इंसानों को पढ़कर पहचानने की लाइब्रेरी है ये दुनिया

राघवेंद्र तेलंग, सुपरिचित कवि,लेखक,विज्ञानवेत्ता

आज यह सब लिखने से पहले मैं इस भाव में था कि जैसे आज किताबों की सालगिरह हो और आज मुझे सब गुडी-गुडी ही कहना चाहिए। लेकिन लगा कि किताबें जो हमारे उत्थान में सीढ़ियां बनीं आज उपेक्षा का विषय होती जा रही हैं। डिजिटल जिसने वर्चुअल को रियल बना डाला है हमारी आर्गेनिक दुनिया के लिए एक आसन्न संकट है। अब यह पीछे मुड़कर देखने का समय है, अपनी फिनिश लाइन तय करने का समय। अभी भी समय है। अभी भी समय है यह आज के समय की शाश्वत काल पुरानी आवाज है, समय-समय पर चेतावनी दे देता है। बहरहाल, तो चलिए आज कुछ बातें किताबों के बहाने।

ये दुनिया इंसानों को पढ़कर पहचानने की लाइब्रेरी है। यहां इंसान नाम की किताब फ्री में उपलब्ध है। लेकिन कुछ अपवाद भी हैं। जैसे दुनिया की बेहतरीन पुस्तकें सबकी पहुंच में नहीं वैसे ही बेहतरीन इंसान भी सबको मिल पाना सबके नसीब में नहीं। दुनिया की सबसे मूल्यवान चीजें क्या हैं यह बहुतों के लिए नामालूम विषय है। इंसानों को पढ़ते हुए हम उनके भीतर की तह में उनकी सोच के माध्यम से उतरते हैं। जानना चाहते हैं कि इसकी सोच के अंदर कितना उबाल और शीतलता का कितना अहसास है। ऐसे समय में हम पानी की तरह होते हैं। दो लोगों के मिलने-जुलने व घुलने को पानी के तरीके से देखा जाए तो यह तलाश हर मौसम में अनुकूल ताप के पानी की तलाश है जिसे प्यास के समय और स्नान की बेला में सहा जा सके।

एक अनिश्चितता से भरी दुनिया में अनिश्चित से निश्चित की ओर खोज की यात्रा की कवायद है इंसान से संवाद। यह जानते हुए भी कि दुनिया की ही तरह इंसान का व्यवहार भी अनिश्चित है फिर भी हम संबंधों में स्थायित्व चाहते हैं, ऐसी चाहत ही हमें वह सूत्र-समीकरण ढूंढने पर जोर देती है कि हम इंसानों को पढ़कर अपनी खातिर कोई नतीजा निकालें और निश्चित नजरिया बनाकर निश्चिंत हो जाएं। लेकिन इंसान वैसी एक किताब तो नहीं है जिसे एक खास उद्देश्य और मिशन के तहत चुने हुए शब्दों, जमाए हुए वाक्यों और प्रूफ रीडिंग करके किताब की तरह तैयार किया गया हो। या ऐसा भी कहा जा सकता है इंसान ने अपने आपको तय कर किताब की तरह रचा ही न हो या इसके बारे में सोचा ही न हो। आप पाएंगे आज इंसान के भीतर से किताब नहीं नोट बोल रहा है। इंसान बस बोल ही बोल रहा है उसके पास कहने को कुछ नहीं है। उसने अपनी पढ़ाई भुला दी है,पढ़ी हुई किताबें भुला दी हैं,उसके आसपास न ग्रंथ हैं,न कॉपी, न किताब, न कलम और यह सब अगर बचे भी हैं तो ड्राइंगरूम के शेल्फ में दिखाने भर के लिए, दिखावे की दुनिया में जीते हुए ऐसा ही होगा।

मशीन, मोबाइल, टीवी व कंप्यूटर में खोया हुआ इंसान खो गया है। रचने के सारे माध्यमों के औज़ार उसने तकनीकी के आगे सरेंडर कर दिए हैं। उसकी स्मृति अभी एक भूल-भुलैया में खो गई है क्योंकि उसने किताबों के दुश्मनों की समय पर पहचान नहीं की, उनसे एक संतुलित किनारा नहीं किया। सवाल यह है कि क्या इस अंधड़ में इंसान नाम की किताब के पन्ने इधर-उधर बिखर गए हैं। क्या इंसान को अपने आप को किताब मानना एक पुराना ख्याल लगने लगा है? क्या आज के इंसान के भीतर अब भी कुछ ऐसा बचा है जो किताब के मैटर जैसा कुछ लगे? क्या इस इंसान को पढ़ सकना संभव भी है जो मिलने से पहले ही अपनी जेब बार-बार चेक कर रहा हो? इस असुरक्षित और अनिश्चित इंसान को पढ़कर एक अनिश्चित राय ही बनेगी इंसानियत के बारे में।

किसी के मन की थाह लेने के लिए एक समुद्री गोताखोर के जैसा धैर्य चाहिए। मोती जैसा होता है इंसान का मन। सीप से ढंका हुआ। गोताखोर आशावादिता का प्रतीक है, वह गोता लगाता ही इसीलिए है कि कुछ नायाब-सा लेकर लौटे। हर वो इंसान जो एक मुकम्मल किताब है,अपने को एक सीप के आवरण में ढंके हुए है। फिर हर इंसान मोती में तब्दील हो भी नहीं पाता। उज्ज्वल मोती हो जाने में लंबा वक्त लगता है। जिसने अपने-आपको इस प्रक्रिया के लिए बचाए रखा हो, जिसे प्रक्रिया की मालूमात हो, जिसे भरोसा हो अपने-आप पर वह समुद्र के अथाह जल की तह में, भारी दबाव के बावजूद, बहते-बहते एक दिन अपने गोताखोर के हाथों में पहुंच ही जाएगा। वह गोताखोर किताब पढ़ने वालों में से है, वह इंसानों के बीच विचर रहा है। जिसमें अपने पन्ने खो जाने की बेचैनी है वह इंसान उसके काम का हो सकता है। वह भी उसके काम है जिसने अपने पुरखों की हस्तलिखित पांडुलिपियां अब तक बचाए रखी हैं। वह तो और काम का है जो अपनी जड़ों की भाषा ऐसे समय में बोल रहा है।

वह पाठक है जिसे गोताखोर कहा गया है यहां। शांत स्वरूप पाठक अपने सुदीर्घ धैर्य के साजो-सामान के साथ यात्रा पर है। वह आएगा और तुम्हें पढ़ेगा कुछ यूं कि तुम्हें पता ही न चलेगा। हो सकता है ठीक इसी वक्त जब तुम सीप के अंदर प्रशांत बैठे हुए मद्धिम प्रकाश में यह सब पढ़ रहे हो तभी ही कभी किसी के तुम्हें चुन लिए जाने के कंपनों का अहसास ‘एक दस्तक जैसा कुछ’ के रूप में लगे। ध्यान रहे, इसके बाद गोताखोरी का दायित्व तुम्हें ही संभालना है। खुद को, अपनी कलम को, स्याही और कागज को तैयार रखना।

raghvendratelang6938@gmail.com

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