सिद्धांत रूप में बेहतर मार्क्सवाद आखिर है क्या?
मार्क्सवाद केवल एक राजनीतिक या आर्थिक सिद्धांत नहीं है। यह एक दार्शनिक सिद्धांत भी है और उसी से उसके राजनीतिक और आर्थिक सिद्धांत भी निकलते हैं।
सिद्धांत रूप में बेहतर मार्क्सवाद आखिर है क्या? जारी >
मार्क्सवाद केवल एक राजनीतिक या आर्थिक सिद्धांत नहीं है। यह एक दार्शनिक सिद्धांत भी है और उसी से उसके राजनीतिक और आर्थिक सिद्धांत भी निकलते हैं।
सिद्धांत रूप में बेहतर मार्क्सवाद आखिर है क्या? जारी >
गुलमोहर हमें बताता है कि सबके साथ रहकर भी सबसे अलग रहना, सबमें अलग होना क्या होता है। कैसे सबके बीच रहकर भी अपनी विशिष्टता के कारण अलग से पहचाने जाते हैं हम।
अपनी गलियों में अपने गुलमोहर की छांंह जारी >
सुंदर मठ, झरनें, झीलें और शांत कैफे, जहां आज का कर्कश विदेशी संगीत नहीं बल्कि धीमे स्वर में चलते बौद्ध मंत्र मैक्लोडगंज को एक दिलचस्प पर्यटन स्थल बनाने में योगदान करते हैं।
‘उपस्थित होना’ ही है वहां रहने का आनंद जारी >
फिल्म को मोस्ट वायलेंट फिल्म की तरह से प्रमोट करते हुए फिल्ममेकर एक तरह से नये जॉनर की घोषणा कर रहा है। सवाल है कि क्या फिल्म को मोस्ट वायलेंट कहते हुए प्रमोट करना ठीक है?
‘एनिमल’ हो चुके समाज का मोस्ट वायलेंट यात्रा में स्वागत जारी >
दुनिया भर के श्रमिकों ने अथक परिश्रम से जो हक हासिल किए हैं। जो सुरक्षा हासिल की है उसे छीनने के जतन आज भी जारी हैं। विश्व श्रम दिवस इस लंबे संघर्ष से प्राप्त हुए हकों को याद रखने का दिन है।
छलावा है जितनी मेहनत उतना कर्मठ कहने का फलसफा जारी >
शब्दों और तस्वीरों का मिला जुला रंग हमें खुद से, अपनी यादों से जोड़ता है। हमरंग में उसी शाम का रंग जो हमारी अपनी है। हमारी यादों वाली शाम। हमारे अहसासों वाली शाम।
किसी भी शहर को देखने का, उसे याद रखने का सबका एक अलग नजरिया होता है। यायावरी के जुनून को पंख देकर आज उड़ चली हूं मध्यप्रदेश के मुरैना जिले में स्थिति दो प्रसिद्ध मंदिरों के प्रांगण में।
इक इरफान और उस इरफान से ‘जस्ट मोहब्बत’ जारी >
केंद्र सरकार ने तीन नये आपराधिक न्याय विधेयकों (जो अब कानून बन चुके हैं) को इस आधार पर उचित ठहराने की कोशिश की है कि मौजूदा कानून ‘औपनिवेशिक’ तो था ही, बदला गया कानून भारत विरोधी भी था। लेकिन तुलना करने पर पता चलता है कि नये कानून कहीं ज्यादा प्रतिगामी और कठोर हैं।
अंग्रेजों के जमाने के कानून अच्छे थे… जारी >
मम्मा इनकी मोटी ताजी/ पापा है भाई गप्पूजी/ किसे पता है बोलो-बोलो/ कौन है अपने झप्पूजी?
बाल कविता: प्यारे-प्यारे लप्पूजी जारी >
ये दुनिया इंसानों को पढ़कर पहचानने की लाइब्रेरी है। यहां इंसान नाम की किताब फ्री में उपलब्ध है। लेकिन कुछ अपवाद भी हैं। जैसे दुनिया की बेहतरीन पुस्तकें सबकी पहुंच में नहीं वैसे ही बेहतरीन इंसान भी सबको मिल पाना सबके नसीब में नहीं।
इंसानों को पढ़कर पहचानने की लाइब्रेरी है ये दुनिया जारी >