एक कप चाय? … हो जाए…

दाम के हिसाब से महंगी चाय दुनिया के किसी भी कोने में मिले, हमारे लिए तो सबसे खास, सबसे कीमती चाय वह है जिसे पीने के अरमान बने रहें और मौका मिलते ही हम कह उठें, चलो चाय पीते हैं।

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40 साल गुजरे, गंगा मैली की मैली, 18 साल और …

हकीकत यह है कि बहुप्रचारित नमामि गंगे कार्यक्रम पर लगभग 40,000 करोड़ रुपये खर्च करने के बावजूद गंगा अभी भी अंधेरी है। स्थानीय लोगों और विशेषज्ञों दोनों का कहना है कि नदी ज्‍यादा साफ नहीं हुई है। सीवेज उपचार संयंत्र ठीक से कार्य नहीं कर रहे हैं। रेत खनन, ड्रेजिंग और अनियमित और अनुशासनहीन पर्यटन जैसी गतिविधियां नदी पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रही हैं ।

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मैं क्यों लिखता हूं? शायद इसलिए कि…

जीवन में मुझे अपने भाई का स्थान देने वाली वह बहन, अस्पताल में पड़ा वह नौजवान, जिसके मन में मृत्युशय्या पर भी मेरी पुस्तक पढ़ने की याद जगती है; बस में मिलने वाला वह किसान, जिसे इस बात पर हँसी आ जाती है कि मैं इतनी अच्छी किताब, लिख कैसे लेता हूं, जिसे पढ़कर उसकी स्त्री और लड़की दोनों खुश हों तथा किराये की साइकिल की दुकान चलाने वाला वह गरीब लड़का, जो मुझसे इसलिए अपनी साइकिल का किराया नहीं लेना चाहता कि मैं उसका प्रिय लेखक हूं- क्या इन सबका यह असीम स्नेह; मेरी पुस्तक की पर्याप्त रायल्टी नहीं है?

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डाकुओं के कब्‍जे वाली जगह पर एक साथ सौ मंदिर

एक-दो नहीं, लगभग आधा सैकड़ा से अधिक शिव मंदिर, जिन्हें आठवीं शताब्दी की कारीगरी का उत्कृष्ट नमूना कहेंगे। यह ‘बटेसर मंदिर समूह’ ख़जुराहो मंदिर से भी तीन सौ वर्ष पूर्व के बने हैं। हर दीवार व पत्थर को बारीकी से तराश कर बनाई गई बेशकीमती वास्तुशिल्प अपने होने पर इतराती, इठलाती खड़ी हो जैसे।

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क्या महत्वाकांक्षा के बगैर जीना संभव है?

हमारे लिए महत्वाकांक्षा का मतलब है कि हम जिस भी स्थिति में है वह ठीक नहीं है और हमें उससे आगे की किसी स्थिति के लिए कोशिश करते रहना है। जीवन भले ही नरक हो जाए लेकिन हमें फैलते जाना है, आगे बढ़ते जाना है, नया से नया हासिल करते जाना है।

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मैं एक ‘बुरी’ मां हूं और मुझे इसका कोई पछतावा नहीं

मैं ‘बुरी’ मां हूं क्योंकि मैं रोबोट की तरह व्यवहार नहीं कर सकती। मुझे भी गुस्सा आता है, मुझे भी रोना आता है, मैं फिल्मों और टीवी और फिल्मों में नजर आने वाली मां की तरह मां नहीं हूं।

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