने तो स्पष्ट पूछा कि भ्रष्टाचारियों पर लगाम कसके उनसे वसूली भी की जा सकती है, इसमें क्या बुराई है? मैंने कहा ऐसा बिल्कुल नहीं हो सकता। उन्हें समझाया कि आर्थिक लाभ तो कुछ नहीं है, हाँ समाज में प्रतिष्ठा बढ़ेगी और समाज का लाभ होगा जिससे अंततः सभी का लाभ है। शासन की योजनाओं का लाभ सब तक पहुँचे यही देखना है और योजनाएँ सभी के लिये हैं, जिसमें तुम भी शामिल हो। समाज में भाईचारा, एकजुटता पैदा करना है। कुछ लोगों ने प्रश्न किया कि आदिवासियों का बहुत आतंक है कस्बाईयों पर, एकदम मारने-काटने पर उतर आते हैं। कानून भी उनके पक्ष में है। इसके लिये क्या करेंगें? मेरी समझ में आ रहा था कि यह सोच और समझ ही ग़लत है, आदिवासियों को ही सबसे ज़्यादा जागरुकता की ज़रूरत है। अगर ऐसा कुछ होता है तो वह तो प्रतिक्रिया स्वरूप है, ज़रूरत से ज्यादा दबाए जाने के ख़िलाफ़। मुझे तो मूलतः आदिवासियों के साथ ही जुड़ना है। आदिवासियों और गैर आदिवासियों के बीच ग़लतफहमी और असुरक्षा का भाव लगातार बना हुआ है। गैरआदिवासी और कस्बाई समाज अपने को आदिवासियों से श्रेष्ठ समझता आया है और अभी भी उसी मानसिकता का शिकार है।
इन्हीं परिस्थितियों के बीच मैं दीवाली- भाईदूज के लिये मंडला चला गया। उसी दौरान वहाँ बहन अर्चना का अचानक निधन हो गया, उसकी विक्षिप्त छोटी बेटी भव्या अनाथ और बेसहारा हो गई। मुझे वहाँ काफी समय लगाना पड़ा। बहुत दुःखी होकर लौटा। इसी दौरान विधानसभा चुनाव की घोषणा हो चुकी थी और प्रत्याशियों की चयन प्रक्रिया चल रही थी। मैं लौटा तो देखा लगभग सारे नवयुवक इरशाद और पारसिंग के नेतृत्व में काँग्रेस प्रत्याशी के प्रचार में जुट गये हैं। चुनाव के चक्कर में मैंने भी अपने आपको सारी गतिविधियों से दूर कर लिया था। कमल का मेरे घर आना-जाना बढ़ गया, सबसे क़रीब उनका ही घर है, इसलिये मेरा भी उठना-बैठना उनके यहाँ बढ़ गया। अविनाश का भी आना-जाना थोड़ा बढ़ा। इस बीच कमल ने बताया कि पारसिंग कह रहा था बाबा लकड़ी चोरों की मदद करते हैं, सारे फॉरेस्ट वाले दुश्मन हो गये हैं और यह कि बाबा गलत बताते हैं, मानव अधिकार आयोग मित्र जैसी कोई चीज़ होती ही नहीं। इरशाद के बारे में बताया कि बोल रहा था कि बाबा के चक्कर क्यों लगाएँ, कुछ न कुछ काम बता देते हैं, अब हमारा काँग्रेस का विधायक हो जायेगा, वही सब ठीक कर देगा। पुलिस केस भी ख़त्म करा देगा। इस तरह कमल ने पारसिंग और इरशाद के लिये नाराज़गी पैदा करा दी। मैंने मान भी लिया। वैसे भी सक्रिय राजनीतिज्ञ जब प्रतिस्पर्धा में हों तो कार्य और भी कठिन हो जाता है। छोटे कस्बों में यह परेशानी और भी अधिक है।
इस दौरान ‘बिजली आन्दोलन’ शुरू होने के बाद से साधना-हेरविग से सम्पर्क लगभग टूट ही गया। शुरूआत में ही उनसे बात हुई तो उनका रुख नकारात्मक था। उनका कहना था कि यहाँ कस्बे के लोग बड़े मतलबी हैं, इनके साथ जुड़ने का कोई मतलब नहीं। हम तो अपने प्रोजेक्ट्स के साथ गाँवों में आदिवासियों के बीच काम कर रहे हैं, वहीं ठीक हैं। तब मुझे उनकी बात जमी नहीं थी। यहाँ कस्बे के लोग भी उन्हें पसंद नहीं करते थे और अलग ही रखना चाहते थे। इस तरह उनसे दूरी हो गई थी।
विधानसभा के चुनाव सम्पन्न हो गये, यहाँ से काँग्रेस जीत गई। यहाँ तो काँग्रेस जीत गई लेकिन प्रदेश में भाजपा की सरकार बन गई। भाजपा के स्थानीय लोगों ने अपनी खीज मिटाने के लिये पुलिस को उकसाया कि इरशाद वगैरह कांग्रेस समर्थकों की अब गिरफ्तारियाँ की जाये। फिर से लुका-छुपी का खेल शुरू हुआ और काँग्रेस विधायक ने इस सबमें अपनी असमर्थता जताई होगी तो सबको फिर से बाबा याद आ गया।
मैंने तो केस वापस कराने की ज़िम्मेदारी ली हुई ही थी। यही कहा कि सबको इकट्ठा करो, तभी आगे कार्रवाई करूँगा। लोग फिर इकट्ठे हुए। इस बीच कोई नया थाना प्रभारी आ गया था, वह दबाव डाल रहा था, उसे शायद पृष्ठभूमि पता नहीं थी। उसने कहा दिसम्बर के अंत तक केस में प्रगति करना ज़रूरी है। चूंकि नामजद रिपोर्ट है और गैरजमानती अपराध है तथा दस साल की सज़ा का प्रावधान है, इसलिये गिरफ्तारी तो करनी पड़ेगी। फिर एस.पी. से फोन पर बात की। बिजली वाले अब सहयोग को तैयार नहीं हो रहे थे। एक बार फिर दीपक की मदद ली, उसने ऊर्जा सचिव संजय बंदोपाध्याय से कहा और उसके बाद एस.ई., ई.ई. सब कट्ठीवाड़ा आये, बैठक की। यह तय हुआ कि जो सामान टूटा-फूटा-जला है उसकी भरपाई करेंगे और केस वापस ले लिया जायेगा। दस हज़ार का सामान खरीदकर देना तय हुआ। ‘जन अधिकार मंच’ के नाम से चंदा करके पैसा जमा किया गया और सामान खरीदकर लाया गया। अब स्थानीय जूनियर इंजीनियर महोदय को सामान लेने और थाने में जाकर रिपोर्ट वापस लेने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई। उस लाइनमैन को बुलाया गया जिसने रिपोर्ट की थी। तमाम नखरों के बाद ये दोनों तैयार हुए। सब थाने गये, मुझे भी जाना पड़ा। थानेदार अड़ गया कि ऐसे केस ख़त्म नहीं होगा, गिरफ़्तारी तो करना ही पड़ेगा। वह माना ही नहीं, लिखा-पढ़ी के लिये। फिर एस.पी. को फोन किया और उसके बहुत समझाने और डाँटने के बाद ही थानेदार तैयार हुआ। उसका बहुत नुकसान हो गया था। इस तरह 30 दिसम्बर 2008 को पुलिस के रजिस्टर से प्रकरण समाप्त हो गया। सभी स्वतन्त्र हो गये। थानेदार बहुत चिढ़ गया। बोला मेरी तीस साल की नौकरी में ऐसा कभी नहीं हुआ। उसकी बात सही है, ऐसा कभी होता नहीं, लेकिन यहाँ कट्ठीवाड़ा में हुआ। एक असंभव बात संभव हो गई ।
क्या साधना-हेरविग का सोचना ठीक था? ठीक रहा हो या नहीं, परंतु यह तो साफ़ था कि मेरे लिए काम करने की जगह कस्बा नहीं बल्कि दूर-दराज के गाँव हैं। साफ़ तो खैर पहले से ही था और यही उद्देश्य भी था, लेकिन शुरूआत कैसे हो? यह तो एक संयोग ही था कि बिजली आंदोलन चल पड़ा और मैंने सोचा कि कस्बे से गाँव तक फैलना संभव हो पायेगा। लेकिन अब समझ में आया कि वह सोच-समझ ही ग़लत थी। कस्बे से गाँव नहीं बल्कि गाँव से कस्बे की तरफ़ बढ़ना चाहिए। लेकिन प्रश्न फिर वही कि ऐसी अनजान जगह में गाँव में कैसे और क्या लेकर शुरूआत की जाये? अकेले ? भाषा भी तो एक बहुत बड़ी समस्या है। भीली- भिलाली।
दीवाली के बाद लौटकर साधना-हेरविग से सम्पर्क दोबारा होने लगा था। बातचीत, विचार-विमर्श होने लगा था। अपने संस्थान में मुझे एडवाइजरी बोर्ड पर भी रखना चाहते थे और एक पत्र भी लिखकर दिया इसके लिए। यह सब तो नहीं, लेकिन यह ज़रूर लगा कि इनसे कुछ हद तक सहयोग लिया-दिया जा सकता है। पत्र का तो मैंने जवाब नहीं दिया। परंतु यह कहा कि मेरे साथ के लिये कोई ऐसा व्यक्ति ढूंढ़ने में मदद करो जो भील-भिलाला हो, पूरे समय मेरे साथ रहे और गाँव- गाँव मेरे साथ जाया करे। तय हुआ कि कुछ समय तक तो उनके यहाँ काम कर रहे लोगों में से ही कोई साथ घूमेगा, आगे चलकर देखेंगे, कोई मिल जायेगा। अब तो यही लग रहा था कि ऐसा एक व्यक्ति मिल जाये और एक मोटरसायकिल रख लें तो गाँवों में शुरूआत की जा सकती है। आसपास के कुछ गाँवों में तो लोग पहचानने भी लगे थे। इसी दौरान रठौड़ी गाँव में एक जुआन सिंह नामक पढ़ा-लिखा भील युवक सम्पर्क में आया था। कट्ठीवाड़ा में छ: महीने में और जो भी सार्थक हुआ या नहीं, यह तो जरूर हुआ कि यहाँ एक सद्भावना का वातावरण बन गया था और एकदम खुलकर विरोध करने में लोगों को थोड़ी झिझक होगी। यही बड़ी उपलब्धि थी। इसी सोच, समझ और विचार के साथ 2008 समाप्त हुआ । इस पूरे वर्ष में सफलता-असफलता, संतोष- असंतोष का एक मिला-जुला अनुभव रहा। यह तो जरूर हुआ कि इस दौरान बिल्कुल अकेले, बिना किसी साथ या सहारे या मदद के रहना और अपनी रोज़मर्रा की जिंदगी में सब कुछ करना सीख लिया। यह एक उपलब्धि ही है।
साधना ने उनके यहाँ काम कर रहे लोगों में से एक धानसिंह को मेरे पास भेजना शुरू कर दिया साथ गाँवों में जाने के लिये। उसी के साथ जनवरी के मध्य में जाना शुरू किया। भला सा आदिवासी युवक धार जिले का। उसका भाई यहाँ गायत्री मंदिर में है। उससे चर्चा चलती रही साथ रहने की लेकिन यहाँ सुनसान-बियाबान में रहने को उसकी पत्नी तैयार नहीं हुई। धानसिंह के साथ दो-तीन गाँव गया, लेकिन कुछ ख़ास बात नहीं बनी। मैं तो चाहता था इस तरह से गाँवों में सम्पर्क हो जाये, जिससे आगे अपनी तरह से काम कर सकूँ । थोड़ी-बहुत चर्चा तो होती रही, लेकिन आगे नहीं बढ़ पाई।
क्रमशः…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा की सभी कड़ियां यहाँ देखेंः
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-1: अनजान द्वारा खुद को समझे जाने से जीवन मनोहारी हो गया
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-2: भोजन करने और भोजन पाने के बीच का अंतर भी समझ आने लगा
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-3: उसने मेरे पैर छू कर कहा, बाबा, कहीं मत जाओ…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-4: मैंने सोचा, खतरनाक होने के लिए खतरनाक होना जरूरी नहीं होता
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-5: वाह, पचास रुपए? बड़े दिनों बाद इतने रुपए एक साथ देखे थे…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-6: जीवन में पहली बार रोजदारी की थी, वह भी भक्ति की!
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-7: भोपाल करीब आने लगा तो मैं ट्रेन में ऊपर चढ़कर बैठ गया…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-8: दोनों घूम-घूम कर पार्टी का प्रचार कर रहे हैं, सावधान रहना
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-9: नक्सलवाद के एक काल्पनिक बिजूके को प्रतीक बनाया गया
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-10: मैंने अपना पूरा नाम बताया तो वे एकदम उछल पड़े…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-11: कथा वाचक की नई भूमिका, मुझे अंदर से हँसी आ रही थी…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-12: वृंदावन की कुंज गली में बदल गया मेरा नजरिया
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-13: ब्रज जा कर जाना, श्रद्धा से किस तरह आनंदित रहा जा सकता है
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-14: मैं बाबा नहीं बन पाया…मैं हार गया!
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-15: अहसास हुआ कि लोग सफर को मंजिल से बेहतर क्यों बताते हैं…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-16: मैं संघ का भेदिया हूं, वकील तो ऐसे होते नहीं हैं…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-17: घर बनते जाते हैं, जमीन बंटती चली जाती है लेकिन रहते सब साथ-साथ हैं
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-18: सौ दिन पूरे… लगता है घर से बहुत दूर न जाकर गलती कर दी
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-19: मैं सन् उन्नीस सौ बावन में सातवीं फेल हुआ हूं…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-20: संभवतः किसी को उम्मीद नहीं होगी कि मैं इस तरह फट पडूंगा…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-21: दहेज का दबाव न हो तो हर मर्द चार-पांच ब्याह कर लेगा
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-22: पूरे पच्चीस साल बाद पैदल अपने गांव भंवरताल जा रहा हूं…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-23: अपने गांव भंवरताल में हूं; एक वो दिवाली थी, एक ये दिवाली है, एकदम अलग
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-24: खबर फैल गई कि मैं ‘बैरागी’ हूं, इनाम नहीं मिलेगा
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 25ः भंवरताल में आखिरी रात है, पता नहीं कब आना होगा…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 26ः वकालत छोड़ी, फिर अपनाई, मैं उलझता चला जा रहा था…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 27: उस दिन मैं अचानक छोटा-मोटा ‘महामानव’ बन गया… मगर
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 28ः चोम सिंह ने समझा दिया, 21 वीं सदी में अपनी शर्तों पर जिया जा सकता है
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 29ः आज ऑफिस में लगेगा ताला, नाम पट्टिका हट जाएगी
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 30ः उन जगहों पर लाैटना जहां कभी मन बैरागी बन कर गया था…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 31ः स्वामी अवधेशानंद बाेले, विभूति जी आप अवश्य आइए, मुझे प्रतीक्षा रहेगी
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 32ः नाते-रिश्तेदार ‘माता-पूजन’ कर मनाते हैं ईंद, हैं न अनाेखी बात
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 33: बुढ़े ने रहने बुला लिया, हम सामान लिए चले आए, रात में बोला, घर से निकलो
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 34ः बाबा, मैं ठीक होना चाहता हूँ… बाबागिरी मेरा पीछा नहीं छोड़ रही
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 35ः ऐसा लगा जैसे दुनिया जीत ली, सिर्फ तीन दिन बाद जबर्दस्त मुँह की खाई
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 36: काेई खेत नहीं गया, कोई बाजार, कोई स्कूल, राे कर बोले, बाबा मत जाओ
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 37: मैं विचलित हूं, मुझे बताए बिना महेश जी ने ऐसा क्यों किया?
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 38: जिसे ‘खूनी सोंडवा’ कहते हैं, मुझे वहीं मिला सबसे ज्यादा आनंद
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 39 : जो मैं कहना चाह रहा था, वह खुद न कहकर उनसे कहलवा लिया
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 40 : मरेंगे और मारेंगे, नहीं तो जिंदगी किस काम की! कानून की पढ़ाई दांव पर
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एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 42 : आप इतने अच्छे आदमी हैं, कैसे लोगों के बीच फँस गए?
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 43 : एक साल की यात्रा−सार…स्वाभाविकता ही वास्तविक जीवन
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 44 : एक लक्ष्यहीन यात्राःकट्ठीवाड़ा के ‘बाबा’ बम्हनी में ‘दादा’, प्रेम व विश्वास ही आधार

